भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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( धक

अ० ४६ | ९९ ।

जभ्ी--पाचन (वाचक), तीण, कृमि, वायु, कफ नाशक

| युरमि--अग्निदोपकः सचिकारक, सुख कौ स्वच्छता को

न्न करता दै । कफ, वायु, विष, श्वास, कास एवं दुगन्धता

को दूर करता हे ॥२२२,२२१२॥ वित्तकरत्‌ पाञ्वशूहष्नः सुरसः समुदाहतः । तद्वत सुखो ज्ञेयो विषाद्‌ गर नानः २३५] । सुर्-पित्तकारक, पाश्वशूनाशक दै । सुमुख के गुण

भरी युर के समान है, खासकर गर (संयोगजन्य विष; को दूर

` करता दै ॥२२५॥ ६ कृफष्ना छवो रूक्षास्तीद्णोष्णाः पित्तवधंनाः।

। कटुपाकृरसाश्चेव सुरसाजकमूस्वणाः ॥२३५॥ ॥ सुरख-भजंक-मूस्तृण-कफनाशक, ल्घु, रूक्ष, तीच,

। उष्ण, पित्तवधंक, कटविपाक, कटुरख है ।२२५॥ |, मधुरः कफवातष्नः पाचनः कण्टञोधनः । । विरेषतः पि्तहरः सतिक्तः कासमदेकः ॥२३२॥

। कासमद्‌-मघुर, कफ वायुन।शक, पाचक, कण्ठशोधक,

खासकर पित्तनाशङ़, तिक्त दे ॥२३६॥ कटुः सक्षारमधुरः शिग्रुस्तिक्तोऽथ पिच्छिलः । मधुशिग्रः सरस्तिक्तः ओोफष्नो दीपनः कटः ॥२३॥

सहजन (कडवा)--कटु, क्षारयुक्त, मधुर, तिक्त, पिच्छिल है । मधुरिग्र (मीठा सहजन) खर (विरेचकर), तिक्त, शोफनाशक

अग्निदीपक सोर कट्‌ है ॥२२५७॥

विदाहि बद्धविण्मूचं क्षं तीदणोष्णमेव च । त्रिदोषं साषेपं शाकं गाण्डीरं वेगनाम च ॥२३द॥ `

सरसों का शाक, गाण्डीर ओर वेग (मारवार फुल)-

विदाही, मल-मूत्र-अवरोधक, रूक्ष, तीच्ण ओर उष्ण, तीनों दोषो को उयन्न करते हँ २२८ चित्रकृस्तिख्प्णीं च कफगोफहरे खघु । । चित्रक ओर तिल्पणी--कफ-शोफनाशक ओर ल्घु है ।

। बपोभूः कफवातध्नी हिता ओप्तोदराशेसाम्‌ ॥२२९॥ | . वषाम्‌ (पुननेवा)--कफ-वातनाशक, शौफ, उद्ररोगी एवं अशरोगियों के ल्यि दितकरी ३ ॥२२६॥

र्टतिक्तरसा हया रोचनी वहिदीपनी । सबेदोषहरा रुष्वी कण्ठ्या मूर्कपोतिका ॥२४०॥ महत्तद्गुरु विष्टम्भि तीद्णमानं त्रिदोषकृत्‌ ।

तदेव स्नेहसिद्धं तु पित्तनुत्‌ कफवातजित्‌ ॥२४१॥ त्रिदोषशमनं जष्कं विषदोषहरं खु । ` षष्म्मि वातरं ज्ञाः युष्कमन्यत्र मूखकात्‌ ॥२४२॥ रो्यकपोतिका (मूली)- कट, तिक्तरसः, हृदय के व्यि प्रिय,

| 2 अभिदीपक्‌, त्निदोषनाशक, लघु, गले के व्यि हितकारी । = त्‌ (बह्ग मूली) - गुरं ओर विष्टम्भी. । आम (असं-

