सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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भूतस्थानम्
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तेषामप्यनिलक्षन्तवाचौण्य्यौण्यो गुणोत्तरी ।
स्निग्धत्वन स्वादुपाकत्वात्तयोर्वाप्या गुणाधिकाः ॥१२॥
सामुद्रमत्स्य के सामान्य गुण—समुद्र में रहनेवाली मछलियाँ—गुरु, स्निग्ध, मधुर, ईषत्पित्तप्रकोपक, उष्ण, वायुनाशक, वृष्य (शुक्रवर्धक), वर्चस्य (मलवर्धक) और कफवर्धक हैं ।
समुद्र में रहनेवाली मछलियाँ मांसभक्षक होने के कारण खासकर बलवर्धक हैं । और नदियों में रहनेवाली मछलियाँ वृंहण (देहवर्धक) होने से समुद्रजन्य मछलियों से गुणों में श्रेष्ठ हैं । इन समुद्र एवं नदियों की मछलियों से चौण्य्य और कृग की मछलियाँ अधिक श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे वायुनाशक हैं और वापी (बाबड़ी) की मछलियाँ स्निग्ध एवं मधुर विपाक होने के कारण, चौण्य्य और कृप की मछलियों से अधिक श्रेष्ठ हैं ॥
नादेया गुरवो मध्ये यस्मात् पुच्छाश्चत्चारिणः ।
सरस्तडागजानां तु विशेषेण शिरो लघु ॥१२२॥
नदियों से उत्पन्न मछलियाँ—चूँकि पूछ और मुख को सहायता से गति करती हैं, इसलिये मध्य भाग से गुरु होती हैं । सरोवर एवं तालाबों में उत्पन्न मछलियों का शिर, विशेष करके लघु होता है ॥१२२॥
अदूरगोचरा यस्मात्समादुत्सोदपानजाः ।
किंचिन्मुक्त्वा शिरोदेशमत्यर्थं गुरवस्तु ते ॥१२३॥
उत्स (झरना), उदपान (बुद्ध जलाशय) में उत्पन्न मछलियाँ चूँकि अधिक दूरी तक नहीं फिरतीं (अल्प व्यापाम करती हैं) इसलिये शिरोदेश को छोड़कर, बहुत गुरु होती हैं ॥
अधस्ताद् गुरवो ज्ञेया मत्स्याः सरसिजाः स्मृताः ।
उरोविचरणशोषां पूर्वमंज्जं लघु स्मृतम् ॥१२४॥
सरस (सरोवर) में उत्पन्न मछलियों का निचला भाग विशेष करके भारी होता है, क्योंकि ये मछलियाँ छाती के द्वारा गति करती हैं, इसलिये इनका पूर्व भाग लघु रहता है ॥१२४॥
इत्यानूपो महास्थन्दी मांसवर्ग उदीरितः ॥१२५॥
यह महाभिष्यन्दि१ (दोष, धातु मलों का अतिशय किल्लकरने वाला) आनूप, मांसवर्ग कह दिया ॥१२५॥
तत्र शुष्कपूतिव्याधिष्विषसर्पहृत्दिग्धविद्वजोर्णुकश- बालानामसात्क्यचारिणां च मांसान्यदभयाणि, यस्माद्दि- गतव्यापन्नापहृत्परिणताल्पासंपूर्णवीर्यत्वाद्दोषकराणि भवन्ति; एभ्योऽन्येषामुपादेयं मांसमिति ॥१२६॥
शुष्क, पूति (दुर्गन्धयुक्त), व्याधिहृत (रोगग्रस्त), विषहृत, सर्पहृत, दिग्ध (विषादि से लिप्त शस्त्र द्वारा), विद्व (बीधा), जोर्ण (हृद्ध), कृश (दुबल), बालक, असाल्प्य (अनुचित आहार
