सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्योतिषोपनिषदध्याय ७६१ यन्त्र, ५—कपाल यन्त्र, ६- राम यन्त्र, ७- दिगंश यन्त्र, ८- नाडीवलय यंत्र, ९— दक्षिणोत्तरभित्ति यन्त्र, १०-उन्नतांश यन्त्र, ११- चक्र यन्त्र, १२-क्रान्तिवृत्त यन्त्र । इन यन्त्रों की विशेष चर्चा करने की आवश्यकता यहाँ नहीं है। इनसे प्रकट होता है कि प्राचीन काल में हमारे राजे महाराजे ज्योतिष सम्बन्धी खोज के लिये कैसा परिश्रम करते थे और कितना रुपया खर्च करते थे । इस अध्याय को एक साधारण धूप घड़ी के बनाने की रीति लिखकर समाप्त किया जायगा । ऐसी धूप घड़ी के लिये पीतल की चद्दर जिसकी मुटाई ३/८ इंच के लगभग, लम्बाई १५ से २० इंच तक और चौड़ाई दस या बारह इन्च हो तो काम चल सकता है। इस चद्दर से एक समकोण त्रिभुज ऐसा काट लेना चाहिये जिसकी लम्बी भुज पर जो कोण बने वह उस स्थान के अक्षांश के समान हो जहाँ धूप-घड़ी स्थापित करना हो। इसी प्रकार का एक समकोण त्रिभुज बची हुई चद्दर में भी बन जायगा । मान लीजिये त थ न ध पीतल की चद्दर का चौकोर टुकड़ा है। इससे द ध न एक समकोण त्रिभुज ऐसा काट लिया जिसका कोण द ध न प्रयाग के अक्षांश २५°२५' के समान है। बचा हुआ टुकड़ा त थ द ध है जिसमें द से त थ के समानान्तर द उ रेखा खींच दी जाय तो इसका उ द ध कोण भी २५°२५', के समान होगा। अब द ध न टुकड़े को लेकर यह देखना चाहिये कि इसमें से बड़े से बड़ा वृत्त खंड किस प्रकार काटा जा सकता है। ऐसे वृत्त खंड का केन्द्र निश्चय करके इसी के पास दो समानान्तर रेखाएं जिनके बीच की दूरी चद्दर की मुटाई के समान हो और जो द ध भुज पर लम्ब बनाती हों खींच लेनी चाहिये । फिर प्रत्येक रेखा की नोक को केन्द्र मान कर दो समान धनु खींच लेने चाहिये । इन धनुओं के केन्द्र पर का कोण ६० अंश से कम न हो और १०५ अंश से अधिक न हो क्योंकि प्रयाग में दिनमान १४ घंटे से अधिक नहीं होता । इस वृत्त खंड के किनारों को पहले पन्द्रह-पन्द्रह अंकों के अंतर पर विभाजित करना चाहिये फिर इन भागों को तीन-तीन या चार-चार समान भागों में बांटना चाहिये (चित्र में तीन ही तीन भाग दिखलाये गये हैं) । पन्द्रह-पन्द्रह अंश- वाले भाग घंटा बतलावेंगे और यदि प्रत्येक घंटे में तीन-तीन भाग हों तो हर एक से २० मिनट और चार-चार भाग हो तो हर एक से पन्द्रह मिनट का ज्ञान हो सकता है। चित्र में इससे छोटे-छोटे भाग नहीं दिखलाये जा सके परन्तु यथार्थ में प्रत्येक चौथे भाग के भी तीन-तीन समान भाग किये जा सकते हैं जिनसे पाँच मिनट का अन्तर जाना जा सकता है। बलिया और रायबरेली के गवर्नमेंट हाई स्कूलों में ऐसी ही धूप-घड़ी स्थापित की गयी हैं। बलिया की धूप-घड़ी को तो नवीं कक्षा के एक विद्यार्थी ने ही इस लेखक की देख-रेख में तैयार की थी परन्तु रायबरेली की धूप-घड़ी एक मिस्त्री से बनवायी गयी थी ।