सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४६ ]
हृव्यं स्वादु कषायमलं भव्यमास्यविशोधनम् । पित्तश्लेष्महरं ग्राहिं गुरु विष्टम्भि जीतलम् ॥ १५७ ॥ भव्य—हृदय के लिये प्रिय, स्वादु, कषाय-अम्ल, और सुख का शोधक है। पित्त-कफनाशक, संग्राहि, गुरु, विष्टम्भी, शीतल है ॥१५७॥
पारावतं सुमधुरं रुच्यमत्यग्नित्वानुत् । पारावत—मधुर, रुचिकारक, अत्यग्नि, एवं वायु का नाश करता है।
गरदोषहरं नीपं प्राचीनामलकं यथा ॥ १५८ ॥ नीप ( कदम्ब )—गर ( संयोगजन्य विष )—दोषनाशक है, प्राचीन आमलक ( पानीय आँवला ) भी गरदोषनाशक है। वातापहं तित्तिडीकमामं पित्तबलासक्तु । प्राहृणं दीपनं रुच्यं संपक्वं कफवातनुत् ॥ १५९ ॥ कच्ची तित्तडी ( कच्ची इमली )—वातनाशक, पित्त, कफ-कारक है। पक्की इमली—संग्राही, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, रुचिकारक, कफ-वातनाशक है ॥१५९॥
तस्मादल्पान्तरगुणं कोशाग्रफलमुच्यते । कोशाम् ( कोशाम्बी ) फल—के गुण—इमली से कुछ कम गुणवाले हैं।
अम्लीकायाः फलं पक्वं तद्दुर्भेदि तु केवलम् ॥ १६० ॥ पक्की अम्लिका ( इमली ) के गुण—पक्के तित्तडीफल के समान ही हैं, किन्तु यह विरेचक हैं ॥१६०॥
अम्लं समधुरं हृव्यं विशदं भक्तरोचनम् । वातघ्नं दुर्जरं प्रोक्तं नारङ्गस्य फलं गुरु ॥ १६१ ॥ नारङ्ग ( नारङ्गी )—अम्ल, मधुर, हृदय के लिये प्रिय, विशद, भोजनमें रुचिकर, वातनाशक, दुर्जर, गुरु ( चिरपाकी ) होता है ॥१६१॥
तृष्णाशूलकफोत्क्लेशच्छिदिंश्वासनिवारणम् । वातश्लेष्मविबन्धघ्नं जम्बीरं गुरु पित्तकृत् । ऐरावतं दन्तशठमरनं शोणितपित्तकृत् ॥ १६२ ॥ जम्बीर—तृष्णा, शूल-कफ की वृद्धि, वमन, स्वासनाशक, वायु कफ एवं विबन्धनाशक, गुरु, पित्तकारक है। ऐरावत दन्तशठ ( गुदहिया निम्बु )—रक्त पित्तकारक है ॥१६२॥
क्षीरिवृक्षफलजाम्बवराजादनतोदनशीतफलतिन्दुकब- कुलधन्वनाशमन्तकाश्रकणफलगुपुरुषकगाङ्गेशकीपुष्करवर्त्ति- बिल्वविम्बीप्रभृतीनि ॥ १६३ ॥
कषायरस-बहुल फल—
क्षीरिवृक्षफल ( बड़, पीपल, पिलखन, गूलर, आदि ), जाम्बव ( जामुन ), राजादन ( क्षीरिणी ), तोदन ( राजप्रिय ), शीतफल ( उदुम्बर ), तिन्दुक, बकुल ( मौलसरी ), धन्वन ( धामन ), अशमन्तक ( आसन्त अथवा कचनारभेद ), अश्व-
कर्ण ( शाल ), पुरुष ( फालसा ) फल्यु ( अञ्जीर ), गांगेशकी ( नागबला ), पुष्करवर्त्ति, बिल्व ( बेलगिरी ), विम्बी ( कंदूरी ) आदि हैं ॥१६३॥
फलाग्नेतानि शीतानि कफपित्तहराणि च । संग्राहकाणि रूक्षाणि कषायमधुराणि च ॥ १६४ ॥ इनके सामान्य गुण—ये फल शीतवीर्य, कफ-पित्तनाशक
हैं। संग्राही, रूक्ष और कषाय एवं मधुररस हैं ॥१६४॥
क्षीरिवृक्षफलं तेषां गुरु विष्टम्भि शीतलम् । कषायं मधुरं साम्लं नातिमारुतकोपनम् ॥ १६५ ॥
क्षीरिवृक्ष फलों के गुण—गुरु विष्टम्भि, शीतल, कषाय, मधुर, अम्लरस-प्राय, वायु को कुपित करते हैं ॥
अत्यर्थं वातलं ग्राहिं जाम्बवं कफपित्तजित् । जामुन का फल—अत्यन्त वातप्रकोपक, संग्राही, कफ-
पित्तनाशक है ॥
स्तिग्धं स्वादु कषायं च राजादनफलं गुरु ॥ १६६ ॥ राजादन फल—स्तिग्ध, स्वादु-कषाय रस और गुरु है ॥
कषायं मधुरं रूक्षं तोदनं कफवातजित् । अम्लोष्णं लघु संग्राहिं स्तिग्धं पित्तान्तिवर्धनम् ॥ १६७ ॥
तोदन फल—कषाय, मधुर, रूक्ष, कफ-वातनाशक है।
अम्ल, उष्ण, लघु, ग्राही, स्तिग्ध, पित्त एवं अन्तिवर्धक है ॥
आमं कषायं संग्राहिं तिन्दुकं वातकोपनम् । विपाके गुरु संपक्वं मधुरं कफपित्तजित् ॥ १६८ ॥
तिन्दुक फल—आम, कषायरस, संग्राही, वातकोपक है।
मली प्रकार से पका फल, मधुरविपाक, मधुररस, कफ-पित्त-नाशक है ॥१६८॥
मधुरं च कषायं च स्तिग्धं संग्राहिं बाकुलम् । स्थिरीकरं च दन्तानां विशदं फलमुच्यते ॥ १६९ ॥
बकुल ( मौलसरी )—मधुर, कषाय, स्तिग्ध, संग्राही, दन्तों को स्थिर ( दृढ़ करनेवाला ) एवं स्वच्छ करता है ॥
सकषायं हिमं स्वादु धान्वनं कफवातजित् । तद्दृग्गाङ्गेशकं विद्यादशमन्तकफलाणि च ॥ १७० ॥
धान्वन ( धामण ) फल—कषायरस, शीत, स्वादु, कफ-वायुनाशक है। गंगेरन और अशमन्तक के फल में भी ये ही गुण हैं ॥१७०॥
विष्टम्भि मधुरं स्तिग्धं फलगुजं तर्पणं गुरु । फल्यु ( काकादुम्बिका अञ्जीर ) का फल—विष्टम्भी,
मधुर, स्तिग्ध, तृप्तिकारक एवं गुरु है।
अत्यन्तमौषन्मधुरं कषायानुरसं लघु ॥ १७१ ॥
वातघ्नं पित्तजननमामं विद्यात् पुरुषकम् । पुरुष ( कच्चा फालसा )—अत्यन्त खट्टा, थोड़ा मीठा,
कषाय अनुरस, लघु, वातनाशक, पित्तकारक है ॥१७१॥
तदेव पक्वं मधुरं वातपित्तनिर्बहुणम् ॥ १७२ ॥