सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४१ ]
प्रसह—काक (कौवा), कङ्क (दीर्घचंघु), कुरर (कुरल), चाक, मास, शशधाती१, उल्क, चिलि, श्येन (बाज), गीष आदि पक्षी, झपटकर (छीनकर) खाते हैं इसलिये प्रसह हैं ॥
एते सिंहादिभिः सर्वे समाना वायसादयः ।
रसवीर्यविपाकेषु विशेषाच्छोषिणे हिताः ॥ ७४ ॥
इनके सामान्य गुण—ये कौवे आदि सब पक्षी गुणों में रस, वीर्य, विपाक में सिंह आदि के समान हैं । विशेषकर राजयक्ष्मा रोगी के लिये हितकारी हैं ॥ ७४ ॥
मदगुमूषिकवृक्षशायिकावकुशमतिघासवानरप्रभृतयः पर्णमृगाः ॥ ७६ ॥
पर्णमृग—मदगु (वृक्षचर सर्प), मूषिक, वृक्षशायिका (गिल-हरी), अवकुश (गोलगूल), पूतिघास (खाटाश), वानर आदि वृक्षों पर रहने से पर्णमृग हैं ॥ ७६ ॥
मधुरा गुरवो वृष्याश्चक्षुष्याः शोषिणे हिताः ।
सूष्ठमूत्रपुरीषाश्च कासाशैःश्वासनाशनः ॥ ७७ ॥
सामान्य गुण—मधुर, गुरु, वृष्य (शुक्रवर्धक), नेत्ररोग के लिये हितकारी, राजयक्ष्मा रोगी के लिये उत्तम, मल-मूत्र के प्रवर्त्क, कास, अर्श, श्वास नाशक हैं ॥ ७७ ॥
श्याचिच्छल्यकगोधाशशवृषदंशलोपाकलोमशकर्णकदली-मृगप्रियकाजगरसर्पमूषिकनकुलमहाबभ्रप्रभृतयो विलेशयाः ।
विलेशय—शवावित (सूई के समान बालोंवाला) शलुकी, गोधा (गोह), शश (शशक), वृषदंश (गाँव की बिल्ली), लोपाक (भृगाल भेद लोमड़ी), लोमशकर्ण (बड़े बिल्ले के समान), कदलीमृग, अजगर (सर्प), सर्प (सांप दर्वीकर), मूषिक, (चूहा), नकुल (नेवला), महाबभ्र (बड़ा नकुल), आदि जानवर बिलों में रहने से विलेशय हैं ॥ ७८ ॥
१ शशन्ती—Golden Eagle—
यह पक्षी हिमालय, उत्तर एशिया और यूरोप में होता है । इस पक्षी में यह खास बात है कि शिकार में नर और मादा एक दूसरे की मदद करते हैं । यह पक्षी एक पत्तीब्रत वाला होता है । खरगोश और इनके बच्चे दिन भर बिल में रहा करते हैं । इन को बिल में से बाहर निकालने के लिये यह खास युक्ति करता है । यह युक्ति इस पक्षी की, किसी भी अनुभवनी एवं होबियार शिकारी से कम नहीं होती है । अर्थात् नर और मादा में से कोई एक पक्षी बिल के पास छिपकर बैठ जाता है, और फिर दूसरा पक्षी झाड़ियों में जाकर तेज आवाज से सीटी सी बजाता है, साथ में इतनी गड़बड़ और तूफान मचाता है कि खरगोश और उसके बच्चे घबरा के बाहर निकलकर भागने के लिये बाचित होते हैं । और ज्यों ही खरगोश बाहर निकलता है, त्यों ही निगरानी रखनेवाला पक्षी इन पर झटपड़ पड़ता है, और इनको पकड़ लेता है ।
क्योंकि इस पक्षी का मुख्य आहार खरगोश है, इसलिये इसको शशन्ती, शशधाती—ये नाम दिये गये हैं ।
वचोमूत्रं संहंतं कुर्पुरेते
वीर्ये चोष्णाः पूर्ववत् स्वादुपाकाः ।
वातं हन्युः इलेषमपित्तं च कुर्पुः
सिनधाः कासश्चासकाश्यापहाश्च ॥ ७९ ॥
इसके सामान्य गुण—मल और मूत्र को बढ़ा करते हैं, उष्ण-वीर्य, मधुरविपाक, वातनाशक, कफपित्त को करनेवाले, सिन्धु, कास, श्वास, क्रुशता को मिटाते हैं ॥ ७९ ॥
कषायमधुरस्तेषां शशः पित्तकफापहः ।
नातिशीतल्वीर्यस्वाद्वातसाधारणो मतः ॥ ८० ॥
इसमें शशक—कषाय मधुररस, पित्तनाशक, न तो वायु को करता है, और न वायु का शमन करता है, (मधुर होने से वातशमक है और शीतल होने से वायुकारक नहीं, इसलिये साधारण है ) ॥ ८० ॥
गोधा विपाके मधुरा कषायकटुका स्मृता ।
वातपित्तप्रशमनी बृहणी बलवर्धनी ॥ ८१ ॥
गोधा—मधुरविपाक (कषाय-कटुरस), वातपित्तशमक, बृहण (देहवर्धक), बलवर्धक है ॥ ८१ ॥
शल्यकः स्वादुपित्तघ्नो लघुः शीतो विषापहः ।
प्रियको मास्तु पथ्योऽजगरस्त्वर्शसां हितः ॥ ८२ ॥
शल्यक—मधुर, पित्तनाशक, लघु, शीतल, विषनाशक है । प्रियक—वायुरोग में पथ्य है । अजगर—अश्वरोगियों के लिये हितकारी है ॥ ८२ ॥
दुर्नामानिलदोषघ्नाः क्रुमिदूषीविषापहाः ।
चक्षुष्या मधुराः पाके सर्पा मेधाग्निवर्धनाः ॥ ८३ ॥
सांप—दुर्नाम (अश्व) वायु-नाशक, क्रुमि एवं दूषीविष को दूर करते हैं, आँखों के लिये हितकारी, मधुर-विपाक, मेधा-अग्निवर्धक है ॥ ८३ ॥
दर्वीकरा दीपकाश्च तेषुकताः कटुपाकिनः ।
मधुराश्चातिचक्षुष्याः सूष्ठविग्मूत्रमारुताः ॥ ८४ ॥
इन सर्पों में दर्वीकर (दर्वी जैसे फणावाले), और दीपक (राजीमन्त) कटुपाकी हैं, मधुर, आँखों के लिये अति हितकारी, मल-मूत्र एवं वायु के प्रवर्त्क हैं ॥ ८४ ॥
अश्वाश्चतरगोखरोवृषस्तोरभमेदःपुच्छकप्रभृतयो ग्राम्याः ॥ ८५ ॥
ग्राम्य—अश्व (घोड़ा), अश्वतर (खच्चर), गाय, खर (गधा), ऊँट, वस्त (बकरा), उरभ्र (मेढा), मेदःपुच्छ (दुम्बा) आदि ग्रामों में रहने से ग्राम्य हैं ॥ ८५ ॥
ग्राम्या वातहराः सर्वे बृहणाः कफपित्तलाः ।
मधुरा रसपाकाभ्यां दीपना बलवर्धनाः ॥ ८६ ॥
इनके सामान्य गुण—ग्राम्य पशु वातनाशक, बृहण (शरीर वर्धक) कफ-पित्त को करते हैं । मधुररस मधुरविपाक, अग्निदीपक और बलवर्धक हैं ॥ ८६ ॥
नातिशीतो गुरुः सिन्धो मन्दपित्तकफः स्मृतः ।
वृगलत्स्वनभिष्यन्दो तेषां पीनसनाशनः ॥ ८७ ॥
अ० ४६ ]
सूत्रस्थानम्
१६१
वकरी (छागल)—ईष, शीतल, गुरु, स्निग्ध अल्पपित्त, अल्प कफकारक ( अल्प स्नेह और अल्प गुरुता होने से अल्प-कफकारक, उष्णता का सम्पर्क होने से तथा अल्प शीतल होने से अल्प पित्त), अनभिष्यन्दि, (दोष, धातु, मलों को थोड़ा उत्तेजित करती है) तथा पीनसरोगनाशक है ॥८७॥
बृहण् मांसमौरग्रं पित्तश्लेष्मापहं गुरु । औरग्र मांस का गुण—बृहण् (देहवर्धक) पित्तकफनाशक, गुरु है।
मेदःपुच्छोद्भवं वृष्यमौरग्रसहसं गुणैः ॥८८॥ मेद-पुच्छ (हुम्बा)—वृष्य (शुक्ल) तथा उरग्र के समान गुणवाला है ॥८८॥
श्वासकासप्रतिशयायविषमव्वरनाशनम् । श्रमात्यन्तिहितं गव्यं पवित्रमन्तिलापहम् ॥८९॥ गव्य (गाय) मांस का गुण—श्वास, कास, प्रतिशयाय, व्वरनाशक, श्रम एवं अलगपिन के लिये हितकारी, पवित्र, वायुनाशक है ॥८९॥
औरग्रवत्सलवर्णं मांसमेकशफोद्भवम् । एक शफ (खुरवाले घोड़े आदि) का मांस उरग्र के समान गुणकारी, थोड़ा नमक युक्त होता है ।
अल्पाभिष्यन्चयं वर्गो जाङ्गलः समुदाहृतः ॥९०॥ दूरे जनान्तनिलया दूरे पानीयोगो वराः । ये मृगाश्च विहङ्गाश्च तेऽल्पाभिष्यन्दिनो सताः ॥९१॥ अतीवासन्ननिलयाः समीपोदकगोचराः ।
ये मृगाश्च विहङ्गाश्च महाभिष्यन्दिनस्तु ते ॥९२॥ यह जाङ्गल वर्ग थोड़ा अभिष्यन्दी है । जो मृग और पक्षी मनुष्यों के समीपवर्ती स्थान से दूर रहते हैं, तथा पानी के स्थान से दूर रहते हैं, वे अल्प अभिष्यन्दी होते हैं (उन्निष्ठ-अभिष्यन्दि भोजनों के न मिलने से दोषकोपक नहीं होते) । जो मृग-पक्षी घरों के बहुत समीप रहते हैं, या जो पानी के बहुत समीप रहते हैं, वे बहुत ही अभिष्यन्दी दोषप्रकोपक होते हैं ॥९०-९२॥
आनूपवर्गस्तु पञ्चविधः । तथाथा—कूलचराः, प्लवाः, कोषस्थाः, पादिनो, मस्त्याश्चेति ॥९३॥
आनूपवर्ग (जल बहुत प्रदेश का) पाँच प्रकार का है । यथा—कूलचर (किनारों पर चरनेवाले), प्लव (तैरनेवाले), कोषस्थ (शङ्खादि सम्पुट में रहनेवाले), पादी (पाँववाले) और मछलियाँ ॥९३॥
तत्र गजगवयमहिषरुरुचमरसुमररोहितवराहखज्जिगो- कर्णकालपुच्छकोद्रन्यङ्क्ववरण्यगवयप्रभृतयः कूलचराः पशवः ॥९४॥
इनमें कूलचर—गज (हाथी), गवय, महिष (भैंसे), रुरु, चमर, सुमर (महाशूकर) रोहित, वराह, खज्जी (गैंडा), गोकर्ण,
कालपुच्छक, ओन्दुर (ऊदबिलाव), न्यंकु (मृग), अरण्यगवय (वन्य गौ) आदि कूल-पानी के किनारे चरनेवाले पशु हैं ॥
वातपित्तहरा वृष्या मधुरा रसपाकयोः । शीतला बलिनः स्निग्धाः मूत्रलाः कफवर्धनाः ॥९५॥
इनके सामान्यगुण—वात-पित्तनाशक, वृष्य (शुक्ल) मधुररस, मधुरविपाक, शीतल, वलकारक, स्निग्ध, मूत्रल और कफवर्धक हैं ॥९५॥
विरुक्षणे लेखनश्च वीर्योष्णः पित्तदूषणः । स्वाद्वम्ललवणस्तेषां गजः श्लेष्मानिलापहः ॥९६॥ गज (हाथी)—रूक्ष, लेखन, उष्णवीर्य, पित्तप्रकोपक, स्वादु, अम्ल, लवणरस, कफवायुनाशक हैं ॥९६॥
गवयस्य तु मांसं हि स्निग्धं मधुरकासजित् । विपाके मधुरं चापि न्यवायस्य तु वर्धनम् ॥९७॥ गवय का मांस, स्निग्ध मधुररस, कासनाशक, मधुरविपाक और मैथुन शक्ति को बढ़ाता है ॥९७॥
स्निग्धोष्णमधुरो वृष्यो महिषवर्त्तर्पणो गुरुः । निद्रापुंस्त्वबलस्तन्यवर्धनो मांसदावर्द्धकृत् ॥९८॥ भैंस का मांस—स्निग्ध, उष्ण, मधुर, वृष्य (शुक्ल) तर्पण (वृत्तिकारक), गुरु, निद्रा, पुंस्त्व (पुरुषत्व), बल और दूध को बढ़ाता है, मांस को हृद करता है ॥९८॥
