सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 795, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें७७० सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान-भाष्य — इन दोनों श्लोकों की पूरी व्याख्या मध्यमाधिकार के पृष्ठ ४०-४५ में की गयी है इसलिये यहाँ अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है । नक्षत्र कक्षा, आकाश कक्षा तथा ग्रह की गतियों का सम्बन्ध— भवेद्भकक्षा तिग्मांशोर्भ्रमणं षष्टि ताडितम् । सर्वोपरिष्टाद्भ्रमति योजनैस्तैर्भमण्डलम् ॥८०॥ कल्पोक्त चन्द्रभगणा गुणिताः शशिकक्षया । आकाशकक्षा सा ज्ञेया कर व्याप्तिस्तथा रखेः ॥८१॥ सैव यत्कल्पभगणैर्भक्ता तद्भ्रमणं भवेत् । कुवासरैर्विभाज्याह्नः सर्वेषां प्राग्गतिः स्मृता ॥८२॥ भुक्तियोजनजा संख्या सेन्दोर्भ्रमण संगुणा । स्वकक्षाप्तातु सा तस्य तिथ्याप्ता गति लिप्तिकाः ॥८३॥ अनुवाद — (८०) सूर्य-कक्षा के योजनों को ६० से गुणा करने पर नक्षत्र- कक्षा के योजनों का मान आ जाता है। सब ग्रहों से ऊपर नक्षत्र मण्डल इतने ही योजना में घूमता है । (८१) शशिकक्षा के योजनों को एक कल्प के चन्द्र भगणों की संख्या से गुणा करने पर आकाश कक्षा का मान ज्ञात होता है । सूर्य की किरणें वहीं तक जाती हैं । (८२) आकाश कक्षा के मान को जिस ग्रह के कल्प-भगणों की संख्या से भाग दिया जायगा उसी ग्रह की कक्षा का मान योजनों में ज्ञात होगा । आकाश- कक्षा को कल्प के सावन दिनों के भाग देने पर सब गृहों की दैनिकगति योजनों में आ जाती है । (८३) इस योजनात्मक ग्रह गति को चन्द्र-कक्षा से गुणा करके जिस ग्रह की कक्षा से भाग देकर लब्धि को १५ से भाग दें उस ग्रह की दैनिक गति कलाओं में आ जायगी । विज्ञान-भाष्य — इन श्लोकों में जो कुछ बतलाया गया है उसकी चर्चा कई जगह की गयी है (देखो पृ० १५-१७; ४५१-५३) । संक्षेप में इसका सार यह है :— (१) नक्षत्र कक्षा = रवि कक्षा × ६० (२) आकाश कक्षा = कल्प के चन्द्र भगण × चंद्र कक्षा (३) $\frac{आकाशकक्षा}{कल्प में किसी ग्रह की भगण संख्या} =$ उस ग्रह की कक्षा (४) $\frac{आकाश कक्षा}{कल्प के सावन दिन} =$ प्रत्येक ग्रह की दैनिक योजनात्मक गति (५) $\frac{ग्रह की योजनात्मक गति\timesचंद्र कक्षा}{ग्रह कक्षा\times १५} =$ ग्रह की दैनिक कलात्मक गति