भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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मानाध्याय ८०३ विज्ञान भाष्य — जिस समय वृहस्पति सूर्य के बहुत पास आ जाता है उस समय सूर्य के प्रकाश के कारण यह देखा नहीं जा सकता इसलिये अस्त समझा जाता है । फिर जब सूर्य से इतनी दूर हो जाता है कि देख पड़ने लगता है तब उदय समझा जाता है । (देखो उदयास्ताधिकार पृ० ६५६-५७) । यह घटना उस समय के लगभग होती है जब सूर्य और वृहस्पति की युति होती है जो लगभग ३६६ दिन या १३ मास के अंतर पर हुआ करती है। इस काल को 'बार्हस्पत्य वर्ष' कहते हैं । ऐसे वर्षों का नाम उन नक्षत्रों के अनुसार रखा जाता है जिन पर वृहस्पति के उदय या अस्त होने के समय सूर्य और चन्द्रमा दोनों रहते हैं । १६ वें श्लोक में बतलाया गया है कि चान्द्र मासों के नाम उन नक्षत्रों के नाम पर पड़े हैं जिन पर चन्द्रमा पूर्णमान्त काल में रहता है इसलिये यह सिद्ध है कि सूर्य इन मासों के पूर्ण- मान्त नक्षत्रों से १४ वें नक्षत्र पर होता है। जैसे वैशाख मास में पूर्णिमा विशाखा या अनुराधा नक्षत्रों पर होती है तो इस मास में सूर्य विशाखा या अनुराधा के १४ वें नक्षत्र कृत्तिका या रोहिणी में रहेगा। यदि इसी समय वृहस्पति का उदय या अस्त हो तो निश्चय है कि यह भी इन्हीं नक्षत्रों पर या इसके एकाध नक्षत्र आगे पीछे रहेगा और अमावस्या भी इन्हीं नक्षत्रों पर होगी, इसलिये वृहस्पति का 'कार्तिक वर्ष' इसी समय से आरम्भ होगा। अर्थात् वैशाख मास में यदि वृहस्पति का उदय या अस्त हो तो वृहस्पति का 'कार्तिक वर्ष' लगेगा, ज्येष्ठ मास में उदय हो तो 'बार्हस्पत्य मार्ग शीर्ष' वर्ष लगेगा इत्यादि । चान्द्र मासों और बार्हस्पत्य वर्षों की दुविधा मिटाने के लिये दोनों में यह अंतर भी कर दिया जाता है कि बार्हस्पत्य वर्षों के नाम के पहले 'महा' लगा देते हैं । परन्तु आजकल इन कार्तिक आदि वर्षों का प्रचार नहीं है । ध्यान से देखने पर मालूम होगा कि सूर्य-सिद्धान्त का यह नियम बहुत ढीला होता है । वृहस्पति के अस्तकाल से उदय काल का अंतर एक मास के लगभग होता है जिसमें सूर्य दो नक्षत्र से अधिक हट जाता है। यह संभव है कि अस्तकाल के समय सूर्य स्वाती नक्षत्र में हो और उदय काल के समय अनुराधा में । ऐसी दशा में कौन सा बार्हस्पत्य वर्ष मानना चाहिये 'महा चैत्र' या 'महा वैशाख' ? शायद इसी दुविधा को दूर करने के लिये आचार्य वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में यह नियम दिया है कि उदय काल में वृहस्पति जिस नक्षत्र पर हो उसी के नाम से वृहस्पति के वर्ष का नाम रखना चाहिये १ । वराहमिहिर ने इन वर्षों के भिन्न-भिन्न फलों की चर्चा की है। १. नक्षत्रेण सहोदयमुपगच्छति येन देवपति मन्त्री । तत्संज्ञं वक्तव्यं वर्षं मास क्रमेणैव ॥१॥ वर्षाणि कार्तिकादीन्याग्नेयाद्द्वद्वयानुयोगीनि । क्रमशस्त्रिभंतु पञ्चममुपांत्यमंत्यं च यद्वर्षम ॥२॥ (गुरुचाराध्याय)