रुरोर्मांसं समधुरं कषायानुरसं स्मृतम् । वातपित्तोपशमनं गुरु शुक्रविवर्धनम् ॥९९॥ तथा चमरमांसं तु स्निग्धं मधुरकासजित् । विपाके मधुरं चापि वातपित्तप्रणाशनम् ॥१००॥ सुमरस्य तु मांसं च कषायानुरसं स्मृतम् । वातपित्तोपशमनं गुरु शुक्रविवर्धनम् ॥१०१॥
रुरु का मांस—मधुररस, कषाय अनुरस, वातपित्तशामक, गुरु, शुक्रवर्धक है । चमर का मांस स्निग्ध, मधुररस, कासनाशक, मधुरविपाक, वात-पित्तनाशक है । शुक्रवर्धक है ॥
स्वेदनं बृहणं वृष्यं शीतलं तर्पणं गुरुः । श्रमानिलहरं स्निग्धं वाराहं बलवर्धनम् ॥१०२॥ वराह (सूअर) का मांस—स्वेदक, बृहण्, वृष्य, शीतल, तर्पण (वृत्तिकारक), गुरु, स्निग्ध, श्रम-वायुनाशक और बलवर्धक है ॥१०२॥
कफमनं खज्जिपिशितं कषायमन्तिलापहम् । पित्तं पवित्रमायुष्यं बद्धमूत्रं विरुक्षणम् ॥१०३॥ खज्ज (गैंडे) का मांस—कफनाशक, कषायरस, वायुनाशक, पित्तों के लिये हितकारी, पवित्र, आयुवर्धक, मूत्र को रोकने-वाला और रूक्ष है ॥१०३॥
१९२
गोकणेमांसं मधुरं स्निग्धं सदु कफावहम् ।
विपाके सधुरं चापि रक्तपित्तविनाशनम् ॥१०४॥
गोकणं का मांस-मधुर, स्निग्धे मृदु, कफनाशकः मधुर
विपाक, रक्तपित्तनाशक हे ।|१०४]। |
हंससारसक्रौव्वचक्रवाकङुररकादस्बकारण्डवजीवज्ञी- वकवकवराकापुण्डरीकषप्टवशरारीमुखनन्दीुखमद्गूत्को- ञकाचाक्षमल्िकाक्षश्चक्टाक्षपुष्करायिकाकोनाख्काग्बु -
कुक्टिकामेघरावश्वेतवारखप्रश्तयःप्ठ ओः संघातचारिणः।
प्टव (तैरनेवाे) पक्षी- दंस, खारख, क्रोच, चक्रवाक
(चकवा), कुरर, कादम्ब (कठहंख), कारण्डव; जीवज्जीव) वक,
वलाका, पुण्डरीक, प्टव, शरारीमुख, नन्दौमुख, सद्गु (जलकोवा), उ्रोश, काचाक्ष, मल्खिकाक्ष, ुक्छाक्ष, पुष्कस्यायिकरा;
कोनाल्क, अम्बुकुक्छुटिका (जल्कुक्कुरी), मेषराव (चातक)
श्वेतवारक आदि तैरनेवाले पशची है, ये इकट्ठे रहते इं ॥१०५॥
रक्तपित्तहरः ओताः स्निग्धा वृष्या मरुञ्जिताः ।
सष्टमूत्रपुरीषाश्च सधुरा रसपाकयोः ॥१०६॥
इनके सामान्यगुण-रक्त-पित्तनाशक, शीतल, स्निग्ध,
इष्य (शुक्रवधंक), वायुनाशक, मलमूत्र के प्रवत्तंक; मधुररख
मधुर विपाक हँ ॥१०६॥)
गुरूष्णमधुरः स्निग्धः स्वरबणेवलप्रदः ।
ठंहणः ञ्॒क्ररस्तेषां हंसो वातदिकार छत् ॥१०७॥
हंस के गुण, उष्णवीयं, मधुररख, स्निग्ध, स्वसण-बल-प्रद
चंहण (देदव्धक), शुक्रवध॑क, वायुविकारनाशक है ।१०७॥
अङ्खशङ्खनखशक्तिशम्बूकभल्लकप्रथ्तयः कोशस्थाः ॥
कोशस्थ ( शङ्ख आदि मे रदनेवाे )-- शद्ध, शद्धनख,
(षद्रशङ्ख), शक्ति (खीप), शम्बूक (आवत्तंकोश), भल्द्क
(आदि शम्बूक, वोडिक) कोशस्थ हैँ ।॥१०८]
कूमेङकम्भीरधेतककेटकृष्णककेटकनि्चुमारपरश्रतयः पादिनः
पादी (बवल) -कूमं (कच्छुमा), ऊुम्मीर (घड़ियाल),
श्वेत ककरक, कृष्ण ककटक (ककड), शिशुमार पाँववाछे
(गुहामच्छ) ई ॥१०६॥
शङ्ककरूमारयः स्वादुरसपाका मरुन्सुदः।
ओताः स्निग्धा हिताः पित्ते वचस्याः उलेष्मवधंनाः ॥
शङ्ख एवं कूमादि- मधुररसः, मधुरविपाक, वायुनाशक्, `
शीतवीयं, स्निग्ध, पित्तरोग मेँ दितकारी, वचस्य (इष्य-कूममो
वातहरो इष्यो ) ओर कफवधक दै |१००॥ य
कृष्णककंटकृस्तेषां बल्यः कोष्णोऽनिखापहः ।
युक्ठः सन्धानञ्रत् सृष्टविणम्त्रोऽनिर्पित्तदा ॥११६॥
इनमें कृष्ण ककंटक~उष्ण, वायुनाशक दे । श्वेत ककेटकभग्न को जोडनेवाटा, मलमूत्र का विरेचक ओर वायुपित्तनाशक ह ॥१११॥ |
घुश्रतसंहिता
मस्स्यासतु दहिबिधा नादेयाः सामुद्रा श्च ॥११२॥ मह्यां दो प्रकार की है। एक-नदी मे रहनेवारी
(नादेय) मौर दूखरी-समुद्र मे रदनेवारी (खामुद्र) ॥ ११२
तच्र नदेयाः-रोहितपाठीनपाटलाराजीववर्भिगोमसस्य- कृष्णमत्स्यवागुञ्चारयुररुसह खद ट्रश्तयः ॥११३॥
इनमें नादेय --रोदित, पाठीन, पाटला, राजीव, वभि, ।
गोमत्स्य, कष्णमत्स्य १, वागुज्ञार, मुर, सदखदष्टर आदि
नादेय (नदी में रहनेवाली) मछलियां दँ ॥११३॥
नादेया मधुरा रस्या गुरवो मारुतापहाः ।
अ ० ४६ |
रक्तपित्तकराश्चोष्णा वृष्याः स्निग्धाल्पवचंसः ॥११४॥ .
नादेय मत्स्य के सामान्य रुण- मधुर, गुर वायुनाशकः,
रक्त-पित्त प्रकोपक, उष्ण, दृष्य, स्निग्ध ओर मल को थोड़ा
वदाती दै ॥११४॥ | =<
कषायानुरसस्तेषां शष्परोवाङभोजनः।
रोहितो याशुतहरो नाव्यथं पित्तकोपनः ॥११५॥
पाठीनः इेष्पछो व्रृष्यो निद्रालुः पिंगिताशनः।
दुषयेदरक्तपितं तु कुष्ठरोगं करो्यसो ।
रोहितक (हू) मत्स्य--कषाय अनुरस; शष्पशेवाङ को
लानेवाटी, वायुनाशक, पित्त को थोडा ऊुपित करती हं |
पाठीन मत्स्य-कफवर्धक, वृष्य, निद्राकर, मांखमश्षक (होने से
पुष्टिकारक), अग्पित्त रोग तथा कुषठरोग को उत्पन्न करती ६ ॥
मुरछो बरंदणो वृष्यः स्तन्यः इेषमकरस्तथा ॥११६॥
मुर बृंहण (देहवधंक), वृष्य (शुक्रल); दुष ओर कफको | बदाती दे ॥११६॥ ¦
सरस्तडागसंभूताः स्निग्धाः स्वादुरसाः स्ताः ।
महाहदेषु बङिनः, खल्पेऽम्भस्यबखाः स्ताः ॥१९॥
सरोवर एवं ताढाबों मे उत्पन्न मछलि्-सिनिग्धः मधुरस्य
होती ह । बड़े मारी जलाशयं मे उलन मछलिया। बलवान् तथा
थोड़े पानीवाङे जलाशयो मे उन्न मछलियां निब॑र होती ६ ॥ `
तिमितिमिङ्गिक्कलििपाकमरस्यनिरुखनन्दिवार (र).
छकमकरगर्मर चन्द्रकमहामीनराजीवप्रश्चतयः सायुद्राः ॥
समुद्र मे रहनेवाटी महषि्या- तिमि, तिमिङ्गिल, इषः
पाक्रमतस्य, निराल्क, नन्दिवारख्क, -मंकर, गगरक; चन्द्रक
महामीन, राजीव आदि मछलियां समुद्र मे रदती ई ॥११८॥
सायुद्रा गुरवः स्निग्धाः मधुरा नातिपिच्तखाः।
उष्णा वातहरा वृष्या बचंस्याः इठेष्मवधेनाः॥ ११९॥.
बखावहा विशेषेण सांसाश्चित्वात् समुद्रजाः ।
समुद्रनेभ्यो नादेया इंहणस्वाद् गुणोत्तरा; ॥१२०॥
१ कृष्ण मत्स्य - |
““करष्णमत्स्यस्तु शकटी बहुकण्टकसंयुतः ।
_ कषायवर्णो खताच्तः कथितो सत्स्यवेदिभिः ॥ ` . -
स
चक ~~ रवकर क्क कक
अ० ४६ ]
२५
भूतस्थानम्
१६३
तेषामप्यनिलक्षन्तवाचौण्य्यौण्यो गुणोत्तरी ।
स्निग्धत्वन स्वादुपाकत्वात्तयोर्वाप्या गुणाधिकाः ॥१२॥
सामुद्रमत्स्य के सामान्य गुण—समुद्र में रहनेवाली मछलियाँ—गुरु, स्निग्ध, मधुर, ईषत्पित्तप्रकोपक, उष्ण, वायुनाशक, वृष्य (शुक्रवर्धक), वर्चस्य (मलवर्धक) और कफवर्धक हैं ।
समुद्र में रहनेवाली मछलियाँ मांसभक्षक होने के कारण खासकर बलवर्धक हैं । और नदियों में रहनेवाली मछलियाँ वृंहण (देहवर्धक) होने से समुद्रजन्य मछलियों से गुणों में श्रेष्ठ हैं । इन समुद्र एवं नदियों की मछलियों से चौण्य्य और कृग की मछलियाँ अधिक श्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे वायुनाशक हैं और वापी (बाबड़ी) की मछलियाँ स्निग्ध एवं मधुर विपाक होने के कारण, चौण्य्य और कृप की मछलियों से अधिक श्रेष्ठ हैं ॥
नादेया गुरवो मध्ये यस्मात् पुच्छाश्चत्चारिणः ।
सरस्तडागजानां तु विशेषेण शिरो लघु ॥१२२॥
नदियों से उत्पन्न मछलियाँ—चूँकि पूछ और मुख को सहायता से गति करती हैं, इसलिये मध्य भाग से गुरु होती हैं । सरोवर एवं तालाबों में उत्पन्न मछलियों का शिर, विशेष करके लघु होता है ॥१२२॥
अदूरगोचरा यस्मात्समादुत्सोदपानजाः ।
किंचिन्मुक्त्वा शिरोदेशमत्यर्थं गुरवस्तु ते ॥१२३॥
उत्स (झरना), उदपान (बुद्ध जलाशय) में उत्पन्न मछलियाँ चूँकि अधिक दूरी तक नहीं फिरतीं (अल्प व्यापाम करती हैं) इसलिये शिरोदेश को छोड़कर, बहुत गुरु होती हैं ॥
अधस्ताद् गुरवो ज्ञेया मत्स्याः सरसिजाः स्मृताः ।
उरोविचरणशोषां पूर्वमंज्जं लघु स्मृतम् ॥१२४॥
सरस (सरोवर) में उत्पन्न मछलियों का निचला भाग विशेष करके भारी होता है, क्योंकि ये मछलियाँ छाती के द्वारा गति करती हैं, इसलिये इनका पूर्व भाग लघु रहता है ॥१२४॥
इत्यानूपो महास्थन्दी मांसवर्ग उदीरितः ॥१२५॥
यह महाभिष्यन्दि१ (दोष, धातु मलों का अतिशय किल्लकरने वाला) आनूप, मांसवर्ग कह दिया ॥१२५॥
तत्र शुष्कपूतिव्याधिष्विषसर्पहृत्दिग्धविद्वजोर्णुकश- बालानामसात्क्यचारिणां च मांसान्यदभयाणि, यस्माद्दि- गतव्यापन्नापहृत्परिणताल्पासंपूर्णवीर्यत्वाद्दोषकराणि भवन्ति; एभ्योऽन्येषामुपादेयं मांसमिति ॥१२६॥
शुष्क, पूति (दुर्गन्धयुक्त), व्याधिहृत (रोगग्रस्त), विषहृत, सर्पहृत, दिग्ध (विषादि से लिप्त शस्त्र द्वारा), विद्व (बीधा), जोर्ण (हृद्ध), कृश (दुबल), बालक, असाल्प्य (अनुचित आहार
खानेवाले), पशुओं का मांस अभक्ष्य है । क्योंकि—शुष्क होने से, रसहीन, व्यापन्न (वृषित), अपहृत, परिणत, अल्प, असम्पूर्णवीर्य, तथा दोषकारक होने से अभक्ष्य है । इन दोषों से रहित मांस खाना चाहिये ॥१२६॥
अरोचकं प्रतिशयायं गुरु शुष्कं प्रवर्त्तयेत् ।
