सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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ल्वलीफल १ (ह्रफा रेवड़ी)-- कषाय, कफ-पित्त-नाशकः, कुःछ
तिक्त, रुचिकारक, हदय के ल्यि प्रिय, सुगन्धित, विशद (सूम
खोतों मे पर्हुचनेवाला) दे ॥१८६॥ वसिरं शोतपाक्यं च सारष्करनिबन्धनम् । विष्टम्भि दुजेरं रूक्षं ओतं वातकोपनम् ॥१९०।
विपाने मधुरं चापि रक्तपिन्तप्रसादनम् ।
ेरावतं दन्तञ्चठमम्छं ओणितपिन्तङत् ॥१९१९॥
वसिर (ूर्यावत्तेफ) शीतपाक्य (बल्फल) ओर अरुष्कनि-
बन्धन भिवे का बन्त)-ये विष्टम्भ (पिट मे गुडगुडाहट
कारक); दुजेर (पकने मे कठिन); रूक्ष; शोतल, वायुप्रक।पक
मधुरविपाकः, रक्त-पित्तनाशक हं ॥१६०,१६१॥
शीतं कषाय मधुर टङ्कं मारुतछ्रद् गर ।
रंक (नीलकपित्थफल)-योत, कषाय, मधुरविपाकः, बायु- कारक ओर गरहै। ` स्निग्धोष्णं तिक्तमधुरं वातन्छष्मध्नमेङ्गदम् ॥१९२॥
एरुद (इंगदी फल)- स्निग्ध, उष्ण, तिक्त, मधुर, वातकफ़ नाशक ह ॥१६२॥
्मीफरं गुरु स्वादु रूक्षोष्णं केजनाश्चनम् ।
शमी का फल- गर, स्वादु, रूक्ष, उष्ण, केशनाशक हे ।
गुरु इटेऽमातकफटं कफरृन्मधुरं हिमम् ॥१९३॥
श्टेष्मातक (छ्खोडे का) फल गस, कफकारक, मधुर,
ओर शीतल ह ॥१६३॥
करीरा श्ठिकपालनि तृणन्यफखानि च ।
स्वादु तिक्तकटूष्णानि कफवातहराणि च ॥१९४।।
करोर (करोल); अक्क (तिनशफर् या स्द्राक्ष), पीलु,
तृणशृन्य (मल्लिका) फ के सामान्य गुण-मधुर, तिक्त, कटु
उष्णवीय, कफ-वातनाशक रै ॥१६४॥
तिक्तं पित्तकरं तेषां सरं कटुविपाकि च । तीच्णोष्णं कटुकं पटु सस्नेह कफवातजित् ॥१९५॥
पीलु के गुण-तिक्त, पित्तकारक, खर (विरेचक), कटविपाक
तीण, उष्णवीय, कटुरख, स्तेयुक्त, कफ एवं वायु का नाशक दै | आरुष्करं तोवरक कषायं कटुपाकि च।
उष्णं कृमिञ्वरानाहमेद्योदावतनाञनम् ॥१<६॥
आरष्कर (भिलावा) ओर तौवरक (प्रमेह चिकित्सा मे कहा
तुवरकं फट)-- कषाय, कटुविपाक) उष्ण, कृमि, ज्वर, आनाह, प्रमेह, उदावत्त नाशक दै ॥१६६॥
गुल्मोदरार्शोष्न कटपाकि तथेव च ।
करञ्जकिडकारिषटफलटं जन्तुप्रमेहयत् ।
अङ्कोरस्य फट विख गुरु श्टेष्महरं हिमम् ॥१९७॥
१ कवरोफट-
“घनस्निग्वा हरितायुप्रपुन्नाटसद्व्छदा ।
बुगन्धिम्ला रवली पाण्डुकोमलवल्कङा ॥'"
सुश्रतसंहितां | अं० ४६
करञ्ञ, किंशुक (दाक); अरिष्टफल (निमोटी)-कुष्ठ, ग्म
उद्ररोग, अशरोग नाशक; कटुविपाक, कटुरख, कमि (अन्तः-
ओर बाह्य दोनों) ओर प्रमेह के नाशक हैँ | १९७॥
रूक्षोष्णं कटक पाके घु वातकफापहम् |
तिक्तमीषद्धिषहितम् विडङ्ग कृमिनाशनम ॥१९द्
विडङ्ग (वायविडङ्ग)- रूक्ष, उष्णवीयं कट्विपाक, ल व यु-कफनाशक, ईषत् तिक्त विषरोग मे हितकारी ओर मि. नारक हे १६८]
बरण्यञुष्णं सरं मेध्यं दोषघ्न' शोफकुषनुत् ।
कषायं दीपनं चाम्लं चजञुष्यं चाभयाफटम् ॥ १९९ सभया (हरड़) का फल--नरण के ल्य द्ितकारी, उष्ण,
खर {(विरेचक), मेध्य (मेधा के ट्य हितकारी), दोष (वातादि)
नाशक, शोफ, कुष्टनाशक, कषाय, अग्नि दीपक, अम्छ, आंखों के ल्यि हितकारी हे ।॥॥१६६॥
भेदन' रघु रूक्षोष्णं वेस्वयकृमिनाशनम्। चक्षुष्यं स्वादु पाक्या्चं कृषायं कफपित्तजित् ।२००। अक्ष (वहेडा) फल-मेदक (विरेचन), ल्घु उष्ण, - स्वरभंग
के छिये हितकर, मिनाशक, आंखों के किए हितकारी, मधुरविपाक, कषाय, कफ-पित्तनाशक हं ॥२००॥
कफपित्तहरं रूक्षं वक्त्रक्ूदमरखापहम् ।
कृषायमीषन्मधघुरं किचित् पूगफटं सरम् ॥२०१॥
पूग॒(युपारी) फल--कफ-पित्तनाशक, रुक्ष, सुख कौ आद्रता ओर मक को दूर करता है । कषाय, थोड़ा मधुर ओर `
कु विरेचक हे ॥२०२१॥
जातोकोशोऽथ कूरं जातीकटुकयोः फलम् ।
कृको (ङा) खक ख्वङ्ग च तिक्त कट कफापहम।२०२।
घु दृष्णापह् वक्त्रक्रददोगन्ध्यनानम् ।
जात) कोश (जायफर), कपूर, जाती (जावित्री); कटुक
(लघु कक्कोल, कवाबचीनी या ठताकस्तूर), कक्कोल (शीतलनी) ओर कवग (लँग)- तिक्त, कटु, कफ नाशक, लुः
वृष्णानाशक, मुख कौ आपद्र॑ता ओर दुग॑न्ध का नाश करते ई ॥
सतिक्तः सुरभिः शीतः कपूरा छघु टेख नः ॥२०३॥
चृष्णायां मुखशोषे च वेरस्ये चापि पूनितः।
खताकस्तूरिका तद्वच्छीता बस्तिविओंधनी ॥२०४॥
कपू र तिक्त, सुगन्धि, शीतल, लधु, ठेखन (कफनाशक)
है, तृष्णा ओर मुख की शुष्कता एवं सुख की विरखता मे उत्तम हे । ्ताकस्तूरी के भी गुण कपूर के समान दै, शीतल
है, बस्ति(मूत्राशय) का शोघक (विबन्धनाशक) दै॥ २०२,२०४॥
त्रियाख्मल्ञा मधुरो वृष्यः पित्तानिखापहः की मञ्ना-
पियाली की मज्जा (गिरि)-मधुर, इष्य (शुक्रवधक) पित्त” वायु-ना्चक ह
फलों