भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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हती (वही कटेरी) कण्टका रिका (छोर) कटे री) के फल,

पटो (धरवल), वत्तिाक (वेगन), कारवेल्र (करेल)

कंटकिका (कट्की); केलुक, उरक (श्वेत एरण्ड), पर्ष

(पित्तपापडा); करिराततिक्ता (चिरायता), कर्कटक (ककड़ा),

अरि ( नीम ), कोशातकी ( रई कडुवी) वेत्रकरीर वेत का

| © त्र अंकुर); आरस्ष (रासा), अकर पुष्पी (कुटुम्बनि या आक्‌ के

। प्ते) आदि शाक द ॥२६२॥ रक्तपित्तहराण्याहुहयानि सुख्घूनि च । कष्ठमेहञ्वरश्चासकासारुचिहराणि च ॥२६३॥ हनके सामान्य गुण--रक्त पित्तनाशक, हृदय के ल्यि । प्रि, ल्घु कुषठमेह, ववर, श्वाख, कास ओर अरचिनाशक है ॥ । कंषाया तु हिता पित्ते स्वादुपाकरसा हिमा । भ्वी मण्डुकपरणीं तु तद्रद्गोजिहिका मता ॥२६४॥

मण्डूकपर्णी कषायरख, पित्त मे हितकारी, मधुरविपाक,

मधुररस, शीतल, ल्घु है । गोजिहा के गुण भी मण्डूकपर्णी के । समान द ।२६४॥ । अविःाही त्रिदोषघ्नः संम्राही सुनिषण्णकः । सुनिषण्णक--अवि दाही, त्रिदोषनाशक, संग्राही है । अवल्गुजः कटुःपाके तिक्तः पित्तक्ापहः ॥२६५॥। अवल्गुज--कट्विपाक, तिक्त; पित्तकफनाशक रै ॥[२६५॥ ईेपत्तिक्त त्रिदोषष्नं शाकं कटु सतीनजम्‌ । नाद्युष्णञ्जोत कुष्ठघ्नं काक्माच्यास्तु तद्विधम्‌ ॥२६६॥ सतीन (मटर के पत्र)-थोड़ा तिक्त, त्रिदोषनाशक, कटुरस ६। काकमाची (मकरोय)- न तो अधिक उष्ण ओर न अधिकं

शीत (साधारण), कु्ठनारक, तिक्त ओर कटुरस दै | २६६॥ कण्डुकुष्ठकृमिष्नानि कफवातहराणि च । रुछानि बरहतीनां तु कटुतिक्तख्धूनि च ॥२६७॥

पकणी

पि

_ बृहतीफलं ( कटेरी-बड़ी कटेरी के फल )-- कण्ड्‌; कुष, | मिना क) कफवात को दूर करते ह । कटु, पित्त ओर घु हं ॥२६७॥ कफपित्तहरं त्रण्यसुष्णं तिक्तमवातखम्‌ ।

कटुक पाके वृष्यं रोचनदीपनम्‌ ॥२९2॥ पट्‌

(मष), रोचक ओर अग्निदीपक दै ॥\६८ र्वातहर तिक्तं रोचनं कटुकं रषु । षाताकर दीपनं परोक्तं जणं सक्षारपित्तछम्‌ ॥२६९॥ । पात्ताक ( बेगन । भोर ठ ( ¢ 1 | | य ओर पित्तकारक है ।(२६६॥ त ( ते कोटक वित्‌ कारपेहल्कमेव च।

|

सूत्रस्थानम्‌

® (परवल) -कफ़-पित्तनाशक, व्रण के व्यि हितकारी,

णा, तिक्त, परन्तु वायुकारक नही, विपाक मे कटु, इष्य |

। गौर )--कफ-वायुनाशक, तिक्त, रोचक, कटु | ॥ त ३ एषं अग्निदीपक है । जीणं (पका हज ) बेगन-- | `

१ कविराज हाराणचन्द्रजी

२०३ कर्कोट ( कंकोड़ा ) ओर कासैल्छक ( करेला ) मरगन्‌ के समान हे ॥ आटरूपकवेत्राप्रगुड्‌ ची निम्बपपटाः।

किराततिक्तसदहितासितिक्ताः पित्तकषापहाः ॥२७०] आटसूप्रक (वासा) वेतराग्र वेत का अग्रमाग). गुडची (गिव), निम्व (नीम), ओर पपट (पित्तपापडा), किरततिक्ता ( चिरायता ), तिक्ता ( कटुकी )-ये सव्र तिक्त, पित्त कफ- नाशक ह ।|२७०॥

कफापहं शाकमुक्तं बरुणप्रपुन्नाड (2) योः। रूक्ष रघु च शीतं च वातपित्तप्रकोपणम्‌ ॥२७१॥ वरण (वरना) ओर प्रपुन्नाड (पनवाड़)- का शाक्त क्फ. नाशक, रुक्ष, रघु, शीतर, वायु-पित्तप्रकोपकं ह ।२७१॥

दीपनं काठशाक तु गरदोषहरं कट्‌ ।

काल्ाक अग्निदोपक) गरदोष (संयोगजन्य बिष) को न करता है ओर कटु हे । | कौसुम्भं मधुरं रूक्षमु्मं श्टेष्महरं र्वु ॥२०२॥ कौसुम्भ (कुम्भा) का शाक मधुर, रुक, उष्ण, कृफहर ओर ल्धु है ॥२७२॥ | ¦ बातठं नालिकाशाकं पित्तध्नं मधुरं च तत्‌।

नालिकाशाक--वायुकारक, पित्तनाशक ओर मधुर है । ग्रहण्यर्योविकारष्नी साम्छा वातकफे हिता । उष्णा कषायमधुरा चाङ्गरो चाग्तिदीपनी ॥२७३॥ चांगेरी (खहमिदी) -प्रणी-जशरोगनाश्क, खटी, बाु- कफरोग मे हितकारी, उष्ण, कषायमधुर ओर अग्निदीपक है ॥ लोणिकाजातुकत्रिपणिक्रापत्तूरजीवकसुवचेखा इडरक- कुतुम्बककुणिज्ञरङुन्तठ्काङ्करण्टिक प्रभृतयः ॥२५४॥

लोणिक्‌ (दणि); ज दुकत्रिषणिका, पततूर (शालिञ्ची शाक), जीव, सुवचला (त्राह्ली), इड्रक, कुतम्बक्‌ (राजञचिण्टी)- ऊुठि- ज्र (तरसीमेद्‌) कुन्तलिका (नीछन्चिन्टी), कुरण्टिका (पीत कण्ट) आदि (राजक्षवक आदि), शाक दै? ॥२७४॥ स्वादुपाकरसाः ओताः करूष्ना नातिपित्तखाः। ख्वणायुरसाः रक्षाः सक्षाराः वातखा सराः ॥२७५॥

इनके सामान्य गुण- | मधुररस, मधुरपाक, शीतवीय, कफनाराक, ईैषत्पित्तकारक, खवण-अनुरस, रुक्ष, ईषल्ारयुक्त, वायुकारक ओर सर (विरे.

चक) है ॥२७५॥ स्वादुतिक्ता कुन्तलिका कषाया सकुरण्टिका ।

` छरण्टिका--कषायरस, कुन्तलिका -स्वाड एवं तिक्तरस ईै। संभ्राहि शीतलं चापि रघ दोषापहं तथा । __ राजक्षवकशाकं त शटीशाक च तद्विधम्‌ ॥२७९॥ _

ते ६. (2 (कः ११

४ §