विषव्याधिहृतं मृत्युं बालं छिद्रं च कोपयेत् ॥१२७॥
कासश्वासहर्षं वृद्धं त्रिदोषं व्याधिदूषितम् ।
किलन्नमुक्त्वेजजननं कृशं वातप्रकोपणम् ॥१२८॥
दूषित मांस के खाने में दोष—
शुष्क मांस—अरुचि, प्रतिशयाय, भारीपन करता है । विष एवं रोग से मरे पशु का मांस मृत्यु करता है । बालक पशु का मांस—बमन रोग करता है । वृद्ध पशु का मांस—कास, श्वास करता है । रोग से पीड़ित पशु का मांस—तीनों दोषों को कुपित करता है । किलन्न (पूति) मांस—उत्कलेश (जी मचलाना) करता है । कृश पशु का मांस वायु को कुपित करता है ॥१२७, १२८॥
खियश्चतुष्पात्सु, पुमांसो विहङ्गेषु, महाशरीरेष्वल्प- शरीराः, अल्पशरीरेषु महाशरीराः प्रधानतमाः । एवमेक- जातीयानां महाशरीरेभ्यः कृशशरीराः प्रधानतमाः ॥१२९॥
लिङ्ग आदि का विचार—
चौपायों में झीलिंग श्रेष्ठ है, पक्षियों में पुल्लिङ्ग श्रेष्ठ है । महाशरीर (मैंठा, गैंडा) वाले आनूप देश के प्राणियों में अल्प शरीरवाले (रुख आदि) श्रेष्ठ हैं । अल्पशरीरवाले (लावा आदि) विकिरों में महान् शरीरवाले पक्षी उत्तम हैं । समान जातीयों में महान् शरीरवालों से कृशशरीरवाले प्राणी श्रेष्ठ हैं ॥१२९॥
स्थानादिकृतं मांसस्य गुरुलाघवमुपदेक्ष्यामः । तद्यथा रक्तादिषु शुक्रान्तेषु धातुष्वुत्तरोत्तरा गुरुतरः, तथा सकृथ- स्कन्धक्रोडशिरःपादकरकटीपुष्टचर्मकालेयकयकृद्गन्त्राणि ॥
स्थान के विचार से मांस का गुरु—लाघव कहते हैं, यथा-रक्त से आरम्भ करके शुक्तक धातुओं में उत्तरोत्तर गुरुत्व आता जाता है । रक्त से मांस, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा और मज्जा से शुक्त गुरु है । इसी प्रकार—सकृथ (ऊर्ध्व), स्कन्ध (कन्धे), क्रोड (उदर), शिर, पांव (पिछले), कर (अगले पांव), कटि, पीठ, चर्म (स्वर्वा), कालेयक (बृक्क), यकृत (जिगर) और आंत ये उत्तरोत्तर गुरु हैं ॥१३०॥
शिरः स्कन्धं कटीपुष्टं सकृथनी चात्मपक्षयोः ।
गुरु पूर्व विजानीयाद्वातवस्तु यथोत्तरम् ॥१३१॥
शिर, स्कन्ध, कटि, पीठ, टांगों में अपनी अपेक्षा से पूर्व को गुरु जानना चाहिये । रक्तादि धातुओं में अपनी अपेक्षा से पिछले को गुरु समझना चाहिये ॥१३१॥
१ अभिष्यन्दि—
“हृदयस्यान्ननिर्यासवाहिलोतोमुखांनि यत ।
मुक्त्वं लिप्सति पेच्छित्यादिभिष्यन्दि तदुच्यते ॥”
१९४
मुश्तसंहिता
[ अ० ४६ ]
सर्वेभ्य प्राणिनो देहे मध्ये गुरुरुद्गान्नः ।
पूर्वभागो गुरुः पुंमापभोगागस्तु योषिताम् ॥१३२॥
उरोघ्रोंव विहङ्गानां विरोषेण गुरु स्मृतम् ।
पक्षोन्तेगस्ममो दृष्टो मध्यभागस्तु पक्षिणाम् ॥१३३॥
सब प्राणियों का मध्य भाग गुरु होता है, पुरुषों का पूर्व भाग गुरु होना है, स्त्रियों का अधोभाग गुरु होता है । पक्षियों की छाती और ग्रीवा विशेषकर गुरु होती हैं, पक्षियों का मध्य-भाग न तो लघु, न गुरु, समान होता है, क्योंकि पंखों के चालन के कारण समान रहना है ॥१२२, १३३॥
अनीव रूक्षं मांसं तु विहङ्गानां फलाजिनाम् ।
बृहणं मांसमन्यर्थं स्वगानां पिशिताशिनाम् ॥१३४॥
मत्स्यगजिनां पित्त्करं वातघ्नं धन्वचारिणाम् ।
आहार दृष्टि से गुरु-लाघव—
फल खानेवाले पक्षियों का मांस अति रूक्ष होता है ।
मांस खानेवाले पक्षियों का मांस अतिशय देहवर्धक होता है ।
मछलियों को खानेवाले (बगुले आदि) पक्षियों का मांस पित्त-
कारक होता है, धन्व (जांगल देश) चारी पक्षियों का मांस
वातनाशक होता है ॥१३४॥
जलजानपजा ग्राम्याः क्रम्यादैकजफाम्भथा ॥१३५॥
प्रमहा विल्वामाश्रयं च जंघालसंज्ञिताः ।
प्रतुदा विकिराश्रयं लघवः स्युर्थेभोत्तरम् ।
अल्पामिष्यन्दिनश्रयं यथापूर्वमतोऽन्यथा ॥१३६॥
बगों का गुरु-लाघव—जलज (जल में रहनेवाले) आनूपज (आनूर—जलबहुल प्रदेश में), ग्राम्य (गौ आदि), क्रम्याद (मांस खानेवाले), एकशफ (घोड़े आदि), प्रसह (काक आदि), विल्ववासी (सिंह आदि) और जंघाल (मृग आदि), प्रतुद (कपोत-पारावत आदि), विकिर (बटेर आदि) ये उत्तर-रोत्तर लघु एवं अल्प अमिष्यन्दि होते हैं । (आनूप से जलज गुरु और महा अमिष्यन्दि हैं) ॥१३५, १३६॥
प्रमाणधिकाम्तु स्वजातावलपमारा गुरवश्च । सर्व-प्राणिनां सर्वशरीरेभ्यः प्रधानतमा भवन्ति यकृतप्रदेजावर्ति-तस्तानाददीन, प्रधानालाभे मध्यमयस्कं सद्यस्कमकिल घमुपादेयं मांसमिति ॥१३७॥
अपनी ही स्वजाति में जो पशु शरीर में अधिक होते हैं वे अल्पसार (तुच्छ वल) होते हैं, तथा गुरु होते हैं । सब प्राणियों में, सम्पूर्ण शरीर के अन्दर यकृत प्रदेश में रहने वाली सिंघा स्नायु-मांस अधिक प्रधान (श्रेष्ठ) होते हैं, इनका ग्रहण
१ कबिराज हाराणचन्द्र जी ने 'आत्मपञ्चयोः' यह पाठ 'आत्मपक्षयोः' के स्थान पर दिया है । इसका अर्थ स्त्री एवं पुल्लिङ्ग भेद से किया है ।
करना चाहिये । (पित्ताशय—(Gale-Bladder) एवं पित्तबाहक प्रणाली को छोड़ देना चाहिये यह बुद्धवैद्यप्रथा है) । यदि प्रधान (श्रेष्ठ) न मिले तो मध्यम आयुवाले, तरुण तुरन्त मारे पशु का, अकिलध (मन के अनुकूल) मांस का ग्रहण करना चाहिये ॥१३७॥
भवति चात्र—
चरः शरीरावयवाः स्वभावो धातवः क्रिया ।
लिङ्गं प्रमाणं संस्कारो मात्रा चास्मिन् परीक्ष्यते ॥१३०॥
इति मांसवर्गः ।
कहा भी है—
मांस के विषय में निम्न बातों का विचार करना चाहिये—
चर (किस स्थान में विचरता है), शरीरावयव (शरीर के भाग), स्वभाव, धातु (रस रक्तादि), क्रिया (चेष्टा), लिङ्ग, प्रमाण और संस्कार (कल्लग्न) का विचार करना चाहिये ॥
चर—किस स्थान पर विचरता है, धन्व (जांगल देश) में, या आनूप (जलबहुल में), जल में विचरता है, किस प्रकार का यह आहार करता है, किस प्रकार का इसका विहार है । इत्यादि बातों को देखना चाहिये । शरीरावयव—शरीर के भाग-पक्षियों की उर और ग्रीवा भारी होती है । स्वभाव—स्वभाव में, बटेर लघु होते हैं । धातु—रक्त से मांस धातु गुरु है । क्रिया—छाती के सहारे चलने से इनका पूर्व भाग लघु होता है । लिंग—चौपायों में स्त्री लघु है, पक्षियों में पुरुष लघु है । प्रमाण—महाशरीरों में अल्प शरीर लघु हैं । संस्कार—चावलों से लाजा लघु हैं । मात्रा—गुरु पदार्थों को आधे पेट खाना, लघु पदार्थों को पेट भरकर खाना ।
'च' से अभिनव की अपेक्षा से भी विचार करना चाहिये । इन सब बातों का विचार करके गुरु लघु का निश्चय करना चाहिये ॥१३८॥
अथ फलवर्गः ।
अत ऊर्ध्वं फलान्युपदेद्यामः । तद्यथा—दाडिमाम-लकवदरकोलककन्दुसौवीरसिञ्चितिकाफलकपित्थमातुलुङ्गाप्रः प्रातककरमदप्रियालनारङ्गजम्बोरलकुचभन्यपाराव-तवेरफलप्राचीनामलकतिन्तिडीकनीपकोशाप्राम्लीकाप्रश्नीनीति ॥१३९॥
इसके आगे फलों को कहते हैं—
यथा—दाडिम (अनार), आमलक (आंवला), बदर (बदर), कोल (झाड़ी के वर), ककन्दु (होटे वर), सौवीर (बेर का भेद), सिञ्चितिका (पाठान्तर में शिम्बिका—देर का भेद), कपित्थ (कैथ), मातुलुङ्ग (बिजौरा), करमद (करौंदा), पियाल, नारंग (नारंगी), जम्बोर, लकुच (बड़हल), भन्य (कामरंग-कमरख),
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- थ दूसरे सव फलो से अधिक गुणकारी दै ॥१४३.१४४॥
वधक ह
अ० ४६ ] |
सवत, वे्रफलः प्राचीन आमल्कं ( पानीयामलक ), तिन्ति-
न नीप ( कदम्ब); कोशम् ( कोसिम्ब्र ); आम्डीका
%) ( इमी ) आदि फल दे ।।१३६॥ . |
अम्डानि रसतः पाके गह्ण्युष्णानि वीयेतः । पित्तङान्यनिरष्नानि कृफोक्टेशकराणि च ॥ १४० ॥
ामान्य गुण-फों के रस, अम्करस, गुरुविपाक (मधुर),
उवी, पित्तकारक, वायुनाश ओर कफ को ऊुपित करते है ।
कषायानुरसं तेषां दाड्मि नातिपित्तछम् ।
दीपनीयं रुचिकरं हदं वचा विवन्धनम् ॥ १४१ ॥ द्विविध तत्त॒ विज्ञयं मधुरं चाम्खसेव च ।
त्रिदोषष्नं तु सधुरमम्खे वातकफापहम् ॥ १४२ ॥ दाडिम ( अनार )- कपाय--अनुरख, थोडा पित्तकारक,
अग्निदीपक, सचिकरः हदय के ल्य प्रिय, मल को रोकनेवालां है | अनार दो प्रकार का दै--मीठा ओर खदा । इनमें मधुर- न्रिदोषनाशक ओर अम्छ (खट्टा) अनार वात-कफनाश्चक है ॥ अम्टं समधुरं तिक्तं कषायं कटुक सरम् । ` चज्ञुष्यं सवेदोषषनं वृष्यमामलकीफलम् ॥ १५३॥
हन्ति वातं तदम्ख्त्वात् पित्तं माधुयंञव्यतः।
कफ़ रूक्षकषायत्वात् फेभ्योऽभ्यधिकं च तत् ॥ १४४ भामलकौ फल--अम्क;) थाड्ा मधुर, तिक्त--कषाय- कटु
रख, आंखो के श्य हितकारी, त्रिदोषनाशक, दूष्य, शुक्रवधंक
हे | अम्लरस हाने से वायुका, मधुर एवं शीतवीयं होने से पत्त का, रुक्ष-- कषाय होने से कफ का नाश करता है, इस
