सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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पूर्वस्थानम्
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क्ष्वक-कुमिकारक, मधुर-विपाक, पिच्छिल, विष्यन्दि (कफसावि), वायुकारक, पित्त-कफ को थोड़ा बढ़ाता है ॥
वेणोः करीराः कफला मधुरा रसपाकतः ।
विदाहिनो वातकराः सकषाया विरुक्षणः ॥२२॥
बाँस के अंकुर—कफकारक, मधुरविपाक, विदाही, वायुकारक, कषाय एवं रूक्ष हैं ॥२२॥
उद्भिदानि पलाक्षुकरीषवेणुक्षितिजानि । तत्र पलाक्षजानं मधुरं मधुरविपाकं रूक्षं दोषप्रशमनं च, इलुजं मधुरं कषायानुरसं कटुपाकं शीतलं च तद्धेवोष्णं कारीषं कषायं वातकोपनं च, वेणुजातं कषायं वातकोपनं च; भूमिजं गुरुं नातिवातलं भूमितश्चास्यानुरसः ॥२३॥
उद्भिदं शाक—( भूमि में से उत्पन्न होनेवाले और बिना बोये )—
पलाळ ( पुआल शस्यशून्य काण्ड ), इलु ( गन्ने ), करीष ( शुष्क गोमय ), वेणु ( बाँस ), क्षितिज ( भूमि में उत्पन्न ) उद्भिद ( छत्रकादि ) शाक हैं । इनमें पलाळ ( पुआल ) में उत्पन्न शाक—मधुररस, मधुरविपाक, रूक्ष, दोषनाशक हैं । गन्ने में उत्पन्न शाक—मधुररस, कषाय—अनुरस, कटु और शीतल हैं । करीष में उत्पन्न शाक—उष्ण, कषाय और वातप्रकोपक हैं । वेणु ( बाँस ) में उत्पन्न शाक—कषाय एवं वायुप्रकोपक हैं । भूमिजन्म शाक—गुरु, ईषत्—वायुकारक और भूमि के समान गुणवाले होते हैं ॥२६॥
पिण्याकतिलकत्कस्थूणिकागुष्कशाकानि सर्वदोषप्रकोपणानि ॥२८॥
पिण्याक ( अलसी-सरसों की खल ), तिलकल्क ( तिल खल ), स्थूणिका ( वटक-नालबड़ियाँ ) और ये शुष्क शाक-तीनों दोषों को कुपित करते हैं ॥२८॥
विष्टुभिन्नः स्मृताः सर्वे वटका घातकोपनाः ।
सिण्डाकी वातला साद्री रुचिष्यानलदीपनी ॥२९॥
वटक ( सब प्रकार की बड़ियाँ, मूँग, उड़द आदि से बनी ) विष्टुभिन्न और वायुप्रकोपक होती हैं । सिण्डाकी ( मूली आदि के शाक को थोड़ा-सा उबालकर, कूटकर, इसमें सुगन्धित एवं मिरच आदि द्रव्य मिलाकर बनी बड़ियाँ सिण्डाकी कहलाती है, यह आर्द्र और शुष्क भेद से दो प्रकार की हैं )—वायुकारक हैं, आर्द्रा-रोचक एवं अग्निदीपक हैं ॥२९॥
विडुभेदि गुरु रूक्ष च प्रायो विष्टुभिन्नु दुर्जरम् ।
सकषायं च सर्वं हि स्वादु शाकमुदाहृतम् ॥२९॥
सब स्वादु ( मधुर ) शाक—विरेचक, गुरु, रूक्ष, प्रायः करके विष्टुभिन्नु ( गुड़गुड़ाहट कारक), दुर्जर, और कषायरस हैं ॥
