भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 796

भूगोलाध्याय ७७१ दूसरे और तीसरे समीकरण से स्पष्ट है कि आकाश कक्षा का विस्तार उतना माना गया है जितना प्रत्येक ग्रह एक कल्प में योजनों में चलता है । इससे यह सिद्ध है कि हमारे आचार्य प्रत्येक ग्रह की योजनात्मक गति समान समझते थे जो आजकल के वेधों से अशुद्ध है । ग्रह की दैनिक कलात्मक गति जानने का सिद्धान्त वही है जो ४५१-५३ पृष्ठों में अच्छी तरह समझाया गया है । नक्षत्र कक्षा और आकाश कक्षा के विस्तार कल्पित हैं । नक्षत्रों या तारों की दूरी की सीमा नहीं है । आजकल के वेधों से सिद्ध होता है कि कोई-कोई तारे पृथ्वी से इतनी दूर हैं कि उनके प्रकाश के पहुँचने में लाखों वर्ष लग जाते हैं । ग्रह की दूरी जानने की रीति कक्ष्या भूर्कणगुणिता महीमण्डलभाजिता । तत्कर्णा भूमिकर्णस्त्यु ग्रहोच्चे स्वे दलीकृताः ।।८४।। अनुवाद—किसी ग्रह की कक्षा को भूव्यास से गुणा करने और भूपरिधि से भाग देने पर उस ग्रह की कक्षा का व्यास होता है । इससे भूव्यास घटा कर शेष का आधा करने से भू-पृष्ठ से उस ग्रह की ऊँचाई अथवा दूरी ज्ञात होती है । विज्ञान-भाष्य—परिधि से व्यास जानने का यह एक नियम है । भूव्यास का भू-परिधि से जो सम्बन्ध है वही सम्बन्ध है वही सम्बन्ध प्रत्येक ग्रह की कक्षा के व्यास और परिधि में होता है । इस श्लोक के पूर्वार्ध का सरल अर्थ यह है कि ग्रह की कक्षा को ३.१४१६ से भाग देने पर उसकी कक्षा का व्यास आ जाता है । श्लोक के उत्तरार्ध में जो बात बतलायी गयी है वह पृष्ठ ४०८ के चित्र ७८ से स्पष्ट हो जाती है । इस चित्र में यदि भ द रेखा को द की ओर इतना बढ़ाया जाय कि वह चन्द्र कक्षा और सूर्य कक्षा तक पहुँच जाय तो द से चन्द्र कक्षा के बिन्दु की दूरी को चन्द्रमा की ऊंचाई और सूर्य कक्षा के बिन्दु की दूरी को सूर्य की ऊँचाई समझनी चाहिये । इसी तरह अन्य ग्रहों की ऊँचाई के बारे में भी समझना चाहिये । ग्रह कक्षाओं के विस्तार योजनों में खत्रयाब्धिद्विवह्नयः कक्ष्या तुहिनदीधितेः । ज्ञशीघ्रस्याष्टखद्वित्रिकशून्येन्यवस्तथा ।।८५।। शुक्रशीघ्रस्य सप्ताग्नि रसाब्धि रसषड्यमाः । ततोऽर्कबुधशुक्राणां खखाथे कसुरार्णवाः ।।८६।। कुजस्यातोऽष्टशून्याङ्कषड्वेदैकभुजङ्गमाः । चन्द्रोच्चस्य रसार्थाष्टमुनिद्वित्यष्टहस्तयः ।।८७। कृतर्तुमुनिपञ्चाद्रिगुणेन्दुविषया गुरोः । स्वर्भानोर्दन्ततत्वाब्धिशंलाथाकाशकुञ्जराः ।।८८।।