ककन्धुकोख्वद्रमामं पित्तकफावहम्। पक्वं पित्तानर्हरं स्निग्धं समधुरं सरम् ॥ १४५॥ पुरातन चृदट्ञमनं श्रमध्नं दीपनं छु । न्धुः कोर, बद्र--ये कच अवस्था मे, पित्त एवं कफ- । पकने पर पित्त ~ वायुनाशक, स्निग्ध, मधुर ओर
एए ( विरेचक ) है । पुराने बेर प्यासशामक, थकान को भरते है, अग्निदौपक ओर रघु हे ॥१५५॥ सोवीरं बदरं स्निरधं मधुरं वातपित्तजित् ॥१४६॥ कषाय स्वादु सम्रा।ह शातं सिच्ितिकाफकम्। सौवीर बेर-स्निगध, मधुर, बातपित्तनाशक दहै । सिञ्चितिका एकाह मेद् ) फल कषाय रस, मधुरविपाक, संप्ादी भोर शीतल है || ९४६॥ | जाम कपित्थमस्वयं कफध्तं भ्राहि वातलम् ॥ ९४७॥ कफनिख्हर पक्वं मधघुराम्छरसं गर । ` वासकासारुचिहर तृष्णाघ्नं कण्टञोधनम्॥ १४८ ॥ कपित्थ ( कैय )-- कचा केथ--सरं के व्यि हानिकारक क संहि, वातनाशक दे । पक्ने पर--कफ--बायुः
सूत्रस्थानम्
शुरु ओर शीतर दे ॥१५६॥
| ९९५ नाशक, मधुर. अम्टरखं, गुरु ई; श्वांख, कासं, अरचिना गकर तृष्णानाशक ओर गले का ( स्वर का) शोधन करता दै ॥ खघ्रम्कं दौपनं हद्यं मातुलुङ्गसुदाष्रतम् । त्वक् तिक्ता दुजेरा तस्य वातछृमिकफापहा ॥ १४६॥ स्वादु शौतं गुरु स्निग्धं मांसं मारुतपित्तजित्। मेध्यं शूलानिुच्छदिकफारोचकनाञनम् ॥ १५० ॥
दौपनं लघु संप्राहि गुल्मरार्जघ्नं तु केसरम् । शुलाजीणविवन्धेषु मन्देऽग्नौ कफमारुते ॥ १५१॥ मातचुङ्ग ( व्रिजोरा )--ल्धु, अम्, अग्निदीपक, हृदय के चयि प्रिय है। इघकी छाल तिक्त, दुजर एवं वायु, कृमि ओर कफनाशकर है । इसका मांस ( गुदा ) -मधुर, शीतल, गुर, स्निग्ध, वायु पित्तनाशक दै । मेध्य (मेधा के व्यि दित- कारी ), श्ल, वायु, छर्दि, कफ ओर अर्चि का नाशक दै।
इसका केखर ( तन्तुजा }--अग्नि दीपक, ल्घु, संग्राही, गुल्म- अशनाशक, शूल, अजोीणं विबन्ध ( मलावरोष ), अग्निमान्य
ओर कफवायु रोगो मे दितकारी है ॥१४६-१५२१॥
अरुचौ च विशेषेण रसस्तस्योपदिङ्यते।
पित्तानिखकरं वारं पित्तर बद्धकेशरम् ॥ ११५२ ॥
तरिजोरे का रस--असचि मे खासकर उपयोगी है । बाल ( छोटा त्रिजोरा )-पित्त.एवं वायुक्रारक है । बद्धकेसर (जिस ब्रिजोरे मे तन्तु बद्ध रुका हे ) पित्तकारक है ॥१५२॥ ` हयं बणेकरं रुच्यं रक्तमांसवल्प्रदम् ।
कषायानुरसं स्वादु वातघ्नं जरंहण गुर् ॥ १५३॥ पित्ताविराधि संपक्वमाम्रं ञुक्रविवधेनम् ।
पक्का आम--द्ृदय के व्यि प्रिय, बणकारक) रुचिकर,
रक्तमांस-वल्वधक, कषाय-अनुरख, स्वाद दार, वातहर, बृंहण ओर गुरु है तथा पित्तशामक ओौर शुक्रवधंक रै ॥१५३॥
बृहणं मधुरं बल्यं गुरु विष्टभ्य जीयति ॥ १५४॥
आम्रातक फर वृष्यं सस्नेहं इरृषममवधेनम् ॥
आमूतक फल देहवधक, मधुर, बल्कारक, गुर, विष्टम्भ ( वायु, ताद, श दोना, मल का न आना ) उखन्नकर जीणं
हाता है । बृष्य स्नेहयुक्त ओर कफवधंक हे ।(१५४५॥
त्रिदोष विष्टम्भकरं ्छुचं ज॒ुकरनाशनम् ॥ १५५ ॥
लछुच ( बड़ह )- तीनों दाषों को उन्न करता है, विष्टम्भ (गुडगुडाहट) करता दै, ओर शुक्र को न करता है ॥ अम्खं ठृषापहं रुच्यं पित्तकृत् करमदकम् । करमद ( करोँदा )- अम्लरस, तूषानासक, रुचिकर, पित्त
कारक है | 5 |
वातपित्तहरं वृष्यं प्रियां गुरु शीतरप् ॥ १५६॥ पियाल ( चिररोजी )-बातःपित्तनाशक, इष्य (शुक्रवधक), =
(त न पनी + १ र
० "च "न
१८६
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४६ ]
हृव्यं स्वादु कषायमलं भव्यमास्यविशोधनम् । पित्तश्लेष्महरं ग्राहिं गुरु विष्टम्भि जीतलम् ॥ १५७ ॥ भव्य—हृदय के लिये प्रिय, स्वादु, कषाय-अम्ल, और सुख का शोधक है। पित्त-कफनाशक, संग्राहि, गुरु, विष्टम्भी, शीतल है ॥१५७॥
पारावतं सुमधुरं रुच्यमत्यग्नित्वानुत् । पारावत—मधुर, रुचिकारक, अत्यग्नि, एवं वायु का नाश करता है।
गरदोषहरं नीपं प्राचीनामलकं यथा ॥ १५८ ॥ नीप ( कदम्ब )—गर ( संयोगजन्य विष )—दोषनाशक है, प्राचीन आमलक ( पानीय आँवला ) भी गरदोषनाशक है। वातापहं तित्तिडीकमामं पित्तबलासक्तु । प्राहृणं दीपनं रुच्यं संपक्वं कफवातनुत् ॥ १५९ ॥ कच्ची तित्तडी ( कच्ची इमली )—वातनाशक, पित्त, कफ-कारक है। पक्की इमली—संग्राही, उष्णवीर्य, अग्निदीपक, रुचिकारक, कफ-वातनाशक है ॥१५९॥
तस्मादल्पान्तरगुणं कोशाग्रफलमुच्यते । कोशाम् ( कोशाम्बी ) फल—के गुण—इमली से कुछ कम गुणवाले हैं।
अम्लीकायाः फलं पक्वं तद्दुर्भेदि तु केवलम् ॥ १६० ॥ पक्की अम्लिका ( इमली ) के गुण—पक्के तित्तडीफल के समान ही हैं, किन्तु यह विरेचक हैं ॥१६०॥
अम्लं समधुरं हृव्यं विशदं भक्तरोचनम् । वातघ्नं दुर्जरं प्रोक्तं नारङ्गस्य फलं गुरु ॥ १६१ ॥ नारङ्ग ( नारङ्गी )—अम्ल, मधुर, हृदय के लिये प्रिय, विशद, भोजनमें रुचिकर, वातनाशक, दुर्जर, गुरु ( चिरपाकी ) होता है ॥१६१॥
तृष्णाशूलकफोत्क्लेशच्छिदिंश्वासनिवारणम् । वातश्लेष्मविबन्धघ्नं जम्बीरं गुरु पित्तकृत् । ऐरावतं दन्तशठमरनं शोणितपित्तकृत् ॥ १६२ ॥ जम्बीर—तृष्णा, शूल-कफ की वृद्धि, वमन, स्वासनाशक, वायु कफ एवं विबन्धनाशक, गुरु, पित्तकारक है। ऐरावत दन्तशठ ( गुदहिया निम्बु )—रक्त पित्तकारक है ॥१६२॥
क्षीरिवृक्षफलजाम्बवराजादनतोदनशीतफलतिन्दुकब- कुलधन्वनाशमन्तकाश्रकणफलगुपुरुषकगाङ्गेशकीपुष्करवर्त्ति- बिल्वविम्बीप्रभृतीनि ॥ १६३ ॥
कषायरस-बहुल फल—
क्षीरिवृक्षफल ( बड़, पीपल, पिलखन, गूलर, आदि ), जाम्बव ( जामुन ), राजादन ( क्षीरिणी ), तोदन ( राजप्रिय ), शीतफल ( उदुम्बर ), तिन्दुक, बकुल ( मौलसरी ), धन्वन ( धामन ), अशमन्तक ( आसन्त अथवा कचनारभेद ), अश्व-
कर्ण ( शाल ), पुरुष ( फालसा ) फल्यु ( अञ्जीर ), गांगेशकी ( नागबला ), पुष्करवर्त्ति, बिल्व ( बेलगिरी ), विम्बी ( कंदूरी ) आदि हैं ॥१६३॥
फलाग्नेतानि शीतानि कफपित्तहराणि च । संग्राहकाणि रूक्षाणि कषायमधुराणि च ॥ १६४ ॥ इनके सामान्य गुण—ये फल शीतवीर्य, कफ-पित्तनाशक
हैं। संग्राही, रूक्ष और कषाय एवं मधुररस हैं ॥१६४॥
क्षीरिवृक्षफलं तेषां गुरु विष्टम्भि शीतलम् । कषायं मधुरं साम्लं नातिमारुतकोपनम् ॥ १६५ ॥
क्षीरिवृक्ष फलों के गुण—गुरु विष्टम्भि, शीतल, कषाय, मधुर, अम्लरस-प्राय, वायु को कुपित करते हैं ॥
अत्यर्थं वातलं ग्राहिं जाम्बवं कफपित्तजित् । जामुन का फल—अत्यन्त वातप्रकोपक, संग्राही, कफ-
पित्तनाशक है ॥
स्तिग्धं स्वादु कषायं च राजादनफलं गुरु ॥ १६६ ॥ राजादन फल—स्तिग्ध, स्वादु-कषाय रस और गुरु है ॥
कषायं मधुरं रूक्षं तोदनं कफवातजित् । अम्लोष्णं लघु संग्राहिं स्तिग्धं पित्तान्तिवर्धनम् ॥ १६७ ॥
तोदन फल—कषाय, मधुर, रूक्ष, कफ-वातनाशक है।
अम्ल, उष्ण, लघु, ग्राही, स्तिग्ध, पित्त एवं अन्तिवर्धक है ॥
आमं कषायं संग्राहिं तिन्दुकं वातकोपनम् । विपाके गुरु संपक्वं मधुरं कफपित्तजित् ॥ १६८ ॥
तिन्दुक फल—आम, कषायरस, संग्राही, वातकोपक है।
मली प्रकार से पका फल, मधुरविपाक, मधुररस, कफ-पित्त-नाशक है ॥१६८॥
मधुरं च कषायं च स्तिग्धं संग्राहिं बाकुलम् । स्थिरीकरं च दन्तानां विशदं फलमुच्यते ॥ १६९ ॥
बकुल ( मौलसरी )—मधुर, कषाय, स्तिग्ध, संग्राही, दन्तों को स्थिर ( दृढ़ करनेवाला ) एवं स्वच्छ करता है ॥
सकषायं हिमं स्वादु धान्वनं कफवातजित् । तद्दृग्गाङ्गेशकं विद्यादशमन्तकफलाणि च ॥ १७० ॥
धान्वन ( धामण ) फल—कषायरस, शीत, स्वादु, कफ-वायुनाशक है। गंगेरन और अशमन्तक के फल में भी ये ही गुण हैं ॥१७०॥
विष्टम्भि मधुरं स्तिग्धं फलगुजं तर्पणं गुरु । फल्यु ( काकादुम्बिका अञ्जीर ) का फल—विष्टम्भी,
मधुर, स्तिग्ध, तृप्तिकारक एवं गुरु है।
अत्यन्तमौषन्मधुरं कषायानुरसं लघु ॥ १७१ ॥
वातघ्नं पित्तजननमामं विद्यात् पुरुषकम् । पुरुष ( कच्चा फालसा )—अत्यन्त खट्टा, थोड़ा मीठा,
कषाय अनुरस, लघु, वातनाशक, पित्तकारक है ॥१७१॥
तदेव पक्वं मधुरं वातपित्तनिर्बहुणम् ॥ १७२ ॥
अ० ४९ ]
सूत्रस्थानम्
१६७
विपाके मधुरं शीतं रक्तपित्तप्रसादनम् । पक्वा फाल्सा—मधुररस, वायु-पित्तनाशक, विपाक में मधुर, शीत, रक्तपित्त को स्वच्छ (शान्त) करता है। पौष्करं स्वादु विष्टम्बि बल्यं कफकरं फलम् ॥१७३॥ पौष्कर (कमल)—मधुर, विष्टम्बी, बलकारक, कफवर्धक और गुरु है ॥१७३॥