पुष्पं पत्रं फलं बालं कन्दश्च गुरवः क्रमात् ॥
पुष्प, पत्र, फल, नाल और कन्द शाक ये उत्तरोत्तर गुरु
हैं, पुष्पशाक से पत्रशाक, पत्रशाक से फलशाक, उससे नाल-शाक, नालशाक से कन्दशाक गुरु हैं ॥२९॥
कर्कशं परिजीणं च क्रुमिजुष्टमद्देशजम् ।
वज्रयेत् पत्रशाकं तद्वाटकात्विरोहि च ॥२९॥
त्याज्य पत्रशाक—कर्कश ( खर-स्पर्श ), परिजीर्ण ( पुरा-तन पीला ), क्रुमिजुष्ट ( कीड़ों से खाया हुआ ), अदेशज ( अनुचित देश में उत्पन्न ), अकालविरोहि ( अकाल में उत्पन्न ) पत्रशाक त्याज्य है ॥२९॥
अथ कन्दवर्गः ।
कन्दान्त उर्ध्वं बन्दायसः—विदारीकन्दशतावरीविस-मृणालशृङ्गाटककशेरुकपिण्डालुकमध्वालुकहस्त्यालुकका - घ्वालुकशङ्खालुकरकालुकेन्द्रीवरोत्पलकन्दप्रभृतीनि ॥२९॥
विदारीकन्द ( विदारी ), शतावरी, विस ( कमलमूल ), मृणाल ( कमलनाल ), शृङ्गाटक ( सिंघाड़ा ), कशेरु, पिण्डालु, मध्वालु, हस्त्यालु, काष्ठालु, शंखालु, रक्तालु, इन्दीवर ( नील-कमल ), उत्पल ( श्वेत या लालकमल ) आदि कन्द ( भूमि में उत्पन्न ) हैं ।
वि० मन्तव्य—आज के पाश्चात्य शिक्षा शिक्षितों का विश्वास है कि आल्ड—आज से कुछ शताब्दी पूर्व अमेरिका से भारत में आया है, परन्तु यह भ्रूत है कि अन्त इसका विवेचन पाठक स्वयं करें और देखें कि इस सूत्र में एक नहीं अनेक आलुओं का नामोल्लेख है और—च० सू० अ० २७ में भी “तद्वत् पिण्डालुकां विद्यात् कन्दत्वात् च मुखप्रियम्” कह कर आल्ड का उल्लेख किया गया है । आज के समान उस समय भी यह मुखप्रिय था ॥२९॥
रक्तपित्तहराण्याहुः शीतानि मधुराणि च ।
गुरुणि बहुगुष्काणि स्तन्यबृद्धिकराणि च ॥३०॥
इनके सामान्य गुण—रक्तपित्तनाशक, शीतल, मधुर, गुरु, शुक्रवर्धक हैं और स्तन्यबृद्धि ( दूध को बढ़ाना ) करते हैं ॥
मधुरो वृंहणो वृष्यः शीतः स्वयोरर्जितमूत्रलः ।
विदारीकन्दो बल्यश्च पित्तवातहरश्च सः ॥३०॥
विदारीकन्द—मधुर, वृंहण ( देहवर्धक ), वृष्य ( शुक्रवर्धक ), शीतल, स्वर के लिये हितकारी, अतिमूत्रवर्धक, बलकारक, पित्त वायुनाशक है ॥३०॥
वातपित्तहरी वृष्या स्वादुतिकता शतावरी ।
महती चेव हृद्या च मेधाग्निबलवर्धिनी ॥३०॥
ग्रहण्यशोविकारघ्नी वृष्या शीता रसायनी ।
कफपित्तहरास्तिकतास्तस्या एवङ्गुराः स्मृताः ॥३०॥
शतावरी—वात-पित्तनाशक, वृष्य ( शुक्रवर्धक ), स्वादु-तिक्तरस है । महती ( बड़ी ) शतावर—हृदय के लिये प्रिय, मेधा अग्नि एवं बल की वर्धक है । ग्रहणी रोम-नाशक वृष्य,