भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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- थ दूसरे सव फलो से अधिक गुणकारी दै ॥१४३.१४४॥

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सवत, वे्रफलः प्राचीन आमल्कं ( पानीयामलक ), तिन्ति-

न नीप ( कदम्ब); कोशम्‌ ( कोसिम्ब्र ); आम्डीका

%) ( इमी ) आदि फल दे ।।१३६॥ . |

अम्डानि रसतः पाके गह्ण्युष्णानि वीयेतः । पित्तङान्यनिरष्नानि कृफोक्टेशकराणि च ॥ १४० ॥

ामान्य गुण-फों के रस, अम्करस, गुरुविपाक (मधुर),

उवी, पित्तकारक, वायुनाश ओर कफ को ऊुपित करते है ।

कषायानुरसं तेषां दाड्मि नातिपित्तछम्‌ ।

दीपनीयं रुचिकरं हदं वचा विवन्धनम्‌ ॥ १४१ ॥ द्विविध तत्त॒ विज्ञयं मधुरं चाम्खसेव च ।

त्रिदोषष्नं तु सधुरमम्खे वातकफापहम्‌ ॥ १४२ ॥ दाडिम ( अनार )- कपाय--अनुरख, थोडा पित्तकारक,

अग्निदीपक, सचिकरः हदय के ल्य प्रिय, मल को रोकनेवालां है | अनार दो प्रकार का दै--मीठा ओर खदा । इनमें मधुर- न्रिदोषनाशक ओर अम्छ (खट्टा) अनार वात-कफनाश्चक है ॥ अम्टं समधुरं तिक्तं कषायं कटुक सरम्‌ । ` चज्ञुष्यं सवेदोषषनं वृष्यमामलकीफलम्‌ ॥ १५३॥

हन्ति वातं तदम्ख्त्वात्‌ पित्तं माधुयंञव्यतः।

कफ़ रूक्षकषायत्वात्‌ फेभ्योऽभ्यधिकं च तत्‌ ॥ १४४ भामलकौ फल--अम्क;) थाड्ा मधुर, तिक्त--कषाय- कटु

रख, आंखो के श्य हितकारी, त्रिदोषनाशक, दूष्य, शुक्रवधंक

हे | अम्लरस हाने से वायुका, मधुर एवं शीतवीयं होने से पत्त का, रुक्ष-- कषाय होने से कफ का नाश करता है, इस

ककन्धुकोख्वद्‌रमामं पित्तकफावहम्‌। पक्वं पित्तानर्हरं स्निग्धं समधुरं सरम्‌ ॥ १४५॥ पुरातन चृदट्‌ञमनं श्रमध्नं दीपनं छु । न्धुः कोर, बद्र--ये कच अवस्था मे, पित्त एवं कफ- । पकने पर पित्त ~ वायुनाशक, स्निग्ध, मधुर ओर

एए ( विरेचक ) है । पुराने बेर प्यासशामक, थकान को भरते है, अग्निदौपक ओर रघु हे ॥१५५॥ सोवीरं बदरं स्निरधं मधुरं वातपित्तजित्‌ ॥१४६॥ कषाय स्वादु सम्रा।ह शातं सिच्ितिकाफकम्‌। सौवीर बेर-स्निगध, मधुर, बातपित्तनाशक दहै । सिञ्चितिका एकाह मेद्‌ ) फल कषाय रस, मधुरविपाक, संप्ादी भोर शीतल है || ९४६॥ | जाम कपित्थमस्वयं कफध्तं भ्राहि वातलम्‌ ॥ ९४७॥ कफनिख्हर पक्वं मधघुराम्छरसं गर । ` वासकासारुचिहर तृष्णाघ्नं कण्टञोधनम्‌॥ १४८ ॥ कपित्थ ( कैय )-- कचा केथ--सरं के व्यि हानिकारक क संहि, वातनाशक दे । पक्ने पर--कफ--बायुः

