सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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मैस का मूत्र (मैसै का नहीं)—अर्श, उदर, शूल, कुष्ठ, मेह, अबिशुद्धि (वमन आदि की उचित प्रवृत्ति न होने) में, आनाह, शोक, गुरुम, पाण्डुरोग में बरतना चाहिये ॥२२१॥ कासश्चासापहं शोककामलापाण्डुरोगानुत् ।
कटुतिक्तान्वितं छागमीषन्माहृतकोपनम् ॥२२३॥
बकरी का मूत्र (बकरे का नहीं)—कासश्वासनाशक, शोक, कामला, पाण्डुरोगनाशक, कटु, तिक्तरस, बकरी का मूत्र वायु को थोड़ा-सा प्रकृपित करता है ॥२२३॥
कासप्लीहोदरश्चासशोषवर्चोग्रहे हितम् ।
सक्षारं तित्तककुठुमुष्णं वातघ्नमाविकम् ॥२२४॥
मेड़ का मूत्र (पुल्लिंग का नहीं)—कास प्लीहा, उदर, श्वास, शोष (क्षय), वर्चग्रह (मलावरोध-मल का सूख जाना) में हितकारी, शारयुक्त, तित्तक-कटुरस, उष्णवीर्य, वातनाशक है ॥
दीपनं कटु तीक्ष्णोष्णं वातचेतोविकारानुत् ।
आर्थ कफहरं मूत्रं कुमिदद्रुषु शस्यते ॥२२५॥
घोड़े का मूत्र (घोड़ी का नहीं)—अग्निदीपक, कटुरस, तीक्ष्ण, उष्ण, वायु एवं मानस रोगों को दूर करता है । कफ-नाशक, कुमि एवं दाद में घोड़े का मूत्र उत्तम है ॥२२५॥
सतिक्तं लवणं भेदि वातघ्नं पित्तकोपनम् ।
तीक्ष्णं क्षारे किलासे च नागं मूत्रं प्रयोजयेत् ॥२२६॥
हाथी का मूत्र (हथिनी का नहीं)—तिक्त, लवणरस, भेदि (विरेचक), वातनाशक, पित्तप्रकोपक, तीक्ष्णक्षार कार्य (जलाने) में; किलास (कुष्ठभेद) रोग में हाथी का मूत्र प्रयोग करना चाहिये ॥२२६॥
गरचेतोविकारघ्नं तीक्ष्णं ग्रहणिरोगानुत् ।
दीपनं गार्दभं मूत्रं कुमिवातकफापहम् ॥२२७॥
गधे का मूत्र (गधी का नहीं)—गर (संयोगजन्यविष) एवं मानस रोगों का नाशक, तीक्ष्ण, ग्रहणीरोगनाशक, अग्निदीपक, कुमि, वात, कफ नाशक है ॥२२७॥
शोककुष्ठोदरोन्मादमाहृतकुमिनाशनम् ।
अर्शाघ्नं कारभं मूत्रं मानुषं च विषापहम् ॥२२८॥
जंठ का मूत्र (जंठनी का नहीं)—शोक, कुष्ठ, उदर, उन्माद, वायु, कुमिरोग नाशक एवं अर्शरोग नाशक है । प्रसंगवश-मनुष्यमूत्र के गुण—मनुष्य का मूत्र विषनाशक है ।
वि० मन्तग्ध—नरमूत्र—सर्प विष की उत्तम औषध है ।
मात्रा-४-४ तोला कई बार १-१ घण्टा पर देने से विषवैष शान्त होने लगता है । दंशस्थल पर मूत्र का सेचन भी करना चाहिये। वृश्चिक एवं वरं (भिण्ड-भरिण्ड पञ्जाबी भाषा) के दंश पर भी सेचन से लाभ होता है ॥२२८॥
द्रवद्रव्याणि सर्वाणि समासान् कीर्तिवान्ति तु ।
देशकालविभागज्ञो नृपतेर्दीर्घतुमर्हति ॥२२९॥
देश-काल के विभाग को जाननेवाला वैद्य (कहे या न कहे ) सम्पूर्ण द्रव (तरल) द्रव्यों को राजा के लिये विधान कर सकता है ॥२२९॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रवद्रव्यविज्ञानीयो नाम पञ्चवत्वारिशोऽध्यायः ॥४५॥
पट्टवत्वारिशतमोऽध्यायः
अथातोऽन्नपानविधिमध्येयाय व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥
इसके आगे “अन्नपानविधि” नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।
धन्वन्तरिसभिवाद्य सुश्रुत उवाच—प्रागभिहितः ‘प्राणिनां पुनर्मूलमाहारी बलवर्णौजसां च, स षट्सु रसेष्वायत्तः, रसाः पुनर्द्वंयाश्रयिणः’ द्रव्यरसगुणवीर्य विपाकनिमित्तं च क्षयवृद्धौ दोषाणां साम्यं च, ब्रह्मादेरपि च लोकरथाहारः स्थित्युत्पत्तिविनाशहेतुः, आहारादेवाभि-वृद्धिवलमारोग्यं वर्णोन्द्रियप्रसादश्च, तथा ह्यहारवैषम्या-दस्वास्थ्यं, तस्याशितपीतलीढखादितस्य नानाद्रव्यात्म-कस्यानेकविधविकल्पस्यानेकविधप्रभावस्य पृथक् पृथग-द्रव्यरसगुणवीर्यविपाककर्माणीच्छामि ज्ञातुं, न ह्यनवबुद्ध-स्वभावा भिषजः स्वस्थानुवृत्तिं रोगनिग्रहणं च कतुं समर्थाः, आहारायत्ताश्च सर्वप्राणिनो यस्मात्समादनन्-पानविधिमुपदिशतु मे भगवानित्युक्तः प्रोवाच भगवान् धन्वन्तरिः—अथ खलु वत्स सुश्रुत ! यथाप्ररुनमुच्यमानुपधारयस्व ॥१॥
धन्वन्तरि को नमस्कार करके सुश्रुत ने कहा—आपने पहिले कहा है कि—प्राणियों के बल एवं ओज का कारण आहार है । यह आहार छः रसों में आश्रित है । रस द्रव्य के आश्रित है; दोष-धातुओं का साम्य, क्षय एवं वृद्धि, द्रव्य, रस, गुण, वीर्य विपाक के कारण से होती है । ब्रह्म आदि लोकों का भी आहार ही स्थिति (अवस्थान), उत्पत्ति, विनाश का कारण है । आहार से ही शरीर की वृद्धि बल एवं आरोग्य एवं वर्ण स्वच्छता तथा चक्षु आदि इन्द्रियों में निर्मलता (या पटुता) आती है । आहार की विषमता से ही अस्वास्थ्य उत्पन्न होता है । इस चार प्रकार (अशित, पीत, लीढ़ और खादित रूप) एवं बहुत प्रकार के पृथिवी आदि द्रव्यों से उत्पन्न
१ ब्रह्मालोक—ब्रह्मा का प्रथमलोक ब्रह्मालोक है—
“षड्गुणैत तपोलोकान् सत्यलोकं विराजते ।
अपुनर्मीरका यत्र ब्रह्मलोकं हि स स्मृतः ॥”