भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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मानाध्याय ८०५ प्राजापत्य तथा ब्राह्ममान मन्वन्तरव्यवस्था च प्राजापत्यमुदाहृतम् । न तत्र द्यु निशोश्छेदः ब्राह्मं कल्पं प्रकीर्तितम् ॥२१॥ अनुवाद- मन्वन्तर की व्यवस्था प्राजापत्य मान का उदाहरण है जहाँ दिन और रात का कोई भेद नहीं है। कल्प ब्राह्ममान कहलाता है । विज्ञान भाष्य - कल्प, मन्वन्तर आदि की व्याख्या मध्यमाधिकार के श्लोक १८-२० और उसके विज्ञान-भाष्य में की गयी है । माहात्म्य एतत् ते सर्वमाख्यातं रहस्यं परमाद्भुतम् । ब्रह्मतत्परमं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥२२॥ दिव्यं चाक्षं ग्रहाणाञ्च दर्शित ज्ञानमुत्तमम् । विज्ञायार्कादि लोकस्य स्थानं प्राप्नोति तादृशम् ॥२३॥ अनुवाद - (२२) तुझसे यह दूसरा खंड बतलाया गया जो रहस्यमय और बड़ा ही अद्भुत है, यह ब्रह्म रूप है, उत्कृष्ट है, पवित्र है और सब पाप का नाश करने वाला है । (२३) आकाशीय, नाक्षत्र और ग्रहों का उत्तम ज्ञान दिखलाया गया जिसको अच्छी तरह जान कर मनुष्य सूर्यादि लोकों में वैसा ही स्थान प्राप्त कर लेता है । विज्ञान भाष्य - सूर्य-सिद्धान्त का पूर्वार्ध पाताधिकार के साथ समाप्त हो गया था जिसका उपसंहार उसके अन्तिम श्लोक में कर दिया गया था । उसके उपरान्त भूगोलाध्याय के आरम्भ में मयासुर के प्रश्न करने पर उत्तरार्ध का आरम्भ किया गया था जो यहाँ आकर समाप्त होता है इसलिये यहाँ इस खंड का भी उपसंहार कर दिया गया । उपसंहार इत्युक्त्वा मयमामन्त्र्य सम्यक्तेनापि पूजितः । दिवमुद्गत्य सूर्य्यंशांः प्रविवेश स्वमण्डलम् ॥२४॥ मयोऽथ दिव्यं तज्ज्ञानं ज्ञात्वा साक्षाद्विवस्वतः । कृतकृत्यमिवात्मानं मेने निर्धूतकल्मषम् ॥२५॥ ज्ञात्वा तमृषयश्चाथ सूर्यलब्धवरं मयम् । परिवव्रु रुपेत्याथो ज्ञानं पप्रच्छुरादरात् ॥२६॥