भारतकोश
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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

अ० ४६ ]

सूत्रस्थानम्

२०७

सौवर्चलनमक-मधु, उष्णवीर्य, विशद, कटुविपाक, गुल्म शूल एवं विषम्य (मल-मूत्रावरोध) नाशक, हृदय के लिये प्रिय, सुरभि (सुगन्धित) और रोचक है ॥३१७॥

रोमकं तीक्ष्णमत्युष्णं व्यवायि कटुपाकि च । वातघ्नं लघु विषयन्दि सूक्ष्मं विडुभेदि मूत्रळम् ॥३१८॥

रोमक (सामर)—तीक्ष्ण, उष्ण, व्यवायि (अपकावस्था में शरीर में व्याप्त हो जाता है), फिर शरीर में पचता है, विपाक में कटु, वातनाशक, लघु, विषयन्दि (कफसावक), सूक्ष्म, बल विरेचक और मूत्रल है ॥३१८॥

लघु तीक्ष्णोऽगुत्कलेदि सूक्ष्मं वातानुलोमनम् । सतिकं कटु सञ्चारं विद्यात्त्वणमोद्भिदम् ॥३१९॥

ओद्भिद लवण—लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, उत्कलेदि (वमन की अभिरुचि करनेवाला), सूक्ष्म, वायु का अनुलोमक, ईषत्तिक, कटुस्व, क्षारयुक्त होता है ॥३१९॥

कफवातकृमिघ्नं च लेखनं पित्तकोपनम् । दीपनं पाचनं भेदि लवणं गुटिकाहृयम् ॥३२०॥

गुटिका लवण (पकाने पर गुटिकाकार बना नमक)—कफ वायु कृमिनाशक, लेखन (कफ का), पित्तप्रकोप, अग्निदीपक, पाचक (त्रण को पकानेवाला), भेदि (विरेचक) है ॥३२०॥

ऊषसूतं बालुकैलं शैलमूलाकरोद्भवम् । लवणं कटुकं छेदि विहितं कटु चोत्थते ॥३२१॥

ऊषसूत (ऊषर भूमि में उत्पन्न), बालुकैल (रेतीलीभूमि में उत्पन्न, उदयपुर में इसे डिडुआना कहते हैं), शैलमूलाकरोद्भव (पर्वत की जड़ में उत्पन्न-खनिज)—नमक, कटुरस, छेदि और विगक में कटु होते हैं ॥३२१॥

यवक्षारस्वर्जिकाक्षारोपक्षारपाकिमटङ्कणक्षारप्रभृतयः ॥

यवक्षार (जौवार), स्वर्जिकाक्षार (सर्जजीवार) ऊषक्षार, पाकिम (पाक द्वारा बनाया, पानीय और प्रतिसारणीय अथवा-धूलि आदि से निकाला), टङ्कणक्षार (सुहागा) आदि क्षार हैं ॥ गुल्मागोम्रहणीदोषअर्कराशमरिनाशनः ।

क्षारान्तु पाचनाः सर्वे रक्तपित्तकराः सराः ॥३२२॥

इनके सामान्य गुण—गुल्म अर्श ग्रहणीरोग प्रतिशयनाशक हैं । सब क्षार पाचक (त्रणों को पकानेवाले) रक्त-पित्त-कारक हैं ॥३२२॥

ज्ञेयौ वहिसमौ क्षारौ स्वर्जिकायावशुकजौ ।

शुक्ररत्नेष्वविबन्धागोगुल्मप्लीहविनागनौ ॥३२३॥

स्वर्जिकाक्षार और यवक्षार—अग्नि के समान उष्ण हैं, शुक्र, कफ-विषम्यन (मल-मूत्र अवरोध), अर्श-गुल्म एवं प्लीहा के नाशक हैं ॥३२३॥

१ 'शैलमूलाकरोद्भव' का अर्थ डल्हणाचार्य ने, प्रयासबुलुङ्ग की उत्पत्ति भूमि (तुर्क देश) किया है । इस देश में उत्पन्न यह शर्प किया है ।

लघुगोऽनिलघ्नः प्रकृतेदी चोषक्षारो वलापहः । मेदोघ्नः पाकिमः क्षारस्तेषां वस्तिविशोधनः ॥३२४॥ ऊषक्षार (ऊषर भूमि में तैयार)—उष्ण, वायुनाशक, क्लिन्नता उत्पन्न करता है, बल (शुक्र ओज) नाशक है । पाकिम (पाक द्वारा तैयार) क्षार—मेदनाशक और वस्ति (मूत्र) विशोधक (प्रवर्त्तक) है ॥३२४॥

विरुक्षणोऽनिलकरः इक्षुधमघ्नः पित्तदुष्णः । अग्निदीपिकरस्तीक्ष्णष्टङ्कणः क्षार उच्यते ॥३२५॥

टङ्कणक्षार—रुक्ष, वायुकारक, कफनाशक, पित्तप्रकोपक, अग्निदीपक और तीक्ष्ण है । लवणक्षार पार्थिव हैं, इसलिये अन्य स्वर्णादि धातुओं के भी पार्थिव होने से उनके गुण कहते हैं ॥३२५॥

सुवर्णं स्वादु हृद्यं च वृंहणीयं रसायनम् । दोषत्रयपहं शीतं चक्षुष्यं विषसूदनम् ॥३२६॥

स्वर्ण (भस्म)—मधुर, हृदय के लिये प्रिय, वृंहण (देहवर्धक) रसायन, तीनों दोषनाशक, शीतल, आँखों के लिये हितकारी और विषनाशक है ॥३२६॥

रूप्यमग्गलं सरं शीतं सस्तेहं पित्तवातनुत् ।

रूप्य (चाँदी)—अम्ल, सर (विरेचक), शीतल, स्नेहयुक्त, पित्त वायुनाशक है ॥

ताम्रं कषायं मधुरं लेखनं शीतलं सरम् ॥३२७॥

ताम्र—कषाय, मधुर, लेखन (कफ-मेद का), शीतल और सर (विरेचक) है ॥३२७॥

सतिकं लेखनं कांस्यं चक्षुष्यं कफवातजित् ।

कांस्य—(कांसी-धातु ताम्र एवं यशद से बनाई जाती है, खनिज नहीं)—तिक, लेखन, आँखों के लिये हितकारी, कफ-वायुनाशक है ॥

वातकृच्छीतलं लोहं तृष्णापित्तकफापहम् ॥३२८॥

लोह—वायुकारक, शीतल, तृष्णा पित्त और कफनाशक है । कटु कृमिघ्न लवण त्रपु सीसं च लेखनम् ।

त्रपु (रांगा) सीसा—कटु, कृमिनाशक, लवण और विलेखन (कफ मेद का), गुणकारी है ॥

मुक्ताविदुमवज्रेन्द्रवैदूर्यस्फटिकादयः ॥३२९॥

चक्षुष्या मणयः शीता लेखना विषसूदनाः । पवित्रा धारणीयाश्च पाप्माळदसीमलापहाः ॥३३०॥

इति लवणादिवर्गः । प्रसंगवश-मणियों के गुण—

मुक्ता (मोती) विदुम (प्रवाल), वज्रेन्द्र (हीरा), वैदूर्य,

१ यहाँ पर धातुओं को भस्म के गुण समझने चाहिये ।

२ लघु-शीतवीर्य लिखा है, परन्तु अन्य ग्रन्थों में ताम्र को उष्ण कहा है; देखिये रत्नेन्द्रसारसंग्रह । परन्तु अष्टांगसंग्रह में भी इसे शीत कहा है ।

२०२

मुश्रुतसंहिता

[ अ० ४६ ]

स्फटिक आदि मणियां—भाँखों के लिये हितकारी, शीतल, लेखन, विषनुशाक, पवित्र, धारण करने योग्य, पाप्मा (पाप) अलक्ष्मी (दौर्भाग्य) और मल के नाशक हैं ॥३२६-३३०॥ धान्येषु मांसेषु फलेषु चैव शाकेषु चानुकृमिहाप्रमेयात् । आस्वादतो भूतगुणेश्च मत्वा तदादिशेद्द्रव्यमनल्पबुद्धिः॥ अनहगबुद्धि (अगाध बुद्धिशाली वैद्य)—इष शास्त्र में—अप्र- मेयात् (अनन्त होने से), धान्य, मांस, फल एवं शाक (कन्द) वगों में—न कहे हुए द्रव्यों को आस्वादतः (रस के आस्वाद से) तथा भूतगुणों से (द्रव्यारधक भूत गुणों से, वीर्य-विपाक आदि से) पद्भिचान के ॥३३१॥

षष्टिका यवगोधूमा लोहिता ये च शालयः ।

मुदाठकीमसुराश्च धान्येषु प्रवराः स्मृताः ॥३३२॥

कहे हुए द्रव्यों में श्रेष्ठ द्रव्यों का विचार—

धान्यों में श्रेष्ठ—षष्टिक, यव (जौ), गोधूम (गेहूँ), और लाल शालि, मूळ, अरहर और मसूर श्रेष्ठ हैं ॥३३२॥

ठावतिस्तिरिसारङ्गकुरुक्षेत्रकपिखलाः ।

मयूरवसिकुर्माश्च श्रेष्ठा मांसगणेष्विव ॥३३३॥

मांसवर्ग में श्रेष्ठ—ठाव (बटेर), तित्तिरि, सारङ्ग, कुरुङ्ग, ऐण, कपिखल, मोर, वर्मि, कुर्म (कछुवा) श्रेष्ठ हैं ॥३३३॥

दाडिमामलकं द्राक्षा खजूरं सपरूपकम् ।

राजादनं मातुलुङ्गं फलवर्गं प्रशस्यते ॥३३४॥

फलवर्ग में श्रेष्ठ—अनार, आँवला, द्राक्षा, खजूर, फालसा, राजादन, बिजौरा श्रेष्ठ हैं ॥३३४॥

सतीनो वास्तुकश्चुचूचिच्छिर्मूलकपोतिकाः ।

मण्डूकपर्णीं जीवन्तीं शाकवर्गं प्रशस्यते ॥३३५॥

शाकवर्ग में श्रेष्ठ—सतीन (मटर), बथुवा, चुन्चू, चिछी, मूलकपोतिका (वालमूली), मण्डूकपर्णी, जीवन्ती श्रेष्ठ हैं ॥३३५॥ गन्धं क्षीरं घृतं श्रेष्ठं सैन्धवं लवणेषु च ।

धात्रीदाडिममन्लेषु, पिप्पली नागरं कटौ ॥३३६॥

तिक्के पटोलवार्ताकं मधुरं घृतमुच्यते ।

क्षौद्रं, पूगफलं श्रेष्ठं कषायं सपरूपकम् ॥३३७॥

शर्करेश्वुविकारेषु, पाने मध्वासवौ तथा ।

दूध और घी में गाय का दूध घी उत्तम है, नमकों में सैन्धव नमक, खटाई-अम्लस में अनार और आँवला, कटुरस में पिप्पली और सोंठ, तिक्रस में पटोल और वैंगन, मधुरस में घी और शहद, कषायरस में पूगफल (खुपारी) और फालसा, गन्ने के विकारों में शर्करा, आसवों में (मर्चा में), मूढ़ीका और द्राक्षसव श्रेष्ठ हैं ॥३३७॥

परिसंवत्सरं धान्यं मांसं वयसि मध्यमे ॥३३८॥

अपर्युषितमन्नं तु संस्कृतं मात्रया शुभम् ।

फलं पर्यागतं, शाकमशुष्कं तरुणं नवम् ॥३३९॥

एक साल पुराने धान्य, मध्यम आयुवाले पशु का मांस, जिस पर रात नहीं बीती ऐसा एवं संस्कृती (मली प्रकार पका), मात्रा में (उचित अभिनबलानुसार) एवं शुभ (पवित्र), अन्न पर्यागत (पका पुष्ट) फल तथा अशुष्क (हरा), तरुण (मध्यम- वय) एवं नव (नया) शाक उत्तम हैं ॥३३८, ३३९॥

अथ कृतान्नवर्गः ।

अतः परं प्रबद्धाभि कृतान्नगुणविस्तरम् ।

लाजमण्डो विशुद्धातां पथ्यः पाचनदीपनः ॥३४०॥

वातानुलोमतो हृद्यः पिप्पलीनागरायुतः ।

इसके आगे "कृतान्न" वर्ग के गुणों को कहते हैं —

लाजमण्ड विशुद्ध (वमन-विरेचन द्वारा शुद्ध हुए) रोगियों के लिये हितकारी है, पाचन एवं अभिनदीपक है । पिप्पली एवं सोंठ से युक्त लाजमण्ड वायु का अनुलोमक एवं हृदय के लिये प्रिय है१ ।

वि- मन्तव्य—किया-बनाया-पकाया हुआ अन्न-भोजन- 'कृतान्न' कहलाता है । लाजमण्ड-भुने चावलों का मण्ड मण्ड पिच्छ । पेया—चावलों या जौ, गेहूँ का बनाया वह खाद्य जो पीने योग्य हो जैसे साबुदाना या बारली, इनमें चावल आदि घुले रहते हैं । बिलेयी—जो खाद्य पेया से कुछ गाढा हो, कड़- छुली में लिपता-सटता है, जैसे-फिरनी खिचड़ी आदि । यवगु बिलेयी से भी गाढा खाद्य जैसे—दलिया आदि । ओदन-भात पकाए गये चावल आदि धान्य । ओदन के दो प्रकार—१- अप्रस्तुत-जिसका मन्द पृथक् नहीं किया है—इसे "पिच्छमार भात" कहते हैं । २—प्रस्तुत भात जिसका मण्ड पृथक् कर दिया गया—जुआ दिया गया है । विधि भेद से ओठन के दो प्रकार—भूतन्दुल-जो चावलों को थोड़ा भूनकर भात बनाया जाता है । अमृधतन्दुल-जो चावलों को बिना भूने बनाया जाता है । यह सब शालि एवं षष्टिक धान्यों के खाद्य हैं जो प्रायः रोगियों के लिये उपयोगी हैं । इनके भात एवं रोटियां आदि स्वस्थों के लिये बनते हैं । क्षीरोपसाधित दूध से पकाए चावल आदि जैसे खीर आदि । सूप—दालों-द्विदलों के खाद्य जो तरल रहते हैं वे सूप यूप तथा नूस कहे जाते हैं । यह पतली दाल है । परन्तु मूली आदि के पके रसों को भी 'यूप' कहते हैं । कृशरा—शालि अथवा षष्टिक धान्य तथा द्विदल के योग से बना खाद्य-खिचड़ी आदि । शाक-पत्र पुष्प फल आदि वे पदार्थ जिनके शाक बनाए जाते हैं । स्विब- उबाला हुआ निष्पीडित-जिसका रस निचोड़ दिया गया है । स्नेह संस्कृत स्नेहघृत तैल आदि में छोँका हुआ ॥३४०॥

१ सोंठ और पिप्पली का योग—षडंग परिभाषा के अनुसार होना चाहिये । यथा—

‘यदस्मृ श्रुतशीतासु षडंगादि प्रयुज्यते ।

कषमात्रं ततो द्रव्यं साधयेत्प्रास्थिकेऽन्मसि ॥’

अ० ४६ ] २७

सूत्रस्थानम्

२०६

स्वेदाग्निजननी लब्ध्वी दीपनी वस्तिशोधनी ॥३४१॥

क्षुतृद्धशम्लानिहरी पेया बातानुलोमनी ।

पेया—स्वेद एवं अग्निजनक, लघु, अग्निदीपक, वस्तिशोधक (मूत्रल), क्षुतृ (भूख), प्यास, श्रम और ग्लानि नाशक, एवं वायु का अनुलोमन करती है ॥३४१॥

विलेपी तर्पणी हृद्या ग्राहिणी१ बलवर्धनी ॥३४२॥

पथ्या स्वादुरसा लब्ध्वी दीपनी क्षुर्त्तृषापहा ।

विलेपी—(पेया से सान्द्र-चाटने योग्य)—तर्पणी (वृत्तिकारक), हृद्या (हृदय के लिये प्रिय), संग्राही, बलवर्धक, पथ्या (हितकारी), मधुररस, लघु, अग्निदीपक, भूख-प्यासनाशक है ॥

हृद्या संतर्पणी वृष्या वृंहणी बलवर्धनी ॥३४३॥

शाकमांसफलैर्युक्ता यवाग्बोऽस्म्लारुच दुर्जराः ।

यवाग्—हृदय के लिये प्रिय, सन्तर्पण (वृत्तिकारक) वृष्य (शुक्ल), बलवर्धक है । शाकमांस या फल के साथ पकाने से यवाग् दुर्जर हो जाती है ॥३४३॥

सिक्थैरिंरहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता ॥३४४॥

विलेपी बहुसिक्था स्याद्यवाग्पूर्विरलद्रवा ।

यवाग् के भेद—

मण्ड—सिक्थ से रहित होता है, पेया—सिक्थ के साथ होती है । २विलेपी—बहुत सिक्थवाली है, ३यवाग्—विरल-द्रव होती है ॥३४४॥

विष्टम्भी पायसो बल्यो भेदःकफकरो गुरुः ॥३४५॥

पायस—खीर विष्टम्भी, बलकारक, भेद-कफ को बढ़ाती है, और गुरु है ॥३४५॥

कफपित्तकरी बलया क्रुशराऽनिलनाशनी ।

क्रुशरा—(तिल चावल और माष से बनाई) कफपित्तकारक, बलकारक और वायुनाशक है ।

धौतस्तु विमलः शुद्धो मनोज्ञः सुरभिः ससः ॥३४६॥

१ कविराज हाराणचन्द्र जी—'हृद्या ग्राहिणी' आदि पाठ नहीं पढ़ते । इसके स्थान पर—'वस्तिसंशोधनी वृष्या ज्वरातिसार्योहिता' यह पढ़कर विलेपी के गुण मानते हैं ।

