भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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गोकणेमांसं मधुरं स्निग्धं सदु कफावहम्‌ ।

विपाके सधुरं चापि रक्तपित्तविनाशनम्‌ ॥१०४॥

गोकणं का मांस-मधुर, स्निग्धे मृदु, कफनाशकः मधुर

विपाक, रक्तपित्तनाशक हे ।|१०४]। |

हंससारसक्रौव्वचक्रवाकङुररकादस्बकारण्डवजीवज्ञी- वकवकवराकापुण्डरीकषप्टवशरारीमुखनन्दीुखमद्गूत्को- ञकाचाक्षमल्िकाक्षश्चक्टाक्षपुष्करायिकाकोनाख्काग्बु -

कुक्टिकामेघरावश्वेतवारखप्रश्तयःप्ठ ओः संघातचारिणः।

प्टव (तैरनेवाे) पक्षी- दंस, खारख, क्रोच, चक्रवाक

(चकवा), कुरर, कादम्ब (कठहंख), कारण्डव; जीवज्जीव) वक,

वलाका, पुण्डरीक, प्टव, शरारीमुख, नन्दौमुख, सद्गु (जल￾कोवा), उ्रोश, काचाक्ष, मल्खिकाक्ष, ुक्छाक्ष, पुष्कस्यायिकरा;

कोनाल्क, अम्बुकुक्छुटिका (जल्कुक्कुरी), मेषराव (चातक)

श्वेतवारक आदि तैरनेवाले पशची है, ये इकट्ठे रहते इं ॥१०५॥

रक्तपित्तहरः ओताः स्निग्धा वृष्या मरुञ्जिताः ।

सष्टमूत्रपुरीषाश्च सधुरा रसपाकयोः ॥१०६॥

इनके सामान्यगुण-रक्त-पित्तनाशक, शीतल, स्निग्ध,

इष्य (शुक्रवधंक), वायुनाशक, मलमूत्र के प्रवत्तंक; मधुररख

मधुर विपाक हँ ॥१०६॥)

गुरूष्णमधुरः स्निग्धः स्वरबणेवलप्रदः ।

ठंहणः ञ्॒क्ररस्तेषां हंसो वातदिकार छत्‌ ॥१०७॥

हंस के गुण, उष्णवीयं, मधुररख, स्निग्ध, स्वसण-बल-प्रद

चंहण (देदव्धक), शुक्रवध॑क, वायुविकारनाशक है ।१०७॥

अङ्खशङ्खनखशक्तिशम्बूकभल्लकप्रथ्तयः कोशस्थाः ॥

कोशस्थ ( शङ्ख आदि मे रदनेवाे )-- शद्ध, शद्धनख,

(षद्रशङ्ख), शक्ति (खीप), शम्बूक (आवत्तंकोश), भल्द्क

(आदि शम्बूक, वोडिक) कोशस्थ हैँ ।॥१०८]

कूमेङकम्भीरधेतककेटकृष्णककेटकनि्चुमारपरश्रतयः पादिनः

पादी (बवल) -कूमं (कच्छुमा), ऊुम्मीर (घड़ियाल),

श्वेत ककरक, कृष्ण ककटक (ककड), शिशुमार पाँववाछे

(गुहामच्छ) ई ॥१०६॥

शङ्ककरूमारयः स्वादुरसपाका मरुन्सुदः।

ओताः स्निग्धा हिताः पित्ते वचस्याः उलेष्मवधंनाः ॥

शङ्ख एवं कूमादि- मधुररसः, मधुरविपाक, वायुनाशक्, `

शीतवीयं, स्निग्ध, पित्तरोग मेँ दितकारी, वचस्य (इष्य-कूममो

वातहरो इष्यो ) ओर कफवधक दै |१००॥ य

कृष्णककंटकृस्तेषां बल्यः कोष्णोऽनिखापहः ।

युक्ठः सन्धानञ्रत्‌ सृष्टविणम्‌त्रोऽनिर्पित्तदा ॥११६॥

इनमें कृष्ण ककंटक~उष्ण, वायुनाशक दे । श्वेत ककेटक￾भग्न को जोडनेवाटा, मलमूत्र का विरेचक ओर वायुपित्त￾नाशक ह ॥१११॥ |

