भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४१ ]

होनेवाले तथा अनेक प्रकार के (मण्ड-पेया-विलेपी आदि) की संस्कारकल्पनावाले, नाना प्रकार की शक्तिवाले आहार के, पृथग-पृथग द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक और कर्मों को जानना चाहता हूँ । कारण—विना स्वरूप को जाने वैद्य स्वास्थ्य की रक्षा तथा रोग का निवारण नहीं कर सकते । चूँकि—सब प्राणी आहार के वश में हैं । इसलिये—हे भगवान् ! आप अन्नपान विधि (कल्पना) का उपदेश सुझको करिये ।

इस प्रकार कहने पर-भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत को कहा कि हे वत्स ! अपने प्रश्न का उत्तर ठीक प्रकार से सुनकर धारण करो ॥१॥

तत्र, लोहितशालिकलमकईमकपाण्डुकसुगन्धकशकुनाहृतपुष्पाण्डकपुण्डरीकमहाशालिशीतमीरुकरोद्रपुष्पक-दीर्घशुक्लाश्चनकमहिषमहाशुक्रहायनकदूषकमहादूषकप्रभृतयः शालयः ॥ ४ ॥

शालिवर्ग—लोहितक शालि (लाल चावल), कलम (कलवि), कईमक (कोदा), पाण्डु (पीले तुर का, राम जवान), सुगन्धक (देवशालि-वासमती), शकुनाहृत१ (हंसराज), पुष्पाण्डक, पुण्डरीक, महाशालि, शीतमीरु, रोद्रपुष्प, दीर्घशुक्र, कांचनक, महिषशुक्र, महाशुक्र, हायनक, दूषक, महादूषक आदि (यवक-नैषक आदि) शालि हेमन्त में पकनेवाले धान्य हैं ॥४॥

मधुरा वीर्यतः शीता लघुपाका वलावहाः ।

पित्तघ्नाल्पानिलकफाः स्निग्धा बद्धाल्पवर्चसः ॥५॥

शालियों के सामान्य गुण मधुर, शीतवीर्य, लघुपाकी, बलकारक, पित्तनाशक, वायु-कफ को थोड़ा बढ़ाते हैं, स्निग्ध, मल को थोड़ा शुष्क (क्रम) करते हैं ॥५॥

तेषां लोहितकः श्रेष्ठो दोषघ्नः शुक्रमूलः ।

चक्षुष्यो वर्णबलकृत स्वयों हृद्यस्तृपापहः ॥६॥

प्रण्यो उ्वरहरश्चैव सर्वदोषविपापहः ।

इन शालियों में लालशालि (लालमती) श्रेष्ठ, दोषनाशक, शुक्ल, मूल, चक्षुष्य, वर्णकृत, बलकारक, स्वर के लिये हित

१ शकुनाहृत—

“द्वीपान्तरात् समानीतो गरुडेन महात्मना ।

शकुनाहृतः सः शालिः स्यात् गरुडापरनामकः ॥”

२ देश भेद से द्रव्य का नाम बदल जाता है । इसलिए शुक्र,

शमी, कुषान्य इनको किसानों से पूछना चाहिये, जानवरों को थिकारियों से, पचियों को बिडीमारों से, कन्द-मूल-फलों को तप-स्त्रियों से, शाकों को ग्राम्य एवं अरण्यवासियों से, कृताक्ष (सिद्ध-अक्षों) को रसोइयों से, श्राषध द्रव्यों को अत्तारों से और जो कि श्राषध द्रव्य बाजार में नहीं मिलते, उनको बनवासियों से जानना चाहिये ।

कारी, हृदय के लिये प्रिय, प्यासशामक, त्रण के लिये हितकारी उ्वरहर, सम्पूर्ण रोगों को तथा विष को दूर करता है ॥६॥

तस्मादरूपान्तरगुणा क्रमशः आलयोऽवराः ॥७॥

इन लाल शालि से अन्य शालि के गुणों में थोड़ा ही भेद है, अन्यशालि इस लालशालि से उत्तरोत्तर हीन गुणवाले हैं ॥

षष्ठिककाङ्कुसकुन्दकपीतकप्रमोदककाकलकासनपुष्प-कमहाषष्ठिकचूर्णककुरवककेदारप्रभृतयः षष्ठिकाः ॥८॥

षष्ठिक (साठी धान्य-श्रीष्म ऋतु में पकनेवाले)—षष्ठिक (खेत साठी), कंगु (कङ्कनी), मुकुन्दक-पीतककाकलक असन-पुष्पक-महाषष्ठिक-चूर्णक-कुरवक केदार आदि षष्ठिक (साठी-धान्य) हैं ये श्रीष्म ऋतु में पकते हैं ॥८॥

रसे पाके च मधुराः शमना वातपित्तयोः ।

शालीनां च गुणैस्तुल्या बृंहणाः कफशुक्ललाः ॥९॥

ये साठी धान्य—मधुररस, मधुरविपाक, वातपित्तशामक, शालिकों के समान गुणवाले, बृंहण (देहवर्धक), कफ एवं शुक्लवर्धक हैं ॥९॥

षष्ठिकः प्रवरस्तेषां कषायानुरसो लघुः ।

मृदुः स्निग्धखिदोषघ्नः स्थैर्यकृद्बलवर्धनः ॥१०॥

विपाके मधुरो प्राही तुल्यो लोहितशालिभिः ।

इन साठी धान्यों में सफेद साठी श्रेष्ठ होते हैं, कषाय-अनुरस, लघु, मृदु, स्निग्ध, विदोषनाशक, स्थिरताकारक, बल-वर्धक मधुर-विपाक, संग्राही लाल धान्यों के समान गुण वाले हैं ॥१०॥

शेषास्त्वल्पान्तरास्तस्मात् षष्ठिकाः क्रमशो गुणैः ॥११॥

शेष साठी धान्यों में श्वेत साठी के गुणों से थोड़ा ही भेद होता है, ये साठी-श्वेत साठी से गुणों में कुछ कम होते हैं ॥

कृष्णब्रीहिशालामुखजतुमुखनन्दीमुखलावाश्चत्वरित-कुकुकुटाण्डकपारावतकपाटलप्रभृतयो ब्रीह्यः ॥१२॥

ब्रीहि-धान्य (वर्षा ऋतु में पकनेवाले धान्य)—कृष्णब्रीहि (काले तुषवाले धान्य), शालामुख, जतुमुख, नन्दीमुख, लावाक्ष (बटेर की आँख के समान), त्वरित, कुकुकुटाण्डक, पारावतक, पाटन आदि (खजुरीट, खजान खौमक) ब्रीहिधान्य हैं ॥१२॥

कषायमधुराः पाकेऽमधुरा वीर्यतेऽहिमाः ।

अल्पाभिष्यन्दिनस्तुल्याः षष्ठिकैर्वैद्ध्यवर्चसः ॥१३॥

सामान्य गुण—कषाय, मधुररस, मधुरविपाक, शीतवीर्य, अल्प अभिष्यन्दिन, मल को रोकनेवाले और साठी धान्यों के समान गुणवाले हैं (कुषान्यों से श्रेष्ठ हैं) ॥१३॥

कृष्णब्रीहिर्वरस्तेषां कषायानुरसो लघुः ।

तस्मादरूपान्तरगुणाः क्रमशो ब्रीह्याऽपरे ॥१४॥

इन ब्रीहिधान्यों में काले तुषवाले धान्य श्रेष्ठ हैं,