२ 'विलेपी बहुसिक्था स्यात्' के स्थान पर 'यवाग् बहुसिक्था स्यात्' यह पाठ करते हैं । यह चरक के अनुसार है । परिभाषा—'अन्नं पञ्चगुणे साध्यं विलेपी च चतुर्गुणे ।

मण्डरचतुर्दशगुणे यवाग् षड्गुणेऽस्मसि ॥'

इन्तुणाचार्य ने—'मण्डं पञ्चगुणे तोये, यवाग् षड्गुणे पन्नेत् । चतुर्दशगुणे पेया विलेपी तु चतुर्गुणे ॥' यह पाठ दिया है ।

३ चतुर्विधं भवेद् भक्तं जलदातप्रमाणतः । तत्र भक्तं विलेपी च यवाग् पेयया सह ॥

स्विन्नः सुप्रस्नृतस्तृणो विशद्वस्त्वोदनो लघुः ।

धौत (घुले हुए), निर्मल, शुद्ध, मनोहर, सुगन्धित और अच्छी तरह पके हुए और मांड निकाले हुए उष्ण चावल विशद और लघु होते हैं ॥३४६॥

अधौतोऽप्रस्नृतोऽस्विन्नः शीतश्चाप्योदनो गुरुः ॥३४७॥

अधौत (न घोये), अप्रस्नृत (बिना मण्ड निकाले)—अस्विन्न (अधपके) शीतल-ओदन (भात) गुरु होता है ॥३४७॥

लघुः सुगन्धिः कफहा विज्ञेयो भृष्टतण्डुलः ।

भृष्ट तण्डुल (भूने चावल) का भात—लघु, सुगन्धि, कफ-नाशक है ।

स्नेहैर्मांसैः फलैः कन्दैर्विदलाम्लैश्च संयुताः ॥३४८॥

गुरवो वृंहणा बलया ये च क्षीरोपसाधिताः ।

स्नेह (घृत आदि), मांस, फल, कन्द, वैदल (शामी धान्य-दालें आदि) और क्षीर (दूध) में बनाये आहार गुरु, वृंहण (देहवर्धक) और बलकारक हैं ॥३४८॥

सुस्विन्नो निस्तुपो भृष्ट ईषत् सूपो लघुहितः ॥३४९॥

सुस्विन्न (भली प्रकार से उबाला), निस्तुप (बिना उप के घुले), थोड़े भूने द्रिदलों का सूप (दालें), लघु तथा हितकारी है ।

स्विन्नं निष्पीडितं शार्कं हितं स्यात् स्नेहसंस्कृतम् ।

अस्विन्नं स्नेहहितमपीडितमतोऽन्यथा ॥३५०॥

स्विन्न (जोश दिया), निष्पीडित (निचोड़ा) और धी आदि स्नेह द्वारा संस्कृत शाक हितकारी है । अस्विन्न, स्नेहहित, एवं बिना निचोड़ा (जिसमें पानी रह गया) शाक अहितकारी है ।

मांसं स्वभावतो वृष्यं स्नेहनं बलवर्धनम् ।

स्नेहगोरसधान्याम्लफलाम्लकटुकैः सह ॥३५१॥

सिद्धं मांसं हितं बल्यं रोचनं वृंहणं गुरु ।

मांस—स्वभाव से ही वृष्य (शुक्ल), स्नेहन, बलवर्धक है । यही मांस स्नेह (घृत आदि), गोरस (दही आदि), धान्याम्ल (काझी आदि), फलाम्ल (अनार आदि), कटुक (मरिच आदि) के साथ सिद्ध करने पर, हितकारी, बलकारक, रोचक, वृंहण (देहवर्धक) और गुरु है ।

वि० मन्तभ्य—स्वभावतः कृत्वा मांस, सिद्धमांस—घृत, दही डालकर बनाया मांस—रसेदार मांस ॥३५१॥

तदेव गोरसादानं सुरभिद्रव्यसंस्कृतम् ॥३५२॥

विद्यापित्तकफोद्रेकी बलमांसानिर्बध्ननम् ।

यही मांस—पाक काल में सुगन्धित (स्वग-इलायची आदि) द्रव्यों के साथ मिलाकर, तथा उपयोग काल में गोरस१ (दही या छाछ) के साथ मिलाकर उपयोग करने पर, कफ-पित्त को बढ़ाता है, बल, मांस और अग्नि का वर्धक है ॥३५२॥

१ गोरस शब्द से—दही और तक्र का ही ग्रहण है, दूध का नहीं, क्योंकि दूध मांसरस के साथ नहीं मिलता । यथा—

२९०

परिष्क * स्थिरं स्तिर्धं हषणं प्रीणन गुरु ॥३५२॥

रोचनं वस्मेधाग्निमांसोजःशक्रवधेनम्‌ ।

शुष्क मांख को सिद्ध करने पर स्थिर (कठिन); स्निग्ध

हषण (इर्षोत्पादक), प्रीणन (पुष्टिकारक); गुरु, रोचक; बर

मेधा, अग्नि, मांस, ओज तथा शुक्रवधंक है । |

वि° मन्तव्य- परिशुष्क मांस-पकाया हुआ वहं म

जो सूखा हो जेसे- क्वाव आदि ।३५३॥

तदेवोस्छ्ष्टपिष्टस्वादुस्प्तमिति पाचकाः॥२५४॥।

इससे परिशुष्क मांस को पदिठे खूब अच्छो प्रकार स काट

कर, पीछे से पीस छया जाये, तो उल्लु्त पिष्ट होने के कारण

पाचक (रसोइये) इखको उत्लु्' मांख कदते ३ ।

वि० मन्तव्य--उल्टप्त-मांख को काट-काट कर लगदी

बना, नमक, मसाला मिखाकर पकाया गया ॥२५४॥

परिडष्कगुणेयक्तं वहो पक्वामतो घु ।

यह मांख आग पर पकाने से, परिशुष्क मांख के समान

गुणोंवाखा तथा ल्घु होता हे ।

तदेव शूछिकाप्रोतमङ्गारपरिपाचितम्‌ ॥३५५॥।

ज्ञेयं गुरुतरं किंचित्‌ प्रदिग्धं गुरुपाकतः ।

यही उल्लुप्त मांस--रलाकाओं पर क्गाकर--अंगारो

पर पकाने से (शूल्ाकृत मांस), तथा स्नेह (घत आदि); धान्याम्छ

तक्रादि से मिला होने पर, रारुपाक होने से ङु गुख्पाक दै

इसका नाम ^्रदिग्ध' हे ! |

वि° मन्तव्य- प्रदिग्ध-उल्लुप्त-मांस को लोह कौ शाका

सरिया प्र ल्पेटकर अंगारों पर पकाया जाता है । इसे “शल्य

मी कते हें ॥२५५॥ उस्म भितं पिष्टं प्रतप्रं कन्दुपाचितम्‌ ॥३५६॥

परिष्क प्रदिग्धं च. शल्य य्ान्यदीदशम्‌ |

सास यत्तं सिद्धं तद्रीर्योष्णं पित्तच्रद्‌ गुर्‌ ॥३५५॥।

` छष्वग्निदीपनं हयं रुच्यं दष्टिप्रसादनम्‌ |

अनुष्णवीय पित्तघ्नं मनोज्ञं घृतसाधितम्‌ ॥३५८॥

` उल्लुप्त (कद करके पीसा), भजित (भूना), पिष्ट (पीखाः,

प्रतप्त (गरम किया), कन्दुपाचित, परिशुष्क, प्रदिग्ध ओर

शल्य एवं इस प्रकार के अन्य सव मांस, तेर मे सिद्ध. क्रिये जाने पर--उष्णवीर्य, पित्तकारक ओर शुरु हँ | धी मे सिद्ध होने पर, ल्घु अग्निदीपक, दय के खयि प्रिय, खुचिकारक,

“शशाकाम्लपर्पिण्याककुरत्थर्वणामिषेः ।

करोरदधिमाषस्च प्रायः क्षीरं विरुध्यते ॥

१ परिदष्क मांस- _ `

“सिक्तं बहुघृते भष्टं मुहुरुष्णाम्बूना मदु |

जीरकाचैर्धनं मांसं परिुष्कं तदुच्यते 1 * क =

सुश्रतसिता

ल्यि सुन्दर होते है १ ॥३५६-२५८।।

प्रीणनः प्राणजननः रवासकासक्षयापह्‌ः ।

वातपित्तश्रमहरो ह्यो मांसरसः स्मृतः ॥३५९॥

स्मस्योजःस्वरहीनानां स्वरक्षीणक्षतोरसाम्‌।

भग्नविशष्टसन्धोनां कृश्चानामल्परेतसाम्‌ ॥३६०॥ आप्यायनः संहननः क्रदो बल्वधैनः

मांखरस-- प्रीणन (पुष्टिकारक); प्राणदायक, श्वासकासक्षय

नाशक, वाय-पित्त-श्रमहर, हदय के ल्वयि प्रिय हे | स्मृति, ओज

| अ० ४६ |

आंखों की ज्योति वदति है, अनुष्णवौय, पित्तनाशक, मन |

तथा स्वर से हीन पुरषो के च्यि दितकारी, उ्वरसे क्षीण, त

(उरःक्षत) रोगियों के व्यि उत्तम दे | भग्न एवं सन्धि भ्रंशे |

हितकारी है, कश एवं अल्पवीयवालों को स्वास्थ्यदायक दै | ।

आप्यायन (देह को बदृनेवाखा), संहनन (खन्धानकारफ) शक्र, ओज ओर बल को बद़ाता हे ।

वि° मन्तव्य-- मांस रस-रसेदार मांस का रस जो शोस्वा कहराता है, जेसे आद्‌ आदि का रस्छा। अथवा माषका

स्वरस || ३५९.,३६०॥ स दाडिमयुतो वृष्यः संस्कतो दोषनाशनः ॥३६१॥

प्रीणनः सवभूतानां विशेषान्मुखशोषिणाम्‌ ।

चुत्तष्णापहरः श्रेष्ठः सोरावः स्वादुशीतलः ॥३६२॥

|

2 1 ण क कि |

1

॥ ५ इस मांसरसः को अनार के साथ मिलाकर खाने से इष ,

(शुक्रवधंक) है, कटुरख (मरिच आदि) से संसृत होने पर

दोषनाशक त्रि दोषनाशक) दै । शओ्ओोरवा* (सौराव)- प्रीणन

(खव प्रणियों के ल्य पुष्टिकारक), खासकर सुखशोषवारे |

रोगियों के ल्ियि उत्तम हे। ख-प्याख को हटाता दहै । उत्तम |

तथा मधुर एवं शीतल हे |

वि० मन्तव्य- मांस रख को यदि छोक दिया जाता है

तथा उसमे अम्लता के ल्यि अनारदाना डाला जाता हं तौ बह|

“'सोराव” कहठाता हे ॥३६१,३६२॥

यन्मांससुदुधृतरसं न तत्‌ पुष्टिवखावहम्‌ ।

विष्टम्ि दज रूक्षं विरसं मारुतावहम्‌ ॥२६३॥

१ “मजजितं स्याद्‌ घृतादौ-तु पिष्ट्वा यत्साधितं पुनः ।

अपूपादिकृतं पिष्टं दधिदाडिमसौरभः ॥.

सिद्धः साञ्चैस्तथाजाजीसामुद्रमरिचैरपि ।

_भ्रंगारादिषु यत्पकवं प्रतप्तं तदुदाहूतम्‌ ॥ पिश्वितं सौरभैरिमप्तं कन्दुपकववं.मधुप्रभम्‌ ।

राजिकाकत्कछिप्तं च कन्दपाचितमुच्यते ॥

ह्गिदके परिक्षिप्तं शले निष्पीडितं ततः ।

सिक्त्वा सिक्त्वाम्बधाराभिः ` विधूमेऽगन प्रतापयेत्‌ ॥

फलाम्लेनापि यत्पक्वं शल्यं -तत्‌ सारभान्वितम्‌ ॥

. -२ कफ्नो दीपनो हे यः ` राद्धानां प्राणिनामपि ।

यह्‌ गुण शोरेके माने गएदहं1 - ~

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` कप

अश ४६ )

एवं बका नहीं दौता । विष्टम्भि, पचने म दुजेर रूक्ष, रख

रहित जीर वायु कारक दीता दै ॥६२॥

दीघ्राग्नीनां सदा पथ्यः खानिष्कस्तु परं गुरुः| लानिष्क (शुष्क मांस को पीसकर तयार किय) --अत्यन्त

र ३, इसलिये जिनकी अग्न दीस दती है, उन रोगिरयो क

ल्यि पथ्य है ॥ मसिः निरस्थि सुस्विन्नं पुनरेषदि पे षितम्‌ ॥३६४॥

पिपपलीशचुण्ठिमरिचगुडसर्पिः समन्वितम्‌ । ।

रेकथ्यं पाचयेत्‌ सम्यग्वेसवार इति स्मृतः ।३६५॥ वेसवारो गुरुःस्निग्धो बल्यो वातरुजापहः ।

वेसवार अस्थि रदित मांख को थोडा-सा जोश देकर शिला पर पष लेना चादिये । इसमें पिप्पली, मरिच, खोठ, गुड़ ओर

घी मिलाकर एक साथ पकाने से वेसखवार बनता दहै। यह वेखवार १-- गुर, स्निग्ध, वल्कारक ओर वातरोगनाशक है ॥ - कृफष्नो दीपनो ह्यः शुद्धानां रणिनामपि ॥२६६॥ ्ञयः पथ्यतमश्चैव सुदुगयूषः कृताकृतः । मङ्ग का यूष-कफनाशक, अग्निदीपक हृदय के छियि

प्रिय, वमन-विरेचन द्वारा शुद्ध ब्रणिरयों के ख्य हितकारी है। कृत-अङ्ृत ( क्वण मरिच दारा संस्कृत या असंस्कृत )--मूज्ञ युष--अतिशय पथ्य हे । वि० मन्तव्य-कृतयूष- जो मरिच हींग आदि से लोका हुआ हो, अङ्त-हछोका न गया हो ॥२६६॥ सतु दाडिममरद्रीकायुक्तः स्याद्रागषा (खा) उवः॥ रुचिष्यो छघुपाकश्च दोषाणां चाविरोध्त्‌। इस मूङ्ग के यूषमें दाडिम (अनार) ओर म॒द्धीका (किसमिस) को मिकाने से “रागषाडवः बनता है । यह राग लाडव.सचिकारक, ठधुपाक, वात आदि दोषों का थोड़ा पमन करता हे ॥३६७॥| ¦ मसूरमुद्‌गगोधूमङ्खरत्थर्वणेः कृतः ॥२६द कृफपित्ताविरोधी स्याद्रातञ्याधौ च शस्यते । मसूर; मूङ्ख, गहू, कुत्थी तथा नमक से तैयार किया । बक भूष--कफपित्त का अविरोधी तथा वायु सेग मे उत्तम हे। (मङ्ग ओर मसूर का यूष वायु मे, मसूर, मूङ्ग, गहू, इन श यूष पित्तनाशक, ओर पाचों का यूष कफनाशक है) ढोकादाडिभेयुक्त; स चाप्युक्तोऽनिलार्दिते ॥३६९॥

चनो दीपनो हयो खघुपाक्युपदिश्यते ।

इ पचक यूष मं मृद्वीका ओर अनार का योग होने से, |

| ए पादक हो जाता है। रुचिकारक, अग्निदीपक # 1171 ~

  • रीणनः सर्वेभूतानां विरोषान्मुशोषिणाम्‌' ^" कविराज हराणचन््र जीं ते माने है । -- वेशवार के

सूत्रस्थानम्‌

उस साख मे सेरस निकाल ल्या, वह मांस-पुष्ि

ई. मरिवाजाजिसामुद्रैः युक्तः तिल्खडो भवेत्‌ ॥

पटोटनिम्बयुपौ तु कफमेदोविशीपिणौ ॥३७०॥ पित्तघ्नो दीपनौ हयो छमिक्षठञ्चरापहौ । पटोल (परवल) जर नीम का यूप-कफ ओर मेद्‌ को ` सुखात हे । पित्तनाशक, अग्निदीपक, हृदय के लि प्रिय, कृमि-कुष्ट-ज्वरनाशक दै ॥२३७०॥ शधासकासप्रतिरयायप्रसेकारो चकञ्वरान्‌ ॥३१॥ हन्ति मूखकयुषस्तु कृफमेदोगलगप्रहान्‌ । मलक यूष ( वाल-शुष्क मूली का यूष )--श्वास, कास, प्रतिश्याय, प्रसेक (खालाखाव), अरोचक, उवरनाशक दै। एवं कफ-मेद ओर गले के रोगों को नष्ट करता है ॥३७१॥ कुरत्ययुषोऽनिख्हा शासपीनसनाञ्ञनः ॥३७२॥ तूणीप्रतूणीकासारसगुल्ममेदःकफापहः | कुर्यी का यूष--वायुनाशक, श्वास-पीनस नाशक है | तूणी-प्रतूणी, का, अश्म, गुल्म, मेद ओर कफनाशक है ॥

दाडिमामशख्केयुषो हयः संशमनो खयुः ॥३७३॥ ` प्राणाभ्िजननो मूच्छामेदोऽनो बात पित्तजित्‌।

अनार ओर आंबले का यूष--हृदय के ल्यि प्रिय, ` संश￾मन (विना वमन ओर विना विरेचन के वहीं पर स्थित दोषों का शमन करता है), ल्घु दै । प्राण-अग्निजनक, मूच्छा-मेद￾नाशक पित्त वायु को नष्ट करता हे ॥२७३॥

मुद्‌गामख्कयषस्तु ग्राही पित्तकफे हितः ॥३७४॥

मूङ्ग ओर आवे का यूष- संग्राह्य, पित्त ओर कफरोग में हितकारी हे ॥२७४॥ |

यवकोखद्ख्त्थानां युषः कण्ठ योऽनिरापहः। यव (जौ), कोठ (वेर) ओर ऊती का यूषं--गले के व्यि हितकारी ओर वायुनाशक ह ॥३७४॥। ध सवेधान्यङ्ृतस्तद्द्‌जरंहणः प्राणवधेनः ॥३७५॥