कफानिलहर् तीक्ष्णं स्निग्धं संप्राहि दीर्घनम् । कटुतिक्तकषायोष्णं बालं बिल्वमुदाहृतम् ॥१७४॥ विद्यात्तदेव संपक्वं मधुरानुरसं गुरु । विदाहि विष्टम्भकरं दोषकृतं पूतिमारुतम् ॥१७५॥ बेल (कच्चा)—कफ वायुनाशक, तीक्ष्ण, स्निग्ध, संप्राही, अनिदीपक, कटु, तिक्त, कषायरस, उष्ण होता है। यही बेल पकने पर मधुर-अनुरस, गुरु, विदाही, विष्टम्भकारक, दोषप्रकोपक एवं दुर्गन्धित वायु को उत्पन्न करता है ॥१७४, १७५॥ बिम्बीफलं साश्वकर्णं स्तन्यकृतं कफपित्तजित् । रुद्धवाह्यवरपित्तासूक्ष्मासश्वासक्षयापहम् ॥१७६॥ बिम्बीफल—(कंदूरी)—अश्वकर्णफल-दुग्धवर्धक, कफ-पित्तनाशक, तृष्णा, दाह, ज्वर, पित्त, रक्त, कास, क्षय रोग को नष्ट करते हैं ॥१७६॥
तालनालिकेरपनसमोचप्रभृतीनि ॥१७७॥ मधुर फल कहते हैं— ताल (ताड़), नारिकेल (नारियल), पनस (कटहल) और मोच (केला) आदि मधुर फल हैं ॥१७७॥ स्वादुपाकरसान्याहुर्वातिपित्ताहराणि च । बलप्रदानि स्निग्धानि बृहणानि हिमानि च ॥१७८॥ इनके सामान्य गुण—मधुररस, मधुरविपाक, वात-पित्तनाशक, बलदायक, स्निग्ध, देहवर्धक और शीतल हैं ॥१७८॥ फलं स्वादुरसं तेषां तालजं गुरु पित्ताजित् । तद्रौजं स्वादुपाकं तु मूत्रलं वातपित्ताजित् ॥१७९॥ ताल का फल—मधुररस, गुरु, पित्तनाशक है। ताड़ का रौज, मधुरविपाक, मूत्रल, वात-पित्तनाशक है ॥१७९॥ नालिकेरं गुरु स्निग्धं पित्तादनं स्वादु शीतलम् । बलमांसप्रदं हृद्यं बृहणं वस्तिशोधनम् ॥१८०॥ नारियल का फल—गुरु, स्निग्ध, पित्तनाशक, मधुर, शीतल, बलप्रद, मांसप्रद हृदय के लिये प्रिय, बृहण (देहवर्धक) और वस्तिशोधक (मूत्रल) है ॥१८०॥ पनसं सकषायं तु स्निग्धं स्वादुरसं गुरु ।
१ "पूतिमारुतं" का अर्थ डल्हणाचार्य ने सुगन्धित वायु किया है। पकने पर सुगन्धित गन्धवाला होता है। तथा— "पूतिः खट्वाशः वनजा मधुककंदी पूतिपुष्यति—सुगन्धितपुष्यत्यर्थः ॥"
पनस (कटहल)—कषायरस (थोड़ा), स्निग्ध, मधुररस और गुरु है।
मोचं स्वादुरसं प्रोक्तं कषायं नातिशीतलम् ॥१८१॥ रक्तपित्ताहरं वृष्यं रुच्यं श्लेष्मकरं गुरु ॥
मोच (केला)—मधुररस, कषाय, थोड़ा शीतल, रक्त-पित्तनाशक, बृष्य (शुक्रवर्धक), रुचिकर कफकारक और गुरु है ॥
द्राक्षाकार्शमर्मधुकपुष्पखजूरप्रभृतीनि ॥१८२॥ द्राक्षा (किशमिस), कार्शमरी (गम्भीर), खजूर (खजूर, पिण्डखजूर) और मधुकपुष्प (महुवे के फूल) आदि फल हैं ॥ रक्तपित्ताहराण्याहुर्गुरुणि मधुराणि च ।
सामान्य गुण—ये रक्त-पित्तनाशक, गुरु एवं मधुररस, मधुर विपाक हैं।
तेषां द्राक्षा सरा स्वर्ष्या मधुरा स्निग्धशीतला ॥१८३॥ रक्तपित्तावरश्वासतृष्णादुहिक्षयापहा ।
द्राक्षा फल—सर (विरेचक), स्वर्ष्य (गले के लिये हितकारी), मधुर, स्निग्ध, शीतल है। रक्त-पित्त, ज्वर, श्वास, तृष्णा, दाह, क्षय नाशक है ॥१८३॥
हृद्यं मूत्रविबन्धनं पित्तासूरवातनाशनम् ॥१८४॥ केश्यं रसायनं मेध्यं कार्शमर्म फलमुच्यते ।
कार्शमरी फल—हृदय के लिये प्रिय, मूत्रावरोधनाशक, पित्त-रक्त-वायु को नष्ट करता है। केश्यों के लिये हितकारी रसायन, मेध्य (मेधा के लिये हितकारी है) ॥१८४॥
क्षतक्षयापहं हृद्यं शीतलं तर्पणं गुरु ॥१८५॥ रसे पाके च मधुरं खाजूरं रक्तपित्तातु ।
खजूर—क्षत-क्षयनाशक, हृदय के लिये प्रिय, शीतल, वृत्तिकारक, गुरु, मधुररस, मधुरविपाक और रक्त-पित्तनाशक है ॥
बृह्णीयमहृद्यं च मधुककुसुमं गुरु । वातपित्तोपगमनं फलं तस्योपदिश्यते ॥१८६॥
महुवे का फूल—बृह्णीय (देहवर्धक), हृदय के लिये अप्रिय गुरु है। इसका फल-वात-पित्तशामक है ॥१८६॥
वातानाश्वोडाभिषुकनिचुलपिचुनिकोचमोरुमाणप्रभृतीनि ॥
बाताम (बवाम), अश्वोक (अखरोट), अभिषुक (अंगूर), निचुल, पिचु, निकोचम (पिस्ता), उरुमाण (खुरमन्ति), लवली आदि फल हैं ॥१८७॥
पित्ताश्लेष्महराण्याहुः स्निग्धोष्णानि गुरुणि च । बृहणान्यनिलघ्नानि बल्यानि मधुराणि च ॥१८८॥
इनके सामान्य गुण—कफ-पित्तनाशक, स्निग्ध, उष्ण, गुरु, बृहण (देहवर्धक), वायुनाशक, बलकारक और मधुररस, मधुरविपाक हैं ॥१८८॥
कषायं कफपित्ताजं किचिस्निक्तं रुचिप्रदम् । हृद्यं सुगन्धि विशदं लवलीफलमुच्यते ॥१८९॥
१९द
ल्वलीफल १ (ह्रफा रेवड़ी)-- कषाय, कफ-पित्त-नाशकः, कुःछ
तिक्त, रुचिकारक, हदय के ल्यि प्रिय, सुगन्धित, विशद (सूम
खोतों मे पर्हुचनेवाला) दे ॥१८६॥ वसिरं शोतपाक्यं च सारष्करनिबन्धनम् । विष्टम्भि दुजेरं रूक्षं ओतं वातकोपनम् ॥१९०।
विपाने मधुरं चापि रक्तपिन्तप्रसादनम् ।
ेरावतं दन्तञ्चठमम्छं ओणितपिन्तङत् ॥१९१९॥
वसिर (ूर्यावत्तेफ) शीतपाक्य (बल्फल) ओर अरुष्कनि-
बन्धन भिवे का बन्त)-ये विष्टम्भ (पिट मे गुडगुडाहट
कारक); दुजेर (पकने मे कठिन); रूक्ष; शोतल, वायुप्रक।पक
मधुरविपाकः, रक्त-पित्तनाशक हं ॥१६०,१६१॥
शीतं कषाय मधुर टङ्कं मारुतछ्रद् गर ।
रंक (नीलकपित्थफल)-योत, कषाय, मधुरविपाकः, बायु- कारक ओर गरहै। ` स्निग्धोष्णं तिक्तमधुरं वातन्छष्मध्नमेङ्गदम् ॥१९२॥
एरुद (इंगदी फल)- स्निग्ध, उष्ण, तिक्त, मधुर, वातकफ़ नाशक ह ॥१६२॥
्मीफरं गुरु स्वादु रूक्षोष्णं केजनाश्चनम् ।
शमी का फल- गर, स्वादु, रूक्ष, उष्ण, केशनाशक हे ।
गुरु इटेऽमातकफटं कफरृन्मधुरं हिमम् ॥१९३॥
श्टेष्मातक (छ्खोडे का) फल गस, कफकारक, मधुर,
ओर शीतल ह ॥१६३॥
करीरा श्ठिकपालनि तृणन्यफखानि च ।
स्वादु तिक्तकटूष्णानि कफवातहराणि च ॥१९४।।
करोर (करोल); अक्क (तिनशफर् या स्द्राक्ष), पीलु,
तृणशृन्य (मल्लिका) फ के सामान्य गुण-मधुर, तिक्त, कटु
उष्णवीय, कफ-वातनाशक रै ॥१६४॥
तिक्तं पित्तकरं तेषां सरं कटुविपाकि च । तीच्णोष्णं कटुकं पटु सस्नेह कफवातजित् ॥१९५॥
पीलु के गुण-तिक्त, पित्तकारक, खर (विरेचक), कटविपाक
तीण, उष्णवीय, कटुरख, स्तेयुक्त, कफ एवं वायु का नाशक दै | आरुष्करं तोवरक कषायं कटुपाकि च।
उष्णं कृमिञ्वरानाहमेद्योदावतनाञनम् ॥१<६॥
आरष्कर (भिलावा) ओर तौवरक (प्रमेह चिकित्सा मे कहा
तुवरकं फट)-- कषाय, कटुविपाक) उष्ण, कृमि, ज्वर, आनाह, प्रमेह, उदावत्त नाशक दै ॥१६६॥
गुल्मोदरार्शोष्न कटपाकि तथेव च ।
करञ्जकिडकारिषटफलटं जन्तुप्रमेहयत् ।
अङ्कोरस्य फट विख गुरु श्टेष्महरं हिमम् ॥१९७॥
१ कवरोफट-
“घनस्निग्वा हरितायुप्रपुन्नाटसद्व्छदा ।
बुगन्धिम्ला रवली पाण्डुकोमलवल्कङा ॥'"
सुश्रतसंहितां | अं० ४६
करञ्ञ, किंशुक (दाक); अरिष्टफल (निमोटी)-कुष्ठ, ग्म
उद्ररोग, अशरोग नाशक; कटुविपाक, कटुरख, कमि (अन्तः-
ओर बाह्य दोनों) ओर प्रमेह के नाशक हैँ | १९७॥
रूक्षोष्णं कटक पाके घु वातकफापहम् |
तिक्तमीषद्धिषहितम् विडङ्ग कृमिनाशनम ॥१९द्
विडङ्ग (वायविडङ्ग)- रूक्ष, उष्णवीयं कट्विपाक, ल व यु-कफनाशक, ईषत् तिक्त विषरोग मे हितकारी ओर मि. नारक हे १६८]
बरण्यञुष्णं सरं मेध्यं दोषघ्न' शोफकुषनुत् ।
कषायं दीपनं चाम्लं चजञुष्यं चाभयाफटम् ॥ १९९ सभया (हरड़) का फल--नरण के ल्य द्ितकारी, उष्ण,
खर {(विरेचक), मेध्य (मेधा के ट्य हितकारी), दोष (वातादि)
नाशक, शोफ, कुष्टनाशक, कषाय, अग्नि दीपक, अम्छ, आंखों के ल्यि हितकारी हे ।॥॥१६६॥
भेदन' रघु रूक्षोष्णं वेस्वयकृमिनाशनम्। चक्षुष्यं स्वादु पाक्या्चं कृषायं कफपित्तजित् ।२००। अक्ष (वहेडा) फल-मेदक (विरेचन), ल्घु उष्ण, - स्वरभंग
के छिये हितकर, मिनाशक, आंखों के किए हितकारी, मधुरविपाक, कषाय, कफ-पित्तनाशक हं ॥२००॥
कफपित्तहरं रूक्षं वक्त्रक्ूदमरखापहम् ।
कृषायमीषन्मधघुरं किचित् पूगफटं सरम् ॥२०१॥
पूग॒(युपारी) फल--कफ-पित्तनाशक, रुक्ष, सुख कौ आद्रता ओर मक को दूर करता है । कषाय, थोड़ा मधुर ओर `
कु विरेचक हे ॥२०२१॥
जातोकोशोऽथ कूरं जातीकटुकयोः फलम् ।
कृको (ङा) खक ख्वङ्ग च तिक्त कट कफापहम।२०२।
घु दृष्णापह् वक्त्रक्रददोगन्ध्यनानम् ।
जात) कोश (जायफर), कपूर, जाती (जावित्री); कटुक
(लघु कक्कोल, कवाबचीनी या ठताकस्तूर), कक्कोल (शीतलनी) ओर कवग (लँग)- तिक्त, कटु, कफ नाशक, लुः
वृष्णानाशक, मुख कौ आपद्र॑ता ओर दुग॑न्ध का नाश करते ई ॥
सतिक्तः सुरभिः शीतः कपूरा छघु टेख नः ॥२०३॥
चृष्णायां मुखशोषे च वेरस्ये चापि पूनितः।
खताकस्तूरिका तद्वच्छीता बस्तिविओंधनी ॥२०४॥
कपू र तिक्त, सुगन्धि, शीतल, लधु, ठेखन (कफनाशक)
है, तृष्णा ओर मुख की शुष्कता एवं सुख की विरखता मे उत्तम हे । ्ताकस्तूरी के भी गुण कपूर के समान दै, शीतल
है, बस्ति(मूत्राशय) का शोघक (विबन्धनाशक) दै॥ २०२,२०४॥
त्रियाख्मल्ञा मधुरो वृष्यः पित्तानिखापहः की मञ्ना-
पियाली की मज्जा (गिरि)-मधुर, इष्य (शुक्रवधक) पित्त” वायु-ना्चक ह
फलों
| . ० ४६ ] ्ैमीतको मदकरः कफमरुतनाशनः ॥२०५॥|
विभीतक मज्जा-मदकर (मदकारक), कफ-वायुनाशक है|
| कषायमधुरो मउजा कोलानां पित्तनाशनः ।
। ° दृष्णाच्छयेनिल्ध्नश्च तद्वदामल्कस्य च ॥२०६॥
