सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 798, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदश अध्याय ज्योतिषोपनिषदध्याय (संक्षिप्त वर्णन) [श्लोक १-३—भूमगोल की रचना का उपदेश कैसे करना चाहिये। श्लोक ३-१३ भूभगोल बनाने की रीति। श्लोक १३-१५—लग्न, अन्त्या आदि के स्थान निश्चय करना। श्लोक १६-१७—भूमगोल किस प्रकार अपने आप घूम सकता है। श्लोक १८-२४—समय बतलानेवाले अन्य यन्त्रों की चर्चा। श्लोक २५—ज्योतिष का माहात्म्य।] भूभगोल बनाने की तैयारी— अथ गुप्ते शुचौ देशे स्नातश्शुचिरलङ्कृतः । संपूज्य भास्करं भक्त्या ग्रहान्भान्यथ गुह्यकान् ॥१॥ पारंपर्योपदेशेन यथा ज्ञातं गुरोर्मुखात् । आचार्यः शिष्यबोधार्थं सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ॥२॥ भूभगोलकस्य रचनां कुर्यादाश्चर्यकारिणीम् । अनुवाद—तब आचार्य स्नान करने के बाद अलंकार धारण करके शुद्ध मन से एकान्त और पवित्र स्थान में सूर्य, ग्रहों, नक्षत्रों और यक्षों की भक्ति के साथ पूजा करके परम्परा से प्राप्त उपदेश के द्वारा गुरु के मुख से सुने हुए और स्वयं प्रत्यक्ष देखे हुए ज्ञान से शिष्य को पूरी तरह समझाने के लिये भूभगोल की आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली रचना करे। विज्ञान-भाष्य—कई टीकाकारों ने आचार्य का अर्थ सूर्यांश पुरुष और शिष्य का अर्थ मयासुर किया है; परन्तु मेरी समझ में यह सभी आचार्यों के लिये साधारण उपदेश है। 'कुर्यात्' शब्द भी यही प्रकट करता है। इन श्लोकों से प्रकट होता है कि आचार्य को केवल मौखिक उपदेश से ही सन्तुष्ट नहीं होना चाहिये वरन् व्यावहारिक और क्रियात्मक ज्ञान भी कराना चाहिये जिसके लिये उसे स्वयं व्यावहारिक ज्ञान भी रखना चाहिये और ज्ञान को प्रत्यक्ष देनेवाला भी होना चाहिये, ऐसा नहीं कि टीका कर डालें सूर्य सिद्धांत ऐसे गूढ़ ग्रन्थ की, परन्तु आकाश के मुख्य- मुख्य तारों की भी पहचान न हो। ग्रहों की पूजा में सूर्य की पूजा भी आ जाती है परन्तु यहाँ ग्रहों के साथ सूर्य शब्द अलग भी आया है जो सूचित करता है कि सूर्य की विशेष प्रकार से