सत्र धान्यो (शक धार्यो एवं शमीधान्यो) से बनाया यूष

बृंहण (देहवधंक) है । इसीको (नवपुष्टि यूष कहते ह ॥२७५॥ खडकाम्बङ्कि हयौ तथा वातकफे दितौ !. खड ओर काम्बरल्कि-यूष-हदय के व्यि प्रिथ, वायु-कफं

मे हितकारी दै।- 3 5

१ खड्यूषदो प्रकारकाहै-- `

_ एक-सतक्रशमीधाव्य ओर दुसरा-सतक्र शाक ॥ ` _- __

(सतक्राणि शमीधान्यानि स्तिधानि संग्राहकाणि खलाति 1“ ~ - “कपित्थ तक्र-चांगेरी मरिचाजाजि-चित्रकेः 1 ;: .: सुपक्वः खडयूषोऽयं तथा कास्किकोऽपरः ॥। `: दध्यम्ल-रवण-स्नेह-तिल-माष-समन्वितः.]1”? ‰ ~

परे पृतं पचेद्‌ धीमान्‌ भद्रकोत्यापिते ततः ॥ > ~ = `

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९१२

बल्यः कफानिरो हन्ति दाडिमाम्छोऽग्निदीपनः ।३७६।

दध्यस्छः कफछद्रूल्यः स्निग्धो वातहरो गुरः ।

तक्राम्छः पित्तकृत्‌ प्रोक्तो विषरक्प्रदूषणः ॥ ३७७]

अनार के द्वारा खदा किया यूष-बकारक, कफ-वायु- नाशक दै। दही से खट्वा यूष कफ़कारक, बलकारक, रिनग्ध,

वायुनाशक ओर गुरु है। तक्रसे खहा किया--पित्तकारक)

विषरक्तं प्रदूषक हे ॥२३७६,२७७॥

खडाः खडयवाग्वश्च षा (खा) उवाः पानकानि च)

एवमादीनि चान्यानि क्रियन्ते वेयवाक्यतः ॥३७८॥

खड, खडयवागू , षाडव १, पानक (इमली द्राक्षादि से

बनाये) आदि वस्तुयेँ वेद्य की आज्ञा से बनाई जाती है ।३७८।

` अस्नेहख्वणं सथमकृतं कटकेर्विना

विज्ञेयं खवणस्नेहकटकेः संयुतं कृतम्‌ ॥३७९॥।

अक्त (असंस्कृत)- स्नेह (घी), नमक ओर कटु (शुण्ठी)

आदि के बिना ख असंस्कृत हँ | नमक, स्नेह ओर शुण्ठी के साथ संस्कृत (कृत यूष) हे ॥ ३७६॥ अथ गोरसधान्याम्छफलम्छेरम्कितं च यत्‌ | यथोत्तरं ख्यु दितं सस्छृतासंस्छृतं रसम्‌ ॥२८०॥

गोरस (दही या छाछ); धान्याम्छ, फलाम्छ, इनके साथ मिखा मांखरस, संस्कृत को अपेक्षा असंस्कृत (मांसरस) अधिक लघु एवं हितकारी हे । गोरस से संस्कृत की अपेक्षा धान्याम्छ धान्याम्ड कौ अपेक्षा फरम्क अधिक लधु एवं हितकारी है ॥ दधिमत्स्वम्छसिद्धस्तु यूषः काम्बलिकः स्मतः । काम्बल्कि यूष का लक्षण-दही-मछटियाँं अर अम्छ (खहा) दारा घिद्ध यूष-- कम्बलिक यूप्र- दै । तिख्पिण्याकविकृतिः शाष्कशांकं विरूढकम्‌ ।३८१॥ सिण्डाकौ च गुरूणि स्युः कफपित्तकराणि च।

तिल्-विकृति (मोदकादि), पिण्याकं विकृति, शुष्क शाक विरूढ (अंङुरित धान्य); सिण्डाकी (मी आदि शकों को कुछ उवाट्कर-कृूट्कर दाख्चीनी इलायची सुगन्धित द्रव्यो के साथ मिखाकर वटक बनाने से सिण्डाकी होती दै), तथा कफ-पित्तकारक हे ॥३८१॥

. . तद्रस्च वटकान्याहूविदाहीति गुरूणि च ॥३८२॥ वटक--उसी प्रकार गुरु ओर विदाही है ॥३८२॥ ङ्घवो छ हणा वृष्या ह्या रोचनदीपनाः। ~ ` ठष्णामूच्छरसच्छदिश्रमध्ना रागषाडवाः ॥२८३॥

काम्बलिकः यूषः-- ““दधिमस्त्वर्रषिदधस्तु यूषः काम्बलिकः स्मृतः। रमैः॥ संयोज्य मथितः स्वच्छ एष काम्बकिको भवेत्‌ ॥” ` १ षाडव्र-^स्पष्टाम्कमधुरोऽस्पष्टकषायख्वणोषणः । भतिक्तः षाडवःकोचकपित्याचुपव हितः ॥” ~

सुश्रुतसंहिता

गुस

"रागष।डव--लधुः वरण ( देहवधक ), वृष्य, हृद्य के ठि प्रिय, रोचक, अग्नि दीपकः वृष्णा-मूरछा-भरम वमन ओरं |

श्रम के नाशक हैँ ॥२८३॥

रसाला छ्रंहणौ बल्या स्नग्धा वष्या च रोचनी । ररखाला--चृंहण (देहवधक); वलकारक, स्निग्ध, बृष्य रोचक है ।

स्नेहनं गुडसंयुक्तं हयं दध्यनिरखापहम्‌ ३८१] गुडयुक्त ददी-स्तेहन, हृदय के चि प्रिय ओर वायु नाश्चक है ॥ ३८४] सक्तवः सर्पिषाऽभ्यक्ताः गीतवारिपरिष्डताः ] नातिद्रवा नातिसान्द्रा मन्थ इद्युपदिर्यते ॥३८५॥

  • मन्थः सदयोबख्करः पिपासाश्रमना्नः |

मन्थ-- जो के सत्त कोषौ मे मख्लकर, खण्डे पानीमेन तो बहुत पतल ओर न बहुत सान्द्र घने से मन्थ बनता है। यह मन्थ-- सद्यः (तुरन्त) बलकारक, पिपासा-भमनाशक है ॥ साम्छस्नेहगडो मच्रकृच्छोदावतेनाश्ञनः ॥३८६। रकरेणुरसद्राक्षायुक्तः पित्तविकारनुत्‌। ्राक्षामधूदकयुतः कफरोगनिबदहेणः ॥ २८७1

वगेत्रयेणोपहितो मर्दोषानुरोमनः

यही मन्थ-अम्न (खद्ाई), स्नेह ओर गुड़ के साथ मिल

कर-मघ्रकृच्छ, उदावत्त (वातोदावत्त आदि) नाशक दै।

| अ० ४६ |

शकरा, इष्षुरख ओर द्राक्षा से मिला मन्थ--पित्तरोग नाशक |

्राश्चा ओर मधूक (महूवे) के साथ संयुक्त मन्थ-कफ रोग कौ

नष्ट करता है । तृतीयवगं (अम्-स्तेह ओर गुड) से मिला मन्थ￾मल-मूत्र के दोष (अवरोध) को नष्ट करता हं ॥६८६.३८७॥

गोडमस्लमनम्ं वा पानकं गरु मूत्रम्‌ ॥२८८॥

तदेव खण्डमद्रीका्चकरासहितं पुनः| `

साम्लं सतीदणं सहिमं पानक.स्यान्निरत्ययम्‌ ॥३८९॥

गुड़ से बना--खद्रा या बिना अम्ढ के-पानक (शबत)

गुरु ओर मन्रल रै । यदि इस गुड के शबत में-- खाण्ड)

मृद्रीका, चकरा, अम्क ( इमली आदि ), तीदण (मस्चिादि)

दिम (कषर), मिला दिया जाये तो अवयन्तश्रषठ हो जाता दै ॥

१ रागषाडव-- सितार्चकसिन्धूत्थः सवक्षाम्लपरूषकः ।

जम्बूफल रसैयुक्तो रागो राजिकया कृतः ॥

२ रसाङा-अर्द्धाढकः सुचिरपय्युषितस्य दध्न ।

खण्डस्य षोडरा पलानि शरिप्रभस्य ।

सपिः पठं मधु पकं मरिचं दविकषम्‌

र॒ण्डयाः पलार्ध॑मपि चाद्धं परु विडस्य ॥

सूक्ष्मे पटे सुविमले मरदुपाणिषष्टा- स कपूरधूकिसुरभीङृतपात्रसंस्था ॥

एषा वृकोदऱृता सरसा रसाला ॥

अ० ४६ ]

सूत्रस्थानम्

२१३ :

मादीकं तु श्रमहरं मूर्च्छादाहृत्वापहम् । परुषकाणां कोलानां हृद्यं विष्टुभिं पानकम् ॥३६०॥ मृदीका (किसमिस) से बना शर्बत—श्रमनाशक, मूर्च्छा, दाह, तृपानाशक है। फालसे और बेरों का बना शर्बत—हृदय के लिये प्रिय और विष्टुभि होता है ॥३६०॥ द्रव्यसंयोगसंस्कारं ज्ञात्वा मात्रां च सर्वतः । पानकानां यथायोगं गुरुलाघवमादिशेत् ॥३६१॥ इति कृतान्नवर्गः । सब पानकों में द्रव्यसंयोग तथा संस्कार एवं मात्रा को जानकर—पानकों का गुरुलाघव समझना चाहिये। यह कृता- न्नवर्ग कह दिया ॥३६१॥

अथ भक्ष्यवर्गः ।

वक्ष्याम्यतः परं भक्ष्यान् रसवीर्यविपाकतः । इसके आगे भक्ष्य (लड्डू आदि) वस्तुओं का रस, वीर्य, विपाक कहते हैं ।

भक्ष्याः क्षीरकृता बलया वृष्या हृद्याः सुगन्धितः ॥३६२॥ अदाहितः पुष्टिकरा दीपनाः पित्तनाशनाः । गेहूँ आदि के आटे को दूध में सिद्ध करके बनाये भक्ष्य बलकारक, शुक्लवर्धक, हृदय के लिये प्रिय सुगन्धित, अदाही (ईषद् दाह युक्त), पुष्टिकारक, अग्निदीपक, और पित्तनाशक हैं। वि० मन्तव्य—भक्ष्य वे कहे जाते हैं जो स्वस्थों का आहार हैं। इस प्रकरण में उन्हों का वर्णन किया गया है ॥ तेषां प्राणकरा हृद्या घृतपूराः कफावहाः ॥३६३॥

वातपित्तहारा वृष्या गुरवो रक्तमांसलाः । घृतपूर१—प्राणकारक, हृदय के लिये प्रिय, कफकारक, वात-पित्तनाशक, वृष्य (शुक्ल), गुरु, रक्त और मांस के वर्धक हैं ॥३६३॥

बृंहणा गौडिका भक्ष्या गुरवोऽनिलनाशनाः ॥३६४॥ अदाहितः पित्तहराः शुक्लाः कफवर्धनाः । गौडिक (गुड़ प्रधान) भक्ष्य—बृंहण (देहवर्धक) भक्ष्य, गुरु, वायुनाशक, अदाहि, पित्तनाशक, शुक्ल और कफवर्धक हैं।

मधुशीर्षकसंयावाः पूपा ये ते विशेषतः ॥३६५॥ गुरवो बृंहणाश्चैव मोदकास्तु सुदुर्जराः । रोचनो दीपनः स्वयः पिप्तान्नः पवनापहः ॥३६६॥ मधुमस्तक (मधुशीर्षक), संयाव२ पूपा—गुरु, देहवर्धक है। मोदक (लड्डू)—दुर्जर हैं, रोचन, अग्निदीपक, स्वरभङ्ग के लिये हितकारी, पित्तनाशक, वायु को दूर करते हैं ३६५, ३६६

१ घृतपूर—“महिता समिताः क्षीरा नालिकेरसितादिभिः । अवगाह्य घृते पवने घृतपूरौऽयमुच्यते ॥” २ संयाव—“समितां मधुदुर्घेन माधुर्यत्वात् श्रुभाननः । पचैद् घृतोत्तरे भाण्डे क्षिपेद् भाण्डे नवे ततः । संयावोऽदी यतुर्वृणैः खण्डैलमरिचार्द्रकैः ॥”

गुरुर्मृष्टतरश्चैव सट्टकः प्राणवर्धनः । हृद्याः सुगन्धिमधुरः स्निग्धः कफकरो गुरुः ॥३६७॥ सट्टक१—गुरु, अतिमिष्ठ और प्राणवर्धक हैं। हृदय के लिये प्रिय, सुगन्धित, मधुर, स्निग्ध, कफकारक गुरु हैं ॥३६७॥ वातापहस्तुमिकरो बल्यो विष्यन्दु उच्यते । बृंहणा वातपित्तघ्ना भक्ष्या बलयास्तु सामिताः ॥३६८॥ विष्यन्दि२—वायुनाशक, तृप्तिकारक, बलकारक हैं। सामित (गेहूँ के आटे से बने भक्ष्य)—बृंहण (देहवर्धक), वात- पित्तनाशक, बलकारक हैं ॥३६८॥ हृद्याः पथ्यतमास्तेषां लघवः फेनकादयः । मुदुगादिवेसवाराणां पूर्णा विष्टुभिन्मो मताः ॥३६९॥ फेनकादि३—हृदय के लिये प्रिय, अतिशय पथ्यकारक और लघु हैं। मूत्र आदि धान्य तथा वेसवार से भरे पूप (रोटी, गुडिया, कचौरी आदि) विष्टुभि होते हैं ॥३६९॥ वेसवारैः सपिशितैः संपूर्णा गुरुबृंहणाः । पाल्लाः श्लेष्मजननाः, शष्कुल्यः कफपित्तलाः ॥४००॥ मांसयुक्त वेसवार से भरे पूप-गुरु और देहवर्धक हैं। पाल्ल (तिल पिष्ट एवं गुड़ से बने) कफजनक हैं, शष्कुली (पूरी) कफ- पित्तकारक हैं ॥४००॥ वीर्योष्णाः पौष्टिका भक्ष्याः कफपित्तप्रकोपणाः । विदाहिन्मो नातिबला गुरवश्च विशेषतः ॥४०१॥ पौष्टिक (उड़द की पिठी से बने)—भक्ष्य उष्णवीर्य, कफ- पित्तप्रकोपक, विदाही, ईषद् बल कारक, और खासकर गुरु हैं ॥ वैदला लघवो भक्ष्याः कषायाः सूष्टमास्ताः । विष्टुभिन्मः पित्तसमाः श्लेष्मघ्ना भिन्नवचंसः ॥४०२॥ बलया वृष्यास्तु गुरवो विज्ञेया माषसाधिताः । वैदल (दाल आदि से बने) भक्ष्य—लघुकषायरस, वायु को प्रवृत्त करते हैं। उड़द से बने भक्ष्य—विष्टुभि, पित्त के समान, कफनाशक, मलप्रवर्त्तक (विरेचक), बलकारक, वृष्य एवं गुरु होते हैं ॥४०२॥ कूर्चिकाविकृता भक्ष्या गुरवो नातिपित्तलाः ॥४०३॥ (फटे दूध के जमने से उत्पन्न कूर्चिका से बने) भक्ष्य-गुरु और ईषद् पित्तकारक हैं ॥४०३॥ १ सट्टक—“लवंग व्योषखण्डैस्तु दधि निर्मध्य गालितम् । दाडिर्म बीजसंयुक्तं चन्द्रचूर्णाबिचूर्णितम् । सट्टकं सुप्रमोदाख्यं नलादिभिर्बदाहृतम् ॥” २ विष्यन्द—“आमं गोधूमवृणं च सपिशीरगुणान्वितम् । नातिसान्द्रो नातिघनो विष्यन्दो नाम नामतः ॥” ३ फेनका—“विमर्घ विमलां शुक्लां समितां नातिसार्कराम् । संवेष्टनाय गर्भार्थं खरपाकं घृते पचैत् । फेनक फेनसंकाशं सम्पूर्णं शशिसन्निभम् ॥”

२९४ -

विरूढक_क्ता भ्या गुरबोऽनिख्पित्तखाः ।

विदाहोकक्छेचजनना रूक्षा रष्प्रदूषणा : ॥ ४०४

विरूढक (अंकरुरित) धान्यो से बनाये मद्य गुरुः वायु

पित्तकारक हँ । विदाही, उक्छेश (जीमचलाना); रूक्ष हैं

दृष्टि (आंखों) को दूषित करते हे ।[४०४]।

हयाः सुगन्धिनो मद्या ख्घवो घृतपाचिताः

वातपित्तहरा बल्या वणदृष्टिप्रसाद नाः ॥४०५॥

घी मे तले (संस्कृत) मद्य-हृदय के लिय प्रिय, सुगन्धित,

ल्घु, वात-पित्तनाशक, वलकारक, वण-एवं दृष्टि को स्वच्छ

` करते हे |४०५॥

विदाहिनस्तेरश्ता गुरवः कटपाकिनः

उष्णा मारुतरष्टिघनाः पित्तलास्त्वक्प्रदूषणाः ॥४०६।

तैर मे संस्कृत मद्य-- विदाही, गुरु, कट विपाक, उष्ण

वायुनाद्चक, दष्ट को हानि पर्हैचानेवाटठे, पित्तकारक, त्वचा को

दूषित करनेवाले हें ॥४०६॥

फलमासेल्लविकृतितिख्माषोपसंस्कृताः।

मद्या बल्याश्च गुरवो चर हणा हृदयग्रियाः ४०७]

फल्वग, मांखवग, इत्तुविकार, तिल, माष से संस्कृत मक्ष

बल्कारकर, गुरु, बृंहण (देहवधक) ओर हृदय के द्यि प्रिय हे |

कृपाङाङ्गारपक्तास्तु ख्यवो वातकोपनाः ।

सुपक्रास्तनवञ्चेव भूयिष्ठं रघवो मताः ॥४०८]

कार (मिद्धी के ठीकरे) पर पकाये भद्य- अतिशय रघु

जर वायुकोपक हँ । अच्छी प्रकार से पके भक््य-पतले-फुरके

सूच्चम ओर कषु हं ॥४०८]।

सङ्किखाटादयो सद्या गुरवः कफवधनाः।

कुल्माषा वातला रूक्षा गुरवो भिन्नवचंसः ॥४०€॥ उदावतेहरो वास्यः कासपीनसमेहरुत्‌ । धानोदटुम्बास्तु ख्घश्रः कफमेदोविरोषणाः ॥ ^१०॥

किखार (क्षीर कूर्चिका पिण्ड) के संयोग से बने भ

गुरु ओर कफवधक हं । कुलमाप--वायुक्रारक, रूक्ष, गुर ओर

मठ विरेचक ह । बाटिया--उदावत्तनाशक, कास-पीनख एवं

प्रमेहं के नाशक ई । धान (मूने जा), उलु्वा (होटे)-ल्घु,. कफ

एवं मेद्‌ को शुष्क करते हं ॥४०६,४१०॥

शक्तवो जंहणा व्रृष्यास्ठष्णापित्तकफापहाः

पीताः सद्योवल्करा भेदिनः पवनापहाः ॥४११॥ शक्तु--(-जो आदि ऊ सतत्‌ )देदवधक, इष्य (शुक्रवधंक).

