सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०६
( शुक्रल ), शीतल एवं रसायन है | शतावरी के अंकुर (परोद) कफ-पित्तनाशक, तिक्त होते देँ ॥ ३०१,२०२ ॥
अविद्ाहि विसं प्रोक्तं रक्तपित्तप्रसादनम् |
विष्टम्भि दुरं रूक्षं विरसं मारुतावहम् ॥ ३०३ ॥ वरिस ( कमटमूल )-अविदाहि (जलन उन्न नदीं करती), रक्त-पिच्नाशक है । रसरहित त्रिख विष्टम्भि, दुजर, रुक्ष, वायु-
कारक हे ।|२०३॥ गुरू विष्टम्मिशीतो च श्चङ्गाटककरेरको ।
सिघाड़ा ओर कशेरू- गुर, विष्टम्भि ओर शीतल है ।
पिण्डाढुकं कफकरं गुरु वातप्रकोपणम् ॥ ३०४ ॥
पिण्डाल्ु-कफकारक गुरु ओर वायुप्रकोपक है ॥३०४॥ सुरेन्द्रकन्दः श्टेष्मघ्नो विपाके कडु पित्तञ्त् | सुरन्द्रकन्द ( वच्रकन्द ) कफनाशक, कटुविपाकं एवं पित्तकारक है |
वेणोः करीरा गुरवः क फमारुतकोपनाः ॥ ३०५॥ बां की मूल का अंदुर-गुख, कफ एवं वायुप्रकोपक है ॥ स्थुटसूरणमाणक्म्र्चतयः कन्दा ईषक्कषायाः कटुका रूक्षा शिष्टम्भिनो गुरवः कफव्रातखाः पित्तहराश्च ॥३०६॥ स्थूल्कन्द् ( ग्रामक्न्द् ), सूरणकन्द् ( जिपिकन्द ), माण- ककन्द् ( मानकन्द् ) आदि कन्द्-ईषत्कपाय रस, कटुविपाक, रूक्ष, 'वष्टम्भि, गुर, कफ-वायुकरारक ओर पित्तनाशक रै | २०६॥। मान् (ण) क स्वादु खतं च गुरु चापि प्रकीर्तितम् । स्थूख्कन्दस्तु नात्युष्णः सूरणो गद कीर्हा ॥ ३०७ ॥ : म।णककन्द्-स्वदु ( मधुर ), शीतल ओर गुर है । स्थूल- कन्द्-थोडा उष्ण ह, सूरणकन्द्-गुदकौल-(अशंरोग) नाशक दै । कुयुदोत्पट्पद्यानां कन्दा मारतकोपनाः । कषायाः पित्तशमना विपाके मधुरा हिमाः ॥ ३०८ ॥ कुमुद्, उत्पल ओर पद्म, इनके कन्द्-वायु-प्रकोपक, ˆ कषाय्रख, पित्तशामक, विपाक मे मधुर ओर शीतवीर्यं है २०८ वाराहकन्द्ः इरेऽमध्नः कटको रसपाकतः । मेद कु्ठकृमिहरो बरस्यो वृष्यो रसायनः ॥ ३०६ ॥ ` वाराहकन्द् ( युअरकन्द्-सुअर जैसे बार होते हे )-कफ- नाक्र, कटुरसः कडुविप।क, प्रमेह-कुष्ठ कृमिनाशक, वलकारक दृष्य ( शुक्रवधेक ) ओर रसायन दै ॥२०६।।
ताछनारिके& खजुरग्रशतीनां मस्तकमञ्जानः ॥३१०॥ स्वादुपाकरसानाहू रक्तपित्तदरांस्तथा । १ युक्रखाननिरध्नाश्च कफबद्धकरानपि ॥ २३१९ ॥ ताल ( ताङ् ) नारके ( नारि ) खर्जर ( खजुर ) आदि बृश्चों की मस्तकमज्जा ( अग्रमञ्जाभाग }-मधुररस, मुरविपाक, रक्तपित्तनाशक, शुक्रवधक, वायुनाशक, एवं कफ ` को बढ़ती हे।
