भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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८०६ सूर्य-सिद्धान्त स तेभ्यः प्रददौ प्रीतो ग्रहाणां चरितं महत् । अत्यद्भुततमं लोके रहस्यं ब्रह्मसम्मितम् ॥२७॥ अनुवाद—(२४) यह कह कर सूर्यांश पुरुष मय से विदा होकर और उससे अच्छी तरह पूजित होकर स्वर्ग को जाकर अपने मण्डल में घुस गये । (२५) तब मयासुर सूर्य ने साक्षात् भगवान् से इस दिव्य ज्ञान को प्राप्त करके अपने को पाप रहित और कृतकृत्य माना । (२६) तब ऋषियों ने यह जान कर कि मय को सूर्य भगवान से यह वरदान मिला उसके पास आये और घेर कर आदर के साथ पूछा । (२७) इस पर उसने प्रेम के साथ ग्रहों के इस महान् चरित्र को जो इस लोक में अत्यन्त आश्चर्य उत्पन्न करने-वाला, रहस्य और ब्रह्मज्ञान के समान है उनको बतलाया । विज्ञान भाष्य—इससे स्पष्ट होता है कि यह सूर्य-सिद्धान्त नामक ज्योतिष ग्रन्थ ऋषियों को मयासुर से मिला जिसने तपस्या करके यह ज्ञान सूर्य भगवान् अथवा सूर्यांश पुरुष से प्राप्त किया था । इससे कुछ विद्वान यह परिणाम निकालते हैं कि यह ग्रन्थ यवन ज्योतिषियों से प्राप्त किया गया था । इस सम्बन्ध में यहाँ कुछ विचार न करके भूमिका में विस्तारपूर्वक लिखा जायगा । इति सूर्य-सिद्धान्ते मानाध्यायः किसी-किसी ग्रन्थ में बीजोपनयनाध्याय नामक २१ श्लोकों का एक छोटा अध्याय और लिखा मिलता है जिस पर टीकाकारों ने यह समझ कर टीका नहीं की है कि ग्रन्थ निर्माण-काल में बीज-संस्कार की आवश्यकता नहीं पड़ सकती इसलिये यह अध्याय पीछे से जोड़ा गया है । मेरी लघु सम्मति में यह सम्भव है कि अब तक जो कुछ लिखा गया है वह इसी रूप में सूर्यांश पुरुष से मयासुर को मिला हो परन्तु उसके बाद मयासुर ने कई वर्ष तक जीवित रह कर अपने अनुभव से कुछ अन्तर पाया होगा जिसके अनुसार उसने बीजोपनयनाध्याय अन्त में जोड़ दिया । अथवा मयासुर के बाद किसी अन्य ज्योतिषी ने ही इसे बढ़ाया होगा । भूमिका में इस पर भी प्रकाश डालने का यत्न किया जायगा । इस समय मैं भी यह अध्याय जोड़ देने की धृष्टता करता हूँ । यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा तद्वद्वेदाङ्ग शास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम् ॥१॥ न देयं तत् कृतघ्नाय वेदविप्लवकाय च । अर्थलुब्धाय मूर्खाय साहङ्काराय पापिने ॥२॥ एवं विधाय पुत्रायाप्यदेयं सहजाय च । दत्तेन वेद मार्गस्य समुच्छेदः कृतो भवेत् ॥३॥