वृष्णा-पित्त ओर कफनाशक दे । पीने पर तरन्त व्र क्ति आती `

मेदि (विरेचक) ओर वायु को नष्ट करते हं ॥४११॥ गुवीं पिण्डी खराऽत्यथ छष्वी सैव विपयंयात्‌।

शक्तूनामाश्च जीयत मृदुत्वादवरहिका॥४१२॥

अत्यन्तः खर (कठिन) पिण्डी - गुर होती ह; -विपयय से

सुश्रतसंहिता

(मृदु) पिण्डी ल्घु ह| सत्तओं की अवलेषिका कोमल हनने से

शीघ्र जीण हो जाती हे ॥४१२॥

लाजार्यंतिसारघ्रा दीपनाः कफनाशनाः

बल्याः कषायमधुरा छषवस्तृण्मखापहाः ॥४१३॥ छाज- (मनने पर चिक धान्य) छर्दि (बमन) ओर अति. खार नाशक, अग्नि दीपक, कफ़ को नष्ट कुरते हं; बलकाख कषाय, मधुर, तृषा ओर मर के नाशक हं ॥४१३॥

तट्यर्दिदाहवमांर्तिनुदस्तरसक्तवो सताः

रक्तपित्तहराश्चेव दाहञ्वरवि नाशनाः ॥४१४॥

लाजखक्तु--तृषा, छर्दि, दाह, घमातिं (ग्म का दुःख)

को नष्ट करते हें | रक्तपित्तनाशक, दाह ज्वरनाशक ह [४१४

पृथुका गुरवः स्निग्धा चर हणाः कफ्वधनाः |

बल्याः सक्षीरभाधात्त वातघ्ना भिन्नवचसः॥४१५॥

पृथुक (चोढे- चूडा गीढे शाछि धान्यां के योड़ासा भून

[ अ०५६

कर ऊखल में कूटने से बनये)- गुर, स्निग्ध देहवधक ओर

कफ़ को वदति हैँ बल कारकहं। दूधमें मिाकर खाने से

वायुनाशक ओर मल का रेचन करते हे .॥४१५॥

` संधानकृत्‌ पिष्टमामं ताण्डुरं कूमिमेदत्‌ ।

धान्यपिष्ट--आम (नया-अपक्व) पीखा धान्य भग्न की

जोडता दै । तण्डल-कृमि ओर प्रमेह को नष्ट करता दै* ।

सुदुजेरः स्वादुरसो च हणस्तण्डरो नवः ॥४१६॥

नया चावल (तण्डुल)- पचने मे दुज॑र, मधुररख ओर

देहवधक हे ||४१६॥ सन्धानकन्मेहहरः पुराणस्तण्डुरः स्खतः

पुराना चावल--मग्न अंग को जोड़ता हे प्रमेह नाराक हे |

यदाकारणमासादयय भोक्तणां छन्दतोऽपि वा ॥४६५॥

मच्यादयः प्रकल्प्या स्युस्तदा सुनिपुणो भिषक्‌ ।

द्रव्यसंयोगसंस्कारविकारान्‌ समवेदय च ।

अनेक द्रव्यो निखोच्छाख्तस्तान्‌ विनिर्दिशेत्‌ ॥४१८॥

इति भक्यवगः।

जिस कारण (दोष रोग प्रतिकार रूपी कारण) से अथव

मोक्ता (खानेवाखों की) इच्छानुसार, भ्य आदि बनाये

हो, उख- मद्य द्रव्य के अनेक द्रव्य उस्त्ति कारण हने ¢

व्य, संयोग, संस्कार एवं विकारो (परिव्त॑नो) को श।ख द

से विचारकर इन भ्य दर्यो के गुणों को कहना चाहिये ॥

अतः सवोनुपानान्युपदेचयामः।

इसके आगे संम्पूणं अनुपानों को (अनन के पीछे पिये जने

वाटी वस्तुओं को) कते ह ° ।

१ यह पाठ कविराज हाराणचन्द्र जी ने नहीं पढ़ा ।

अनुपान का गुण-- ट =.

दोषवद्‌ गुरं वा भुक्तमतिमात्रम्थापि वा । यथोक्तेनानपानेन सुखमन्नं अजीय्यति ॥

अ० ४६]

सूत्रस्थानम्

२१५

अस्तेन केचिद्विहता मनुष्या माधुर्ययोगे प्रणयीभवन्ति । तथाऽम्लयोगे मधुरेण तुप्रास्तेषां यथेष्टं प्रवदन्ति पथ्यम् ॥ अम्लरस से उबकाये (उद्विग्न) हुए बहुत से मनुष्य-मधु- रस के उपयोग से सुखी हो जाते हैं । इसी प्रकार मधुररस से तृप्त मनुष्य अम्लरस के योग में दुःखी होते हैं, यही इनकी इच्छानुसार पथ्य है ॥४१६॥

श्रीतोणतोयासवमद्युषफलाम्लधान्याम्लपथोरसानाम् । यस्यानुपानं तु हितं भवेद्यत्तस्मै प्रदेयं विह मात्रया तत् ॥ व्याधिं च कालं च विभाष्य धीरै—

द्वैत्याणि भोज्यानि च तानि तानि ।

सर्वानुपानेषु वरं वदन्ति

मेध्यं यदस्मभः शुचिभाजनस्थम् ॥४२१॥

अनुपान द्रव्य—

शीत जल, उष्ण जल, आसव (द्रव प्रधान) द्रव्य प्रधान- मद्य, यूष, फलाम्ल, धान्याम्ल, (कांजी), पय (दूध), रस (मांस- रस), जो अनुपान हितकारी हो, वही उस पुरुष को उचित मात्रा में देना चाहिये । व्याधि (ब्रह्म-ज्वरादि), काल (आव- स्थिक और आर्चव), इनको विशेष रूप से जानकर, द्रव्य (तैलादि), भोज्य (रक्तशलि आदि), इन सब को तर्क द्वारा जानकर अनुपान देना चाहिये ।

सब अनुपानों में श्रेष्ठ अनुपान—पवित्र पात्र में रक्खा, १मेध्य (अन्तरिक्ष) का जल है ॥४२०,४२१॥

लोकस्य जन्मप्रभृति प्रशस्तं

तोयात्मकाः सर्वरसाश्च दृष्टाः ।

सङ्क्षेप एषोऽभिहितोऽनुपाने-

व्रतः परं विस्तरतोऽभिधास्ये ॥४२२॥

कारण—संसार के (मनुष्यों के) जन्मकाल से प्रारम्भ करके यही जल उत्तम है, सब रस जलमय ही हैं । यह अनुपान संक्षेप में कह दिया । इसके आगे विस्तार से कहेंगे ॥४२२॥

उष्णोदकानुपानं तु स्नेहानामथ शस्यते ।

स्यते भरुलातकस्नेहात् स्नेहात्तौवरकात्तथा ॥४२३॥

अनुपानं वदन्त्येके तैले यूषाम्लकाञ्चिकम् ।

श्रीतोदकं माश्रिकस्य पिष्टान्नस्य च सर्वशः ॥४२४॥

दधिपायसमद्यातिविषजुष्टे तथैव च ।

केचित् पिष्टमयस्याहुर्नुपानं सुखोदकम् ॥४२५॥

पयो मांसरसो वाऽपि शालिमुद्गादिभोजिनाम् ।

युद्धाध्वातपसंतापविषमद्यरुजासु च ॥४२६॥

माषादेरनुपानं तु धान्याम्लं दधिमस्तु वा ।

मद्यं मद्योचितानां तु सर्वमासेषु पूजितम् ॥४२७॥

१ मेध्य का अर्थ—कविराज हाराणचन्द्रजी ने पवित्र किया है । इस दृष्टि से पवित्र जल-उत्तम पात्र में रखना श्रेष्ठ है ।

अमद्यपानामुदकं फलाम्लं वा प्रशस्यते ।

क्षीरं घर्माध्वभाष्यच्छीकलान्तानामस्तुतोपमम् ॥४२८॥

सुरा कृशानां स्थूलानामनुपानं मधुदकम् ।

निरामयानां चित्रं तु सुक्तमध्ये प्रकीर्तितम् ॥४२९॥

स्निग्धघोषणं मारुते पथ्यं कफे रूक्षोष्णमिष्यते ।

अनुपानं हितं चापि पित्तो मधुरजीतलम् ॥४३०॥

हितं शोणितपित्तिभ्यः क्षीरमिखुरसस्तथा ।

अर्कशैलुशिरीषाणामासवास्तु विषातिषु ॥४३१॥

मिलावे और तुवरक१ स्नेह को छोड़कर—शेष सब स्नेहों के लिये, उष्णोदक (गरम पानी) का अनुपान प्रशस्त है । कुछ आचार्यों का विचार है कि-उष्णकाल में तेल का अनुपान यूष, शीतकाल में तेल का अनुपान कांजी है । माश्रिक (मधु) और पिष्टान्न (तण्डुल पिष्ट) का अनुपान शीतल जल है । दधि, पायस (खीर), मद्यात्ति (मद्य विदाह), विष जुष्ट (विष व्यामोह में)—अनुपान शीतल जल है । पिष्टान्न का अनुपान कई आचार्य ईषदुष्ण पानी मानते हैं । शालि (हेमन्त धान्य), मूळ आदि खानेवालों के लिये, युद्ध, अन्ध (माग) आतप (धूर), सन्ताप (मनः सन्ताप, बेचैनी), विष, मद्य को पीड़ा में—दूध या मांसरस का अनुपान उचित है । माष (उद्वद) आदि का अनु- पान—धान्याम्ल (कांजी), दधि, या मस्तु है । मद्य पीनेवालों के लिये तथा सब मांसों में मद्य अनुपान है । जो मद्य नहीं पीते, उनके लिये पानी और फलाम्लों का अनुपान उत्तम है । घर्म (गरमी), अन्ध (माग), माष्य (जोर से बोलना), स्त्री संभोग से थके पुरुषों के लिये सुरा और स्थूल पुरुषों के लिये, दूध अमृत के समान है । कृश पुरुषों के लिये सुरा और स्थूल पुरुषों के लिये शहद का शर्बत अनुपान है । निरामय (स्वरथ) पुरुषों के लिये चित्र (नाना प्रकार के अनुपान) भोजन के बीच- बीच में देने चाहिये । वायु रोग में—स्निग्ध और उष्ण, कफ में—रूक्ष एवं उष्ण, पित्त में-मधुर और शीतल अनुपान हित- कारी है । रक्त पित्त रोगियों के लिये—दूध और गन्ने का रस हितकारी है । विषात्ति (विष पीड़ा) में—आक, सेलु (लसड़ा) और शिरीष इनका आसव उत्तम है ॥४२३-४३१॥

अतः परं तु वर्गोणामनुपानं प्रथक् प्रथक् ।

प्रवदयाम्यनुपूर्वणं सर्वेषामेव मे शृणु ॥४३२॥

इसके आगे प्रत्येक वर्ग का अनुपान प्रथक् प्रथक् रूप में कहता हूँ । इसको मुखसे सुनो—

तत्र पूर्वशस्यजातानां बदराम्लं, वैदलानां धान्याम्लं, जङ्गलाणां धन्वजानां च पिप्पल्यासवः, विकिराणां कोल- बदरासवः, प्रतुदानां क्षीरवृक्षसवः, गुहाशयानां खर्जूर-

१ तुवरक का लक्षण—

“पत्रस्तु केशराकारः कलायसदृशः फलेः ।

वृक्षास्तुवरनामानः पश्चिमाण्वतीरजाः ॥”

२१६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४१ ]

नालिकैरासवः, प्रसहानामश्वगन्धासवः, पर्णभुगाणां कृष्णगन्धासवः, विलेजयानां फलासवः एकगफानां त्रिफलासवः, अनेकगफानां खदिरासवः, कूलचराणां शृङ्गाटककशे-रुकासवः, कोशावासिनां पादिनां च स एव, प्लवानामिश्वरसासवः, नादेयानां मत्स्यानां मृणालासवः, सामुद्राणां मातुलुङ्गासवः, अम्लानां फलानां पञ्चोत्पलकन्दरासवः, कषायानां दाडिमवैत्रासवः, मधुराणां त्रिकटुकयुक्तखण्डासवः, तालफलादीनां धान्याम्लं, कटुकानां दूर्वनिलवैत्रासवः, पिप्पल्यादीनां श्वदृष्टावसुकासवः, कृष्माण्डादीनां दार्विकरीरासवः, चुरुचुरभूतीनां लोभासवः, जीवन्त्यादीनां त्रिफलासवः, कुसुम्भशाकस्य स एव मण्डूकपर्ण्यादीनां महापञ्चमूलासवः, तालमस्तकादीनामम्लफलासवः, सैन्धवादीनां सुरासव आरनालं च, तौर्यं च सर्वत्रैते ॥४३३॥

प्रथम कहे अत्र समूहो (शूक धान्य, कुषान्य) का अनु-पान-वदाम्ल, वैदलो (मूळ आदि) का धान्याम्ल (कांजी), जंघाल (ऐणादि) और धनवज (वर्त्ताकादि) का पिप्पल्यासव, चिकिरो का—कोलाम्ल (स्वरूप वेर), वदराम्ल (मध्य प्रमाण का वेर), प्रतुदो का क्षीरी वृक्षो (वटादि का) का आसव, गुहा-शयो (सिंहादि) का खजूररासव और नारिकेलासव, प्रसर्हो के लिये अश्वगन्धासव, पर्णभुगो के लिये कृष्णगन्धा (शोभाजन) का आसव, विलेजयो के लिये फलसारासव, एकशफो (बोड़े आदि) के लिये त्रिफलासव, अनेक शफो (बकरी आदि) के लिये खदिरासव, कूलचरो के लिये शृङ्गाटक और कशेरु का आसव, कोशावासि और पादियों के लिये शृङ्गाटक कशेरुका-सव, प्लवो के लिये इक्षुसासव, नादेय मछलियों के लिये मृणालासव, सामुद्र मछलियों के लिये मातुलुंगासव, कषायवर्ग के लिये दाडिम वैत्रासव, मधुरवर्ग के लिये त्रिकटुक युक्त खण्डा-सव, ताल-फल आदि के लिये धान्याम्ल, कटुवर्ग के लिये दूर्वा-नल वैत्रासव, पिप्पल्यादि के लिये श्वदंष्ट्रा (गोलरु), वसुक (बुक-वगहुल) का आसव, कृष्माण्ड आदि के लिये दावी (दारु-हल्दी) करीरासव, चुन्तु आदि के लिये लोभासव, जीवन्ती आदि के लिये त्रिफलासव, कुसुम्भ शाक के लिये त्रिफलासव, मण्डूकपर्णा आदि के लिये महापञ्चमूलासव, तालमस्तक आदि के लिये अम्लफलासव, सैन्धव आदि के लिये सुरासव और आरनाल अनुपान है, सब स्थानों पर जल का भी अनुपान देना चाहिये ॥४३३॥

भवन्ति चात्र—

सर्वेषामनुपानानां माहेन्द्रं तौयमुत्तमम् ।

सान्यं वा यस्य यत्तौर्यं तत्तस्मै हितमुच्यते ॥४३४॥

उष्णं वाते कफे तौर्यं पित्रो रक्ते च शीतलम् ।

कहा भी है—

सब अनुपानों के लिये—माहेन्द्र (आन्तरिक्ष) जल उत्तम

अनुपान है। जो जल (नदी, सरोवर, तड़ाग आदि का) जिस पुरुष को सत्य हो, वही जल उस पुरुष के लिये हितकारी है। वायु और कफ में—गरम जल, पित्त और रक्त में शीतल जल बरतना चाहिये ॥४३४॥

दोषवद् गुरु वा भुक्तमतिमात्रमथापि वा ॥४३५॥

यथोक्तेनानुपानेन सुखमन्तं प्रजीर्यते ।

दोषवत् (वातादि दोषकारक), गुरु, अधिक मात्रा में खाया भोजन, यथोक्त—उचित अनुपान की सहायता से, बिना किसी कष्ट के सुखपूर्वक जीर्ण हो जाता है ॥४३५॥

