भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ४९ ]

सूत्रस्थानम्

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विपाके मधुरं शीतं रक्तपित्तप्रसादनम् । पक्वा फाल्सा—मधुररस, वायु-पित्तनाशक, विपाक में मधुर, शीत, रक्तपित्त को स्वच्छ (शान्त) करता है। पौष्करं स्वादु विष्टम्बि बल्यं कफकरं फलम् ॥१७३॥ पौष्कर (कमल)—मधुर, विष्टम्बी, बलकारक, कफवर्धक और गुरु है ॥१७३॥

कफानिलहर् तीक्ष्णं स्निग्धं संप्राहि दीर्घनम् । कटुतिक्तकषायोष्णं बालं बिल्वमुदाहृतम् ॥१७४॥ विद्यात्तदेव संपक्वं मधुरानुरसं गुरु । विदाहि विष्टम्भकरं दोषकृतं पूतिमारुतम् ॥१७५॥ बेल (कच्चा)—कफ वायुनाशक, तीक्ष्ण, स्निग्ध, संप्राही, अनिदीपक, कटु, तिक्त, कषायरस, उष्ण होता है। यही बेल पकने पर मधुर-अनुरस, गुरु, विदाही, विष्टम्भकारक, दोषप्रकोपक एवं दुर्गन्धित वायु को उत्पन्न करता है ॥१७४, १७५॥ बिम्बीफलं साश्वकर्णं स्तन्यकृतं कफपित्तजित् । रुद्धवाह्यवरपित्तासूक्ष्मासश्वासक्षयापहम् ॥१७६॥ बिम्बीफल—(कंदूरी)—अश्वकर्णफल-दुग्धवर्धक, कफ-पित्तनाशक, तृष्णा, दाह, ज्वर, पित्त, रक्त, कास, क्षय रोग को नष्ट करते हैं ॥१७६॥

तालनालिकेरपनसमोचप्रभृतीनि ॥१७७॥ मधुर फल कहते हैं— ताल (ताड़), नारिकेल (नारियल), पनस (कटहल) और मोच (केला) आदि मधुर फल हैं ॥१७७॥ स्वादुपाकरसान्याहुर्वातिपित्ताहराणि च । बलप्रदानि स्निग्धानि बृहणानि हिमानि च ॥१७८॥ इनके सामान्य गुण—मधुररस, मधुरविपाक, वात-पित्तनाशक, बलदायक, स्निग्ध, देहवर्धक और शीतल हैं ॥१७८॥ फलं स्वादुरसं तेषां तालजं गुरु पित्ताजित् । तद्रौजं स्वादुपाकं तु मूत्रलं वातपित्ताजित् ॥१७९॥ ताल का फल—मधुररस, गुरु, पित्तनाशक है। ताड़ का रौज, मधुरविपाक, मूत्रल, वात-पित्तनाशक है ॥१७९॥ नालिकेरं गुरु स्निग्धं पित्तादनं स्वादु शीतलम् । बलमांसप्रदं हृद्यं बृहणं वस्तिशोधनम् ॥१८०॥ नारियल का फल—गुरु, स्निग्ध, पित्तनाशक, मधुर, शीतल, बलप्रद, मांसप्रद हृदय के लिये प्रिय, बृहण (देहवर्धक) और वस्तिशोधक (मूत्रल) है ॥१८०॥ पनसं सकषायं तु स्निग्धं स्वादुरसं गुरु ।

१ "पूतिमारुतं" का अर्थ डल्हणाचार्य ने सुगन्धित वायु किया है। पकने पर सुगन्धित गन्धवाला होता है। तथा— "पूतिः खट्वाशः वनजा मधुककंदी पूतिपुष्यति—सुगन्धितपुष्यत्यर्थः ॥"

पनस (कटहल)—कषायरस (थोड़ा), स्निग्ध, मधुररस और गुरु है।

मोचं स्वादुरसं प्रोक्तं कषायं नातिशीतलम् ॥१८१॥ रक्तपित्ताहरं वृष्यं रुच्यं श्लेष्मकरं गुरु ॥

मोच (केला)—मधुररस, कषाय, थोड़ा शीतल, रक्त-पित्तनाशक, बृष्य (शुक्रवर्धक), रुचिकर कफकारक और गुरु है ॥

द्राक्षाकार्शमर्मधुकपुष्पखजूरप्रभृतीनि ॥१८२॥ द्राक्षा (किशमिस), कार्शमरी (गम्भीर), खजूर (खजूर, पिण्डखजूर) और मधुकपुष्प (महुवे के फूल) आदि फल हैं ॥ रक्तपित्ताहराण्याहुर्गुरुणि मधुराणि च ।

सामान्य गुण—ये रक्त-पित्तनाशक, गुरु एवं मधुररस, मधुर विपाक हैं।

तेषां द्राक्षा सरा स्वर्ष्या मधुरा स्निग्धशीतला ॥१८३॥ रक्तपित्तावरश्वासतृष्णादुहिक्षयापहा ।

द्राक्षा फल—सर (विरेचक), स्वर्ष्य (गले के लिये हितकारी), मधुर, स्निग्ध, शीतल है। रक्त-पित्त, ज्वर, श्वास, तृष्णा, दाह, क्षय नाशक है ॥१८३॥

हृद्यं मूत्रविबन्धनं पित्तासूरवातनाशनम् ॥१८४॥ केश्यं रसायनं मेध्यं कार्शमर्म फलमुच्यते ।

कार्शमरी फल—हृदय के लिये प्रिय, मूत्रावरोधनाशक, पित्त-रक्त-वायु को नष्ट करता है। केश्यों के लिये हितकारी रसायन, मेध्य (मेधा के लिये हितकारी है) ॥१८४॥

क्षतक्षयापहं हृद्यं शीतलं तर्पणं गुरु ॥१८५॥ रसे पाके च मधुरं खाजूरं रक्तपित्तातु ।

खजूर—क्षत-क्षयनाशक, हृदय के लिये प्रिय, शीतल, वृत्तिकारक, गुरु, मधुररस, मधुरविपाक और रक्त-पित्तनाशक है ॥

बृह्णीयमहृद्यं च मधुककुसुमं गुरु । वातपित्तोपगमनं फलं तस्योपदिश्यते ॥१८६॥

महुवे का फूल—बृह्णीय (देहवर्धक), हृदय के लिये अप्रिय गुरु है। इसका फल-वात-पित्तशामक है ॥१८६॥

वातानाश्वोडाभिषुकनिचुलपिचुनिकोचमोरुमाणप्रभृतीनि ॥

बाताम (बवाम), अश्वोक (अखरोट), अभिषुक (अंगूर), निचुल, पिचु, निकोचम (पिस्ता), उरुमाण (खुरमन्ति), लवली आदि फल हैं ॥१८७॥

पित्ताश्लेष्महराण्याहुः स्निग्धोष्णानि गुरुणि च । बृहणान्यनिलघ्नानि बल्यानि मधुराणि च ॥१८८॥

इनके सामान्य गुण—कफ-पित्तनाशक, स्निग्ध, उष्ण, गुरु, बृहण (देहवर्धक), वायुनाशक, बलकारक और मधुररस, मधुरविपाक हैं ॥१८८॥

कषायं कफपित्ताजं किचिस्निक्तं रुचिप्रदम् । हृद्यं सुगन्धि विशदं लवलीफलमुच्यते ॥१८९॥