सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्तसंहिता
[ अ० ४६ ]
सर्वेभ्य प्राणिनो देहे मध्ये गुरुरुद्गान्नः ।
पूर्वभागो गुरुः पुंमापभोगागस्तु योषिताम् ॥१३२॥
उरोघ्रोंव विहङ्गानां विरोषेण गुरु स्मृतम् ।
पक्षोन्तेगस्ममो दृष्टो मध्यभागस्तु पक्षिणाम् ॥१३३॥
सब प्राणियों का मध्य भाग गुरु होता है, पुरुषों का पूर्व भाग गुरु होना है, स्त्रियों का अधोभाग गुरु होता है । पक्षियों की छाती और ग्रीवा विशेषकर गुरु होती हैं, पक्षियों का मध्य-भाग न तो लघु, न गुरु, समान होता है, क्योंकि पंखों के चालन के कारण समान रहना है ॥१२२, १३३॥
अनीव रूक्षं मांसं तु विहङ्गानां फलाजिनाम् ।
बृहणं मांसमन्यर्थं स्वगानां पिशिताशिनाम् ॥१३४॥
मत्स्यगजिनां पित्त्करं वातघ्नं धन्वचारिणाम् ।
आहार दृष्टि से गुरु-लाघव—
फल खानेवाले पक्षियों का मांस अति रूक्ष होता है ।
मांस खानेवाले पक्षियों का मांस अतिशय देहवर्धक होता है ।
मछलियों को खानेवाले (बगुले आदि) पक्षियों का मांस पित्त-
कारक होता है, धन्व (जांगल देश) चारी पक्षियों का मांस
वातनाशक होता है ॥१३४॥
जलजानपजा ग्राम्याः क्रम्यादैकजफाम्भथा ॥१३५॥
प्रमहा विल्वामाश्रयं च जंघालसंज्ञिताः ।
प्रतुदा विकिराश्रयं लघवः स्युर्थेभोत्तरम् ।
अल्पामिष्यन्दिनश्रयं यथापूर्वमतोऽन्यथा ॥१३६॥
बगों का गुरु-लाघव—जलज (जल में रहनेवाले) आनूपज (आनूर—जलबहुल प्रदेश में), ग्राम्य (गौ आदि), क्रम्याद (मांस खानेवाले), एकशफ (घोड़े आदि), प्रसह (काक आदि), विल्ववासी (सिंह आदि) और जंघाल (मृग आदि), प्रतुद (कपोत-पारावत आदि), विकिर (बटेर आदि) ये उत्तर-रोत्तर लघु एवं अल्प अमिष्यन्दि होते हैं । (आनूप से जलज गुरु और महा अमिष्यन्दि हैं) ॥१३५, १३६॥
प्रमाणधिकाम्तु स्वजातावलपमारा गुरवश्च । सर्व-प्राणिनां सर्वशरीरेभ्यः प्रधानतमा भवन्ति यकृतप्रदेजावर्ति-तस्तानाददीन, प्रधानालाभे मध्यमयस्कं सद्यस्कमकिल घमुपादेयं मांसमिति ॥१३७॥
अपनी ही स्वजाति में जो पशु शरीर में अधिक होते हैं वे अल्पसार (तुच्छ वल) होते हैं, तथा गुरु होते हैं । सब प्राणियों में, सम्पूर्ण शरीर के अन्दर यकृत प्रदेश में रहने वाली सिंघा स्नायु-मांस अधिक प्रधान (श्रेष्ठ) होते हैं, इनका ग्रहण
१ कबिराज हाराणचन्द्र जी ने 'आत्मपञ्चयोः' यह पाठ 'आत्मपक्षयोः' के स्थान पर दिया है । इसका अर्थ स्त्री एवं पुल्लिङ्ग भेद से किया है ।
करना चाहिये । (पित्ताशय—(Gale-Bladder) एवं पित्तबाहक प्रणाली को छोड़ देना चाहिये यह बुद्धवैद्यप्रथा है) । यदि प्रधान (श्रेष्ठ) न मिले तो मध्यम आयुवाले, तरुण तुरन्त मारे पशु का, अकिलध (मन के अनुकूल) मांस का ग्रहण करना चाहिये ॥१३७॥
भवति चात्र—
चरः शरीरावयवाः स्वभावो धातवः क्रिया ।
लिङ्गं प्रमाणं संस्कारो मात्रा चास्मिन् परीक्ष्यते ॥१३०॥
इति मांसवर्गः ।
कहा भी है—
मांस के विषय में निम्न बातों का विचार करना चाहिये—
चर (किस स्थान में विचरता है), शरीरावयव (शरीर के भाग), स्वभाव, धातु (रस रक्तादि), क्रिया (चेष्टा), लिङ्ग, प्रमाण और संस्कार (कल्लग्न) का विचार करना चाहिये ॥
चर—किस स्थान पर विचरता है, धन्व (जांगल देश) में, या आनूप (जलबहुल में), जल में विचरता है, किस प्रकार का यह आहार करता है, किस प्रकार का इसका विहार है । इत्यादि बातों को देखना चाहिये । शरीरावयव—शरीर के भाग-पक्षियों की उर और ग्रीवा भारी होती है । स्वभाव—स्वभाव में, बटेर लघु होते हैं । धातु—रक्त से मांस धातु गुरु है । क्रिया—छाती के सहारे चलने से इनका पूर्व भाग लघु होता है । लिंग—चौपायों में स्त्री लघु है, पक्षियों में पुरुष लघु है । प्रमाण—महाशरीरों में अल्प शरीर लघु हैं । संस्कार—चावलों से लाजा लघु हैं । मात्रा—गुरु पदार्थों को आधे पेट खाना, लघु पदार्थों को पेट भरकर खाना ।
'च' से अभिनव की अपेक्षा से भी विचार करना चाहिये । इन सब बातों का विचार करके गुरु लघु का निश्चय करना चाहिये ॥१३८॥
अथ फलवर्गः ।
अत ऊर्ध्वं फलान्युपदेद्यामः । तद्यथा—दाडिमाम-लकवदरकोलककन्दुसौवीरसिञ्चितिकाफलकपित्थमातुलुङ्गाप्रः प्रातककरमदप्रियालनारङ्गजम्बोरलकुचभन्यपाराव-तवेरफलप्राचीनामलकतिन्तिडीकनीपकोशाप्राम्लीकाप्रश्नीनीति ॥१३९॥
इसके आगे फलों को कहते हैं—
यथा—दाडिम (अनार), आमलक (आंवला), बदर (बदर), कोल (झाड़ी के वर), ककन्दु (होटे वर), सौवीर (बेर का भेद), सिञ्चितिका (पाठान्तर में शिम्बिका—देर का भेद), कपित्थ (कैथ), मातुलुङ्ग (बिजौरा), करमद (करौंदा), पियाल, नारंग (नारंगी), जम्बोर, लकुच (बड़हल), भन्य (कामरंग-कमरख),