सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 255, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ४६ ]
सूत्रस्थानम्
२०७
सौवर्चलनमक-मधु, उष्णवीर्य, विशद, कटुविपाक, गुल्म शूल एवं विषम्य (मल-मूत्रावरोध) नाशक, हृदय के लिये प्रिय, सुरभि (सुगन्धित) और रोचक है ॥३१७॥
रोमकं तीक्ष्णमत्युष्णं व्यवायि कटुपाकि च । वातघ्नं लघु विषयन्दि सूक्ष्मं विडुभेदि मूत्रळम् ॥३१८॥
रोमक (सामर)—तीक्ष्ण, उष्ण, व्यवायि (अपकावस्था में शरीर में व्याप्त हो जाता है), फिर शरीर में पचता है, विपाक में कटु, वातनाशक, लघु, विषयन्दि (कफसावक), सूक्ष्म, बल विरेचक और मूत्रल है ॥३१८॥
लघु तीक्ष्णोऽगुत्कलेदि सूक्ष्मं वातानुलोमनम् । सतिकं कटु सञ्चारं विद्यात्त्वणमोद्भिदम् ॥३१९॥
ओद्भिद लवण—लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, उत्कलेदि (वमन की अभिरुचि करनेवाला), सूक्ष्म, वायु का अनुलोमक, ईषत्तिक, कटुस्व, क्षारयुक्त होता है ॥३१९॥
कफवातकृमिघ्नं च लेखनं पित्तकोपनम् । दीपनं पाचनं भेदि लवणं गुटिकाहृयम् ॥३२०॥
गुटिका लवण (पकाने पर गुटिकाकार बना नमक)—कफ वायु कृमिनाशक, लेखन (कफ का), पित्तप्रकोप, अग्निदीपक, पाचक (त्रण को पकानेवाला), भेदि (विरेचक) है ॥३२०॥
ऊषसूतं बालुकैलं शैलमूलाकरोद्भवम् । लवणं कटुकं छेदि विहितं कटु चोत्थते ॥३२१॥
ऊषसूत (ऊषर भूमि में उत्पन्न), बालुकैल (रेतीलीभूमि में उत्पन्न, उदयपुर में इसे डिडुआना कहते हैं), शैलमूलाकरोद्भव (पर्वत की जड़ में उत्पन्न-खनिज)—नमक, कटुरस, छेदि और विगक में कटु होते हैं ॥३२१॥
यवक्षारस्वर्जिकाक्षारोपक्षारपाकिमटङ्कणक्षारप्रभृतयः ॥
यवक्षार (जौवार), स्वर्जिकाक्षार (सर्जजीवार) ऊषक्षार, पाकिम (पाक द्वारा बनाया, पानीय और प्रतिसारणीय अथवा-धूलि आदि से निकाला), टङ्कणक्षार (सुहागा) आदि क्षार हैं ॥ गुल्मागोम्रहणीदोषअर्कराशमरिनाशनः ।
क्षारान्तु पाचनाः सर्वे रक्तपित्तकराः सराः ॥३२२॥
इनके सामान्य गुण—गुल्म अर्श ग्रहणीरोग प्रतिशयनाशक हैं । सब क्षार पाचक (त्रणों को पकानेवाले) रक्त-पित्त-कारक हैं ॥३२२॥
ज्ञेयौ वहिसमौ क्षारौ स्वर्जिकायावशुकजौ ।
शुक्ररत्नेष्वविबन्धागोगुल्मप्लीहविनागनौ ॥३२३॥
स्वर्जिकाक्षार और यवक्षार—अग्नि के समान उष्ण हैं, शुक्र, कफ-विषम्यन (मल-मूत्र अवरोध), अर्श-गुल्म एवं प्लीहा के नाशक हैं ॥३२३॥
१ 'शैलमूलाकरोद्भव' का अर्थ डल्हणाचार्य ने, प्रयासबुलुङ्ग की उत्पत्ति भूमि (तुर्क देश) किया है । इस देश में उत्पन्न यह शर्प किया है ।
लघुगोऽनिलघ्नः प्रकृतेदी चोषक्षारो वलापहः । मेदोघ्नः पाकिमः क्षारस्तेषां वस्तिविशोधनः ॥३२४॥ ऊषक्षार (ऊषर भूमि में तैयार)—उष्ण, वायुनाशक, क्लिन्नता उत्पन्न करता है, बल (शुक्र ओज) नाशक है । पाकिम (पाक द्वारा तैयार) क्षार—मेदनाशक और वस्ति (मूत्र) विशोधक (प्रवर्त्तक) है ॥३२४॥
विरुक्षणोऽनिलकरः इक्षुधमघ्नः पित्तदुष्णः । अग्निदीपिकरस्तीक्ष्णष्टङ्कणः क्षार उच्यते ॥३२५॥
टङ्कणक्षार—रुक्ष, वायुकारक, कफनाशक, पित्तप्रकोपक, अग्निदीपक और तीक्ष्ण है । लवणक्षार पार्थिव हैं, इसलिये अन्य स्वर्णादि धातुओं के भी पार्थिव होने से उनके गुण कहते हैं ॥३२५॥
सुवर्णं स्वादु हृद्यं च वृंहणीयं रसायनम् । दोषत्रयपहं शीतं चक्षुष्यं विषसूदनम् ॥३२६॥
स्वर्ण (भस्म)—मधुर, हृदय के लिये प्रिय, वृंहण (देहवर्धक) रसायन, तीनों दोषनाशक, शीतल, आँखों के लिये हितकारी और विषनाशक है ॥३२६॥
रूप्यमग्गलं सरं शीतं सस्तेहं पित्तवातनुत् ।
रूप्य (चाँदी)—अम्ल, सर (विरेचक), शीतल, स्नेहयुक्त, पित्त वायुनाशक है ॥
ताम्रं कषायं मधुरं लेखनं शीतलं सरम् ॥३२७॥
ताम्र—कषाय, मधुर, लेखन (कफ-मेद का), शीतल और सर (विरेचक) है ॥३२७॥
सतिकं लेखनं कांस्यं चक्षुष्यं कफवातजित् ।
कांस्य—(कांसी-धातु ताम्र एवं यशद से बनाई जाती है, खनिज नहीं)—तिक, लेखन, आँखों के लिये हितकारी, कफ-वायुनाशक है ॥
वातकृच्छीतलं लोहं तृष्णापित्तकफापहम् ॥३२८॥
लोह—वायुकारक, शीतल, तृष्णा पित्त और कफनाशक है । कटु कृमिघ्न लवण त्रपु सीसं च लेखनम् ।
त्रपु (रांगा) सीसा—कटु, कृमिनाशक, लवण और विलेखन (कफ मेद का), गुणकारी है ॥
मुक्ताविदुमवज्रेन्द्रवैदूर्यस्फटिकादयः ॥३२९॥
चक्षुष्या मणयः शीता लेखना विषसूदनाः । पवित्रा धारणीयाश्च पाप्माळदसीमलापहाः ॥३३०॥
इति लवणादिवर्गः । प्रसंगवश-मणियों के गुण—
मुक्ता (मोती) विदुम (प्रवाल), वज्रेन्द्र (हीरा), वैदूर्य,
१ यहाँ पर धातुओं को भस्म के गुण समझने चाहिये ।
२ लघु-शीतवीर्य लिखा है, परन्तु अन्य ग्रन्थों में ताम्र को उष्ण कहा है; देखिये रत्नेन्द्रसारसंग्रह । परन्तु अष्टांगसंग्रह में भी इसे शीत कहा है ।