सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६२ सूर्य-सिद्धान्त चित्र १३६ को ध्यान से देखने पर यह बातें समझ में आ जायँगी । वृत्त खंड के दो समानान्तर त्रिज्याओं के बीच के आधे भाग को जो परिधि की ओर है काट कर निकाल देना चाहिये और द ध भुज पर लम्ब बनाती हुई दो समानान्तर रेखाएँ इस प्रकार खींचनी चाहिये कि दोनों के बीच का अंतर चद्दर की मुटाई के समान हो । इन्हीं रेखाओं के बीच के उतने हिस्से को निकाल देना चाहिये जिसकी लम्बाई वृत्त खंड के उस भाग के बराबर हो जो कटी हुई रेखाओं से प्रकट किया गया है। अब इस वृत्त खंड को द ध भुज पर इस प्रकार जोड़ देना चाहिये कि वृत्त खंड का केन्द्र द ध भुज पर आ जाय और इसका खुला हुआ भाग त्रिभुज के उस भाग पर बैठ जाय जो कटी हुई रेखाओं से प्रकट किया गया है। ऐसा करने पर इन दोनों का आकार चित्र १४० के उस भाग के समान हो जायगा जो खम्भे पर दिखलाया गया है। चित्र १३६ इस धूप घड़ी को ऐसे स्थान पर स्थापित करना चाहिये जहाँ धूप दिन भर रहती हो, घर या पेड़ की छाया कम पड़े तो अच्छा है। चार साढ़े चार फुट ऊंचा पक्का खम्भा बनवा कर उस पर यह इस प्रकार स्थिर करना चाहिये कि इसका त थ द उ भाग खम्भे की गच के नीचे हो, द उ ठीक दक्षिण-उत्तर रेखा पर हो, द उ ध त्रिभुज का तल ठीक सीधा खड़ा हो पूरब या पच्छिम किसी तरफ झुका न हो । ऐसी दशा में द ध किनारा ठीक आकाशीय ध्रुव की दिशा में रहेगा। यह खम्भे में अच्छी तरह जकड़ा रहना चाहिये, इसलिये यह अच्छा होगा कि क, ग, स्थानों पर छेद करके इनमें दो लोहे की छड़ें एक-एक हाथ लम्बी जड़ दी जायँ जिनके दूसरे किनारे दो-दो इन्च पर झुके रहें। इनके द्वारा यह धूप घड़ी खम्भे में डेढ़ फुट की गहराई तक जकड़ी रहेगी (देखो चित्र १४०) ।