भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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का ॐ ऋ।व = अ

` पमुन्द्कवे

को १ कोरदूषकं (कोदा), श्यामाक (सांबक-तीन प्रकार पन्य) ५ क उद्र्यामक, इस्तिश्यामक), नीवार (उड्धिया- ` “.. क, रक (रटिक), उदाल्कः प्रियंगु, मधूलिका,

अण 1 दथ सूत्रस्थानम्‌

कषाय-अनुरव, लधु हई । इख कष्ण त्रीहि से अन्य त्रीहि घान्यों | नान्दीुखी, ुखवन्द १८९ गवेषुक, तोदपरणी, मुदुंदक, वेणुयव के गुणो म योड़ा-खा ही भेद्‌ दै-ङष्णवरीहि से गणो मे ऊ | आदि (कषण्टो-वर्ी आदि) कुधान्थवग दै ॥२१॥ कम है ॥१५। |

द््धायामवनौ जाताः जाल्यो खषुपाकिनः।

कषाया बद्धविण्मूत्रा रूक्षाः श्टेषमापकषेणाः ॥१९५॥

जली हई भूमि मे उन्न शाकि-ख्घुपाकी (शीघ्र जीण

होनेवाठे), कषायरख, मलमूत्र को रोकनेवले, रूक्ष) कफ को. कम करनेवले होते दै ॥१५॥। स्थलजाः कफपित्तघ्नाः कषायाः कटुकान्वयः |

करिवित्सतिक्तमधुराः पवनानठ्व धेनाः ।१६॥ स्थलजन्य (जांगल देश मे उत्पन्न)--धान्य कफ-पित्त.

नायक, कषायरख; कटु-अनुरख, कुछ तिक्त, मधुरविपाक, वायुः पित्त को बढ़त है ।॥१६॥ ` कैदारा मधुरा वृष्या बल्याः पित्तनिबहंणाः |

ईषतकषायाल्पमखा गुरवः कफञुक्रखाः ॥१५७॥

केदार (खतो मे-जलबहुल देश में उत्पन्न) धान्य -मधुर,

शुक्रवधंक, बलकारक, पित्तनाशक, थोड़ा कषाय रस, -थोडे मल

कारक, गुर कफ एवं शुक्रवधंक है | १५॥। रोप्यातिरोप्या छघवः शीघ्रपाका गुणोत्तराः ।

अदाहिनो दोषहरा बल्या मूत्रविवधेनाः ॥१८॥ जो धान्य एक स्थान से उखाड़कर दूसरे स्थान पर लगाये जति, वे धान्य लु, शीघ्र जीण होने, गुणो मे श्र अदाहि, दोषनाशक, वरुकारक ओर मूत्र को बद़ानेवले है ॥ शाख्यरिदठननरूढा ये रूक्षास्ते बद्धवचंसः। तिक्ताः कषायाः पित्तना ्घुपाकाः कफापहाः ॥१९॥ , जो धान्य काटने के पीछे पिर ब्रदते है--ये धान्य रुक २ मढ को रोकनेवाले है । तिक्त, कषायरस, पित्तनाशकः, सपपाको ओर कफ नाशक है || १६॥।

विस्तरेणायसुदिषटः गालिवर्गो हिताहितः

त्त्‌ कुधान्यमुद्‌ गादिमाषादीनां च वद्यते ॥२०॥। क इति शा्िवगः। पवा ३ ५ व रूप म विस्तार से यहाँ कह गप आदि को १ र (विस्तार से)-कुषान्य, मूङ्ग आदि तथा | कदेगे ॥२०॥ + वय उपानयत । र सूकसयामाकनीवारशान्वदबरकोदाठकभियह न्दीसुलीकरुबिन्दगवेधुकसरवरुकतोद-( य )- गुघवेम्रश्चतयः ऊुधान्यविशेषाः ॥२९॥ `

उष्णाः कषायमधुरा रूक्षाः कटुविपाकिनः शटेष्मव्ना वद्धनिष्यन्दा वातपित्तप्रकोपणाः ॥२२]

कषायमधुरस्तेषां शीतः पित्तापहः स्मृतः| कोद्रवश्च सनीवारः श्यामाकश्च सशान्तनुः ॥२३॥ सामान्य गुण-उष्णवीय, कषायरख, मधुर, सष, कटु- विपाक, कफनाशक, मूत्र को रोकनेवाला, वातपित्तप्रकोपक दै । इनमें कोद्रव नीवार-श्यामाक-शान्तनुकषाय, मधुररस, शीतवीर्थ, पित्तनाशकर ह ॥२२,२३॥

कृष्णा रक्ताश्च पोताश्च श्वेताश्चेव प्रियङ्गवः । यथोत्तरं प्रधानाः स्यू रूक्षाः कफहराः स्पृताः ॥२४॥

काला, खाक, पीला, श्वेत, प्रियंु-उत्तरोत्तर रूक्च, कफ- हर आदि गुणो मेंश्े्ठ॥२४॥

मधूटो मधुरा शीता स्निग्धा नन्दीमुखी तथा ।

मधूलिका ओर नान्दीमुख-मधुर, शीतल, स्निग्ध होते है ॥

विञोषी तत्र भूयिष्ठं वस्कः सयुक्कन्दकः ॥२९५॥

वरुक-मुक्ुन्दक- ये विशेषकर द्रव धातुओं को सुखाते है ॥

रूक्षा वेणुयवा ज्ञया वीर्योष्णा कटुपाकिनः ।

बद्धमूत्राः कषहराः कषाया वातकोपनाः ॥२६॥

वेणुयव (बाँस के जौ)-- रुक्ष, उष्णएवीय, कटु-विपाक, म्र

को रोकनेवाला, कषायरस, कफनाशक, वातकोपक दँ ।॥२६॥

मुद्‌गवनयुद्गकखायमङ्कष्ठमसुरमङ्गल्यचणकसतीन -

त्रिपुटकरेण्वाढकीप्रभरतयो बेदखाः ॥२७॥

शमी धान्य--मृङ्ग (हरे, पीले, काले, खाल), वनमुद्ग

(बन मे उत्पन्न मृङ्ख), कलाय (मटर), मङष्ठक (मोट), मसर

(दो प्रकार क है-काठे ओर पाण्डुर), चणक (चने), खतीन

(वर्तुठक-मटर) निपुटक (स्वल्प), हरेणु, आढको (अरहर)

आदि की वैदल संज्ञा है,. वेदल-दो दर्खोवाले है, दाल के

काममेअतिर्है॥२७॥ _

कषायमधुराः आताः कदृपाका सरुस्सरा, ।

बद्धमूत्रपुरीषाश्च पित्तश्छेऽ्मह रास्तथा ॥२८॥

नास्यथ बातडास्तेषु सुद्गा दषटिप्रसादनाः । प्रधाना हरितास्तत्र वन्या युद्गसमाः स्छताः ॥९.॥ मङ्ग के गण--कषाय्‌-मधुररस, शीतवीयं, विपाक में कटुः

वायुकारक, मलमूत्र को ँधनेवाटे, पित्तकफनाशक; एवं वायु

को बहत नहीं बदाते, आंखों को स्वच्छं करते दै । इन मज्ञ म हरे मङ्ग भेदै, बनमज्गमृज्ञ के समान गुणकारी है ।॥२८२२६॥ विपाके मधुराः प्रोक्ता मसुरा बद्धबचेसः। - `

मसूर मधुर विपाक, मल को रोकनेवाले ५ ह॥

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