खानेवाले), पशुओं का मांस अभक्ष्य है । क्योंकि—शुष्क होने से, रसहीन, व्यापन्न (वृषित), अपहृत, परिणत, अल्प, असम्पूर्णवीर्य, तथा दोषकारक होने से अभक्ष्य है । इन दोषों से रहित मांस खाना चाहिये ॥१२६॥
अरोचकं प्रतिशयायं गुरु शुष्कं प्रवर्त्तयेत् ।
विषव्याधिहृतं मृत्युं बालं छिद्रं च कोपयेत् ॥१२७॥
कासश्वासहर्षं वृद्धं त्रिदोषं व्याधिदूषितम् ।
किलन्नमुक्त्वेजजननं कृशं वातप्रकोपणम् ॥१२८॥
दूषित मांस के खाने में दोष—
शुष्क मांस—अरुचि, प्रतिशयाय, भारीपन करता है । विष एवं रोग से मरे पशु का मांस मृत्यु करता है । बालक पशु का मांस—बमन रोग करता है । वृद्ध पशु का मांस—कास, श्वास करता है । रोग से पीड़ित पशु का मांस—तीनों दोषों को कुपित करता है । किलन्न (पूति) मांस—उत्कलेश (जी मचलाना) करता है । कृश पशु का मांस वायु को कुपित करता है ॥१२७, १२८॥
खियश्चतुष्पात्सु, पुमांसो विहङ्गेषु, महाशरीरेष्वल्प- शरीराः, अल्पशरीरेषु महाशरीराः प्रधानतमाः । एवमेक- जातीयानां महाशरीरेभ्यः कृशशरीराः प्रधानतमाः ॥१२९॥
लिङ्ग आदि का विचार—
चौपायों में झीलिंग श्रेष्ठ है, पक्षियों में पुल्लिङ्ग श्रेष्ठ है । महाशरीर (मैंठा, गैंडा) वाले आनूप देश के प्राणियों में अल्प शरीरवाले (रुख आदि) श्रेष्ठ हैं । अल्पशरीरवाले (लावा आदि) विकिरों में महान् शरीरवाले पक्षी उत्तम हैं । समान जातीयों में महान् शरीरवालों से कृशशरीरवाले प्राणी श्रेष्ठ हैं ॥१२९॥
स्थानादिकृतं मांसस्य गुरुलाघवमुपदेक्ष्यामः । तद्यथा रक्तादिषु शुक्रान्तेषु धातुष्वुत्तरोत्तरा गुरुतरः, तथा सकृथ- स्कन्धक्रोडशिरःपादकरकटीपुष्टचर्मकालेयकयकृद्गन्त्राणि ॥
स्थान के विचार से मांस का गुरु—लाघव कहते हैं, यथा-रक्त से आरम्भ करके शुक्तक धातुओं में उत्तरोत्तर गुरुत्व आता जाता है । रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्त गुरु है । इसी प्रकार—सकृथ (ऊर्ध्व), स्कन्ध (कन्धे), क्रोड (उदर), शिर, पांव (पिछले), कर (अगले पांव), कटि, पीठ, चर्म (स्वर्वा), कालेयक (बृक्क), यकृत (जिगर) और आंत ये उत्तरोत्तर गुरु हैं ॥१३०॥
शिरः स्कन्धं कटीपुष्टं सकृथनी चात्मपक्षयोः ।
गुरु पूर्व विजानीयाद्वातवस्तु यथोत्तरम् ॥१३१॥
शिर, स्कन्ध, कटि, पीठ, टांगों में अपनी अपेक्षा से पूर्व को गुरु जानना चाहिये । रक्तादि धातुओं में अपनी अपेक्षा से पिछले को गुरु समझना चाहिये ॥१३१॥
१ अभिष्यन्दि—
“हृदयस्यान्ननिर्यासवाहिलोतोमुखांनि यत ।
मुक्त्वं लिप्सति पेच्छित्यादिभिष्यन्दि तदुच्यते ॥”