(कोर)- वेर की मञ्जा--कपाय-मधुर, पित्तनाशक है |
प्या, वमन ओर वायुनाशक हे । आवले कौ मञ्जामे भी
बेर क समान गुण ह ।॥२०६॥
बीजपूरकञ्म्याकमञ्जा कोञाम्रमंभवः।
स्वादुपाकोऽग्निबख्द्ः स्निग्धः पित्तानिङापह्ः॥२०७॥। बीजपूरक (बिजोरा), शम्याक ( किरमालकर-अमल्तास ),
कोशाम्-इनकी. मञ्जा-मधुरः विपाक, अग्निवधक, ` बल्प्रद्,
स्निग्ध, पित्त एवं वायुनाशक हे ॥२०७॥
| यस्य यस्य कफप्येह वीये मवति यादप | तस्य तस्येव वीयण मञजानमपि निर्दिशेत् ॥२०८॥
जिख २ फल का जेसा वीय (गुण-कमं) होता है, मज्जा को भी उसी उसी गुण-कमोंाटी समन्चना चाद्ये ॥२०८॥
फटेषु परिपकं यद् गुणवत्तदुदाह्टतम् । बिल्वादन्यत्र विज्ञेयमामं तद्धि गुणोत्तरम् ।
प्राह युष्णं दीपनं तद्धि कपायकदटुतिक्तकम् ॥२०९॥
भ 1 ध कनक
~ -- ~~~ ०»न ~ =
विल्व (वेकगिरी) मे इनका अपवाद है, वेर का कचा फल गौ मे शठ है । बिल्वफल संग्राही, उष्ण, अग्निदीपक, कषाय, कटतिक्तरस है ॥२०६॥] व्याधितं कृमिजुष्टं च पाकातीतमकाख्जम् । वजनीयं फं सवमपर्यागतमेव च ॥२१०॥
इति एख्वगेः ।
त्याज फल-- ४ । | व्याधित (रोगयुक्त), मिज (मियो से व्याप्त), पाका- पत (बहत पका हुआ), अकालज (बिना ऋत के उदन्न हुआ), ओर अपयांगत (अपुष्ट) एङ त्याज्य ह ॥२१०॥
इति फल्वगः |
स अथ आाकवगेः । राकन्यत ऊध्वे' बद्यामः।--
तन पुष्पफ़खाखाबुकाङिन्दकप्रभ्रतीनि ।२९१॥ र अशे शक्रो, को कहतेहै- `
४५ 1
नक `
| [- । (तीर तरबूज) १ आदि शाक है ॥२११॥
। शाको के भेद-
£ { | शूर पत्र-करोराग्र-फल-काण्डाधिरूढकम् ॥
प्स कवकञचेव शाकं ददविषं स्मृतम् ॥", . ॥ ¢
तत्रस्था नम्
जो फल पका होता हे, वह गुणों मे श्रेष्ठ होता है, परन्तु
इनमें पुष्पफल ( कूष्माण्ड ), अलाबु ( तुम्बी ); काडिन्द ¦
@. . . ५& पित्तष्नान्यनिलं कयस्तथा मन्दकफानि च । सष्टमूत्रपुरीषाणि . स्वादुपाकरसानि च ॥२१२॥ ` इसके सामान्य गुण--पित्तनाशक वायुकरक कफ को कम
करते हेः मूत्र-मल को प्रवृत्त करते ह, ओर मधुररख ह ॥२१ २॥
पित्तघ्नं तेषु कूष्माण्डं वां मध्यं कफाग्हम् । रुक्छं छघृष्णं सक्षारं दीपनं वस्तिओधनम् ॥२१३॥ वाल (कचा) कृष्माण्ड--पित्तनाशक, मध्य कूष्मांड कफ- नाशक, शुक्छ (पूणं पका श्वेत), ल्घु; उष्ण, क्षारयुक्त, अग्नि- दोपक, वरितिशोधक (मू्ल-मू्र-विरेचक) है ।२१२॥
सवंदोषहरं हृं पथ्यं चेतोविकारिणाम् ।
टष्टिञुक्रक्षयकरं काछिन्दं कफवातक्रत् ॥२१४॥
कालिन्द-त्रिदोषनाशक, हृदय के भ्ये प्रिय चेतोविकार
(उन्माद, अपस्मार, मृच्छां आदि) के रोगियों के व्यि पथ्य हे |
हृष्टि एवं शुक्रनाशक ओर कफ-वायुकारक दै ।२१४॥।
अलावुभिन्नविटका तु र्चा गु्तिओोतला ।
तिक्ताखाबुरदया तु वामिनी वातपित्तजित् ॥२१५॥ अला (मीठी तम्बी) भिन्नविट्का (मलग्रवत्तक द्रवकरारे)
रुक्ष, रुर अतिशीतल है । कडवी अलाब्ु-हृदय के च्य
अप्रिय, वामक, वायुपित्तनाशक दै ॥२१५॥
तरपुसेवौसुककौरुकीणवृन्तप्रभृतीनि ॥२१६॥
स्वादु तिक्तरसान्याहुः कफवातकराणि च ।
खष्रमूत्रपुरीषाणि रक्तपित्तहराणि च ॥२१७॥
फलटशाक-- त्रपुस (खीरा), एवां रं (ककड़ी), ककार (खीरे
के मेद्), शीणचरन्त (ककड़ी का मेद विशेष, चिभ॑ट या कचरी)
आदि है । इनके सामान्यगुण-स्वादु, तिक्तरस, कफ-वायु-
कारक, गुरु, विष्टम्भि, शीतल, मधुरविपाक¢ कफ-वातकारक,
मलमूत्र के प्रवत्तक, रक्त-पित्तनाशक ^ । (पाठान्तर मे क्षार
युक्त ओर मधुर है) ॥२१६.२१७॥
बार सनीटं पुसं तेषां पित्तहरं स्तम् ।
तत्पाण्डु कफकृउजीणेमम्छं वातकफापहम् ॥२१८॥
पुख (खीरा)- बाल्यावस्था मे जब नीला-खा होता है,
तवर पित्तनाशक्र है । पीला होने पर--कफक्रारक), बहुत पकने
पर--अम्खरस, वायु कफनाशक हे ॥२१८॥
भूल पू (मूली जादि), पत्र (पटोलादि), करोरीः (वंशादि), अग्र
(बत आदि), फल, काण्ड (कूभ्मांड आदि), अधिषूढ् (कता), त्वक्
(मातु ङ्ग आदि), पुष्प (कचनार आदि); कवक (छातिया) आदि।
१ कविराज हाराणचन्द्र की टीका मे - स्वादुतिरक्तसान्याहूुः
कफवातक राणि चः यह पाठ नहीं है । ‹रक्तपित्तहराणि' के स्थान
२००
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४६ ]
एवोस्कं सकर्कार संपर्कं कफवातकृत ।
सक्षारं मधुरं रुच्यं दीपनं नातिपित्तलम् ॥२१६॥
एवोश् और कर्कार—मली प्रकार से पकने पर—कफ एवं वायुकारक हैं । क्षारयुक्त, मधुर, रुचिकारक, अग्निदीपक और थोड़ा पित्त को करती है ॥२१६॥
सक्षारं मधुरं चैव और्णवृन्तं कफापहम् ।
भेदनं दीपनं हृद्यमानाहाष्टीलनुल्लघु ॥२२०॥
शीर्णवृन्त (चिमट)—थोड़ा क्षारयुक्त, मधुर, कफनाशक, भेदक (विरेचक), अग्निदीपक हृदय के लिये प्रिय, आनाह (आधमान), अष्टीला (वाताष्टीला) रोगनाशक एवं लघु है ॥२२०॥
पिप्पलीमरिचशृङ्गवैराद्रिकहिङ्गुजीरकुस्तुम्बुरजम्बीर-सुमुखसुरसाजकभूस्तृणसुगन्धकवासमर्दककालमालकुटेर-कक्षवकखरपुष्पगिप्रमधुरगिप्रफणिञ्जकसर्पपराजिकाकुलाहलायगुथगण्डौरहिलपर्णिकावर्षाभूवित्रकमूलकलशुनक-छायपलाण्डुकलायप्रभृतीनि ॥२२१॥
पिप्पली, मरिच, शृङ्गवैर (आद्रिक), हींग, जीरा, कुस्तुम्बुर (घनिया), जम्बीरक (निम्ब), सुमुख (वनवर्षी), सुरसा (तुलसी), अर्जक (श्वेत कुटेरक), भूस्तृण (रोहित्यृण), सुगन्धक (गन्ध-तृण), कासमर्दक (कालकासन्दी), कालमाल (कृष्ण तुलसी), कुटेरक (तुलसीभेद), खवक (छिक्णी), खरपुष्प (मरूवक), शिप्र (कडुवा सहजन), मधुशिप्र (मधुर सहजन), फणिञ्जक (तुलसी भेद), सर्पप (सरसो), राजिका (राई), कुलाहल (मुण्डितक), वेणु (वॉस), तिलपर्णि (चोरक, अन्य लाल चन्दन), वर्षाभू (पुनर्नवा), चित्रक (चीता), मूलक (मूली), लशुन पलाण्डु (प्याज), कलाय (मटर) आदि शाक संस्कार एवं आहार के काम में आते हैं ॥२२१॥
कटून्युष्णानि रुच्यानि वातश्लेष्महराणि च ।
कृताञ्चेषुपुष्पयन्ते संस्कारार्थमेनेकधा ॥२२२॥
इनके सामान्य गुण—कटु, उष्ण, रुचिकर वात-कफ-नाशक, कृताञ्च (मूळयूप-लाजमण्ड) के संस्कार तथा अनेक (स्वायत्कलादि भेद से) प्रकार से आहारों में इनका उपयोग होता है ॥२२२॥
तेषां गुर्वो स्वादुशीता पिप्पल्याद्रां कफावहा ।
शुष्का कफानिलछनी सा वृष्ट्या पिप्ताविरोधिनी ॥२२३॥
पिप्पली (गीली)—गुरु, मधुर, शीतल कफनाशक है । शुष्क पिप्पली—कफ-वायुनाशक वृष्ट्य (शुक्रवर्धक और ईषत् पित्तशामक है । (गीली-पित्तशामक, शुष्क-पित्तप्रकोपक है) ॥
स्वादुपाक्याद्रमरिचं गुरु श्लेष्मप्रसेकि च ।
कटूर्णं लघु तच्छुष्कमवृष्ट्यं कफवातजित् ॥२२४॥
नात्युष्णं नातिशीतं च वीर्यतो मरिचं सितम् ।
गुणवन्मरिचेश्वयश्च चतुष्टयं च विशेषतः ॥२२५॥
मरिच (आद्रि)—मधुरविपाक, गुरु, कफनाशक, कटु, उष्ण लघु है । शुष्क मरिच—अवृष्ट्य (शुक्रवर्धक नहीं) और कफ-वायुनाशक है । श्वेत मरिच (शोभाञ्जन का बीज) न तो अति उष्ण और न अतिशीत है, साधारण वीर्यवान् है । मरिच के समान गुणकारी है, खासकर आँखों के लिये हितकारी है २२४, २२५॥
नागरं कफवातछनं विपाके मधुरं कटु ।
वृष्ट्योष्णं रोचनं हृद्यं सस्नेहं लघु दीपनम् ॥२२६॥
नागर (सोठ)—कफ वायुनाशक, मधुरविपाक, वृष्ट्य (शुक्रवर्धक), उष्ण रोचक, हृदय के लिये प्रिय, स्नेह युक्त, लघु, और अग्निदीपक है ॥२२६॥
कफानिलहर् स्वयं विबन्धानाहशूलनुत् ।
कटूर्णं रोचनं हृद्यं वृष्ट्यं चैवाद्रिकं स्मृतम् ॥२२७॥
आद्रिक (आदी)—कफ-वायुनाशक, स्वर के लिये हितकारी, विबन्ध, आनाह और शूलनाशक है । कटुरस, उष्णवीर्य, रोचक हृदय के लिये प्रिय, वृष्ट्य (शुक्रवर्धक है) ॥२२७॥
लघूर्णं पाचनं हिङ्गु दीपनं कफवातजित् ।
कटु स्निग्धं सरं तीक्ष्णं शूलाजीर्णं विबन्धनुत् ॥२२८॥
हींग—लघु, उष्ण, पाचक, अग्निदीपक, कफ वायुनाशक कटु स्निग्ध, सर (विरेचक), तीक्ष्ण, शूल-अजीर्ण-विबन्ध-नाशक है ॥२२८॥
तीक्ष्णोष्णं कटुकं पाके रुच्यं पित्तानिर्वर्धनम् ।
कटु श्लेष्मानिलहर् गन्धाख्यं जीरकद्वयम् ॥२२९॥
कारवी करवी तद्वद्विज्ञेया सोपकुञ्चिका ।
दोनो (श्वेत और काला) जीरे, तीक्ष्ण, उष्ण, कटुविपाक, रुचिकारक, पित्तवर्धक, अग्निवर्धक, कटुरस, कफ-वायुनाशक, गन्धवृद्धि होते हैं । कारवी (सूक्ष्म जीरा), करवी (सूक्ष्म कृष्ण जीरक), उपकुञ्चिका (काली जीरी)-के गुण भी जीरे के समान हैं २२९॥
भक्ष्ययन्ज्यन्तभोजयेषु विविधेष्ववचारिता ॥२३०॥
आद्रा कुम्बुम्बरी कुर्यात् स्वादुसौगन्ध्यहृद्यात्म् ।
सा शुष्का मधुरा पाके स्निग्धा रुद्धादाहनाजनी ॥२३१॥
दोषछनी कटुका किंचित् तिका क्षोतोविशोधनी ।