अर्थात्‌ कच्ची) - तीक्षण ओर तीनों दोषों को उद्यन्न करती

|, मूखी स्नेह मेँ सिदध होने पर-पित्तनाशक) कफवाधु

सूत्रस्थानम्‌ €

गुरु, कषाय--अनुरख, विपाक में मधुर

| २०९ कारक हे । सूरी मूली-त्रिदोषशामक, विषदोषनाश्कं ओर घ हे । मूटी को छोड़कर अन्य सव शुष्क याक विष्टम्भी ओरं वायुकारक हे ॥२४०-२४२॥ |

पुष्पं च पत्रं च फटं तथेव ` यथोत्तरं ते गुरवः प्रदिष्टाः | तेषां तु पुष्पं कफपित्तहन्दर

फलं निहन्यात्‌ . करमारुतो तु ॥२४२॥ पुष्प, पत्र ओर फक इनमे उत्तरोत्तर ल्घु दै, पुष्पसे पुत्र (पे), पर्तो से फल लधु दै । इनमे पुष्पकफ-पित्तनायक ई, ओर फठ कफवायुनाशक हँ । (कई आचायं-ये गुण मूढी के मानते हँ) ॥२५३॥

स्तिरधोष्णतीद्णः कटुपिच्छिख्श्च

गुरुः सरः स्वादुरसश्च बल्यः।

वृष्यश्च मेधास्वरबणंचज्लु- भरनास्थिलतन्धानकयो रसोनः ॥२४४॥ हद्रोगजीणेजवरकुक्षिशू - विबन्धगुल्मारुचिकासशोफान्‌ । दुनोमञुष्ठानरसाद जन्तु | समीरणश्वासकफांश्च हन्ति ॥२४५॥ ` रसोन (लदघुन)- स्निग्ध, उष्ण, तीण, कटुरख, पिच्छिल, गुर, खर (विरेचन), मधुररस, बककारक, वृष्य (शुक्रवधक);

मेधा (उद्धि), स्वर वण, आंखों के स्यि दितकारी, मगनास्थि

को जोड़नेवाखा है । हृदयरोग, जीणज्वर, कुक्षिश (उदरः श), विवरन्ध, गुल्म, अर्चि, काठ, शोक, दुनांम (अश), कुष्ठ, अनलसाद्‌ (अभिमाय), जन्तु (कृमि), समीरण (वायु),

श्वास ओर कफ को नष्ट करता है ॥२४४,२४५॥

नाद्युष्णवीर्याऽनिख्हा कटुश्च तीद्णो गुरुनो तिकष्ावहश्च ।

बरखावहः पित्तकरोऽथ किंचित्‌. | पराण्डुरम्ि च विवधयेत्तु. ॥२४६॥ स्निग्धो सुचिष्यः स्थिरधावुकारी बल्योऽथ मेधाकफपुष्टिद्श्च । . स्वादुगुरुः शोणितपित्तशस्तः _ सपिच्छिछः क्षीरपरण्डुरुक्तः ॥२४७॥ पलाण्ड्‌ (प्याज)- अति उष्णवीयं नहीं, (इषत्‌ उष्णवीय),

वायुनाशक, तीदण, गुरु, ईैषत्कफकारक, बरकारक, ईैषत्पित्त- कारक, अभचिवधंक . है | क्षीरपखाण्डु (मधुररस युक्त प्याज);

स्निग्ध, रुचिकारक, षाठ॒ओं को स्थिर करनेवाला, बलंकारक, मेधा द्धि) कफ ओर पुष्टि कारक, स्वादु (मधुर), गुरु, रक्त- पित्त में प्रशस्त ओर पिच्छिर ई ।(२४६.२४७॥ ह करायशाकं पित्तघ्नं कषफ्ऽ्न वातरं गुरू । `` कषायानुरसं चेव विपाके मधुरं च तत्‌ ॥२४८ ~ _ कलाय शाक (मटर)-पित्तनाशक, कफनाशक, वायुका,

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