रोचनं बृंहणं वृष्यं दोषसंघातभेदनम् ॥४३६॥

तर्पणं मार्दवकरं श्रमकलमहरं सुखम् ।

दीपनं दोषशमनं पिपासाच्छेदनं परम् ॥४३७॥

बल्यं वर्णकरं सम्यगनुपानं सद्बोधयेते ।

अनुपान के गुण—रोचक, बृंहण (देहवर्धक), वृष्य (शुक्र-वर्धक), दोषसमूहों का भेदन करता है, तर्पण (तृप्तिकारक) मार्दवकर (शरीर में कोमलता उत्पन्न करनेवाला), श्रम-कलम को दूर करता है, सुख (स्वास्थ्य उत्पन्न करता है)। अग्निदीपक, दोष शामक, पिपासा को नष्ट करने में श्रेष्ठ, बलकारक, वर्ण-कारक है। इस प्रकार का उचित अनुपान सर्वदा व्यवहार करना चाहिये। (आगे अनुपान से जल को समझना, क्योंकि प्रायः जल ही बरता जाता है) ॥४३६, ४३७॥

तदादौ कशयेत्पीतं स्थापयेन्मध्यसेवितम् ॥४३८॥

परचात्पीतं बृंहयति तस्माद्विद्य प्रयोजयेत् ॥

भोजन से पहिले पिया अनुपान शरीर को अति कुश करता है, भोजन के मध्य में सेवन किया अनुपान शरीर को पूर्ववत् रखता है। भोजन के पीछे पिया अनुपान शरीर को बढ़ाता है, इसलिये विचारकर अनुपान का प्रयोग करना चाहिये ॥४३८॥

स्थिरतां गतमकिटन्तमन्नमद्रवपायिनाम् ॥४३९॥

भवत्याबाधजननमनुपानमतः पिवेत् ।

अद्रवपायी (अनुपान न पीनेवाले) मनुष्यों को—स्थिरता (निश्चलता), अकिटन्त (शुष्कता), आबाधजनन (पीड़ा) होती है, इसलिये अनुपान पीना चाहिये। “समस्थूलकृशा भक्तमध्या-न्तप्रथमांनुपाः” हृदय ॥४३९॥

न पिवेच्छासकासातीं रोगे चाप्यूर्ध्वजगुणे ॥४४०॥

क्षतोरस्कः प्रसेकीं च यस्य चोपहतः स्वरः ।

निम्न पुरुषों को अनुपान नहीं पीना चाहिये—

श्वास-कास रोगी, गले से ऊपर के रोगों में, उरः क्षत रोगी, प्रसेकी (लालाखात्री) और जिस रोगी को स्वरभङ्ग हो उसे अनुपान नहीं पीना चाहिये ॥४४०॥

पीत्वाऽध्वभाष्याध्ययनगोस्वप्नान्न शीलयेत् ॥४४१॥

प्रदूष्यामाशयं तद्वि तस्य कण्ठोरसि स्थितम् ।

स्यन्दानिन्सादन्च्छादीनामयाज्ञनयेद्वहून ॥४४२॥

अ० ४६ ]

२८

सूत्रस्थानम्

२१७

अनुपानपीकर-अध्व (मार्गगमन), भाष्य (जोर से बोलना), अध्ययन (पढ़ना), गेय (गाना), शयन नहीं करना चाहिये। क्योंकि यह अनुपान कण्ठ-उर में स्थित वातादि दोषों को तथा आमाशय को दूषित करके, पुरुष में-स्यन्द (नेत्राभिध्वन्द), अग्निमान्द्य, छर्दन (वमन) आदि बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है ॥४४१,४४२॥

गुरुलाघवर्चिन्तेयं स्वभावं नातिवर्तते।

तथा संस्कारमात्रान्नकालांश्चाप्युत्तरोत्तरम् ॥४४३॥

गुरु लाघव विचार—

द्वयो का गुरु-लाघव, स्वभाव (नैसर्गिकता) से ऊपर तथा (यथा जंघाल-जंगल में विचरनेवाले स्वभाव के कारण ही लघु है), संस्कार, मात्रा, अन्न, काल के ऊपर निर्भर है। यथा—संस्कार स्वभाव से गुरु ग्रीहि भी, संस्कार के कारण लांजा रूप में लघु है। मात्रा—गुरु पदार्थों को आधा पेट भर के खाना और लघु पदार्थों को पूरा पेट भर के खाना। अन्न-मण्ड-पेया विलेपी-मक्त-पूपादि यथोत्तर गुरु हैं। काल-नया धात्य अभि ध्वनि और साल भर पुराना अन्न लघु है। उत्तरोत्तर-स्वभाव से संस्कार, संस्कार से मात्रा, मात्रा से अन्न, अन्न से काल, गुरु-लघु के विचार को अतिक्रमण नहीं करते ॥४४३॥

मन्दकर्मोन्तारोग्याः सुकुमाराः सुखोचिताः।

जन्तवो ये तु तेषां हि चिन्तेयं परिकीर्यते ॥४४४॥

जो पुरुष—मन्दकर्म (आलसी), मन्दानल (मन्दान्ति), मन्दारोग्य (रोगी), सुकुमार (मृदुशरीर), सुखोचित (सुखी) हैं—उनके विषय में गुरु लघु का विचार करना आवश्यक है ॥

बलिनः खरभदया ये ये च दीमाग्रनयो नराः।

कर्मनित्याश्च ये तेषां नावरश्यं परिकीर्यते ॥४४५॥

इत्यनुपानवर्गः।

जो पुरुष-बलो (शक्तिशाली), खरभदय (अमृदुभोजी), दीमाग्नि (तीक्ष्णान्ति) और कर्मनित्य (सदा कर्म करनेवाले हैं), उनके विषय में गुरु-लघु का विचार करना आवश्यक नहीं ॥ यह सर्व अनुपान वर्ग कह दिया—

अथाहारविधिं वत्स ! विस्त्रेणाखिलं शृणु ।

आत्मास्थितमसंकीर्णं शुचिं कार्यं महानसम् ॥४४६॥

हे वत्स ! सम्पूर्ण आहार विधि को अब विस्तार से कहता हूँ—उसे सुनो। महानस (रसोई)—आत्मास्थित (विश्वस्त पुरुषों से युक्त), असंकीर्ण (असंकट-खुली-छोटी नहीं), शुचि (पवित्र-साफ सुथरी) रसोई बनानी चाहिये ॥४४६॥

१—चरक में संस्कार के लिये—संस्कारो हि गुणात्तराधान-मुच्यते। ते गुणास्तोयान्सविकर्षशीब्रमस्थनदेशकालवासनादिभिः कालप्रकर्षभाजनादिभिश्चाधीयन्ते। चरक० विमाने अ० १।

तत्रातिर्गुणसंपन्नं भदयमन्नं सुसंस्कृतम्।

शुचौ देशे सुसंगुर्म समुपस्थापयेद् भिषक् ॥४४७॥

इस रसोई में विश्वस्त पुरुषों द्वारा सुसंस्कृत (भली प्रकार से तैयार किये), गुण सम्पन्न (इष्ट-रस, गन्ध, स्पर्श-वर्णयुक्त), भदय (खाने योग्य) अन्न को, पवित्र स्थान में भली प्रकार छिपाकर (शुद्ध आदि जहाँ न जा सके), वैद्य को रखना चाहिये ॥

विषद्वैतैरगदैः स्पृष्टं प्रोक्षितं व्यजनोदकैः।

सिद्धैर्मन्त्रैर्हतविषं सिद्धमन्नं निवेद्येत् ॥४४८॥

विषद्वैत (विष नाशक) औषधियों से स्पृष्ट (छुए) व्यजनोदक प्रोक्षित (विषनाशक अगदोदक से धोये पंखों को वायु से शुद्ध किये अथवा, अथर्ववेद के मन्त्रों से अभिमन्त्रित), सिद्ध, मन्त्र (अभ्यभिचारि, कुछ कुक्का आदि मन्त्रों द्वारा)—विष को नष्ट करके, सिद्ध (तथ्यार), भोजन खानेवाले को समर्पित करना चाहिये ॥४४८॥

वद्याम्यतः परं कृत्स्नामाहारस्योपकल्पनाम्।

घृतं काष्णायसे दैयं, पेया देया तु राजते ॥४४९॥

फलाणि सर्वभदयांश्च प्रव्याह्विद्वेत्तु ।

परिशुष्कप्रदिग्धानि सौषर्णं प्रकल्पयेत् ॥४५०॥

प्रद्रवाणि रसांश्चैव राजतेपूषहारयेत्।

कट्वराणि खडांश्चैव सर्वांछलेषु दापयेत् ॥४५१॥

दद्यात्ताम्रमये पात्रे सुजीतं सुभृतं पयः।

पानीयं पानकं मद्यं मृन्मयेषु प्रदापयेत् ॥४५२॥

काचस्फटिकपात्रेषु जीतलेषु शुभेषु च।

दद्याह्विद्वैर्द्युचित्रेषु रागाषाडवसट्टकान् ॥४५३॥

पुरस्ताद्विमले पात्रे सुविस्तीर्णं मनोरमे।

सूदः सूपौदनं दद्यात् प्रदेहांश्च सुसंस्कृतान् ॥४५४॥

फलाणि सर्वभदयांश्च परिशुष्काणि यानि च।

तानि दक्षिणपार्श्वं तु सुज्ञानस्योपकल्पयेत् ॥४५५॥

प्रद्रवाणि रसांश्चैव पानीयं पानकं पयः।

खडान् यूषांश्च पेयांश्च सन्त्ये पाश्चं प्रदापयेत् ॥४५६॥

सर्वान् गुडविकारांश्च रागाषाडवसट्टकान्।

पुरस्तात् स्थापयेत् प्राहो द्वयोरपि च मध्यतः ॥४५७॥

इसके आगे सम्पूर्ण भोजन को परोसने की विधि कहता हूँ। घी को कुष्णलोह के पात्र में, सब प्रकार की पेया राजत पात्र में, फल और लड्डू आदि सब प्रकार के भदय पदार्थ-पत्तों की पतली या दोनों में देने चाहिये। परिशुष्क और प्रदिग्ध (दही या तक में मिला) मांस को स्वर्ण

१ दुन्दुभिस्क्नीय अध्याय में कही विधि से—विष रहित करके देना चाहिये।

२ परिशुष्क मांस—

“सिक्तां बहुमृतं भृष्टं मुहुर्गुणाम्बुना मृदु।

जीरकाद्यैर्वर्णं मांसं परिशुष्कं तदुच्यते ॥”

प्रदिग्ध मांस—तदैव गोरसादानं प्रदिग्धमिति विश्रुतम्।

२१८

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४६ ]

के पात्रों में देना चाहिये। प्रदवाणि (अतिशय द्रव-मण्डादि) और रसों (मांस रसों) को-चाँदी के पात्रों में देना चाहिये। कट्वर१ (तक्र), और खड् यूरों को पत्थर के बर्तनों में देना चाहिये। भली प्रकार उवालकर ठण्डा किया दूध-ताम्र के पात्र में देना चाहिए। पानी, पानक और मद्य इनको मिट्टी के पात्रों में देना चाहिये। राग, पाङ्ग, सट्क का कांच, स्फटिक के भण्ड एवं शीतल पात्रों में, वैङ्ग्य (बिल्लौर) के विचित्र पात्रों में देना चाहिये। पूर्वोक्त-विमल एवं खूब फैले (चौड़े), सुन्दर (स्थाली आदि) पात्रों में रसोद्ये—दाल चावल और अच्छी प्रकार से तैय्यार किये प्रलेहों (चाटने योग्य वस्तुओं) को दें। फल सब भक्ष्य (लड्डू आदि), और परिशुष्क वस्तुओं को खानेवाले के दक्षिण पार्श्व में रखना चाहिये। गुड से बनी सब वस्तुओं को, राग, पाङ्ग, सट्क को सामने में अथवा किसी एक पार्श्व में, (जहाँ उचित समझे) रखना चाहिये ॥४४८-४१७॥

एवं विज्ञाय मतिमान् भोजनस्योपकल्पनाम् ।

भोक्ताः विजने रम्ये निःसंपाते शुभे शुचौ ॥४५८॥

सुगन्धयुष्परचिते समे देशे च भोजयेत् ।

बुद्धिमान् मनुष्य उपरोक्त प्रकार से भोजन के परोसने की विधि को जानकर—भोजन करनेवाले मनुष्य को, विजन (एकान्त) में, रम्य (मनोहर), निःसंपात (खुले-विस्तार युक्त), शुभ एवं पवित्र, सुगन्धित फूलों से शोभित, समतल स्थान में बिठाकर भोजन कराये ॥४५८॥

विशिष्टमिष्टसंस्कारः पथ्यैरिष्टै रसादिभिः ॥४५९॥

मनोर्ज्ञ शुचि नात्युष्णं प्रत्यग्रगमनं हितम् ।

इष्ट संस्कार (वाञ्छित-कल्पनाविधि) से बने, हितकारी-प्रिय रस-गन्ध-वर्ण से युक्त, मनोर्ज्ञ (सुन्दर), शुचि (पवित्र), बहुत गरम नहीं (थोड़ा गरम), प्रत्यग्र (अभिनव), अशन (भोजन) करना चाहिये ॥४५९॥

पूर्वं मधुरमरुनीयान्मध्यैऽन्मलवणौ रसौ ॥४६०॥

पश्चाच्छेषान् रसान् वैद्यो भोजनेष्ववचारयेत् ।

आदौ फलानि सुञ्जीत द्राडिमादीनि बुद्धिमान् ॥४६१॥

ततः पेयैस्ततो भोज्यान् भदयाश्चित्रैस्ततः परम् ।

घनं पूर्व समरुनीयात्, केचिदाहुर्विपर्ययम् ॥४६२॥

१ कट्वर—“सीवाराम्मथात्मलं काञ्चिकं कट्वरं विदुः ।

तदघो भागं तक्रं वा हम्मलां गतम् ।

सन्तेहं दधिजं तक्रमाहूरये तु कट्वरम् ॥”

राग—“सितारुचक सिन्धुत्यः सवृश्चाम्लपृषकः ।

जम्बूफलरसैर्युक्तो रागो राजकिया कृतः ॥”

सट्क—“लवंगं व्योषखण्डैस्त दधि-तिर्मध्यं गालितम् ।

दाडिम्बीजसंयुक्तं चण्डचूर्णावर्चणितम् ।

सट्कं तत्प्रभोदास्थं नलादिभिर्वदाहृतम् ॥”

आदावन्ते च मध्ये च भोजनस्य तु ग्रह्यते ।

निरस्त्ययं दोषहर् फलेष्वाभलकं नृणाम् ॥४६३॥

मृणालविसशालूककन्देक्षुप्रभृतीनि च ।

पूर्वं योज्यानि भिषजा न तु मुञ्क्ते कदाचन ॥४६४॥

भोजनों में सब से पूर्व मधुररस खाना चाहिये (जिससे पक्वाशय गत वायु का ह्रास हो), अम्ल और लवणरस को भोजनों के मध्य में खाना चाहिये (जिससे पिचाशय में अग्नि प्रदीप्त हो), शेष कट्वादि रसों को अन्त में (कफ की शान्ति के लिये) खाना चाहिये। बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि सब से प्रथम द्राडिम (अनार) आदि-अम्ल फलों को खाये (जिससे कि वायु शान्त हो)। इसके पीछे पीने योग्य पेय वस्तुओं को खाना चाहिये, फिर नाना प्रकार के मध्य-भोजनों (दाङ् चावल आदि) को खाना चाहिये। प्रथम घन (कठिन) भोजन खाना चाहिये, कई आचार्य कहते हैं कि इसके विपरीत प्रथम द्रव भोजन करना चाहिये। भोजन के आदि में, मध्य में और अन्त में, आँबला-फल दोषहर होने से, बिना किसी रुकावट के बरता जा सकता है। मृणाल (पद्मनाल), विष (भिष), शालूक, कन्द, गन्धे आदि वस्तुओं को भोजन से पूर्व देना चाहिये, भोजन के उपरान्त कभी भी नहीं देना चाहिये ॥४६०-४६४॥

सुखमुच्यैः समासीनः समदेहोऽन्नतत्परः ।

काले सात्त्व्यं लघु स्निग्धमुष्णं क्षिप्रं द्रवोत्तरम् ॥४६५॥

बुभुक्षितोऽन्नमरुनीयान्मात्रावद्धिदितागमः

सुख पूर्वक, मूर्मि से ऊँचाई पर-शरीर को (शिर-ग्रीवा और पोट को) समान रखकर, भोजन में तत्पर (कामादि व्यथता को छोड़कर), होकर उचित समय पर, अपनी आत्मा के अनुकूल, लघु, स्निग्ध, जल्दी (न कि बहुत जल्दी) और उष्ण द्रवप्रधान भोजन करना चाहिये। हेय उपादेय सम्बन्धि हितार्हित की विवेचना करनेवाला—भूख होने पर, मात्रा के परिमाण में भोजन करे ॥४६५॥

१ चरक में भोजन विधि—विमान स्थान में—“उष्णं स्निग्धं मात्रावज्जोर्णं वीर्याबिन्दुमिष्टे देशे इष्टसर्वापकरणे नातिदुर्लं नाति-विलम्बितं तन्मना भुञ्जीत ।”

सच्ची भूख में भोजन करना चाहिये—कहा भी है “भवत्य-कालेऽपि या बुभुक्षा सा मन्दबुद्धिं विषवलिहति ।”

मात्रा का लक्षण—

“अपीडनं भवेत्कुक्षेः पाश्चैयोरविपाटनम् ।

अनेन हृदयाबाधो जठरस्य न गौरवम् ॥

प्राणनं चक्षुरादीनां शमनं क्षुत्पिपासयोः ।

उच्छ्वासास्रवासाह्वासादिकथाम् सुखवर्तनम् ।

सुखेन परिणामः स्यादने भुक्ते दिवानिशि ।”

