सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें| . ० ४६ ] ्ैमीतको मदकरः कफमरुतनाशनः ॥२०५॥|
विभीतक मज्जा-मदकर (मदकारक), कफ-वायुनाशक है|
| कषायमधुरो मउजा कोलानां पित्तनाशनः ।
। ° दृष्णाच्छयेनिल्ध्नश्च तद्वदामल्कस्य च ॥२०६॥
(कोर)- वेर की मञ्जा--कपाय-मधुर, पित्तनाशक है |
प्या, वमन ओर वायुनाशक हे । आवले कौ मञ्जामे भी
बेर क समान गुण ह ।॥२०६॥
बीजपूरकञ्म्याकमञ्जा कोञाम्रमंभवः।
स्वादुपाकोऽग्निबख्द्ः स्निग्धः पित्तानिङापह्ः॥२०७॥। बीजपूरक (बिजोरा), शम्याक ( किरमालकर-अमल्तास ),
कोशाम्-इनकी. मञ्जा-मधुरः विपाक, अग्निवधक, ` बल्प्रद्,
स्निग्ध, पित्त एवं वायुनाशक हे ॥२०७॥
| यस्य यस्य कफप्येह वीये मवति यादप | तस्य तस्येव वीयण मञजानमपि निर्दिशेत् ॥२०८॥
जिख २ फल का जेसा वीय (गुण-कमं) होता है, मज्जा को भी उसी उसी गुण-कमोंाटी समन्चना चाद्ये ॥२०८॥
फटेषु परिपकं यद् गुणवत्तदुदाह्टतम् । बिल्वादन्यत्र विज्ञेयमामं तद्धि गुणोत्तरम् ।
प्राह युष्णं दीपनं तद्धि कपायकदटुतिक्तकम् ॥२०९॥
भ 1 ध कनक
~ -- ~~~ ०»न ~ =
विल्व (वेकगिरी) मे इनका अपवाद है, वेर का कचा फल गौ मे शठ है । बिल्वफल संग्राही, उष्ण, अग्निदीपक, कषाय, कटतिक्तरस है ॥२०६॥] व्याधितं कृमिजुष्टं च पाकातीतमकाख्जम् । वजनीयं फं सवमपर्यागतमेव च ॥२१०॥
इति एख्वगेः ।
त्याज फल-- ४ । | व्याधित (रोगयुक्त), मिज (मियो से व्याप्त), पाका- पत (बहत पका हुआ), अकालज (बिना ऋत के उदन्न हुआ), ओर अपयांगत (अपुष्ट) एङ त्याज्य ह ॥२१०॥
इति फल्वगः |
स अथ आाकवगेः । राकन्यत ऊध्वे' बद्यामः।--
तन पुष्पफ़खाखाबुकाङिन्दकप्रभ्रतीनि ।२९१॥ र अशे शक्रो, को कहतेहै- `
४५ 1
नक `
| [- । (तीर तरबूज) १ आदि शाक है ॥२११॥
। शाको के भेद-
£ { | शूर पत्र-करोराग्र-फल-काण्डाधिरूढकम् ॥
प्स कवकञचेव शाकं ददविषं स्मृतम् ॥", . ॥ ¢
तत्रस्था नम्
जो फल पका होता हे, वह गुणों मे श्रेष्ठ होता है, परन्तु
इनमें पुष्पफल ( कूष्माण्ड ), अलाबु ( तुम्बी ); काडिन्द ¦
@. . . ५& पित्तष्नान्यनिलं कयस्तथा मन्दकफानि च । सष्टमूत्रपुरीषाणि . स्वादुपाकरसानि च ॥२१२॥ ` इसके सामान्य गुण--पित्तनाशक वायुकरक कफ को कम
करते हेः मूत्र-मल को प्रवृत्त करते ह, ओर मधुररख ह ॥२१ २॥
पित्तघ्नं तेषु कूष्माण्डं वां मध्यं कफाग्हम् । रुक्छं छघृष्णं सक्षारं दीपनं वस्तिओधनम् ॥२१३॥ वाल (कचा) कृष्माण्ड--पित्तनाशक, मध्य कूष्मांड कफ- नाशक, शुक्छ (पूणं पका श्वेत), ल्घु; उष्ण, क्षारयुक्त, अग्नि- दोपक, वरितिशोधक (मू्ल-मू्र-विरेचक) है ।२१२॥
सवंदोषहरं हृं पथ्यं चेतोविकारिणाम् ।
टष्टिञुक्रक्षयकरं काछिन्दं कफवातक्रत् ॥२१४॥
कालिन्द-त्रिदोषनाशक, हृदय के भ्ये प्रिय चेतोविकार
(उन्माद, अपस्मार, मृच्छां आदि) के रोगियों के व्यि पथ्य हे |
हृष्टि एवं शुक्रनाशक ओर कफ-वायुकारक दै ।२१४॥।
अलावुभिन्नविटका तु र्चा गु्तिओोतला ।
तिक्ताखाबुरदया तु वामिनी वातपित्तजित् ॥२१५॥ अला (मीठी तम्बी) भिन्नविट्का (मलग्रवत्तक द्रवकरारे)
रुक्ष, रुर अतिशीतल है । कडवी अलाब्ु-हृदय के च्य
अप्रिय, वामक, वायुपित्तनाशक दै ॥२१५॥
तरपुसेवौसुककौरुकीणवृन्तप्रभृतीनि ॥२१६॥
स्वादु तिक्तरसान्याहुः कफवातकराणि च ।
खष्रमूत्रपुरीषाणि रक्तपित्तहराणि च ॥२१७॥
फलटशाक-- त्रपुस (खीरा), एवां रं (ककड़ी), ककार (खीरे
के मेद्), शीणचरन्त (ककड़ी का मेद विशेष, चिभ॑ट या कचरी)
आदि है । इनके सामान्यगुण-स्वादु, तिक्तरस, कफ-वायु-
कारक, गुरु, विष्टम्भि, शीतल, मधुरविपाक¢ कफ-वातकारक,
मलमूत्र के प्रवत्तक, रक्त-पित्तनाशक ^ । (पाठान्तर मे क्षार
युक्त ओर मधुर है) ॥२१६.२१७॥
बार सनीटं पुसं तेषां पित्तहरं स्तम् ।
तत्पाण्डु कफकृउजीणेमम्छं वातकफापहम् ॥२१८॥
पुख (खीरा)- बाल्यावस्था मे जब नीला-खा होता है,
तवर पित्तनाशक्र है । पीला होने पर--कफक्रारक), बहुत पकने
पर--अम्खरस, वायु कफनाशक हे ॥२१८॥
भूल पू (मूली जादि), पत्र (पटोलादि), करोरीः (वंशादि), अग्र
(बत आदि), फल, काण्ड (कूभ्मांड आदि), अधिषूढ् (कता), त्वक्
(मातु ङ्ग आदि), पुष्प (कचनार आदि); कवक (छातिया) आदि।
१ कविराज हाराणचन्द्र की टीका मे - स्वादुतिरक्तसान्याहूुः
कफवातक राणि चः यह पाठ नहीं है । ‹रक्तपित्तहराणि' के स्थान