सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४१ ]
प्रसह—काक (कौवा), कङ्क (दीर्घचंघु), कुरर (कुरल), चाक, मास, शशधाती१, उल्क, चिलि, श्येन (बाज), गीष आदि पक्षी, झपटकर (छीनकर) खाते हैं इसलिये प्रसह हैं ॥
एते सिंहादिभिः सर्वे समाना वायसादयः ।
रसवीर्यविपाकेषु विशेषाच्छोषिणे हिताः ॥ ७४ ॥
इनके सामान्य गुण—ये कौवे आदि सब पक्षी गुणों में रस, वीर्य, विपाक में सिंह आदि के समान हैं । विशेषकर राजयक्ष्मा रोगी के लिये हितकारी हैं ॥ ७४ ॥
मदगुमूषिकवृक्षशायिकावकुशमतिघासवानरप्रभृतयः पर्णमृगाः ॥ ७६ ॥
पर्णमृग—मदगु (वृक्षचर सर्प), मूषिक, वृक्षशायिका (गिल-हरी), अवकुश (गोलगूल), पूतिघास (खाटाश), वानर आदि वृक्षों पर रहने से पर्णमृग हैं ॥ ७६ ॥
मधुरा गुरवो वृष्याश्चक्षुष्याः शोषिणे हिताः ।
सूष्ठमूत्रपुरीषाश्च कासाशैःश्वासनाशनः ॥ ७७ ॥
सामान्य गुण—मधुर, गुरु, वृष्य (शुक्रवर्धक), नेत्ररोग के लिये हितकारी, राजयक्ष्मा रोगी के लिये उत्तम, मल-मूत्र के प्रवर्त्क, कास, अर्श, श्वास नाशक हैं ॥ ७७ ॥
श्याचिच्छल्यकगोधाशशवृषदंशलोपाकलोमशकर्णकदली-मृगप्रियकाजगरसर्पमूषिकनकुलमहाबभ्रप्रभृतयो विलेशयाः ।
विलेशय—शवावित (सूई के समान बालोंवाला) शलुकी, गोधा (गोह), शश (शशक), वृषदंश (गाँव की बिल्ली), लोपाक (भृगाल भेद लोमड़ी), लोमशकर्ण (बड़े बिल्ले के समान), कदलीमृग, अजगर (सर्प), सर्प (सांप दर्वीकर), मूषिक, (चूहा), नकुल (नेवला), महाबभ्र (बड़ा नकुल), आदि जानवर बिलों में रहने से विलेशय हैं ॥ ७८ ॥
१ शशन्ती—Golden Eagle—
यह पक्षी हिमालय, उत्तर एशिया और यूरोप में होता है । इस पक्षी में यह खास बात है कि शिकार में नर और मादा एक दूसरे की मदद करते हैं । यह पक्षी एक पत्तीब्रत वाला होता है । खरगोश और इनके बच्चे दिन भर बिल में रहा करते हैं । इन को बिल में से बाहर निकालने के लिये यह खास युक्ति करता है । यह युक्ति इस पक्षी की, किसी भी अनुभवनी एवं होबियार शिकारी से कम नहीं होती है । अर्थात् नर और मादा में से कोई एक पक्षी बिल के पास छिपकर बैठ जाता है, और फिर दूसरा पक्षी झाड़ियों में जाकर तेज आवाज से सीटी सी बजाता है, साथ में इतनी गड़बड़ और तूफान मचाता है कि खरगोश और उसके बच्चे घबरा के बाहर निकलकर भागने के लिये बाचित होते हैं । और ज्यों ही खरगोश बाहर निकलता है, त्यों ही निगरानी रखनेवाला पक्षी इन पर झटपड़ पड़ता है, और इनको पकड़ लेता है ।