२९६

वृत्तस्थानम्

२९६

काले प्रीणयते भुक्तं सात्त्व्यमन्नं न वाधते ॥४६॥ लघु शीघ्रं व्रजेत् पाकं स्निग्धोष्णं बलवद्भिदम् । क्षिप्रं भुक्तं समं पाकं यात्यदोषं द्रवोत्तरम् ॥४६॥ सुखं जीरयति मात्रावद्वातुसाभ्यं करोति च ।

समय पर खाया भोजन तृप्ति को करता है, सात्त्व्य (अग्नी आत्मा के अनुकूल) अन्न शरीर को पीड़ा नहीं पहुँचाता। लघु अन्न शीघ्र जीर्ण होता है, स्निग्ध और उष्ण अन्न, बल एवं अग्नि को बढ़ाता है। न तो बहुत जल्दी और न रुक-रुककर खाया अन्न एक साथ जीर्ण (पचता) होता है, द्रव-प्राधान भोजन दोषों को कुपित नहीं करता। मात्रा में खाया अन्न भली प्रकार यिना किसी कष्ट के पच जाता है और धातुओं को समान करता है ॥४६६,४६७॥

अतीवायतयामस्तु क्षपा येष्टुतुषु स्मृताः ॥४६८॥ तेषु तत्प्रत्यनीकाद्व्यं भुञ्जीत प्रातरेव तु ।

जिन ऋतुओं में (हेमन्त और शिशिर में) रात्रियाँ बहुत लम्बे प्रहरोंवाली होती हैं, उनमें काल बल प्रवृत्त दोषों के विरोधी गुण बहुत भोजन-प्रातः ही (चौथे प्रहर में, शीघ्र) कर लेना चाहिये ॥४६८॥

येषु चापि भवेयुश्च दिवसा भृशमायताः ॥४६९॥ तेषु तत्कालविहितमपराह्ने प्रसश्यते ।

जिन ऋतुओं में ( ग्रीष्म और प्रावृट् ) दिन बहुत लम्बे हो जाते हैं, उन ऋतुओं में कालोचित द्रव-स्निग्ध-मधुर प्राय अन्न अपराह्ने में भी खाना चाहिये ॥४६९॥

रजन्यो दिवसाश्चैव येषु चापि समाः स्मृताः ॥४७०॥ कृत्वा सममहोरात्रं तेषु भुञ्जीत भोजनम् ।

जिन ऋतुओं में ( शरद और वसन्त ) में रात और दिन बराबर हो जाते हैं, उन ऋतुओं में दिन रात को बराबर करके समय पर भोजन करना चाहिये।

ये नियम ऋतु अलक्षित काल के लिये हैं। आवस्थिक के नियम स्वस्थ वृत्ताध्याय में कहेंगे ॥४७०॥

नाप्राप्तातीतकालं वा हीनाधिकमथापि वा ॥४७१॥ अप्राप्तकालं भुञ्जानः शरीरे ह्यलघौ नरः ।

तांस्तान् व्याधानंवाप्रीतिं मरणं वा नियच्छति ॥४७२॥ अतीतकालं भुञ्जानो वायुनोपहतेऽनले ।

कुरुच्छाद्विपच्यते भुक्तं द्वितीयं च न काङ्क्षति ॥४७३॥ हीनमात्रमसंतोषं करोति च बलक्षयम् ।

आलस्यगौरवाटोषसादांश्च कुरुतेऽधिकम् ॥४७४॥ अप्राप्त काल (भोजन बेला के न आने पर) में अतीतकाल

में (भोजन का समय व्यतीत हो जाने पर), हीन मात्रा अथवा अधिक मात्रा में भोजन नहीं करना चाहिये। कारण-शरीर में भारीपन रहने पर अप्राप्तकाल में भोजन करने से शिरोवेदना आदि अनेक रोग अथवा मृत्यु हो जाती है। अतीतकाल में भोजन न करने पर, वायु के कारण अग्नि के मन्द पड़ जाने से, भोजन कठिनाई से पचता है, और दूसरे भोजन की फिर

इच्छा नहीं होती। भोजन की हीन मात्रा असन्तोष और बल का क्षय करती है। भोजन की अधिक मात्रा आलस्य, गौरव (भारीपन), आटोष (आधमान), साद (अज्ञों में शिथिलता) उत्पन्न करती है ॥४७१-४७४॥

तस्मात् सुसंस्कृतं युक्त्या दोषैरेतैर्विजितम् । यथोक्तगुणसंपन्नमुपसेवेत भोजनम् ॥४७५॥ विभज्य दोषकालादीन् कालयोःसभ्योपि । अचोक्षं दुष्टमुत्सृष्टं पाषाणवृणलोष्टवत् ॥४७६॥ द्विष्टं व्युपितमस्वादु पूर्ति चात्रं विवर्जयेत् । चिरसिद्धं स्थिरं शीतमन्तमुष्णीकृतं पुनः ॥४७७॥ अशान्तमुपदग्धं च तथा स्वादु न लक्ष्यते ।

इसलिये युक्ति पूर्वक—सधु रीति से संस्कृत (तैय्यार किये) एवं उपरोक्त दोषों से रहित तथा पूर्वोक्त गुण से युक्त अन्न दोनों समय खाना चाहिये। जो अचोक्ष (अपवित्र-मलिन), विषादि से दुष्ट, उत्सृष्ट, (खाने से बचा हुआ), द्विष्ट (मन के प्रतिकूल), व्युपित (बासी सड़ा), अस्वादु (स्वाद रहित), पूर्ति (दुर्गन्धयुक्त) चिर सिद्ध (देर का पकाया), स्थिर (कठोर), शीत (ठण्डा), पुनः गरम किया, अशान्त (बहुत उष्ण—जिसकी बाष्प शान्त नहीं हुई), उपदग्ध (जला हुआ) और जो अन्न स्वादु नहीं दीखता—तथा पत्थर तृण और मिट्टी के कणों से युक्त हो छोड़ देना चाहिये ॥४७७॥

यद्यत् स्वादुतरं तत्तद्विदध्यादुत्तरोत्तरम् ॥४७८॥

जो वस्तु अधिक स्वादु हो (खाने में स्वादिष्ट हो) उससे अधिक स्वादिष्ट वस्तु उत्तरोत्तर देनी चाहिये। एक स्वादु वस्तु खाने पर, दूसरी बार उससे अधिक स्वादु वस्तु देनी चाहिये, तीसरी बार उससे भी अधिक स्वादिष्ट वस्तु देनी चाहिये ॥४७८॥

प्रक्षालयेदद्भिरास्यं भुञ्जानस्य मुहुर्मुहुः । विशुद्धे रसने तस्य रोचतेऽन्नमपूर्ववत् ॥४७९॥

स्वादुना तस्य रसन् प्रथमेनाविपतितम् । न तथा स्वादयेदन्मत्समात् प्रक्षाल्यमन्तरा ॥४८०॥

भोजन करते हुए बार बार पानी से मुख धोना (गरारे करनी) चाहिये। ऐसा करने से जिह्वा के शुद्ध होने पर भोजन अपूर्व (नया ही) के समान प्रिय लगता है। प्रथम मधुर वस्तु के कारण जिह्वा अत्यन्त तृप्त सी हो जाती है, इसलिये अन्य वस्तु अच्छी नहीं लगती, अतः बीच में मुख को धोना चाहिये ॥

सौमनर्यं बलं पुष्टिमृत्साहं हर्षणं सुखम् । स्वादु संजनयत्यन्तमस्वादु च विपर्ययम् ॥४८१॥

भुक्त्वाऽपि यत् प्रार्थयते भूयस्तत् स्वादु भोजनम् । स्वादु अन्न—सौमनस्य (सुमनस्कता), बल (ओज), पुष्टि (शरीर की बृद्धि), उत्साह, हर्षण (प्रसन्नता), सुख (नीरोगता), को उत्पन्न करता है। अस्वादु अन्न-इनसे विपरीत गुणों को

२२०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४९ ]

उत्पन्न करता है। भोजन करनेवाला पुरुष जिस भोजन को एक बार खाकर फिर फिर मांगता है, उसको अवश्य स्वादु समझना चाहिये ॥४८१॥

अशित्थोदकं युक्त्या भुञ्जानश्चान्तरा पिबेत् ॥४८२॥ भोजन करनेवाले पुरुष को चाहिये कि—भोजन करके, पीछे से पानी को मात्रा में पीये ॥४८२॥

दन्तान्तरगतं चान्नं शोधनेनाहरेच्छनैः।

कुर्याद्दिनिह्वं तद्वि मुखस्थानिष्टगन्धताम् ॥४८३॥

भोजन के उपरान्त दांतों में फँसे अन्न को तिनके आदि से बाहर निकाल दे। क्योंकि न निकालने पर मुख में यह अन्न दुर्गन्ध उत्पन्न करता है ॥४८३॥

जीर्णोऽन्ने वर्धते वायुर्विदग्धे पित्तमेव तु।

भुक्तमात्रे कफश्चापि, तस्माद्भुक्तेरितं कफम् ॥४८४॥

भोजन के जीर्ण (पचने) होने पर वायु बढ़ती है, भोजन के विदग्ध (अर्ध पक) अवस्था में पित्त बढ़ता है, भोजन के उपरान्त कफ बढ़ता है ॥४८४॥

धूमेनापोहा हृवैर्वा कषायकटुतिक्तैः

पूरगङ्गोल्कपूररलवङ्गसुमनः फलेः ॥४८५॥

फलेः कटुकषायैर्वा मुखवैशद्यकारकैः।

ताम्बूलपत्रसहितैः सुगन्धैर्वा विचक्षणः ॥४८६॥

इसलिये भोजन के द्वारा प्रेरित कफ को धूमपान के द्वारा अथवा कषाय-कटु तिक्त रसवाले, हृदय के लिये प्रिय द्रव्यों द्वारा या—पूर (सुगारी), कंकोल (झीतल चीनी), कपूर, लौंग, सुमनफल (जायफल-जावित्री) से तथा मुख को स्वच्छ करनेवाले कषाय, एवं कटु रस युक्त फलों के द्वारा अथवा ताम्बूलपत्र (पान) में सुगन्धित वस्तुयें मिलाकर खाने से नष्ट करना चाहिये ॥

भुक्त्वा राजवदासीत यावदन्नकलमो गतः।

ततः पादशतं गत्वा वामपार्श्वेन संविशेत् ॥४८७॥

भोजन करने के उपरान्त—जब तक भोजन जन्म भ्रम दूर न हो जाये, तबतक राजासन (भद्रासन१) से बैठना चाहिये। इसके पीछे सौ पांव चलकर वाम पार्श्व से लेटना चाहिये एक मुहूर्त (४८ मिनट) आराम जरूर लेना चाहिये ॥४८७॥

शब्दान् रूपान् रसान् गन्धान् स्पर्शाश्च मनसः प्रियान्।

भुक्त्वातुपसेवेत तेनान्नं साधु तिष्ठति ॥४८८॥

भोजन करने के पीछे मन के अनुकूल शब्दों स्पर्शों रूपों

रसों और गन्धों का सेवन करना चाहिये। इस प्रकार से अन्न भली प्रकार से पचता है ॥४८८॥

अङ्गदूरपरसा गन्धाः स्पर्शाश्चापि जुगुप्सिताः।

अशुच्यन्नं तथा भुक्तमतिहास्यं च वामयेत् ॥४८९॥

जुगुप्सित (निन्दित-अप्रिय)—शब्दों, रूपों, रसों, गन्धों और स्पर्शों का सेवन से अपवित्र अन्न के खाने से, अति भोजन से, तथा अतिहास्य के कारण भोजन का वमन हो जाता है ॥४८९॥

अयनं चासनं वाऽपि नेच्छेद्वापि द्रवोत्तरम्।

नाग्न्यातपौ न प्लवन् न यानं नापि वाहनम् ॥४९०॥

भोजन करने के उपरान्त न तो अधिक देर लेटना-खाना चाहिये, न बैठना चाहिये, और न बहुत पानी पीना चाहिये (द्रव बहुत भोजन नहीं करना चाहिये)।

न तो अग्नि, न धूप, सेवन करनी चाहिये। न स्नान (जल में तैरना उछलना कुदना), न गमन (तेज या दूर चलना) और न घोड़े आदि की सवारी करनी चाहिये ॥४९०॥

न चैकरससेवायां प्रसज्येत कदाचन।

शाकावरान्नभूयिष्ठमम्लं च न समाचरेत् ॥४९१॥

कभी भी एक ही रस का निरन्तर (अथवा बार-बार) अभ्यास—सेवन नहीं करना चाहिये। शाक (पत्र-पुष्पादि) अवरान्न (वेणुयवादि) तथा अम्ल रस को अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिये। 'एकरसाभ्यासो दौर्बल्यकरणात्'—चरक ॥४९१॥

एकैकसाःसमस्तान् वा नाध्यश्नीयाद्वास्नान् सदा।

प्राग्भुक्ते त्वविविकतेऽन्तो द्विरन्तं न समाचरेत् ॥४९२॥

पूर्वभुक्ते विद्ग्धेऽन्ने भुञ्जानो हन्ति पावकम्।

एक एक रस को पृथक् पृथक् करके अथवा सब रसों को एक साथ में मिलाकर भोजन नहीं करना चाहिये। अपितु कुछ रसों को पृथक् पृथक् करके और कुछों को मिलाकर खाना चाहिये। दोष और रोग की अपेक्षा से एक एक रस का और स्वस्थ की अपेक्षा से सब मिलित रसों का निषेध है। प्रातः या पूर्व भोजन करने के उपरान्त जब तक अग्नि स्पष्ट न हो (भूख न लगे), तब तक दूसरी बार किया भोजन जठराग्नि की मन्द (नष्ट) कर देता है ॥४९२॥

मात्रागुहं परिहरेदोहारं द्रव्यतश्च यः ॥४९३॥

पिधान्नं नैव मुक्त्वाति मात्रया वा बुभुक्षितः।

द्विगुणं च पिबेत्तोर्यं सुखं सम्यक् प्रजीयति।

जो द्रव्य लघु हैं (मूत्र आदि हैं) उनको मात्रा से (अधिक मात्रा में) छोड़ देना है, और जो द्रव्य स्वभाव से गुह (मात्रा आदि) हैं उनको वैसे ही अधिक नहीं खाना चाहिये।

पिधान्न (संस्कार जन्म गुह मात्रा का द्योतक) की कभी नहीं खाना चाहिये। यदि खाना हो तो मात्रा में

१ भद्रासन—

“सीमन्याः पार्श्वयोर्न्यस्येद् गुल्फयुग्मं सुनिश्चलम्।

बृषणाऽष्वः पादपाणिं पाणिभ्यां परिवन्धयेत्।

भद्रासनसमुद्दिष्टम्।” नृपासनमेतद् भद्रासनम् ॥

अ० ४६ ]

सूत्रस्थानम्

२२९

तथा भूख लगने पर ही खाना चाहिये१ । इसको खाकर दुगुना पानी पीना चाहिये, इससे सुखपूर्वक पाचन हो जाता है ।

पेयलेहाद्यभक्ष्याणां गुरु विद्याद्यथोत्तरम् ॥४६४॥

चार प्रकार के अन्न में (पेय, लेह्य आद्य-खाद्य और भक्ष्य) उत्तरोत्तर प्रकार का अन्न गुरु समझना चाहिये । यथा-पेय-जहादि से लेह्य-मध्यादि, लेह्य से खाद्य (चावल आदि), खाद्य से भक्ष्य (लड्डू आदि) गुरु हैं ॥४६४॥

गुरुणामधसौहित्यं लघूनां तृप्तिरिष्यते ।

द्रवोत्तरो द्रवश्चापि न मात्रागुरुरिष्यते ॥४६५॥

द्रवाद्यथमपि शुष्कं तु सम्यगेवोपपद्यते ।

जो पदार्थ स्वभाव से या संस्कार के कारण गुरु हैं, उनको आधी मात्रा में (आधे पेट-भूख रखकर) खाना चाहिये । और जो पदार्थ लघु हैं, उनको तृप्ति (थोड़ी भूख रखकर—ईषत् तृप्ति) तक खाना चाहिये । द्रवोत्तर (द्रव बहुल-तत्कादि) और द्रव (पेयादि) का भी अधिक मात्रा में सेवन करना ठीक नहीं, जो पदार्थ शुष्क हैं, वे भी द्रव बहुल होने पर बिना दोष उत्पन्न किये भली प्रकार से पच जाते हैं । क्योंकि पानी का पाचन बृहदन्न में होने से सम्पूर्ण अन्न प्रणाली को धोता जाता है ॥४६५॥

विशुष्कमन्नमभ्यस्तं न पाकं साधु गच्छति ॥४६६॥

पिण्डीकृतसंसंकिलन्नं विदाहमुपगच्छति ।

विशुष्क (सूखा) अन्न सेवन करने पर भली प्रकार से जीर्ण नहीं होता । अपितु असंकिलन्न (ठीक प्रकार से गीला न होकर) एक गोल खा बनकर विदग्ध हो जाता है (आधा कच्चा-पका रह जाता है) ॥४६६॥

स्रोतस्यन्नवहे पित्तं पत्तो वा यस्य तिष्ठति ॥४६७॥

विदाहि शुक्तमन्यद्वा तस्याप्यन्नं विदह्यते ।

जिस समय पित्त अन्नवह स्रोतस् (अन्न) में तथा (अग्नि स्थान) में रुक जाता है, उस समय विदाही अन्न तथा अविदाही भोजन सब विदग्ध हो जाता है ॥४६७॥

शुष्कं विरुद्धं विष्टभिम् वह्नियपादमावहेत् ॥४६८॥

शुष्क (मुष्टान्नादि), विरुद्ध, (दूध, मछली आदि), विष्टभिम् (चना मसूर आदि) अन्न अग्नि दोष को उत्पन्न करते हैं ॥४६८॥

