सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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जन्तुष्नङ्कच्चयूथिकात रुणीजोवन्तीविस्बीतिकानदी
(न्दी) मल्लातकच्छगान्त्रीबृक्षादनीफञ्ीलात्मरीशोटटुव नस्पतिप्रसवरणकवदारकोविदारप्रश्चती नि ॥२४६॥
कघायमधुर शाक--
जन्तुष्न. चुच्चू , युथिका (जही); तरणी, जीवन्तः विभत्री
(कन्दुरी के पत्ते) ~ नन्दी, भल्लातक, छगलान्त्री (विधारे के पत्त) 3
वृक्षादनी (बन्दा), फञ्ञी, शाल्मली, शेलु (लिसोड़ा), वनस्पति-
प्रसव (गूर आदि के पत्ते), शण, कलु'दार (कचनार); कोवि-
द्ार (श्वेतकचनार) आदि शाक हे ।२४६।।
कषायस्वाटुतिक्तानि रक्तपित्तहराणि च ।
कफघ्नान्यनिटं कयः संप्राहीणि ङघनि च ॥२५०॥
इसके सामान्य गुण-- कषाय-स्वादुरख, तिक्तरख, रक्तः पित्तनाशक; कफनारक?
वायुकारक, संग्राही ओर लघु है ।२५०॥
रुधः पाके च जन्तुष्नः पिच्छिटो ब्रणिनां हितः ।
कषायमधुरं भ्राही चुच्चस्तेषां त्रिदोषह। ॥२५१॥
चुच्चू--विपाक मे लधु, ृमिनाशक, पिच्छिलः, व्रणरोगियां
के ल्यि हितकारी है । कषाय-मधुररस, संग्राही ओर तीनों दोषो
कोनष्टकरतादे।२५१॥
चक्षष्या सवदोषध्नी जीवन्ती समुदाहृता ।
जीवन्ती-ओंखो के व्यि हितकारी त्रिदोषनाशक है ।
चु्धादनी वातहरा, फञ्जी स्वल्पवखा मता ॥२८२॥
बृश्चादनी- वातनाशक ओर फल्जी (मांग) अल्प वल्वाटी
है, ईषत् बख्वधैक ह ॥२५२॥।
क्षीरवरक्षोखल्यादीनां कषायाः पल्लवा; स्मृताः ।
ङीता: सं्राहिणः अस्ता रक्तपित्तातिसारिणाम् ।२५३
क्षीरवृक्ष (अश्वत्थ आदिर्यो) के तथा उत्पल (कमट) आदि
के पल्टव (कोप)-कषायरसख, शीतल, संग्राहक; रक्तपित्त
अतीखार में प्रशस्त दै २५३
पुननैवावरुणतकोयैरुवूकवत्सादनी बिल्वशाकम्रभूतीनि ॥
पुननैवा (श्वेत), वख्ण (वरना), तकांरी (अरणिक)
उख्बूक (शुक्ल एरण्ड), वत्छादनी (गिरोय), बिल्व्ाक (त्रिल्व
के पत्ते) आदि शाक है ।॥२५४॥
उष्णानि स्वाद तिक्तानि वातप्रसमनानि च ।
इसके सामान्य गु"-स्वादु, तिक्तरख ओर बात नाशक दै ।
तेषु पौननेवं आकरं विरोषाच्छोकनाञनम् ॥२५९॥
इनमें पुनन॑वाः का चाक--खाख करके शोफ (सूजन) को
नष्ट करता ह ॥२५५॥ ` तण्डुलीयकोपोदिकाऽस्ववखाचिज्लीपाल्ङकयावास्तूकप्रभृतीनि र , मेथिका तत्समे किञ्चित् हिस्फित्थं पुष्टिद गुरु ॥""
= र ` क १ ~ ण) १ निर्णयसागर की छप पुस्तक मे नन्दी" के स्थाने मे नदी
पाठ हं। ¦
