भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४६ ]

एवोस्कं सकर्कार संपर्कं कफवातकृत ।

सक्षारं मधुरं रुच्यं दीपनं नातिपित्तलम् ॥२१६॥

एवोश् और कर्कार—मली प्रकार से पकने पर—कफ एवं वायुकारक हैं । क्षारयुक्त, मधुर, रुचिकारक, अग्निदीपक और थोड़ा पित्त को करती है ॥२१६॥

सक्षारं मधुरं चैव और्णवृन्तं कफापहम् ।

भेदनं दीपनं हृद्यमानाहाष्टीलनुल्लघु ॥२२०॥

शीर्णवृन्त (चिमट)—थोड़ा क्षारयुक्त, मधुर, कफनाशक, भेदक (विरेचक), अग्निदीपक हृदय के लिये प्रिय, आनाह (आधमान), अष्टीला (वाताष्टीला) रोगनाशक एवं लघु है ॥२२०॥

पिप्पलीमरिचशृङ्गवैराद्रिकहिङ्गुजीरकुस्तुम्बुरजम्बीर-सुमुखसुरसाजकभूस्तृणसुगन्धकवासमर्दककालमालकुटेर-कक्षवकखरपुष्पगिप्रमधुरगिप्रफणिञ्जकसर्पपराजिकाकुलाहलायगुथगण्डौरहिलपर्णिकावर्षाभूवित्रकमूलकलशुनक-छायपलाण्डुकलायप्रभृतीनि ॥२२१॥

पिप्पली, मरिच, शृङ्गवैर (आद्रिक), हींग, जीरा, कुस्तुम्बुर (घनिया), जम्बीरक (निम्ब), सुमुख (वनवर्षी), सुरसा (तुलसी), अर्जक (श्वेत कुटेरक), भूस्तृण (रोहित्यृण), सुगन्धक (गन्ध-तृण), कासमर्दक (कालकासन्दी), कालमाल (कृष्ण तुलसी), कुटेरक (तुलसीभेद), खवक (छिक्णी), खरपुष्प (मरूवक), शिप्र (कडुवा सहजन), मधुशिप्र (मधुर सहजन), फणिञ्जक (तुलसी भेद), सर्पप (सरसो), राजिका (राई), कुलाहल (मुण्डितक), वेणु (वॉस), तिलपर्णि (चोरक, अन्य लाल चन्दन), वर्षाभू (पुनर्नवा), चित्रक (चीता), मूलक (मूली), लशुन पलाण्डु (प्याज), कलाय (मटर) आदि शाक संस्कार एवं आहार के काम में आते हैं ॥२२१॥

कटून्युष्णानि रुच्यानि वातश्लेष्महराणि च ।

कृताञ्चेषुपुष्पयन्ते संस्कारार्थमेनेकधा ॥२२२॥

इनके सामान्य गुण—कटु, उष्ण, रुचिकर वात-कफ-नाशक, कृताञ्च (मूळयूप-लाजमण्ड) के संस्कार तथा अनेक (स्वायत्कलादि भेद से) प्रकार से आहारों में इनका उपयोग होता है ॥२२२॥

तेषां गुर्वो स्वादुशीता पिप्पल्याद्रां कफावहा ।

शुष्का कफानिलछनी सा वृष्ट्या पिप्ताविरोधिनी ॥२२३॥

पिप्पली (गीली)—गुरु, मधुर, शीतल कफनाशक है । शुष्क पिप्पली—कफ-वायुनाशक वृष्ट्य (शुक्रवर्धक और ईषत् पित्तशामक है । (गीली-पित्तशामक, शुष्क-पित्तप्रकोपक है) ॥