क्योंकि इस पक्षी का मुख्य आहार खरगोश है, इसलिये इसको शशन्ती, शशधाती—ये नाम दिये गये हैं ।
वचोमूत्रं संहंतं कुर्पुरेते
वीर्ये चोष्णाः पूर्ववत् स्वादुपाकाः ।
वातं हन्युः इलेषमपित्तं च कुर्पुः
सिनधाः कासश्चासकाश्यापहाश्च ॥ ७९ ॥
इसके सामान्य गुण—मल और मूत्र को बढ़ा करते हैं, उष्ण-वीर्य, मधुरविपाक, वातनाशक, कफपित्त को करनेवाले, सिन्धु, कास, श्वास, क्रुशता को मिटाते हैं ॥ ७९ ॥
कषायमधुरस्तेषां शशः पित्तकफापहः ।
नातिशीतल्वीर्यस्वाद्वातसाधारणो मतः ॥ ८० ॥
इसमें शशक—कषाय मधुररस, पित्तनाशक, न तो वायु को करता है, और न वायु का शमन करता है, (मधुर होने से वातशमक है और शीतल होने से वायुकारक नहीं, इसलिये साधारण है ) ॥ ८० ॥
गोधा विपाके मधुरा कषायकटुका स्मृता ।
वातपित्तप्रशमनी बृहणी बलवर्धनी ॥ ८१ ॥
गोधा—मधुरविपाक (कषाय-कटुरस), वातपित्तशमक, बृहण (देहवर्धक), बलवर्धक है ॥ ८१ ॥
शल्यकः स्वादुपित्तघ्नो लघुः शीतो विषापहः ।
प्रियको मास्तु पथ्योऽजगरस्त्वर्शसां हितः ॥ ८२ ॥
शल्यक—मधुर, पित्तनाशक, लघु, शीतल, विषनाशक है । प्रियक—वायुरोग में पथ्य है । अजगर—अश्वरोगियों के लिये हितकारी है ॥ ८२ ॥
दुर्नामानिलदोषघ्नाः क्रुमिदूषीविषापहाः ।
चक्षुष्या मधुराः पाके सर्पा मेधाग्निवर्धनाः ॥ ८३ ॥
सांप—दुर्नाम (अश्व) वायु-नाशक, क्रुमि एवं दूषीविष को दूर करते हैं, आँखों के लिये हितकारी, मधुर-विपाक, मेधा-अग्निवर्धक है ॥ ८३ ॥
दर्वीकरा दीपकाश्च तेषुकताः कटुपाकिनः ।
मधुराश्चातिचक्षुष्याः सूष्ठविग्मूत्रमारुताः ॥ ८४ ॥
इन सर्पों में दर्वीकर (दर्वी जैसे फणावाले), और दीपक (राजीमन्त) कटुपाकी हैं, मधुर, आँखों के लिये अति हितकारी, मल-मूत्र एवं वायु के प्रवर्त्क हैं ॥ ८४ ॥
अश्वाश्चतरगोखरोवृषस्तोरभमेदःपुच्छकप्रभृतयो ग्राम्याः ॥ ८५ ॥
ग्राम्य—अश्व (घोड़ा), अश्वतर (खच्चर), गाय, खर (गधा), ऊँट, वस्त (बकरा), उरभ्र (मेढा), मेदःपुच्छ (दुम्बा) आदि ग्रामों में रहने से ग्राम्य हैं ॥ ८५ ॥
ग्राम्या वातहराः सर्वे बृहणाः कफपित्तलाः ।
मधुरा रसपाकाभ्यां दीपना बलवर्धनाः ॥ ८६ ॥
इनके सामान्य गुण—ग्राम्य पशु वातनाशक, बृहण (शरीर वर्धक) कफ-पित्त को करते हैं । मधुररस मधुरविपाक, अग्निदीपक और बलवर्धक हैं ॥ ८६ ॥
नातिशीतो गुरुः सिन्धो मन्दपित्तकफः स्मृतः ।
वृगलत्स्वनभिष्यन्दो तेषां पीनसनाशनः ॥ ८७ ॥