सूत्रस्थानम्‌

शुरु ओर शीतर दे ॥१५६॥

| ९९५ नाशक, मधुर. अम्टरखं, गुरु ई; श्वांख, कासं, अरचिना गकर तृष्णानाशक ओर गले का ( स्वर का) शोधन करता दै ॥ खघ्रम्कं दौपनं हद्यं मातुलुङ्गसुदाष्रतम्‌ । त्वक्‌ तिक्ता दुजेरा तस्य वातछृमिकफापहा ॥ १४६॥ स्वादु शौतं गुरु स्निग्धं मांसं मारुतपित्तजित्‌। मेध्यं शूलानिुच्छदिकफारोचकनाञनम्‌ ॥ १५० ॥

दौपनं लघु संप्राहि गुल्मरार्जघ्नं तु केसरम्‌ । शुलाजीणविवन्धेषु मन्देऽग्नौ कफमारुते ॥ १५१॥ मातचुङ्ग ( व्रिजोरा )--ल्धु, अम्, अग्निदीपक, हृदय के चयि प्रिय है। इघकी छाल तिक्त, दुजर एवं वायु, कृमि ओर कफनाशकर है । इसका मांस ( गुदा ) -मधुर, शीतल, गुर, स्निग्ध, वायु पित्तनाशक दै । मेध्य (मेधा के व्यि दित- कारी ), श्ल, वायु, छर्दि, कफ ओर अर्चि का नाशक दै।

इसका केखर ( तन्तुजा }--अग्नि दीपक, ल्घु, संग्राही, गुल्म- अशनाशक, शूल, अजोीणं विबन्ध ( मलावरोष ), अग्निमान्य

ओर कफवायु रोगो मे दितकारी है ॥१४६-१५२१॥

अरुचौ च विशेषेण रसस्तस्योपदिङ्यते।

पित्तानिखकरं वारं पित्तर बद्धकेशरम्‌ ॥ ११५२ ॥

तरिजोरे का रस--असचि मे खासकर उपयोगी है । बाल ( छोटा त्रिजोरा )-पित्त.एवं वायुक्रारक है । बद्धकेसर (जिस ब्रिजोरे मे तन्तु बद्ध रुका हे ) पित्तकारक है ॥१५२॥ ` हयं बणेकरं रुच्यं रक्तमांसवल्प्रदम्‌ ।

कषायानुरसं स्वादु वातघ्नं जरंहण गुर्‌ ॥ १५३॥ पित्ताविराधि संपक्वमाम्रं ञुक्रविवधेनम्‌ ।

पक्का आम--द्ृदय के व्यि प्रिय, बणकारक) रुचिकर,

रक्तमांस-वल्वधक, कषाय-अनुरख, स्वाद दार, वातहर, बृंहण ओर गुरु है तथा पित्तशामक ओौर शुक्रवधंक रै ॥१५३॥

बृहणं मधुरं बल्यं गुरु विष्टभ्य जीयति ॥ १५४॥

आम्रातक फर वृष्यं सस्नेहं इरृषममवधेनम्‌ ॥

आमूतक फल देहवधक, मधुर, बल्कारक, गुर, विष्टम्भ ( वायु, ताद, श दोना, मल का न आना ) उखन्नकर जीणं

हाता है । बृष्य स्नेहयुक्त ओर कफवधंक हे ।(१५४५॥

त्रिदोष विष्टम्भकरं ्छुचं ज॒ुकरनाशनम्‌ ॥ १५५ ॥

लछुच ( बड़ह )- तीनों दाषों को उन्न करता है, विष्टम्भ (गुडगुडाहट) करता दै, ओर शुक्र को न करता है ॥ अम्खं ठृषापहं रुच्यं पित्तकृत्‌ करमदकम्‌ । करमद ( करोँदा )- अम्लरस, तूषानासक, रुचिकर, पित्त

कारक है | 5 |

वातपित्तहरं वृष्यं प्रियां गुरु शीतरप्‌ ॥ १५६॥ पियाल ( चिररोजी )-बातःपित्तनाशक, इष्य (शुक्रवधक), =

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