स्वादुपाक्याद्रमरिचं गुरु श्लेष्मप्रसेकि च ।

कटूर्णं लघु तच्छुष्कमवृष्ट्यं कफवातजित् ॥२२४॥

नात्युष्णं नातिशीतं च वीर्यतो मरिचं सितम् ।

गुणवन्मरिचेश्वयश्च चतुष्टयं च विशेषतः ॥२२५॥

मरिच (आद्रि)—मधुरविपाक, गुरु, कफनाशक, कटु, उष्ण लघु है । शुष्क मरिच—अवृष्ट्य (शुक्रवर्धक नहीं) और कफ-वायुनाशक है । श्वेत मरिच (शोभाञ्जन का बीज) न तो अति उष्ण और न अतिशीत है, साधारण वीर्यवान् है । मरिच के समान गुणकारी है, खासकर आँखों के लिये हितकारी है २२४, २२५॥

नागरं कफवातछनं विपाके मधुरं कटु ।

वृष्ट्योष्णं रोचनं हृद्यं सस्नेहं लघु दीपनम् ॥२२६॥

नागर (सोठ)—कफ वायुनाशक, मधुरविपाक, वृष्ट्य (शुक्रवर्धक), उष्ण रोचक, हृदय के लिये प्रिय, स्नेह युक्त, लघु, और अग्निदीपक है ॥२२६॥

कफानिलहर् स्वयं विबन्धानाहशूलनुत् ।

कटूर्णं रोचनं हृद्यं वृष्ट्यं चैवाद्रिकं स्मृतम् ॥२२७॥

आद्रिक (आदी)—कफ-वायुनाशक, स्वर के लिये हितकारी, विबन्ध, आनाह और शूलनाशक है । कटुरस, उष्णवीर्य, रोचक हृदय के लिये प्रिय, वृष्ट्य (शुक्रवर्धक है) ॥२२७॥

लघूर्णं पाचनं हिङ्गु दीपनं कफवातजित् ।

कटु स्निग्धं सरं तीक्ष्णं शूलाजीर्णं विबन्धनुत् ॥२२८॥

हींग—लघु, उष्ण, पाचक, अग्निदीपक, कफ वायुनाशक कटु स्निग्ध, सर (विरेचक), तीक्ष्ण, शूल-अजीर्ण-विबन्ध-नाशक है ॥२२८॥

तीक्ष्णोष्णं कटुकं पाके रुच्यं पित्तानिर्वर्धनम् ।

कटु श्लेष्मानिलहर् गन्धाख्यं जीरकद्वयम् ॥२२९॥

कारवी करवी तद्वद्विज्ञेया सोपकुञ्चिका ।

दोनो (श्वेत और काला) जीरे, तीक्ष्ण, उष्ण, कटुविपाक, रुचिकारक, पित्तवर्धक, अग्निवर्धक, कटुरस, कफ-वायुनाशक, गन्धवृद्धि होते हैं । कारवी (सूक्ष्म जीरा), करवी (सूक्ष्म कृष्ण जीरक), उपकुञ्चिका (काली जीरी)-के गुण भी जीरे के समान हैं २२९॥

भक्ष्ययन्ज्यन्तभोजयेषु विविधेष्ववचारिता ॥२३०॥

आद्रा कुम्बुम्बरी कुर्यात् स्वादुसौगन्ध्यहृद्यात्म् ।

सा शुष्का मधुरा पाके स्निग्धा रुद्धादाहनाजनी ॥२३१॥

दोषछनी कटुका किंचित् तिका क्षोतोविशोधनी ।

कुस्तुम्बरी (घनिया हरा)—भक्ष्य (लड्डू आदि), व्यंजन (शाक आदि), भोज्यों (बाल आदि) में नाना प्रकार से उपयोग करने पर स्वादु (मधुरता) और सुगन्धि तथा हृदय के लिये प्रियता उत्पन्न करता है । सूवा घनिया-मधुरविपाक, स्निग्ध, प्यास एवं दाहनाशक, दोषनाशक, कटुरस, थोड़ा तिका और क्षोतोविशोधक है । (पित्त प्रकृतिवालों के लिये विरेचक है) ॥

जम्बीरः पाचनस्तीक्ष्णः कृमिवातकफापहः ॥२३२॥

सुरभिर्दीपनो रुच्यो मुखवैशद्यकारकः ।

कफानिलविषरूपासकासदीर्गन्ध्यनाशनः ॥२३३॥