भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 820, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 820

मानाध्याय ७६५ सौरमान सौरेण द्यु॒ तिशोर्मानं षडशीतिमुखानि च । अयनं विषुवच्चैव सङ्क्रान्तेः पुण्यकालता ॥३॥ अनुवाद—दिन रात्रि का परिमाण, षडशीतिमुख, उत्तरायण और दक्षिणा- यन, विषुव संक्रान्ति, तथा अन्य संक्रान्तियों का पुण्यकाल सौरमान से निश्चय किया जाता है । षडशीतिमुख तुलादेः षडशीत्यंशैः षडशीतिमुखं दिनम् । भचतुष्टयमेवं स्याद् द्विस्वभावेषु राशिषु ॥४॥ षड्विशे धनुषो भागे द्वाविंशेऽतिमिनस्य च । मिथुनेऽष्टादशे भागे कन्यायां च चतुर्दशे ॥५॥ अनुवाद—(४) तुला संक्रान्ति से छियासी दिनों का षडशीति मुख क्रम से होता है । यह चार हैं और द्विस्वभाव राशियों में होते हैं। (५) धनु राशि के २६वें अंश, मीन राशि के २२वें अंश, मिथुन राशिके १८वें अंश और कन्या राशि के १४वें अंश तक । विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों में दिन का अर्थ सावन दिन नहीं है, वरन् वह समय है जिसमें सूर्य एक अंश चलता है। ऐसे ३६० दिनों का एक वर्ष होता है जो सावनमानानुसार ३६५ दिन ६ घंटे से कुछ अधिक हुआ । परन्तु सूर्य की गति सदा समान नहीं होती इसलिये चारों षडशीतिमुखों के मान भी सावन दिनों में समान नहीं हैं। तुला राशि से आरंभ करके तुला और वृश्चिक राशियों के तीस- तीस अंश और धनु के २६ अंश मिलकर ८६ अंश हुए इसलिये प्रथम षडशीतिमुख धनु के २६ अंश पर समाप्त होता है। दूसरा षडशीतिमुख धनु के २७वें अंश से आरम्भ होकर मीन के २२वें अंश पर समाप्त होता है। इसी प्रकार तीसरा मिथुन के १८वें अंश पर और चौथा कन्या के १४वें अंश पर समाप्त होता है। जिन चारों राशियों में षडशीति मुखों का अंत होता है वे द्विस्वभाव की बतलायी गयी हैं जिसकी चर्चा फलित ज्योतिष में आयी है। किसी किसी ग्रन्थ में तिमिनस्य के स्थान में निमिषस्य पाठ है जो अशुद्ध जान पड़ता है क्योंकि निमिष का अर्थ मीन राशि नहीं है। पितृपक्ष ततश्शेषे तु कन्याया यान्यहानि तु षोडश । क्रतुभिस्तानितुल्यानि पितॄणांदत्तमक्षयम् ॥६॥