आमं विदग्धं विष्टब्धं कफपित्तानिलैस्त्रिभिः ।

अजीर्णं केचिद्विच्छन्ति चतुर्थं रसशेषतः ॥४६९॥

१ चरक में भी कहा है—

गुरुपिष्टमयं द्रव्यं तण्डुलान् पृथुकानपि ।

न जातु मुक्तवान् खादेत्सामां खादेद् बुभुक्षितः ॥

आहारमात्रा पुनः अग्निबलापेक्षिणी द्रव्यापेक्षयाच ।

त्रिभागं सौहित्यमधसौहित्यं वा गुरुणामुपविश्यते ॥

चरक०

कफ, पित्त और वायु के कारण, आम अजीर्ण, विदग्ध अजीर्ण और विष्टब्ध अजीर्ण—इन तीन प्रकारों के अजीर्ण होते हैं । कई आचार्य आहार के परिपाक से शेष बचे रस का परिपाचन के कारण उत्पन्न चौथे प्रकार का भी अजीर्ण मानते हैं ।

अत्यन्तमुपानाद्विषमाशनाद्वा

संधारणात् स्वप्नविपर्ययाच्च ।

कालेऽपि सात्स्यं लघु चापि युक्तः

मन्नं न पाकं भजते नरस्य ॥१००॥

ईष्याभयक्रोधपरिक्षितेन

लुब्ध्वेन युगदैन्यनिपीडितेन ।

प्रह्वेषयुक्तेन च सेऽभ्यमान-

मन्नं न सम्यक् परिणाममेति ॥१०१॥

अजीर्ण का कारण—अधिक पानी पीने से, विषमाशन (विषमाशन का लक्षण आगे कहेंगे), मूत्र पूर्ण के उपस्थित वेगों को रोकने से, स्वप्न के विपर्यय (दिन में सोना रात में जागने) से ठीक समय पर और उचित (आत्मा के अनुकूल) एवं लघु (स्निग्ध, उष्णादि) भोजन भी ठाक प्रकार से जाँच नहीं होता । इसी प्रकार ईष्या (दूसरे की सुख-समिति में असहिष्णुता), भय क्रोध से युक्त मनवाले, लालची (लामयुक्त), शुक्र (शोक), दैन्य (दानता) से युक्त मनवाले पुरुष का अन्न भली प्रकार से जीर्ण नहीं होता ॥१००, १०१॥

माधुर्यमन्नं गतमाससन्नं,

विदग्धसन्नं गतमन्मत्तमावम् ।

किंचिद्विष्टकं भूशतोद्गूलं

विष्टब्धमानद्ग्विरुद्धवातम् ॥१०२॥

कफ के प्रभाव से जब अन्न में मधुरता उत्पन्न हो जाती है, तब उसका नाम 'आम' होता है । पित्त के कारण जब अम्लता उत्पन्न हो जाती है, तब इसकी संज्ञा 'विदग्ध' होती है । वायु के कारण जब भोजन कुछ पक जाता है और कुछ कच्चा रह जाता है, बहुत पीड़ा एवं शूल होता है, वायु विशेष रूप में रुक जाता है या प्रवृत्त नहीं होता, तब इसकी संज्ञा 'विष्टब्ध' होती है१ । तीन प्रकार के अजीर्ण हैं—आमाजीर्ण, विदग्धाजीर्ण तथा विष्टब्धाजीर्ण ॥१०२॥

उद्गारशुद्धावपि भक्तकाङ्क्षा

न जायते हृद्गुरुता च यस्य ।

रसावशेषेण तु सप्रसक्तं

चतुर्थमेतत् प्रवदन्त्यजीर्णम् ॥१०३॥

उद्गार (डकार) के शुद्ध होने पर भी भोजन की इच्छा न हो, हृदय प्रदेश पर भारीपन हो, तथा सुख से लालासाव हो तो इसको रसावशेष जन्म चौथे प्रकार का अजीर्ण कहते हैं ।

१ कफ कार्य—गौरव, स्नेह, कण्ठ आदि पित्तकार्य—तिक्त अम्लोद्गार आदि, वात कार्य—जुम्भा, श्रंगसर्द आदि का भी उपलक्षण करना चाहिये ।

२२२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४६ ]

मूर्च्छा प्रलापो वमशुः प्रसेकः सदनं भ्रमः । उपद्रवा भवन्त्येते सरणं चाप्यजीर्णतः ॥५०४॥ अजीर्णं के उपद्रव—

मूर्च्छा ( चेतना नाश ), प्रलाप ( असंबद्ध भाषण ), वमशु ( वमन ), प्रसेक ( मुख से लालाखाप ), सदनं ( अङ्गों का टूटना या अङ्गों में ग्लानि ), भ्रम ( चक्कर आना ), अथवा मृशु—ये उपद्रव अजीर्ण के कारण होते हैं ॥५०४॥

तत्रामे लङ्घनं कार्यं, विदग्धे वमनं हितम् । विष्टब्धे स्वेदनं पथ्यं, रसशेषे शयीत च ॥५०५॥ चिकित्सा—

आम अजीर्ण में लंघन करना चाहिये। विदग्धाजीर्ण में वमन हितकारी है, विष्टब्धाजीर्ण में स्वेदन, तथा रसशेषाजीर्ण में—सोना ( तथा पाचन एवं स्वेदन ) हितकारी है ॥

वामयेदाशु तं तस्मादुष्णं लवणाम्बुना । कार्यं वाऽनशनं तावद्यावन्न प्रकृति भजेत् ॥५०६॥ लघुकायमतश्चैवं लङ्घनं: समुपाचरेत् ।

यावन्न प्रकृतिस्थः स्यादोषतः प्राणतत्तथा ॥५०७॥

वमन के लिये लवणयुक्त गरम जल पिलाना चाहिये, जिससे शीघ्र वमन हो जाये। जब तक अजीर्ण की निवृत्ति न हो तब तक अनशन करना चाहिये। इस प्रकार से अग्नि दीप्त होनेसे शरीर के हल्के होने पर लघु भोजन देने चाहिये। जब तक दोष एवं प्राण ( बल ) से प्रकृति ( स्वास्थ्थ ) में न आ जाये तब तक लघु भोजन ही देना चाहिये ॥५०६,५०७॥

हिताहितोपसंयुक्तमन्नं समशनं स्मृतम् । बहु स्तोकमकाले वा तज्ज्ञेयं विषमाशनम् ॥५०८॥ अजीर्णं भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते ।

त्रयमेतन्निहन्त्याशु बहून्त्याधीनकरोति वा ॥५०९॥ हितकारी और अहितकारी१ अन्न को एक साथ मिलाकर खाना—‘समशन’ कहाता है। बहुत अधिक या थोड़ा अथवा बिना समय के खाना ‘विषमाशन’ कहाता है। अजीर्णावस्था में भोजन करना ‘अध्यशन’ कहाता है। ये तीनों ही मनुष्य को शीघ्र मार देते हैं, अथवा बहुत से रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥५०८,५०९॥

अन्नं विदग्धं हि नरस्य शीघ्रं शीताम्बुना वै परिपाकमेति । तद्व्यस्य शैत्येन निहन्ति पित्त- माकलेदिभावाच्च नयत्यधस्तात् ॥५१०॥

१ हिताहित— “धान्यं नवं पुराणं यच्छाकं जीर्णं च कोमलम् । एकदृषं तद् विरुद्धं स्याच्छीतोष्णं च स्वजातितः ॥”

विदग्धाजीर्ण की चिकित्सा-विदग्ध अन्न शीतल पानी पीने से शीघ्र जीर्ण हो जाता है। क्योंकि—शीतलता के कारण यह जल पित्त को शान्त करता और भोजन को आर्द्र बनाकर नीचे की ओर ले जाता है, दस्त लाता है ॥

विदह्यते यस्य तु भुक्तमात्रे दह्येत हृत्कोष्ठगलं च यस्य ।

द्वाराम्भयां माक्षिकसंप्रयुक्तां

लीहवाऽभयां वा स सुखं लभेत ॥५११॥

जिस पुरुष के भोजन करने के उपरान्त आमाशय में विदग्धाजीर्ण हो जाता है, और हृदय कोष्ठ और गले में जलन होती है, उसके लिये द्वाक्षा और हरड को शहद में मिलाकर देना चाहिये। अथवा खाली अभया ( हरड ) को शहद में मिलाकर चाटना चाहिये ॥५११॥

भवेदजीर्णं प्रति यस्य शङ्का स्तिग्धस्य जनतोर्बलिनोऽन्नकाले ।

प्रातः सप्तुष्टीसभयामशङ्को

मुञ्जीत संप्राश्य हितं हितार्थी ॥५१२॥

जिस बलवान् एवं स्तिग्ध शरीरवाले पुरुष को भोजन के समय अजीर्ण की आशङ्का हो, उसको चाहिये कि प्रातःकाल सौठ और अभया ( हरड ) को खा ले। फिर बेफिकरी के साथ हितकारी भोजन को खाये ॥५१२॥

स्वरूपं यदा दोषविबद्धमांसं लीनं न तेजःपथमावृणोति ।

भवत्यजीर्णोऽपि तदा दुभुक्षा

या मन्ददुद्धि विषवन्निहन्ति ॥५१३॥

जिस समय—थोड़ा-एक पार्श्व में छिपा आमदोष के साथ मिलाकर, अनिर्माग्न को नहीं रोकता, उस समय अजीर्णावस्था में भी खाने की इच्छा उत्पन्न होती है। यह इच्छा-मन्ददुद्धि पुरुष को विष के समान मार देती है, इस समय में भोजन करने से दोष-रोग अधिक बढ़ जाता है१ ॥५१३॥

अत ऊर्ध्वं प्रवद्यामि गुणानां कर्मवित्तरम् । कर्मभित्स्त्वनुमीयन्ते नानाद्रव्याश्रया गुणाः ॥५१४॥ द्वादशः स्तम्भनः शीतो मूर्च्छावृट्स्वेददाहजित् । उष्णस्तद्विपरीतः स्यात्पाचनश्च विशेषतः ॥५१५॥ स्नेहमाद्वैवकृतं स्तिग्धो बलवर्णकरस्तथा । रूक्षस्तद्विपरीतः स्याद्विशेषात् स्तम्भनः खरः ॥५१६॥ पिच्छलो जीवन्तो वत्यः सन्धानः इलेषमलो गुरुः । विशदो विपरीतोऽस्मात् क्लेदाचूषणरोषणः ॥५१७॥

१ कुछ लोग तित्त पाठ आधिक मानते हैं— अन्तेन कुशेद्वैविशो पानैर्नैकं च पुर्येत । आशयं पवनादीनां चतुर्थमवशेष्येत ॥

अ० ४६ ]

सूत्रस्थानम्

२२३

दाहपाककरस्तीक्ष्णः स्नावणो भृदुरन्यथा । सादोपलेपबलकृद् गुरुस्तर्पणबृहणः ॥५१८॥ लघुस्तद्विपरीतः स्याल्लेखनो रोपणस्तथा । दशाद्याः कर्मतः प्रोक्तास्तेषां कर्मविशेषणेः ॥५१९॥ दशैवान्यान्यत्र प्रवद्यासि द्रवादींस्तान्निबोध से । दवः प्रकलेदनः, सान्द्रः स्थूलः स्याद्वन्धकारकः ॥५२०॥ इल्लक्षणः पिच्छिलवज्ज्येयः, कर्कशो विजदो यथा । सुखानुबन्धी सूक्ष्मश्च सुगन्धो रोचनो मृदुः ॥५२१॥ दुर्गन्धो विपरीतोऽस्माद्बृहत्तासारचिकारकः । सरोऽनुलोमनः प्रोक्तो मन्दो यात्राकरः स्मृतः ॥५२२॥ व्यवायी चाखिलं देहं व्याप्य पाकाय कल्पते । विकासी विकसन्नेवं धातुबन्धान् विमोक्षयेत् ॥५२३॥ आशुकारी तथाऽऽशुत्वाद्वावत्यस्मभसि तैलवन्त । सूक्ष्मस्तु सौक्ष्म्यात् सूक्ष्मेषु क्षोतः रवन्तुसरः स्मृतः ॥ गुणा विंशतिरित्येवं यथावत्परिकीर्तिताः ।

इसके आगे गुणों के कर्मों को विस्तार से कहते हैं। चूँकि नाना द्रव्यों में आश्रित शुभाशुभ २० गुण कर्मों से ही जाने जाते हैं। शीत गुण—ह्लादक (सुख दायक), स्तम्भक है, मूर्च्छा, प्यास, स्वेद और दाह का नाशक है। उष्णगुण शीत-गुण के विपरीत गुणोंवाला और विशेष कर पाचक (व्रणादि को पकानेवाला) है। स्निग्ध गुण—स्नेहन, मार्दव (कोमलता), वल एवं वर्ण को उत्पन्न करता है। रूक्षगुण—स्निग्ध के विपरीत गुणोंवाला तथा विशेष करके स्तम्भक एवं खर (कर्कश) है। पिच्छिलगुण—जीवनदायक, बलकारक, सन्धानकारक, कफवर्धक और गुरु है। विशुद्धगुण—पिच्छिलगुण के विपरीत है, इसलिये—आद्रता का नाश करनेवाला और रोहण करता है। तीक्ष्णगुण—दाह (जलन), पाक (व्रण को पकाना) उत्पन्न करता है, और सावक है। मृदुगुण, तीक्ष्णगुण के विपरीत है। गुरुगुण—साद (अङ्ग ग्लानि), उपलेप (मलबृद्धि), बल (कफ) वर्धक, तर्पण (तृप्तिकर), बृहण (देह वर्धक) है। लघुगुण—गुरु गुण के विरुद्ध तथा लेखन (पतला) करनेवाला, और रोपण है। शीत आदि दस गुणों के कर्मों को कह दिया, अब द्रव आदि दस गुणों के कर्मों को कहते हैं। द्रवगुण अक्लेदक (क्लिन्न करनेवाला), सान्द्रगुण स्थूल, बन्धकारक (उपचयकारक) है। रूक्षगुण—पिच्छिल के समान है, कर्कशगुण—विशद के समान है। सुगन्ध गुण—सुखदायक सूक्ष्म, रोचक और मृदु है। दुर्गन्ध गुण—सुगन्ध के विपरीत है, इसलिये—जी मच-लाना तथा अशुचिकारक है। सरगुण—वायु का अनुलोमक है, मन्द गुण—शरीर के वर्चन को कराता है। व्यवयी गुण—प्रथम सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर पीछे से जीर्ण होता है। विकासी गुण—अपक्वावस्था में ही सम्पूर्ण शरीर में फैलकर,

मद्य एवं विष के समान, सब शरीर-धातुओं को शिथिल करता है। आशुकारी गुण—जिस प्रकार पानी में तैल फैल जाता है, उसी प्रकार शीघ्र धातुओं में फैल जाता है। सूक्ष्म गुण—सूक्ष्म होने के कारण सूक्ष्म क्षोतों में फैल जाता है। इस प्रकार के वीस गुणों को कह दिया है।

वि० मन्तव्य—इस पाठ में २० गुणों के व्याख्यान की प्रतिष्ठा की गई है, परन्तु २२ गुण गिन दिये गये हैं—सुगन्ध एवं दुर्गन्ध अधिक हैं। यद्यपि “साध्यां गुर्वाद्यो बुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः। गुणाः प्रोक्ताः” च० सू० अ० १ के अनुसार अर्थ—शब्द आदि विषयों को भी गुण कहा जाता है। अतः सुगन्ध एवं दुर्गन्ध को गुणों में गिना जा सकता है, तथापि च० सू० अ० २५ में आहार के २० ही गुण माने हैं और उनमें सुगन्ध एवं दुर्गन्ध नहीं पड़े गये हैं। और इस सुश्रुत संदर्भ के अनुसार व्यवयी एवं विकासी भी चरक के उत्क्रमकरण वाग्भट सू० स्थान अ० १ में भी नहीं पड़े गये हैं। अस्तु ॥५१४-५२४॥

संप्रवदयाभ्यतश्चोर्ध्वमाहारगतिनिश्चयम् ॥५२५॥

जिस जिस प्रकार का अन्न-जीर्ण होकर जिस द्रव्य का पोषण करता है, उसका निर्णय कहते हैं ॥५२५॥

पञ्चभूतात्मके देहे ह्याहारः पाञ्चभौतिकः ।

विपक्कः पञ्चधा सम्यग्गुणान् स्वातन्त्रिर्बर्धयेत् ॥५२६॥

इस पृथ्वी आदि पञ्चभूतात्मक शरीर में, आहार की पञ्चमहाभूतों की अग्नि द्वारा पक्कर अपने गुणों को बढ़ाता है। पृथ्वी गुणवाले आहार-पार्थिव को बढ़ाने हैं, द्रव गुणवाले जलीय गुण को बढ़ाते हैं ॥५२६॥

अविदग्धः कफः, पित्तं विदग्धः, पवनं पुनः ।

सम्यग्निवपको निःसार आहारः परिबृंहयेत् ॥५२७॥

अविदग्ध (अधुर आहार) आहार कफ को बढ़ाता है, विदग्ध (अस्लीभूत) आहार पित्त को बढ़ाता है। भली प्रकार से पका आहार—सार रहित होने से (मल द्वारा) वायु को बढ़ाता है ॥५२७॥

विष्णुमूत्रमाहारमलः सारः प्रागगिरितो रसः ।

स तु न्यानेन विक्षिप्तः सर्वान् धातून् प्रतपयेत् ॥५२८॥

शोणित वर्णनीय अध्याय में—विट् (मल) और मूत्र और रस की आहार से उत्पत्ति कह दी। यह रस न्यान वायु के द्वारा प्रेरित होकर केदारकुल्या न्याय से सब धातुओं का पोषण करता है ॥५२८॥

