सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 797, कुल 838 में से
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- Left Top: Compared to moon Sukra 8.2242 Buda 3.2198 Mangala 25.1448 Guru 158.5672 Sani 394.0378 Sun 13.3688
- Right Top: Compared to Sun
७७२ | सूर्य-सिद्धान्त
पञ्चपञ्चाश्विनागर्तुं रसाद्र्यर्काश्विनेस्ततः । भानां खखखशून्याङ्कवसुरन्ध्रशराश्विनः ॥८६॥ खव्योमखत्रयखसागरषट्कनाग- व्योमाष्टशून्ययमरूपनगाष्टचन्द्राः । ब्रह्माण्डसंपुटपरिक्रमणं समन्ता- दभ्यन्तरा दिनकरस्य कर प्रसाराः ॥६०॥
अनुवाद—(८५) चन्द्रमा की कक्षा ३२४००० योजन, बुध शीघ्र की कक्षा १०४३२०६ योजन; (८६) शुक्र शीघ्र की कक्षा २६६४६३७ योजन, सूर्य, बुध और शुक्र की कक्षाएँ ४३३१५००; (८७) मङ्गल की कक्षा ८१४६६०६ योजन, चन्द्रोच्च की कक्षा ३८३२८४८४ योजन; (८८) गुरु की कक्षा ५१३७५७६४ योजन; राहु की कक्षा ८०५७२८६४ योजन; (८६) शनि की कक्षा १२७६६८२५५ योजन; नक्षत्र कक्षा २५६८६००१२ योजन और (६०) आकाश या ब्रह्माण्ड की परिधि १८,७१,२०- ,८०,८६,४०,००,००० योजन है जहाँ तक सूर्य की किरणों का प्रसार होता है ।
**विज्ञान-भाष्य—**यदि ग्रहों के कल्प-भगण मध्यमाधिकार के श्लोक २६-३३ के अनुसार मान कर इनकी कक्षाओं की गणना श्लोक ८२ के अनुसार की जाय तो ऊपर दी हुई संख्याओं की इकाई के अंक में थोड़ा सा अन्तर पड़ता है इसका कारण यह जान पड़ता है कि पूरी संख्या लिखने के लिए भिन्नात्मक अंश या तो छोड़ दिया गया है या आधे से अधिक होने के कारण १ मान लिया गया है। ऐसा जान पड़ता है कि चन्द्रोच्च और राहु की कक्षाएँ नियम की समानता दिखलाने के लिए दी गयी हैं क्योंकि ये आकाश में स्वतन्त्र पिंड नहीं हैं, ये तो चन्द्र कक्षा के ही दो विशेष बिन्दु हैं । नक्षत्र कक्षा का भी विशेष महत्व नहीं जान पड़ता ।
आजकल वेधों से यह सिद्ध होता है कि ग्रहों की कक्षाएँ गोल नहीं हैं वरन् दीर्घवृत्त हैं जिनकी एक नाभि पर सूर्य रहता है और सब ग्रह सूर्य की ही परिक्रमा करते हैं । पृथ्वी से किसी ग्रह की दूरी सर्वदा समान नहीं रहती जैसा कि ४१० पृष्ठ के लम्बनों की सारणी से तथा पृष्ठ ५६८ में दिये हुए शीघ्र कर्णों की सारणी से स्पष्ट है। इन शीघ्र कर्णों के मान ऐसी इकाइयों में दिये हुए हैं जिनकी १००० इकाई पृथ्वी से सूर्य की मध्यम दूरी मानी गयी है। ऐसी १००० इकाइयां ६२६००००० मील (६ करोड़ २६ लाख मील) के समान होती हैं क्योंकि पृथ्वी से सूर्य की मध्यम दूरी इतनी ही है (देखो पृष्ठ ४५२) । यदि यह दूरी योजनों में जानना हो तो मीलों को ५ से भाग दे देना चाहिए (देखो पृ० ५४) ।
इस प्रकार भूगोलाध्याय नामक १२वें अध्याय का विज्ञान-भाष्य समाप्त हुआ ।