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सश्रतसंहिता [ अ० ४६ वि° मन्तव्य-ताङ़ आदि इक्षो के अग्रभाग-जहाँ पर हूर
पत्र लगे रहते ह-के मध्य मेँ कौमल गूदा रहता है | उसका
शाक बङ्गार तथा मद्रास मँ खाया जाता है ॥३१०.३१९॥ बालं ह्यनातेवं जीण व्याधितं कृमिभक्षितम् । कन्दं विवजयेत् सवं यो वा सम्यङ् न रोहति ॥३१६॥ त्याज्यकन्द्-बाल ( छोटे ), अनात्तव (अरृठकालजन्य।
जीणं ( पके-पुरातन ) व्याधित ( रोगयुक्त); कृमिमक्षित
( कोड से खाये ), अथवा जो कन्द मी प्रकार से उतपन्न नहीं हुआ-उखको छोड देना चाहिये ॥३१२॥ अथ खवणवगैः |
अथ लवणानि सेन्धवसासुद्रविडसौवच॑ररोमकेोद्धि- प्रभ्रतीनि यथोत्तरसुष्णानि वातकराणि कफपित्तकराणि कटुपाकीनि यथापूव रिनिग्धानि स्वादूनि सष्टमूत्रपुरीषागि ` चेति ३१२
इसके आगे क्वणो को कहते दै- |
सेन्धव ( सेन्धा छाहौरी ), सामुद्र ८ गुजरात मे समुद्र के
पानीसे तैयार); ब्रिड (मेड्गी नमक); सौवचंङ ( सुगन्धी
काला ल्वण ), रोमक ( खाम्भर ), ओद्भिद ( मूमि मे उदन्न ।
खार या खार युक्त पानी से तैयार हुभा ) आदि नमकदहै।
इनके सामान्य गुण-ये उत्तरोत्तर ८ सेन्धव से सामुद्र गुरु, ।
सामुद्र से व्रिड गुर....इषं प्रकार से) गुर दहै, वातनाशक, |
कफपित्तकारक हैँ । यथापूव ( सामृद्रसे सैन्धव, बरिडसे | सामुद्र....इस क्रम से) क्रम मे-रिनिगध, स्वादु ( मधुर); मल |
मूत्र के प्रवत्तंक है ॥२३१२॥ चक्षुष्यं सेन्धवं हयं रुच्यं रुष्वग्निदीपनम् । ` स्निग्धं सुमधुरं बृरष्यं शीतं दोषध्नयुत्तमम् ॥२१४॥ सेन्धव-आंखों के स्यि हितकारी, ह्य ( प्रिय ); खचि
कारक, रधु; अग्निदीपक, सिन्ध, मधुर, वृष्य ( शुक्रवधक ), ,
शीतल, दोषनाशक ओर नमकों मेँ शरेष्ठ है ॥२१५॥
सामुद्रं मधुरं पाके नाद्युष्णमविदाहि च ।
भेदनं सिनिग्धमीषच्च शृरहद्रोगनाशनम् ॥३१५॥ सामद्रनमक~विपाक मे. मधुर, ईषत् उष्ण, अविदाही,
मेदक ( विरेचक ), ईषत् स्निग्ध, शुख्नाशक, ईषत् पित्त
कारक ह |३१५॥ | य
सक्षारं मधुरं सुदमं शूरह्रोगनाशनम् । |
रोचनं तीच्णयुष्णं च विडं वातानुखोमनम् ॥३८६॥ विडनमक-क्ारथुक्त, अग्निदीपक, रूक्ष, शुल्ंदयरगण | नाशक, रोचक, तीण, उष्णवीयं ओर वायु का अनुरीरम"
करता है ॥३१६॥ 1 रघु सोवचंखं पाके वीर्योष्णं विद् कट् । ` गल्मशूरविरवन्धघ्नं हृं सुरमिं रोचनम् ॥३१॥
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