१—चरक में भी कहा है—

“प्रथास्वरेन पुन्युत्ते देहे द्रव्यगुणाः पृथक् ।

पार्थिवाः पार्थिवानेवं शेषाः शेषाश्च कृत्स्नशः ॥”

२२४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४६ ]

कफः पित्तं मलः खेपु स्वेदः स्थानन्खरोम च ।

नेत्रविट् त्वच्च च स्नेहो धातूनां क्रमशो मलाः ॥५२६॥

आहार का मल—मल और मूत्र, रस का मल कफ, रक्त का मल पित्त, मांस का मल—कान मुख नासिका का मल, मेदका मल-स्वेद, अस्थियों के मल नख और रोम, मजा का मल—आँख मल, त्वचा का जो स्नेह है, वह मल है, ये धातुओं के क्रमशः मल है। शुक्र—मल रहित है, इसलिये इसका कोई मल नहीं है, जिस प्रकार कि हजारों बार तपाये स्वर्ण में से मल नहीं निकलता। इसलिये—शुक्रस्य सारमोजः। अत्यन्त शुद्धतयास्य मलाभावः ॥

वि० मन्तव्य—रस आदि धातुओं का स्वस्थस्थान में स्वस्वामि द्वारा परिपाक होने पर कफ आदि मलों की उत्पत्ति एवं बृद्धि होती है ॥५२६॥

दिव्या१ विबुद्धे हृदये जाग्रतः पुण्डरीकवत् ॥

१—दिन में मनुष्य चलता-फिरता रहता है, इसलिये दिन में भोजन हानि नहीं करता।

प्रातरात्रे त्वजीर्णेऽपि सायभाशो न दुष्यति ।

दिव्या प्रवृध्यतेऽकंण हृदयं पुण्डरीकवत् ॥

तस्मिन् विबुद्धे लोतांसि स्फुटत्वं याति सर्वशः ।

व्यायामाच्च विहाराच्च विशिष्यन्तवाच्च चेतसः ॥

न बलेदमुपगच्छति दिवा तेनास्य आवतः ।

अबिलन्तेष्वन्मासिकतम्यत्वेपु न दुष्यति ॥

षविदग्ध इव क्षीरे क्षीरमन्यद् विमिश्रितम् ।

रात्रौ तु हृदये म्लाने संवृत्तेष्वनयेपु च ॥

याति कोष्ठे च विकलेदं संवृत्ते देहधातवः ।

किलन्तेष्वन्यदपक्वेपु तेष्वसिकतं प्रवृध्यति ।

विदग्धेषु पयःस्वन्वत् पयस्तप्तेष्विवान्पितम् ॥ चरको-

वि० अ० १५ ।

अन्नमकिलन्नधातुत्वाद्जीर्णेऽपि हितं निजि ॥५३०॥

हृदि संमोलिते रात्रौ प्रसुमस्य विशेषतः ।

किलन्नविस्त्रस्तधातुत्वाद्जीर्णे न हितं दिवा ॥५३१॥

दिन में जागते हुए पुरुष का हृदय कमल के समान खिला रहता है (मनुष्य का मस्तिष्क क्रियाशील रहता है। चेष्टावद् तन्तु गति करते हैं)। धातुओं के अकिलन्न होने से, रात्रि में, अजीर्णावस्था में भी किया गया भोजन हितकारी होता है। रात्रि में खासकर सोने से हृदय संकुचित हो जाता है (ज्ञान तन्तु सुतावस्था में रहते हैं), इसलिये धातुओं के किलन्न एवं शिथिल होने से अजीर्णावस्था में दिन के समय भोजन करना हितकारी नहीं। सायंकाल के भोजन करने से यदि अजीर्ण उत्पन्न हो तो प्रातःकाल भोजन नहीं करना चाहिये। प्रातःकाल के भोजन करने से यदि अजीर्ण उत्पन्न हो तो सायंकाल का भोजन हानिकारक नहीं है ॥५३०,५३१॥

इमं विधिं योऽनुमतं महामुने-

र्नुपर्विमुद्यस्य पठेद्वि यत्ततः ।

स भूमिपालाय विधातुमौषधं

महात्मनां चाहंति सूरिसत्तमः ॥५३२॥

इसका फल—

जो मनुष्य महामुनि एवं राजर्षियों में अग्रगण्य धन्वन्तरि से अनुमत—सूत्रस्थान में वर्णित इस आधार विधि को पढ़ता है, वह सूरिसत्तम (पण्डित प्रधान)—राजा के लिये औषध बना सकता है, तथा राजाओं के समान सत्कार को पाने के योग्य भी होता है ॥५३२॥

इति भगवता श्रीधन्वन्तरिणोपदिष्टायां तच्छिष्येण

महर्षिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां

सूत्रस्थाने षट्चत्वारिंशत्तमोध्यायः ।

२६

अथ निदानस्थानम्

प्रथमोऽध्यायः

अथातो वातव्याधिनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

हेतु, लिंग और औषध ज्ञान इनको वीज रूप से सूत्रस्थान में कहकर हेतु लक्षण का प्रतिपादन करने के लिये इस-निदान-स्थान का आरम्भ करते हैं। इसमें भी वायु के सबसे प्रधान होने से तथा आरोग्य लाभ की इच्छा से सबसे प्रथम 'वात-व्याधि निदान' की व्याख्या करते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था१।

वि० मन्तव्य—निदान शब्द का अर्थ—रोगों के हेतु तथा लक्षण का निर्देश-वर्णन जिस प्रकरण में हो उसका नाम निदानस्थान है। जिसके द्वारा रोग का निश्चय किया जाता है उसका नाम निदान है। इस प्रकार निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय तथा सम्प्राप्ति का नाम निदान हो जाता है, परन्तु निदान-रोग के निमित्त, हेतु, आयतन, प्रत्यय, उत्थान, कारण, मूल, प्रवर्त्तक, उत्पादक का नाम भी है, पूर्वरूप-भावी, उत्पत्त्यमान, भविष्यत् रोग के लक्षण का नाम है, रूप-उत्पन्न-वर्त्तमान-विद्यमान रोग के लक्षणों का नाम है, रूप के पर्याय हैं—संस्थान, व्यञ्जन, लिंग, चिह्न, आकृति आदि। इनमें व्यञ्जन वह लक्षण है जो रोग का प्रधान लक्षण या स्व-स्वकीय रूप होता है अर्थात् जिसके बिना वह-रोग "वह रोग" ही नहीं कहला सकता है, यथा—ज्वर का सन्ताप, पाण्डुरोग का पाण्डु-वर्ण, कास का कसन—खाँसना, श्वास का श्वास फूलना तथा अर्ध का अर्धोङ्कुर—मांसाङ्कुर आदि २। उपशय—हेतु एवं रोग के विपरीत अथवा विपरीतार्थकारी (विपरीत न होने पर भी विपरीत अर्थ-फल करनेवाले) औषध, आहार तथा विहार का मुखानुबन्ध (आरोग्य प्रद) उपयोग-सेवन का नाम है और सम्प्राप्ति-रोग की उत्पत्ति के प्रकार का नाम है। इस निदानस्थान में जितने रोग लिखे गये हैं उनके संक्षिप्त अथवा विस्तृत निदान पूर्वरूप, रूप, उपशय तथा सम्प्राप्ति सब लिखे गये हैं। यदि उपशय न भी लिखा गया हो तो समझ लिया जाय कि—जो आहार-विहार रोग के निदान-कारण होते हैं उनसे विपरीत आहार-विहार उपशय होते हैं। वातव्याधि-वातजनित विशिष्ट रोग है ॥ १,२ ॥

धन्वन्तरि धर्मभूतां वरिष्ठममृतोद्भवम्१।

चरणातुपसंगृह्य सुश्रुतः परिपुच्छति ॥ ३ ॥

वायोः प्रकृतिभूतस्य व्यापन्नस्य च कोपनैः।

स्थानं कर्म च रोगांश्च वद मे वदतां वरः ॥ ४ ॥

धर्मात्माओं में वरिष्ठ (श्रेष्ठ) एवं अमृत कलश के साथ उत्पन्न भगवान् धन्वन्तरि के चरणों को छूकर सुश्रुत ने पुनः पूछा कि—हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! अपनी प्रकृति (स्वभाव) में स्थित एवं वायु के समान द्रव्य गुण कर्मों के द्वारा कुपित होने से विकृत वायु के स्थान कर्म (सामान्य एवं विशेष) तथा रोगों को मेरे प्रति कहें ॥ ३,४ ॥

तस्य तद्बचनं श्रुत्वा प्रात्रवीक्षिष्यां वरः।

स्वयंभूरेष भगवान् वायुरित्यभिज्ञाद्वितः ॥ ५ ॥

स्वातन्त्र्यान्तित्यभावाच्च सर्वगतत्वात्तथैव च।

सर्वेषामेव सर्वात्मा सर्वलोकनमस्कृतः ॥ ६ ॥

स्थित्युत्पत्तिविनाशेषु भूयानामेष कारणम्।

अव्यक्तो व्यक्तकर्मा च रूक्षः शीतो लघुः खरः ॥ ७ ॥

तिर्यग्गो द्विगुणश्चैव रजोबहुल एव च।

अचिन्त्यवीर्यो दोषाणां नेता रोगसमूहराद् ॥ ८ ॥

आशुकारी सुदृश्वारी पक्वाधानगुदालयः।

भिषजों में श्रेष्ठ धन्वन्तरि ने सुश्रुत के बचन को सुनकर उत्तर दिया—यह वायु भगवान् (समस्त ऐश्वर्य-अणिमादि गुणों से युक्त) है। अपने कार्य में स्वतन्त्र होने से, नित्य तथा सर्वत्र व्याप्त (गतिमान्) होने से (आकाश की भाँति) इसको स्वयम्भू कहते हैं। एवं सूक्ष्म-परमाणु होने से भी स्वयम्भू है। सब स्थावर एवं जंगम पदार्थों में कारण-कार्यात्मक रूप से विद्यमान है। सब प्राणियों की स्थिति (जीवन), उत्पत्ति और विनाश में यही वायु कारणभूत है, इसलिये सम्पूर्ण लोक इसको नमस्कार करता है। अव्यक्त (अहस्य) होते हुये भी इसके कर्म (कार्य) व्यक्त (प्रकट) हैं। वायु के कर्म—रूक्ष, शीत (असंयुक्तवायु) लघु, खर (ककश), तिर्यग्ग (तिर्यग्ग गामी), द्विगुण (शब्द-स्पर्श गुण), रजोबहुल (रजोगुण की प्रधानता), अचिन्त्यवीर्य (अचिन्त्यशक्ति), दोषाणां नेता (दोष-धातु-मल का प्रेरक), पित्त-कफ रक्तादि के रोग समूहों में शोभित होता है, (सबसे अधिक अस्ती वात विकार हैं),

१—यथा चरक में—

“वायोर्वाथा स्तुतिरपि भवत्यारोप्याय।”

१ “अमृतापूर्णकलशं बिभ्रद् वलयभूषितः।”

२२६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० १

आशुकारी ( शीघ्रकारी ), प्रकृति में रहने पर भी बार बार गति करता है। इस वायु के स्थान पक्वाधान ( पक्वाशय-बृहदं ) और गुदा हैं।

वि० मन्तव्य—पक्वाधान—मलाशय और गुदा वायु का प्रधान स्थान है, अर्थात् उनमें विकार उत्पन्न होने पर ही वायु के विकार उत्पन्न होते हैं और उनके शुद्ध रहने पर वायु भी शुद्ध-शान्त रहता है ॥ ५-८ ॥

देहे विचरतस्तस्य लक्षणानि निबोध मे ॥ ९ ॥

दोषधात्वमिसमतां संप्राप्तिं विषयेषु च ।

क्रियाणामानुलोम्यं च करोत्यकुपितोऽनिलः ॥ १० ॥

( इन्द्रियाथोपसंप्राप्तिं दोषधात्वग्न्यवैष्टतम् ।

क्रियाणामानुलोम्यं च कुर्याद्वायुरदूषितः ॥ १० ॥ )

शरीर के अन्दर गति करती हुई वायु के लक्षणों ( मुख से कहे ) को सुनो—दोष एवं धातु तथा अग्नि की समानावस्था में रखना, शब्द-स्पर्श-रूप-रस और गन्ध ( विषयों ) में मन को इन्द्रियों के साथ संयुक्त करना, शारीरिक वाणी एवं मन की क्रियाओं को प्रवृत्त करना, ये अकुपित-प्रकृतिस्थ वायु के कार्य हैं ॥ ९, १० ॥

यथाऽग्निः पञ्चधा भिन्नो नामस्थानक्रियामयैः ।

भिन्नोऽनिलस्तथा ह्येको नामस्थानक्रियामयैः ॥ ११ ॥

प्राणोदानौ समानश्च व्यानश्चापान एव च ।

स्थानस्था मासृताः पञ्च यापयन्ति शरीरणिम् ॥ १२ ॥

जिस प्रकार से अग्नि (पित्त)—नाम (पाचक रङ्गक आदि), स्थान (आमाशय-पक्वाशय ), एवं कर्म (अन्न पाचन आदि) के भेद से पाँच प्रकार की है, उसी प्रकार से एक वायु भी नाम-स्थान और कर्म के कारण पाँच प्रकार की है। यथा—प्राण, उदान, समान, व्यान और अपान-ये पाँच भेद हैं। स्वास्थ्यवस्था में ये पाँचों शरीर को धारण करती हैं ॥ ११, १२ ॥

यो वायुर्वैकत्रसंचारी स प्राणो नाम देहयुक्तः ।

सोऽन्तं प्रवेशयत्यन्तः प्राणोश्चाप्यवलम्बते ॥ १३ ॥

१—यथा छान्दोग्योपनिषद् में—“वायुर्होभितान् सर्वान् संवृज्जते”। इसी प्रकार—“वायुस्त्रीय संसर्गः”—यहाँ से आरम्भ करके—‘आध्यात्मं प्राणो वाचं संसर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव धामप्येति’। (छा० ४।३।३)

२—सर्वं लघु प्रकाशकमिष्टुपष्टमभकं चलञ्च रजः ।

सांख्यकारिका ।

३—वायुस्तन्त्रयंत्रधरः प्राणोदानसमानव्यानापानात्मा, प्रवर्त-कश्चैधानामुच्चावचानां, नियन्ता प्रणेता च मनसः, सर्वेन्द्रियाणा-मुद्योजकः,.... इत्यादि ।

चरक० सू० अ० १२ ।

प्रायशः कुरुते दुष्टो हि काश्चासादिकान् गदान् ।

इनमें जो वायु वक्त्र ( मुख-उर-कण्ठ ) में संचरण करता है, उसका नाम प्राण हैं। यह प्राण शरीर को धारण करता है, भोजन को शरीर के अन्दर प्रविष्ट करता है, प्राणों का ( अग्नि सोमीय ) अधिष्ठान ( आधार भूत-आश्रय स्थान ) है। दूषित होकर यह प्राण-हिक्का—श्वास-प्रतिश्वास आदि रोगों को उत्पन्न करता है।

वि० मन्तव्य—प्राण प्रकर्षण आ-समन्तात् अनिति अर्थात् जिसके द्वारा जन्तु जीवित रहता है प्राणी कहलाता है अथवा प्राणयति इति प्राणः—अर्थात् जो जीवित रहता है। इसका स्थान—नाभि माना जाता है—शरीर में दो अवयवों का नाम “नाभि” है १—घुच्ची या तुन्न जो उदर पर बाहर दीखती है। गर्भ या भ्रूण का प्राणन इसी के द्वारा होता है। २—“पक्वाऽऽ-माशययोः मध्यं सिराप्रभव नाभिः नाम मम” (सु०शा०अ०६) अर्थात् मलाशय एवं आमाशय का मध्य ( जुह्दान्न नामक अवयव ) “नाभि” है। यहीं से रसवाही सिराओं का प्रारम्भ होता है। जन्म के पश्चात्—नालच्छेदन के अनन्तर इसी नाभि से प्राण की प्रवृत्ति होती है जीवन भर और उसका हृदय भी माना जाता है—क्योकि साधारणतः—हृदय की गति चालू रहने पर ही जीवन-प्राण रहता है अन्यथा नहीं। प्राण-उदान आदि शब्द “अन् प्राणने” धातु में उपसर्ग लगाकर बनाये गये हैं। प्राण का प्रभाव जीवन पर है ॥ १३ ॥

उदानो नाम यस्तुर्ध्वमुपैति पवनोत्तमः ॥ १४ ॥

तेन भाषितगीतादिविशेषोऽभिप्रवर्तते ।

ऊर्ध्वजत्रुगतान् रोगान् करोति च विशेषतः ॥ १५ ॥

जो श्रेष्ठ वायु ऊपर को जाती है उसका नाम ‘उदान’ है इसके स्थान—नाभि-उर और कण्ठ हैं। इस वायु के द्वारा ही—भाषण, गाना, उल्लेख आदि विशेष होते हैं। खासकर यह वायु जत्रु से ऊपर के ( वक्ष एवं अंस संधि से ऊपर के ), आंख, मुख, नासिका, कान एवं शिर के रोगों को तथा कामक्षा आदि रोगों को उत्पन्न करती है।

वि० मन्तव्य—उदान—उत्—ऊर्ध्व—आ—समन्तात् अनिति इति उदानः। अर्थात् जो ऊपर के अवयवों

१ उपनिषद् में—“कस्मिन् हमुक्तान्ते उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन् वा प्रतिष्ठितेऽहं प्रतिष्ठास्यामीति—स प्राणमसृजत ॥”

२—यथा सैन्धवोऽश्वः शंकुमुत्पाद्य धावति—तद्वत् प्राणो हृद-सन् सर्वान् वायुत्त्वाद्य प्रयाणकाले धावति ॥

२ यथा चरक में—

“उदानस्य पुनः स्थानं नाभि उरः कण्ठ एव च । वाक्प्रवृत्तिप्रत्यलो जो बलवर्णादि कर्म च ॥”