भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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चतुर्दश अध्याय मानाध्याय (संक्षिप्त वर्णन) [श्लोक १-२—मानों की संख्या और व्यवहार । श्लोक ३-११—सौर मान से अहोरात्र, षडशीतिमुख, अयन, विषुव संक्रान्तियाँ; संक्रान्तियों के पुण्यकाल और ऋतु की गणना । श्लोक १२-१४—चान्द्रमान से तिथि, करण, विवाहादि संस्कार, व्रतोप- वासादि तथा पितरों के दिन रात का निश्चय । श्लोक १५-१६— नाक्षत्र दिन तथा नक्षत्रों से चान्द्रमासों के नाम । श्लोक १७ – बृहस्पति के वर्षों के नाम । श्लोक १८-१६—सावन दिन से यज्ञकाल तथा सूतक आदि का निश्चय । श्लोक २०-२१— दिव्य, प्राजापत्य तथा ब्रह्ममान । श्लोक २२-२७—उपसंहार । अन्त में बीजो- पनयनाध्याय के २१ श्लोक हैं जो क्षेपक कहे जाते हैं। नव मानों के नाम ब्राह्मं पित्र्यं तथा दिव्यं प्राजापत्यं च गौरवम् । सौरं च सावनं चान्द्रमार्क्षं मानानि वै नव ॥१॥ अनुवाद—ब्राह्म, दिव्य, पित्र्य, प्राजापत्य, वार्हस्पत्य, सौर, सावन, चान्द्र और नाक्षत्र नव कालमान हैं । विज्ञान भाष्य — इन शब्दों की व्याख्या आगे आनेवाले श्लोकों में ही दे दी गयी है इसलिये इस समय अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है । व्यवहार में आनेवाले मान चतुर्भिर्व्यवहारोऽत्र सौरचान्द्रार्क्ष सावनै । बार्हस्पत्येन षष्ट्यब्दा ज्ञेया नान्यैस्तु नित्यशः ॥२॥ अनुवाद—इस श्लोक में सौर, चान्द्र, नाक्षत्र और सावन मानों का व्यव- हार होता है । साठ संवत्सरों की गणना बृहस्पति मान से होती है, शेष चार मानों का काम नित्य नहीं पड़ता । विज्ञान भाष्य—इन पांच मानों की चर्चा मध्यमाधिकार में भी आ चुकी है ।