सुश्रतसं हितां [ 1, ४६ |
तण्डुलीयक (चौड), उपोदिका (पई), अश्वबरखा (मेथी), ।
चिल्ली (खेत बुव), पाल्डफया (पारक, वास्तू (बधुवा) ।
आदि पत्रशाक हे" ॥२५६॥ सष्टमूतरपुरीषाणि सक्षारमघुराणि च ।
मन्दबातकष्ठान्याहू रक्तपित्तहराणि च ॥२५७॥ |
इनके सामान्य गुण-- मर -मूत्र-रवत्तक (विरेचक); क्षर्
युक्त, मधुर, कपः एवं वायु को कम करते है, र्तपित्तनाशक है । |
मधुरो रसपाकाभ्यां रक्तपित्तमद्ापहः। |
तेषां ्ीततमो रूक्षस्तण्डटीयो विषापहः ॥२५८्]
तण्डुलीयक (चौलाई)--मधुररस, मधुरविपाकः; रक्तपित्त
मदनाशक, अत्यन्त शीतल, रुक्ष, विषनाशक हे ॥२५८॥
स्वादुपाकरसा बृष्यां वातपित्तसृद्ापहा ।
उपोदिका सरा स्निग्धा वत्या शछेष्मकरी हिमा २५६
उपोदिका (पेई)-मधुररख, मधुरविप।क इष, वातपित्त ,
मदनाशक, खर (विरेचक), रिनग्ध, बलकारक, कफवधक ओर ` ।
शीतल ह ॥२५६॥ |
कटर्विपाे कृमिहा मेधाग्निबख्वधेनः।
सक्षारः सर्वदोषघ्नो वास्तूको रोचनः सरः ॥२६५॥ _
वास्तूक (बथुवा)- कटविपाक, कइमिनाशक, मेधाअनि'
वल्वरधक, $षर्धारयुक्त, चरिदोषनाशक, रोचक ओर स.
(विरेचक) है ।२६०॥ चिल्छी वास्तूकवञ्जञेया पारङ्कयास्तण्डलीयवत्। वातकृदुबद्धविण्मूत्रा रूक्षा पित्तकफे हिता । |
जाक माश्ववलं रूक्षं वद्धविण्मूत्रमारतम् ॥-६९॥ `
चिल्ली-त्थत्रे के समान ओर पालक चोखाई के समान् |
हे । वायुका, मलमूत्र का अवरोधक; रक्ष, पित्त कफ म
दितकारी, आश्ववल (मेथी) का याक--रूक्ष, मल मूत्र ओर
वायु का अवरोधक दै ॥२६५॥ मण्ड्कपर्णीसप्तलासुनिषण्णकुव चंखात्रह्मसुवचंखापि- प्पलीगुड्चीगोजिहाकाकमाचीप्रपुननाडाबल्एजसतीन रह । तीकण्टकारिकाफरूपटोखवातीककारवेस्छककट् किकक्चु |
(बु) कोरुबूकपपटककिराततिकतकर्कोटकारिष्टक। शातः
वेत्रकरीराटरूषकाकपुष्पीप्रभुतीनि ॥२६२॥
तिक्तप्राय शाक- मण्डूकपर्णी (जादी), सतला (चम्म॑साहवा), खनि
(चौपतियार) सुवच॑ला (सुब्रत), ब्ह्मसुवच॑ला (सयम,
पिपली, गिलोय, गोजिहा (गाजवा), काकमाची (मकोष्॥
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१ मेथी श्र हिस्फित्था के भेद-
“वातपित्तहरा तिक्ता रुष्वी श्टेष्मावरोधिनी ।
६
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२ चापतिया-- - < ““चागिरीसदशैः पत्रैः सुनिषण्णद्चतु्लः । , | शाको जलान्वित देोऽचतुष्पव्रीति कथ्यते ॥* = _
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