कुस्तुम्बरी (घनिया हरा)—भक्ष्य (लड्डू आदि), व्यंजन (शाक आदि), भोज्यों (बाल आदि) में नाना प्रकार से उपयोग करने पर स्वादु (मधुरता) और सुगन्धि तथा हृदय के लिये प्रियता उत्पन्न करता है । सूवा घनिया-मधुरविपाक, स्निग्ध, प्यास एवं दाहनाशक, दोषनाशक, कटुरस, थोड़ा तिका और क्षोतोविशोधक है । (पित्त प्रकृतिवालों के लिये विरेचक है) ॥
जम्बीरः पाचनस्तीक्ष्णः कृमिवातकफापहः ॥२३२॥
सुरभिर्दीपनो रुच्यो मुखवैशद्यकारकः ।
कफानिलविषरूपासकासदीर्गन्ध्यनाशनः ॥२३३॥
( धक
अ० ४६ | ९९ ।
जभ्ी--पाचन (वाचक), तीण, कृमि, वायु, कफ नाशक
| युरमि--अग्निदोपकः सचिकारक, सुख कौ स्वच्छता को
न्न करता दै । कफ, वायु, विष, श्वास, कास एवं दुगन्धता
को दूर करता हे ॥२२२,२२१२॥ वित्तकरत् पाञ्वशूहष्नः सुरसः समुदाहतः । तद्वत सुखो ज्ञेयो विषाद् गर नानः २३५] । सुर्-पित्तकारक, पाश्वशूनाशक दै । सुमुख के गुण
भरी युर के समान है, खासकर गर (संयोगजन्य विष; को दूर
` करता दै ॥२२५॥ ६ कृफष्ना छवो रूक्षास्तीद्णोष्णाः पित्तवधंनाः।
। कटुपाकृरसाश्चेव सुरसाजकमूस्वणाः ॥२३५॥ ॥ सुरख-भजंक-मूस्तृण-कफनाशक, ल्घु, रूक्ष, तीच,
। उष्ण, पित्तवधंक, कटविपाक, कटुरख है ।२२५॥ |, मधुरः कफवातष्नः पाचनः कण्टञोधनः । । विरेषतः पि्तहरः सतिक्तः कासमदेकः ॥२३२॥
। कासमद्-मघुर, कफ वायुन।शक, पाचक, कण्ठशोधक,
खासकर पित्तनाशङ़, तिक्त दे ॥२३६॥ कटुः सक्षारमधुरः शिग्रुस्तिक्तोऽथ पिच्छिलः । मधुशिग्रः सरस्तिक्तः ओोफष्नो दीपनः कटः ॥२३॥
सहजन (कडवा)--कटु, क्षारयुक्त, मधुर, तिक्त, पिच्छिल है । मधुरिग्र (मीठा सहजन) खर (विरेचकर), तिक्त, शोफनाशक
अग्निदीपक सोर कट् है ॥२२५७॥
विदाहि बद्धविण्मूचं क्षं तीदणोष्णमेव च । त्रिदोषं साषेपं शाकं गाण्डीरं वेगनाम च ॥२३द॥ `
सरसों का शाक, गाण्डीर ओर वेग (मारवार फुल)-
विदाही, मल-मूत्र-अवरोधक, रूक्ष, तीच्ण ओर उष्ण, तीनों दोषो को उयन्न करते हँ २२८ चित्रकृस्तिख्प्णीं च कफगोफहरे खघु । । चित्रक ओर तिल्पणी--कफ-शोफनाशक ओर ल्घु है ।
। बपोभूः कफवातध्नी हिता ओप्तोदराशेसाम् ॥२२९॥ | . वषाम् (पुननेवा)--कफ-वातनाशक, शौफ, उद्ररोगी एवं अशरोगियों के ल्यि दितकरी ३ ॥२२६॥
र्टतिक्तरसा हया रोचनी वहिदीपनी । सबेदोषहरा रुष्वी कण्ठ्या मूर्कपोतिका ॥२४०॥ महत्तद्गुरु विष्टम्भि तीद्णमानं त्रिदोषकृत् ।
तदेव स्नेहसिद्धं तु पित्तनुत् कफवातजित् ॥२४१॥ त्रिदोषशमनं जष्कं विषदोषहरं खु । ` षष्म्मि वातरं ज्ञाः युष्कमन्यत्र मूखकात् ॥२४२॥ रो्यकपोतिका (मूली)- कट, तिक्तरसः, हृदय के व्यि प्रिय,
| 2 अभिदीपक्, त्निदोषनाशक, लघु, गले के व्यि हितकारी । = त् (बह्ग मूली) - गुरं ओर विष्टम्भी. । आम (असं-
५
।
।
अर्थात् कच्ची) - तीक्षण ओर तीनों दोषों को उद्यन्न करती
|, मूखी स्नेह मेँ सिदध होने पर-पित्तनाशक) कफवाधु
सूत्रस्थानम् €
गुरु, कषाय--अनुरख, विपाक में मधुर
| २०९ कारक हे । सूरी मूली-त्रिदोषशामक, विषदोषनाश्कं ओर घ हे । मूटी को छोड़कर अन्य सव शुष्क याक विष्टम्भी ओरं वायुकारक हे ॥२४०-२४२॥ |
पुष्पं च पत्रं च फटं तथेव ` यथोत्तरं ते गुरवः प्रदिष्टाः | तेषां तु पुष्पं कफपित्तहन्दर
फलं निहन्यात् . करमारुतो तु ॥२४२॥ पुष्प, पत्र ओर फक इनमे उत्तरोत्तर ल्घु दै, पुष्पसे पुत्र (पे), पर्तो से फल लधु दै । इनमे पुष्पकफ-पित्तनायक ई, ओर फठ कफवायुनाशक हँ । (कई आचायं-ये गुण मूढी के मानते हँ) ॥२५३॥
स्तिरधोष्णतीद्णः कटुपिच्छिख्श्च
गुरुः सरः स्वादुरसश्च बल्यः।
वृष्यश्च मेधास्वरबणंचज्लु- भरनास्थिलतन्धानकयो रसोनः ॥२४४॥ हद्रोगजीणेजवरकुक्षिशू - विबन्धगुल्मारुचिकासशोफान् । दुनोमञुष्ठानरसाद जन्तु | समीरणश्वासकफांश्च हन्ति ॥२४५॥ ` रसोन (लदघुन)- स्निग्ध, उष्ण, तीण, कटुरख, पिच्छिल, गुर, खर (विरेचन), मधुररस, बककारक, वृष्य (शुक्रवधक);
मेधा (उद्धि), स्वर वण, आंखों के स्यि दितकारी, मगनास्थि
को जोड़नेवाखा है । हृदयरोग, जीणज्वर, कुक्षिश (उदरः श), विवरन्ध, गुल्म, अर्चि, काठ, शोक, दुनांम (अश), कुष्ठ, अनलसाद् (अभिमाय), जन्तु (कृमि), समीरण (वायु),
श्वास ओर कफ को नष्ट करता है ॥२४४,२४५॥
नाद्युष्णवीर्याऽनिख्हा कटुश्च तीद्णो गुरुनो तिकष्ावहश्च ।
बरखावहः पित्तकरोऽथ किंचित्. | पराण्डुरम्ि च विवधयेत्तु. ॥२४६॥ स्निग्धो सुचिष्यः स्थिरधावुकारी बल्योऽथ मेधाकफपुष्टिद्श्च । . स्वादुगुरुः शोणितपित्तशस्तः _ सपिच्छिछः क्षीरपरण्डुरुक्तः ॥२४७॥ पलाण्ड् (प्याज)- अति उष्णवीयं नहीं, (इषत् उष्णवीय),
वायुनाशक, तीदण, गुरु, ईैषत्कफकारक, बरकारक, ईैषत्पित्त- कारक, अभचिवधंक . है | क्षीरपखाण्डु (मधुररस युक्त प्याज);
स्निग्ध, रुचिकारक, षाठ॒ओं को स्थिर करनेवाला, बलंकारक, मेधा द्धि) कफ ओर पुष्टि कारक, स्वादु (मधुर), गुरु, रक्त- पित्त में प्रशस्त ओर पिच्छिर ई ।(२४६.२४७॥ ह करायशाकं पित्तघ्नं कषफ्ऽ्न वातरं गुरू । `` कषायानुरसं चेव विपाके मधुरं च तत् ॥२४८ ~ _ कलाय शाक (मटर)-पित्तनाशक, कफनाशक, वायुका,
२०२
जन्तुष्नङ्कच्चयूथिकात रुणीजोवन्तीविस्बीतिकानदी
(न्दी) मल्लातकच्छगान्त्रीबृक्षादनीफञ्ीलात्मरीशोटटुव नस्पतिप्रसवरणकवदारकोविदारप्रश्चती नि ॥२४६॥
कघायमधुर शाक--
जन्तुष्न. चुच्चू , युथिका (जही); तरणी, जीवन्तः विभत्री
(कन्दुरी के पत्ते) ~ नन्दी, भल्लातक, छगलान्त्री (विधारे के पत्त) 3
वृक्षादनी (बन्दा), फञ्ञी, शाल्मली, शेलु (लिसोड़ा), वनस्पति-
प्रसव (गूर आदि के पत्ते), शण, कलु'दार (कचनार); कोवि-
द्ार (श्वेतकचनार) आदि शाक हे ।२४६।।
कषायस्वाटुतिक्तानि रक्तपित्तहराणि च ।
कफघ्नान्यनिटं कयः संप्राहीणि ङघनि च ॥२५०॥
इसके सामान्य गुण-- कषाय-स्वादुरख, तिक्तरख, रक्तः पित्तनाशक; कफनारक?
वायुकारक, संग्राही ओर लघु है ।२५०॥
रुधः पाके च जन्तुष्नः पिच्छिटो ब्रणिनां हितः ।
कषायमधुरं भ्राही चुच्चस्तेषां त्रिदोषह। ॥२५१॥
चुच्चू--विपाक मे लधु, ृमिनाशक, पिच्छिलः, व्रणरोगियां
के ल्यि हितकारी है । कषाय-मधुररस, संग्राही ओर तीनों दोषो
कोनष्टकरतादे।२५१॥
चक्षष्या सवदोषध्नी जीवन्ती समुदाहृता ।
जीवन्ती-ओंखो के व्यि हितकारी त्रिदोषनाशक है ।
चु्धादनी वातहरा, फञ्जी स्वल्पवखा मता ॥२८२॥
बृश्चादनी- वातनाशक ओर फल्जी (मांग) अल्प वल्वाटी
है, ईषत् बख्वधैक ह ॥२५२॥।
क्षीरवरक्षोखल्यादीनां कषायाः पल्लवा; स्मृताः ।
ङीता: सं्राहिणः अस्ता रक्तपित्तातिसारिणाम् ।२५३
क्षीरवृक्ष (अश्वत्थ आदिर्यो) के तथा उत्पल (कमट) आदि
के पल्टव (कोप)-कषायरसख, शीतल, संग्राहक; रक्तपित्त
अतीखार में प्रशस्त दै २५३
पुननैवावरुणतकोयैरुवूकवत्सादनी बिल्वशाकम्रभूतीनि ॥
पुननैवा (श्वेत), वख्ण (वरना), तकांरी (अरणिक)
उख्बूक (शुक्ल एरण्ड), वत्छादनी (गिरोय), बिल्व्ाक (त्रिल्व
के पत्ते) आदि शाक है ।॥२५४॥
उष्णानि स्वाद तिक्तानि वातप्रसमनानि च ।
इसके सामान्य गु"-स्वादु, तिक्तरख ओर बात नाशक दै ।
तेषु पौननेवं आकरं विरोषाच्छोकनाञनम् ॥२५९॥
इनमें पुनन॑वाः का चाक--खाख करके शोफ (सूजन) को
नष्ट करता ह ॥२५५॥ ` तण्डुलीयकोपोदिकाऽस्ववखाचिज्लीपाल्ङकयावास्तूकप्रभृतीनि र , मेथिका तत्समे किञ्चित् हिस्फित्थं पुष्टिद गुरु ॥""
= र ` क १ ~ ण) १ निर्णयसागर की छप पुस्तक मे नन्दी" के स्थाने मे नदी
पाठ हं। ¦
सुश्रतसं हितां [ 1, ४६ |
तण्डुलीयक (चौड), उपोदिका (पई), अश्वबरखा (मेथी), ।
चिल्ली (खेत बुव), पाल्डफया (पारक, वास्तू (बधुवा) ।
आदि पत्रशाक हे" ॥२५६॥ सष्टमूतरपुरीषाणि सक्षारमघुराणि च ।
मन्दबातकष्ठान्याहू रक्तपित्तहराणि च ॥२५७॥ |
इनके सामान्य गुण-- मर -मूत्र-रवत्तक (विरेचक); क्षर्
युक्त, मधुर, कपः एवं वायु को कम करते है, र्तपित्तनाशक है । |
मधुरो रसपाकाभ्यां रक्तपित्तमद्ापहः। |
तेषां ्ीततमो रूक्षस्तण्डटीयो विषापहः ॥२५८्]
तण्डुलीयक (चौलाई)--मधुररस, मधुरविपाकः; रक्तपित्त
मदनाशक, अत्यन्त शीतल, रुक्ष, विषनाशक हे ॥२५८॥
स्वादुपाकरसा बृष्यां वातपित्तसृद्ापहा ।
उपोदिका सरा स्निग्धा वत्या शछेष्मकरी हिमा २५६
उपोदिका (पेई)-मधुररख, मधुरविप।क इष, वातपित्त ,
मदनाशक, खर (विरेचक), रिनग्ध, बलकारक, कफवधक ओर ` ।
शीतल ह ॥२५६॥ |
कटर्विपाे कृमिहा मेधाग्निबख्वधेनः।
सक्षारः सर्वदोषघ्नो वास्तूको रोचनः सरः ॥२६५॥ _
वास्तूक (बथुवा)- कटविपाक, कइमिनाशक, मेधाअनि'
वल्वरधक, $षर्धारयुक्त, चरिदोषनाशक, रोचक ओर स.
