सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 833, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें८०८ सूर्य-सिद्धान्त परीक्षिताय शिष्याय गुरुभक्ताय साधवे । देयं विप्राय नान्यस्मै प्रतिकञ्चुककारिणे ॥२०॥ बीजं निःशेष सिद्धान्त रहस्यं परमं स्फुटम् । यात्रापाणिग्रहादीनां कार्याणां शुभसिद्धिदम् ॥२१॥ विज्ञान भाष्य—यह २१ श्लोक मानाध्याय के २३वें श्लोक के उपरान्त और अन्तिम ४ श्लोकों के पहले मिलते हैं और कम से कम ४०० वर्ष पुराने हैं क्योंकि रंगनाथ जी ने अपनी गूढ़ार्थ प्रकाशिका टीका में जो शक १५२५ की लिखी है इसका उल्लेख किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि सूर्य-सिद्धान्त में भी बीज संस्कार करने की आवश्यकता पड़ी थी और हमारे पुराने आचार्य भी ज्योतिष शास्त्र को दोषरहित और सर्वाङ्गपूर्ण बनाने के पक्ष में थे, आजकल के कुछ पंडितों की तरह लकीर के फकीर नहीं थे । इन श्लोकों की टीका इधर के किसी टीकाकार ने नहीं की है इसलिए मैं भी इसका अनुवाद करना व्यर्थ समझता हूँ क्योंकि इन पुराने बीजों से भी अब काम नहीं चल सकता । अब तो सारी गणना नवीन वेधों से स्थिर करने की आवश्य- कता है । इस प्रकार सूर्य-सिद्धान्त के मानाध्याय नामक १४वें और अन्तिम अध्याय का विज्ञान भाष्य समाप्त हुआ ।