घुश्रतसंहिता

मस्स्यासतु दहिबिधा नादेयाः सामुद्रा श्च ॥११२॥ मह्यां दो प्रकार की है। एक-नदी मे रहनेवारी

(नादेय) मौर दूखरी-समुद्र मे रदनेवारी (खामुद्र) ॥ ११२

तच्र नदेयाः-रोहितपाठीनपाटलाराजीववर्भिगोमसस्य- कृष्णमत्स्यवागुञ्चारयुररुसह खद ट्रश्तयः ॥११३॥

इनमें नादेय --रोदित, पाठीन, पाटला, राजीव, वभि, ।

गोमत्स्य, कष्णमत्स्य १, वागुज्ञार, मुर, सदखदष्टर आदि

नादेय (नदी में रहनेवाली) मछलियां दँ ॥११३॥

नादेया मधुरा रस्या गुरवो मारुतापहाः ।

अ ० ४६ |

रक्तपित्तकराश्चोष्णा वृष्याः स्निग्धाल्पवचंसः ॥११४॥ .

नादेय मत्स्य के सामान्य रुण- मधुर, गुर वायुनाशकः,

रक्त-पित्त प्रकोपक, उष्ण, दृष्य, स्निग्ध ओर मल को थोड़ा

वदाती दै ॥११४॥ | =<

कषायानुरसस्तेषां शष्परोवाङभोजनः।

रोहितो याशुतहरो नाव्यथं पित्तकोपनः ॥११५॥

पाठीनः इेष्पछो व्रृष्यो निद्रालुः पिंगिताशनः।

दुषयेदरक्तपितं तु कुष्ठरोगं करो्यसो ।

रोहितक (हू) मत्स्य--कषाय अनुरस; शष्पशेवाङ को

लानेवाटी, वायुनाशक, पित्त को थोडा ऊुपित करती हं |

पाठीन मत्स्य-कफवर्धक, वृष्य, निद्राकर, मांखमश्षक (होने से

पुष्टिकारक), अग्पित्त रोग तथा कुषठरोग को उत्पन्न करती ६ ॥

मुरछो बरंदणो वृष्यः स्तन्यः इेषमकरस्तथा ॥११६॥

मुर बृंहण (देहवधंक), वृष्य (शुक्रल); दुष ओर कफको | बदाती दे ॥११६॥ ¦

सरस्तडागसंभूताः स्निग्धाः स्वादुरसाः स्ताः ।

महाहदेषु बङिनः, खल्पेऽम्भस्यबखाः स्ताः ॥१९॥

सरोवर एवं ताढाबों मे उत्पन्न मछलि्-सिनिग्धः मधुरस्य

होती ह । बड़े मारी जलाशयं मे उलन मछलिया। बलवान्‌ तथा

थोड़े पानीवाङे जलाशयो मे उन्न मछलियां निब॑र होती ६ ॥ `

तिमितिमिङ्गिक्कलििपाकमरस्यनिरुखनन्दिवार (र).

छकमकरगर्मर चन्द्रकमहामीनराजीवप्रश्चतयः सायुद्राः ॥

समुद्र मे रहनेवाटी महषि्या- तिमि, तिमिङ्गिल, इषः

पाक्रमतस्य, निराल्क, नन्दिवारख्क, -मंकर, गगरक; चन्द्रक

महामीन, राजीव आदि मछलियां समुद्र मे रदती ई ॥११८॥

सायुद्रा गुरवः स्निग्धाः मधुरा नातिपिच्तखाः।

उष्णा वातहरा वृष्या बचंस्याः इठेष्मवधेनाः॥ ११९॥.

बखावहा विशेषेण सांसाश्चित्वात्‌ समुद्रजाः ।

समुद्रनेभ्यो नादेया इंहणस्वाद्‌ गुणोत्तरा; ॥१२०॥

१ कृष्ण मत्स्य - |

““करष्णमत्स्यस्तु शकटी बहुकण्टकसंयुतः ।

_ कषायवर्णो खताच्तः कथितो सत्स्यवेदिभिः ॥ ` . -

चक ~~ रवकर क्क कक