सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 815, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें७६० सूर्य-सिद्धान्त जो ७६। से २। अंश कम है। ४।। मिनट प्रति अंश की दर से २। अंश लगभग १० मिनट में पूरा होगा। इसलिये स्थानीय स्पष्ट काल ५ बजने में १० मिनट है अर्थात् ४ बजकर ५० मिनट हुआ है। यही पटने की धूप-घड़ी का समय है। अब देखना चाहिये कि इस दिन का काल-समीकरण क्या है। २१ मार्च का काल-समीकरण ७।। मिनट और २६ तारीख का ५।।। है इसलिये ५ दिन में काल-समीकरण में १।।। मिनट की कमी हुई, और २ दिन में पौन मिनट की। इसलिये २३ मार्च को काल समीकरण ६।।। मिनट है। यह धनात्मक है, इसलिये इसको जोड़ने पर स्थानीय मध्यमकाल ४ बजकर ५६।।। मिनट अथवा ४ बजकर ५७ मिनट हुआ। पटने का देशान्तर ग्रीनविच से ८५ अंश ३० कला के लगभग है जो भारत- वर्ष के प्रधान देशान्तर ८२° ३०' से ३ अंश पूर्व है। इसलिये पटने का देशान्तर- काल १२ मि० पूर्व हुआ। उपर्युक्त समय से १२ मि० घटाने पर आया ४ घंटा ४५ मिनट। यही रेल-घड़ी का का समय हुआ। किसी स्थान का अक्षांश जानना—किसी सारणी से इष्ट दिन का मध्याह्नकालिक (१२ बजे का) नतांश जान लीजिये। फिर उसी सारणी में देखिये कि २१ मार्च का मध्याह्नकालिक नतांश कितना है। दोनों का अन्तर जान लीजिये। यही उस दिन की सूर्य की क्रान्ति है। अब अपने स्थान का मध्याह्नकालिक नतांश नतांशदर्पण से देख लीजिये। यदि क्रान्ति उत्तर हो तो इस नतांश में जोड़ने से और दक्षिण हो तो घटाने से उस स्थान का अक्षांश आ जावेगा। उदाहरण—१७ फरवरी को रायबरेली का मध्याह्नकालिक नतांश ३८।। है। सारणी में १७ फरवरी का मध्याह्नकालिक नतांश ३७।। है, और २१ मार्च का २५।।; इन दोनों नतांशों का अन्तर हुआ १२. इसलिये इस दिन की सूर्य की क्रान्ति हुई १२° दक्षिण। इस क्रान्ति को ३८।। से घटाने पर आता है २६।।, जो रायबरेली का अक्षांश हुआ। यह यथार्थ में २६। है। इसलिये इसमें चौथाई अंश की अशुद्धि है। जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने ज्योतिष शास्त्र का उचित रीति से अध्ययन करने के लिए पहले दिल्ली में, फिर जयपुर, मथुरा, काशी और उज्जैन में ईसा को १८वीं शताब्दी के पहले चरण में अथवा विक्रम की उसी शताब्दी के चौथे चरण में वेधालय बनवाये। प्रत्येक वेधालय में सात आठ यंत्र प्रायः एक ही ढंग के परन्तु भिन्न भिन्न आकार के अब भी दीख पड़ते हैं। उनके नाम यह हैं :-- १—सम्राट यन्त्र, २—षष्ठांश यन्त्र, ३—राशिवलय यन्त्र, ४—जयप्रकाश