सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६६ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—इसके उपरान्त कन्या राशि के शेष १६ दिन यज्ञकाल के समान हैं। इसमें पितरों का श्राद्धादि कर्म करने से अक्षय फल मिलता है। विज्ञान भाष्य—इससे प्रकट होता है कि पितरों का श्राद्ध उस समय करना चाहिये जब सूर्य कन्या राशि में १५ से ३० अंश तक हो। आजकल तो पूर्णिमान्त गणना से आश्विन कृष्ण पक्ष में और अमान्त गणना से भाद्र कृष्ण पक्ष में अर्थात् चान्द्रमान के अनुसार पितृपक्ष माना जाता है। संक्रान्तियों के नाम— भचक्रनाभौ विषुवत्द्वितीयं समसूत्रगम् । अयनद्वितयं चैव चतस्रः प्रथितास्तु ताः ॥७॥ तदन्तरेषु सङ्क्रान्तिद्वितयं द्वितयं पुनः । नैरन्तर्यात् सङ्क्रान्त्यो ज्ञेयं विष्णुपदीद्वयम् ॥८॥ अनुवाद—(७) भगोल के मध्य में एक ही व्यास पर दो विषुवत् संक्रान्तियाँ और उसी प्रकार दो अयन संक्रान्तियाँ कुल चार संक्रान्तियाँ होती हैं। (८) इनके बीच में दो दो संक्रान्तियाँ और होती हैं जिनमें से वह संक्रान्तियाँ जो इन चारों के बाद ही आती हैं विष्णुपदी कहलाती हैं। विज्ञान भाष्य—चौथे श्लोक से आरम्भ करके आठवें श्लोक तक १२ संक्रान्तियों के नाम बतलाये गये हैं। जिस समय सूर्य किसी राशि में प्रवेश करता है उस समय संक्रान्ति होती है। राशियाँ बारह हैं जिनमें से चार राशियों को षडशी- तिमुख कहते हैं। शेष में दो को विषुवत्, दो को अयन और चार को विष्णुपदी कहते हैं। राशि संक्रान्ति के नाम ऋतुओं के नाम १ मेष विषुवत् वसंत २ वृष विष्णुपदी ग्रीष्म ३ मिथुन षडशीतिमुख ,, ४ कर्क अयन वर्षा ५ सिंह विष्णुपदी ,, ६ कन्या षडशीतिमुख शरद ७ तुला विषुवत् ,, ८ वृश्चिक विष्णुपदी हेमन्त ६ धनु षडशीतिमुख ,, १० मकर अयन शिशिर