भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४९ ]

राजक्षवक—संग्राही, शीतल, लघु, दोषनाशक है। शदी का शाक भी राजक्षवक के समान गुणकारी है। ॥२७६॥ स्वादुपाकरसं शाकं दुर्जरं हरिमन्थजम्। हरिमन्थ (चने)—मधुररस, मधुरविपाक और दुर्जर हैं। भेदनं मधुरं रुक्षं कलायसतिवातलम् ॥२७७॥ कलाय (मटरभेद) का शाक, भेदक (विरेचक), मधुर, रुक्ष, अतिवायुकारक है। ॥२७७॥

संसनं कटुकं पाके लघु वातकफापहम्। शोफन्तमुण्वीयं च पत्रं पूतिकरञ्जकम् ॥२७८॥ पूतिकरञ्ज (नाटाकरञ्ज) के पत्तों का शाक—संसन (विरेचक), विपाक में कटु, लघु, वायु-कफनाशक, शोफनाशक, उष्णवीर्य है। ॥२७८॥

ताम्बूलपत्रं तीक्ष्णोष्णं कटु पित्तप्रकोपम्। सुगन्धि विशदं तिक्तं स्वर्यं वातकफापहम् ॥२७९॥ संसनं कटुकं पाके कषायं वह्निदीपनम्। वक्रत्रकण्डूलमलकलेदुर्गन्ध्यादिविशोधनम् ॥२८०॥ ताम्बूलपत्र (पान का पत्ता)—तीक्ष्ण, उष्ण, कटुरस, पित्त-प्रकोपक, सुगन्धि, विशद, तिक्त, ज्वर के लिये हितकारी, वायु-कफनाशक, संसन (मल-विरेचक) विपाक में कटु, कषाय, अग्निदीपक, मुख की खाज, मल की आर्द्रता एवं दुर्गन्धता को नष्ट करता है। ॥२७९, २८०॥

अथ पुष्पवर्गः।

कोविदारञ्जशालमलीपुष्पाणि मधुराणि मधुरविपाकानि रक्तपित्तहराणि च, वृषागस्त्ययोः पुष्पाणि तिक्तानि कटुविपाकानि क्षयकासापहानि च ॥२८१॥

इसके आगे पुष्प वर्ग (शाक)—

कोविदार (कचनार), शण, शालमली (सिम्बल)—इसके फूल मधुररस, मधुरविपाक और रक्त-पित्तनाशक हैं। वृष (बांसा) और अगस्त के फूल तिक्ररस, कटुविपाक एवं क्षय-कासनाशक हैं।

आगस्त्यं नातिशीतोष्णं नक्तान्धानां प्रशस्यते ॥२८२॥

अगस्त्यपुष्प के विशेष गुण—न तो अतिशीत और न अति-उष्ण (साधारण), नक्तान्धों (रतोंधी रोगियों) के लिये उत्तम है। ॥२८२॥

करीरमधुशिम्यकुसुमानि कटुविपाकानि वातहरणानि सुधूम्रप्रपुषाणि च ॥२८३॥

करीर, मधुशिम्य (मीठा सहजन), के फूल—विपाक में कटु, वायुनाशक, मल-मूत्र के प्रवर्त्तक हैं। ॥२८३॥

१ राजक्षवक का अर्थ राई किया है। परन्तु राई शीतल न होकर उष्ण है।

२ कई आचार्य संसन आदि गुण (कच्चे) सुपारी फल के मानते हैं।

रक्तवृक्षस्य निम्बस्य मुष्ककाकौसनस्य च। कफपित्तहरं पुष्पं कुष्ठघनं कुटजस्य च ॥२८४॥ रक्तवृक्ष (लाल चन्दन), निम्ब (नीम), मुष्क (क्षारवृक्ष), अर्क (आक) और असन—इनके पुष्प तथा कुटज (चूड़े) के फूल—कफपित्तनाशक और कुष्ठरोगनाशक हैं। ॥२८४॥

सतिक्तं मधुरं शीतं पद्मं पित्तकफापहम्। पद्म (कमलपुष्प)—द्वैषततिक्त, मधुररस, शीतवीर्य और पित्त-कफनाशक है।

मधुरं पिच्छिलं स्निग्धं कुमुदं ह्लादि शीतलम्। तस्मादल्पान्तरगुणे विद्यात् कुवलयोत्पले ॥२८५॥ कुमुद (चन्द्रोदय में खिलनेवाला) मधुर, पिच्छिल, स्निग्ध, ह्लादि (सुखदायक) और शीतल है। कुवलय और उत्पल में कुमुद से कुछ हीन गुण हैं। ॥२८५॥

सिन्धुवारं विजानीयाद्भित्तं पित्तविनाशम्। सिन्धुवार (निर्गुण्डी) पुष्प—हितकारी और पित्तनाशक है। मालतीमल्लिके तिक्ते सौरभ्यात् पित्तनाशने ॥२८६॥ मालती (जाति), मल्लिका (जूही)—तिक्ररस, सुगन्धि से पित्त का नाश करती हैं। ॥२८६॥

सुगन्धि विशदं हृषं बाकुलं पाटलानि च। बाकुल (मौलसरी) और (पाटल फूल) के पुष्प—सुगन्धि, विशद, हृदय के लिये प्रिय होते हैं।

श्लेष्मपित्तविषघ्नं तु नागं तद्रुचं कुडकुमम् ॥२८७॥ नाग (नागकेसर), कफ पित्त-विषनाशक है, कुंकुम (केसर) में भी नागकेसर के समान गुण हैं। ॥२८७॥

चम्पकं कफपित्तघ्नं शीतोष्णं कफनाशनम्। चम्पक (चम्पा)—रक्त-पित्तनाशक, शीत-उष्ण (साधारण) कफनाशक है।

किंशुकं कफपित्तघ्नं तद्रुदेव कुरण्टकम् ॥२८८॥ किंशुक (डाक) और कुरण्टक के पुष्प-कफ पित्त नाशक हैं। यथावृक्षं विजानीयात् पुष्पं वृक्षोचितं तथा। उपसंहार—वृक्ष के अनुसार-पुष्प में भी गुण समझने चाहिये।

मधुशिम्यकरीराणि कटु श्लेष्महराणि च ॥२८९॥ मधुशिम्य (मीठे सहजन) के करीर (नाल) कटुरस और कफनाशक हैं। ॥२८९॥

क्षवककूलेचरवंशकरीरप्रभृतीनि कफकराणि सुधूम्रप्रपुषाणि च ॥२९०॥

क्षवक (छत्रक), कूलेचर (खुखुण्डक) और वंशकरीर (वंशांकुर)—आदि कफनाशक और मल मूत्र प्रवर्त्तक हैं।

क्षवकं क्रमिलं तेषु स्वादुपाकं सपिच्छलम्। विष्यन्दि वातलं नातिपित्तश्लेष्मकरं च तत् ॥२९१॥

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