भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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८०४ सूर्य-सिद्धान्त बृहस्पति का वर्ष दूसरे प्रकार का भी होता है जिसे सम्वत्सर कहते हैं (मध्यमाधिकार श्लोक ५५ और उसका भाष्य) । पंचांगों में इन्हीं संवत्सरों की चर्चा रहती है । संकल्प के मंत्रों में तो यह प्रतिदिन काम में आते हैं । ऐसे ६० संवत्सरों का एक चक्र होता है । इनके सिवा ५ संवत्सरों का एक चक्र और होता है जिनके नाम क्रमानुसार यह हैं-(१) संवत्सर, (२) परिवत्सर, (३) इदावत्सर, (४) अनुवत्सर, (५) इद्वत्सर । इनकी चर्चा वेदाङ्ग ज्योतिष तथा वृहत्संहिता में है जहाँ इनके फल भी बतलाये गये हैं । सावनमान- उदयादुदयं भानोः सावनं तत्प्रकीर्त्यते । सावनानि स्युरेतानि यज्ञकालविधिस्तु तैः ॥१८॥ सूतकादि परिच्छेदो दिनमासाब्दपास्तथा । मध्यमाग्रह भुक्तिश्च सावनेन प्रकीर्त्यते ॥१९॥ अनुवाद - (१८) सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय के बीच के समय को सावन दिन कहते हैं । सावन दिनों से यज्ञ करने के समय का विधान किया जाता है । (१९) जन्म का सूतक और चान्द्रायण आदि व्रत की सीमा, दिन, मास और वर्ष के स्वामियों का निश्चिय, ग्रहों की मध्यम गति की गणना सावन दिनों से ही की जाती है । विज्ञान भाष्य - इस विषय पर मध्यमाधिकार में अच्छी तरह विचार किया गया है । सावन दिनों में जिन जिन कार्यों के करने की अवधि निश्चित की जाती है वे यहाँ गिनाये गये हैं । जिस घर में सन्तान उत्पन्न होती है, अथवा जिस घर में किसी की मृत्यु होती है वह घर दस, बारह या पन्द्रह दिनों के लिये अपवित्र समझा जाता है । यही सूतक है जिसकी अवधि सावन दिनों के अनुसार निश्चय की जाती है । दिव्यमान सुरासुराणामन्योन्यमहोरात्रं विपर्ययात् । यत्प्रोक्तं तद्द्भवेद्दिव्यं भानोर्भगणपूरणात् ॥२०॥ अनुवाद - देवताओं और असुरों का जो परस्पर विरोधी अहोरात्र बतलाया गया है वही दिव्यमान है । और सूर्य के एक भगण पूरा होने का समय है । विज्ञान भाष्य -- इसकी चर्चा विस्तार के साथ भूगोलाध्याय श्लोक ४७-५० के भाष्य में की गयी है ।