भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ४६ ]

सूत्रस्थानम्

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वकरी (छागल)—ईष, शीतल, गुरु, स्निग्ध अल्पपित्त, अल्प कफकारक ( अल्प स्नेह और अल्प गुरुता होने से अल्प-कफकारक, उष्णता का सम्पर्क होने से तथा अल्प शीतल होने से अल्प पित्त), अनभिष्यन्दि, (दोष, धातु, मलों को थोड़ा उत्तेजित करती है) तथा पीनसरोगनाशक है ॥८७॥

बृहण् मांसमौरग्रं पित्तश्लेष्मापहं गुरु । औरग्र मांस का गुण—बृहण् (देहवर्धक) पित्तकफनाशक, गुरु है।

मेदःपुच्छोद्भवं वृष्यमौरग्रसहसं गुणैः ॥८८॥ मेद-पुच्छ (हुम्बा)—वृष्य (शुक्ल) तथा उरग्र के समान गुणवाला है ॥८८॥

श्वासकासप्रतिशयायविषमव्वरनाशनम् । श्रमात्यन्तिहितं गव्यं पवित्रमन्तिलापहम् ॥८९॥ गव्य (गाय) मांस का गुण—श्वास, कास, प्रतिशयाय, व्वरनाशक, श्रम एवं अलगपिन के लिये हितकारी, पवित्र, वायुनाशक है ॥८९॥

औरग्रवत्सलवर्णं मांसमेकशफोद्भवम् । एक शफ (खुरवाले घोड़े आदि) का मांस उरग्र के समान गुणकारी, थोड़ा नमक युक्त होता है ।

अल्पाभिष्यन्चयं वर्गो जाङ्गलः समुदाहृतः ॥९०॥ दूरे जनान्तनिलया दूरे पानीयोगो वराः । ये मृगाश्च विहङ्गाश्च तेऽल्पाभिष्यन्दिनो सताः ॥९१॥ अतीवासन्ननिलयाः समीपोदकगोचराः ।

ये मृगाश्च विहङ्गाश्च महाभिष्यन्दिनस्तु ते ॥९२॥ यह जाङ्गल वर्ग थोड़ा अभिष्यन्दी है । जो मृग और पक्षी मनुष्यों के समीपवर्ती स्थान से दूर रहते हैं, तथा पानी के स्थान से दूर रहते हैं, वे अल्प अभिष्यन्दी होते हैं (उन्निष्ठ-अभिष्यन्दि भोजनों के न मिलने से दोषकोपक नहीं होते) । जो मृग-पक्षी घरों के बहुत समीप रहते हैं, या जो पानी के बहुत समीप रहते हैं, वे बहुत ही अभिष्यन्दी दोषप्रकोपक होते हैं ॥९०-९२॥

आनूपवर्गस्तु पञ्चविधः । तथाथा—कूलचराः, प्लवाः, कोषस्थाः, पादिनो, मस्त्याश्चेति ॥९३॥

आनूपवर्ग (जल बहुत प्रदेश का) पाँच प्रकार का है । यथा—कूलचर (किनारों पर चरनेवाले), प्लव (तैरनेवाले), कोषस्थ (शङ्खादि सम्पुट में रहनेवाले), पादी (पाँववाले) और मछलियाँ ॥९३॥

तत्र गजगवयमहिषरुरुचमरसुमररोहितवराहखज्जिगो- कर्णकालपुच्छकोद्रन्यङ्क्ववरण्यगवयप्रभृतयः कूलचराः पशवः ॥९४॥

इनमें कूलचर—गज (हाथी), गवय, महिष (भैंसे), रुरु, चमर, सुमर (महाशूकर) रोहित, वराह, खज्जी (गैंडा), गोकर्ण,

कालपुच्छक, ओन्दुर (ऊदबिलाव), न्यंकु (मृग), अरण्यगवय (वन्य गौ) आदि कूल-पानी के किनारे चरनेवाले पशु हैं ॥

वातपित्तहरा वृष्या मधुरा रसपाकयोः । शीतला बलिनः स्निग्धाः मूत्रलाः कफवर्धनाः ॥९५॥

इनके सामान्यगुण—वात-पित्तनाशक, वृष्य (शुक्ल) मधुररस, मधुरविपाक, शीतल, वलकारक, स्निग्ध, मूत्रल और कफवर्धक हैं ॥९५॥

विरुक्षणे लेखनश्च वीर्योष्णः पित्तदूषणः । स्वाद्वम्ललवणस्तेषां गजः श्लेष्मानिलापहः ॥९६॥ गज (हाथी)—रूक्ष, लेखन, उष्णवीर्य, पित्तप्रकोपक, स्वादु, अम्ल, लवणरस, कफवायुनाशक हैं ॥९६॥

गवयस्य तु मांसं हि स्निग्धं मधुरकासजित् । विपाके मधुरं चापि न्यवायस्य तु वर्धनम् ॥९७॥ गवय का मांस, स्निग्ध मधुररस, कासनाशक, मधुरविपाक और मैथुन शक्ति को बढ़ाता है ॥९७॥

स्निग्धोष्णमधुरो वृष्यो महिषवर्त्तर्पणो गुरुः । निद्रापुंस्त्वबलस्तन्यवर्धनो मांसदावर्द्धकृत् ॥९८॥ भैंस का मांस—स्निग्ध, उष्ण, मधुर, वृष्य (शुक्ल) तर्पण (वृत्तिकारक), गुरु, निद्रा, पुंस्त्व (पुरुषत्व), बल और दूध को बढ़ाता है, मांस को हृद करता है ॥९८॥

रुरोर्मांसं समधुरं कषायानुरसं स्मृतम् । वातपित्तोपशमनं गुरु शुक्रविवर्धनम् ॥९९॥ तथा चमरमांसं तु स्निग्धं मधुरकासजित् । विपाके मधुरं चापि वातपित्तप्रणाशनम् ॥१००॥ सुमरस्य तु मांसं च कषायानुरसं स्मृतम् । वातपित्तोपशमनं गुरु शुक्रविवर्धनम् ॥१०१॥

रुरु का मांस—मधुररस, कषाय अनुरस, वातपित्तशामक, गुरु, शुक्रवर्धक है । चमर का मांस स्निग्ध, मधुररस, कासनाशक, मधुरविपाक, वात-पित्तनाशक है । शुक्रवर्धक है ॥

स्वेदनं बृहणं वृष्यं शीतलं तर्पणं गुरुः । श्रमानिलहरं स्निग्धं वाराहं बलवर्धनम् ॥१०२॥ वराह (सूअर) का मांस—स्वेदक, बृहण्, वृष्य, शीतल, तर्पण (वृत्तिकारक), गुरु, स्निग्ध, श्रम-वायुनाशक और बलवर्धक है ॥१०२॥

कफमनं खज्जिपिशितं कषायमन्तिलापहम् । पित्तं पवित्रमायुष्यं बद्धमूत्रं विरुक्षणम् ॥१०३॥ खज्ज (गैंडे) का मांस—कफनाशक, कषायरस, वायुनाशक, पित्तों के लिये हितकारी, पवित्र, आयुवर्धक, मूत्र को रोकने-वाला और रूक्ष है ॥१०३॥