(विरेचक) है ।२६०॥ चिल्छी वास्तूकवञ्जञेया पारङ्कयास्तण्डलीयवत्। वातकृदुबद्धविण्मूत्रा रूक्षा पित्तकफे हिता । |
जाक माश्ववलं रूक्षं वद्धविण्मूत्रमारतम् ॥-६९॥ `
चिल्ली-त्थत्रे के समान ओर पालक चोखाई के समान् |
हे । वायुका, मलमूत्र का अवरोधक; रक्ष, पित्त कफ म
दितकारी, आश्ववल (मेथी) का याक--रूक्ष, मल मूत्र ओर
वायु का अवरोधक दै ॥२६५॥ मण्ड्कपर्णीसप्तलासुनिषण्णकुव चंखात्रह्मसुवचंखापि- प्पलीगुड्चीगोजिहाकाकमाचीप्रपुननाडाबल्एजसतीन रह । तीकण्टकारिकाफरूपटोखवातीककारवेस्छककट् किकक्चु |
(बु) कोरुबूकपपटककिराततिकतकर्कोटकारिष्टक। शातः
वेत्रकरीराटरूषकाकपुष्पीप्रभुतीनि ॥२६२॥
तिक्तप्राय शाक- मण्डूकपर्णी (जादी), सतला (चम्म॑साहवा), खनि
(चौपतियार) सुवच॑ला (सुब्रत), ब्ह्मसुवच॑ला (सयम,
पिपली, गिलोय, गोजिहा (गाजवा), काकमाची (मकोष्॥
| | | ।
१ मेथी श्र हिस्फित्था के भेद-
“वातपित्तहरा तिक्ता रुष्वी श्टेष्मावरोधिनी ।
६
|
२ चापतिया-- - < ““चागिरीसदशैः पत्रैः सुनिषण्णद्चतु्लः । , | शाको जलान्वित देोऽचतुष्पव्रीति कथ्यते ॥* = _
| ष |
¢ ४६ |
हती (वही कटेरी) कण्टका रिका (छोर) कटे री) के फल,
पटो (धरवल), वत्तिाक (वेगन), कारवेल्र (करेल)
कंटकिका (कट्की); केलुक, उरक (श्वेत एरण्ड), पर्ष
(पित्तपापडा); करिराततिक्ता (चिरायता), कर्कटक (ककड़ा),
अरि ( नीम ), कोशातकी ( रई कडुवी) वेत्रकरीर वेत का
| © त्र अंकुर); आरस्ष (रासा), अकर पुष्पी (कुटुम्बनि या आक् के
। प्ते) आदि शाक द ॥२६२॥ रक्तपित्तहराण्याहुहयानि सुख्घूनि च । कष्ठमेहञ्वरश्चासकासारुचिहराणि च ॥२६३॥ हनके सामान्य गुण--रक्त पित्तनाशक, हृदय के ल्यि । प्रि, ल्घु कुषठमेह, ववर, श्वाख, कास ओर अरचिनाशक है ॥ । कंषाया तु हिता पित्ते स्वादुपाकरसा हिमा । भ्वी मण्डुकपरणीं तु तद्रद्गोजिहिका मता ॥२६४॥
मण्डूकपर्णी कषायरख, पित्त मे हितकारी, मधुरविपाक,
मधुररस, शीतल, ल्घु है । गोजिहा के गुण भी मण्डूकपर्णी के । समान द ।२६४॥ । अविःाही त्रिदोषघ्नः संम्राही सुनिषण्णकः । सुनिषण्णक--अवि दाही, त्रिदोषनाशक, संग्राही है । अवल्गुजः कटुःपाके तिक्तः पित्तक्ापहः ॥२६५॥। अवल्गुज--कट्विपाक, तिक्त; पित्तकफनाशक रै ॥[२६५॥ ईेपत्तिक्त त्रिदोषष्नं शाकं कटु सतीनजम् । नाद्युष्णञ्जोत कुष्ठघ्नं काक्माच्यास्तु तद्विधम् ॥२६६॥ सतीन (मटर के पत्र)-थोड़ा तिक्त, त्रिदोषनाशक, कटुरस ६। काकमाची (मकरोय)- न तो अधिक उष्ण ओर न अधिकं
शीत (साधारण), कु्ठनारक, तिक्त ओर कटुरस दै | २६६॥ कण्डुकुष्ठकृमिष्नानि कफवातहराणि च । रुछानि बरहतीनां तु कटुतिक्तख्धूनि च ॥२६७॥
पकणी
पि
_ बृहतीफलं ( कटेरी-बड़ी कटेरी के फल )-- कण्ड्; कुष, | मिना क) कफवात को दूर करते ह । कटु, पित्त ओर घु हं ॥२६७॥ कफपित्तहरं त्रण्यसुष्णं तिक्तमवातखम् ।
कटुक पाके वृष्यं रोचनदीपनम् ॥२९2॥ पट्
(मष), रोचक ओर अग्निदीपक दै ॥\६८ र्वातहर तिक्तं रोचनं कटुकं रषु । षाताकर दीपनं परोक्तं जणं सक्षारपित्तछम् ॥२६९॥ । पात्ताक ( बेगन । भोर ठ ( ¢ 1 | | य ओर पित्तकारक है ।(२६६॥ त ( ते कोटक वित् कारपेहल्कमेव च।
|
सूत्रस्थानम्
® (परवल) -कफ़-पित्तनाशक, व्रण के व्यि हितकारी,
णा, तिक्त, परन्तु वायुकारक नही, विपाक मे कटु, इष्य |
। गौर )--कफ-वायुनाशक, तिक्त, रोचक, कटु | ॥ त ३ एषं अग्निदीपक है । जीणं (पका हज ) बेगन-- | `
१ कविराज हाराणचन्द्रजी
२०३ कर्कोट ( कंकोड़ा ) ओर कासैल्छक ( करेला ) मरगन् के समान हे ॥ आटरूपकवेत्राप्रगुड् ची निम्बपपटाः।
किराततिक्तसदहितासितिक्ताः पित्तकषापहाः ॥२७०] आटसूप्रक (वासा) वेतराग्र वेत का अग्रमाग). गुडची (गिव), निम्व (नीम), ओर पपट (पित्तपापडा), किरततिक्ता ( चिरायता ), तिक्ता ( कटुकी )-ये सव्र तिक्त, पित्त कफ- नाशक ह ।|२७०॥
कफापहं शाकमुक्तं बरुणप्रपुन्नाड (2) योः। रूक्ष रघु च शीतं च वातपित्तप्रकोपणम् ॥२७१॥ वरण (वरना) ओर प्रपुन्नाड (पनवाड़)- का शाक्त क्फ. नाशक, रुक्ष, रघु, शीतर, वायु-पित्तप्रकोपकं ह ।२७१॥
दीपनं काठशाक तु गरदोषहरं कट् ।
काल्ाक अग्निदोपक) गरदोष (संयोगजन्य बिष) को न करता है ओर कटु हे । | कौसुम्भं मधुरं रूक्षमु्मं श्टेष्महरं र्वु ॥२०२॥ कौसुम्भ (कुम्भा) का शाक मधुर, रुक, उष्ण, कृफहर ओर ल्धु है ॥२७२॥ | ¦ बातठं नालिकाशाकं पित्तध्नं मधुरं च तत्।
नालिकाशाक--वायुकारक, पित्तनाशक ओर मधुर है । ग्रहण्यर्योविकारष्नी साम्छा वातकफे हिता । उष्णा कषायमधुरा चाङ्गरो चाग्तिदीपनी ॥२७३॥ चांगेरी (खहमिदी) -प्रणी-जशरोगनाश्क, खटी, बाु- कफरोग मे हितकारी, उष्ण, कषायमधुर ओर अग्निदीपक है ॥ लोणिकाजातुकत्रिपणिक्रापत्तूरजीवकसुवचेखा इडरक- कुतुम्बककुणिज्ञरङुन्तठ्काङ्करण्टिक प्रभृतयः ॥२५४॥
लोणिक् (दणि); ज दुकत्रिषणिका, पततूर (शालिञ्ची शाक), जीव, सुवचला (त्राह्ली), इड्रक, कुतम्बक् (राजञचिण्टी)- ऊुठि- ज्र (तरसीमेद्) कुन्तलिका (नीछन्चिन्टी), कुरण्टिका (पीत कण्ट) आदि (राजक्षवक आदि), शाक दै? ॥२७४॥ स्वादुपाकरसाः ओताः करूष्ना नातिपित्तखाः। ख्वणायुरसाः रक्षाः सक्षाराः वातखा सराः ॥२७५॥
इनके सामान्य गुण- | मधुररस, मधुरपाक, शीतवीय, कफनाराक, ईैषत्पित्तकारक, खवण-अनुरस, रुक्ष, ईषल्ारयुक्त, वायुकारक ओर सर (विरे.
चक) है ॥२७५॥ स्वादुतिक्ता कुन्तलिका कषाया सकुरण्टिका ।
` छरण्टिका--कषायरस, कुन्तलिका -स्वाड एवं तिक्तरस ईै। संभ्राहि शीतलं चापि रघ दोषापहं तथा । __ राजक्षवकशाकं त शटीशाक च तद्विधम् ॥२७९॥ _
ते ६. (2 (कः ११
४ §
२०४
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४९ ]
राजक्षवक—संग्राही, शीतल, लघु, दोषनाशक है। शदी का शाक भी राजक्षवक के समान गुणकारी है। ॥२७६॥ स्वादुपाकरसं शाकं दुर्जरं हरिमन्थजम्। हरिमन्थ (चने)—मधुररस, मधुरविपाक और दुर्जर हैं। भेदनं मधुरं रुक्षं कलायसतिवातलम् ॥२७७॥ कलाय (मटरभेद) का शाक, भेदक (विरेचक), मधुर, रुक्ष, अतिवायुकारक है। ॥२७७॥
संसनं कटुकं पाके लघु वातकफापहम्। शोफन्तमुण्वीयं च पत्रं पूतिकरञ्जकम् ॥२७८॥ पूतिकरञ्ज (नाटाकरञ्ज) के पत्तों का शाक—संसन (विरेचक), विपाक में कटु, लघु, वायु-कफनाशक, शोफनाशक, उष्णवीर्य है। ॥२७८॥
ताम्बूलपत्रं तीक्ष्णोष्णं कटु पित्तप्रकोपम्। सुगन्धि विशदं तिक्तं स्वर्यं वातकफापहम् ॥२७९॥ संसनं कटुकं पाके कषायं वह्निदीपनम्। वक्रत्रकण्डूलमलकलेदुर्गन्ध्यादिविशोधनम् ॥२८०॥ ताम्बूलपत्र (पान का पत्ता)—तीक्ष्ण, उष्ण, कटुरस, पित्त-प्रकोपक, सुगन्धि, विशद, तिक्त, ज्वर के लिये हितकारी, वायु-कफनाशक, संसन (मल-विरेचक) विपाक में कटु, कषाय, अग्निदीपक, मुख की खाज, मल की आर्द्रता एवं दुर्गन्धता को नष्ट करता है। ॥२७९, २८०॥
अथ पुष्पवर्गः।
कोविदारञ्जशालमलीपुष्पाणि मधुराणि मधुरविपाकानि रक्तपित्तहराणि च, वृषागस्त्ययोः पुष्पाणि तिक्तानि कटुविपाकानि क्षयकासापहानि च ॥२८१॥
इसके आगे पुष्प वर्ग (शाक)—
कोविदार (कचनार), शण, शालमली (सिम्बल)—इसके फूल मधुररस, मधुरविपाक और रक्त-पित्तनाशक हैं। वृष (बांसा) और अगस्त के फूल तिक्ररस, कटुविपाक एवं क्षय-कासनाशक हैं।
आगस्त्यं नातिशीतोष्णं नक्तान्धानां प्रशस्यते ॥२८२॥
अगस्त्यपुष्प के विशेष गुण—न तो अतिशीत और न अति-उष्ण (साधारण), नक्तान्धों (रतोंधी रोगियों) के लिये उत्तम है। ॥२८२॥
करीरमधुशिम्यकुसुमानि कटुविपाकानि वातहरणानि सुधूम्रप्रपुषाणि च ॥२८३॥
करीर, मधुशिम्य (मीठा सहजन), के फूल—विपाक में कटु, वायुनाशक, मल-मूत्र के प्रवर्त्तक हैं। ॥२८३॥
१ राजक्षवक का अर्थ राई किया है। परन्तु राई शीतल न होकर उष्ण है।
२ कई आचार्य संसन आदि गुण (कच्चे) सुपारी फल के मानते हैं।
रक्तवृक्षस्य निम्बस्य मुष्ककाकौसनस्य च। कफपित्तहरं पुष्पं कुष्ठघनं कुटजस्य च ॥२८४॥ रक्तवृक्ष (लाल चन्दन), निम्ब (नीम), मुष्क (क्षारवृक्ष), अर्क (आक) और असन—इनके पुष्प तथा कुटज (चूड़े) के फूल—कफपित्तनाशक और कुष्ठरोगनाशक हैं। ॥२८४॥
सतिक्तं मधुरं शीतं पद्मं पित्तकफापहम्। पद्म (कमलपुष्प)—द्वैषततिक्त, मधुररस, शीतवीर्य और पित्त-कफनाशक है।
मधुरं पिच्छिलं स्निग्धं कुमुदं ह्लादि शीतलम्। तस्मादल्पान्तरगुणे विद्यात् कुवलयोत्पले ॥२८५॥ कुमुद (चन्द्रोदय में खिलनेवाला) मधुर, पिच्छिल, स्निग्ध, ह्लादि (सुखदायक) और शीतल है। कुवलय और उत्पल में कुमुद से कुछ हीन गुण हैं। ॥२८५॥
सिन्धुवारं विजानीयाद्भित्तं पित्तविनाशम्। सिन्धुवार (निर्गुण्डी) पुष्प—हितकारी और पित्तनाशक है। मालतीमल्लिके तिक्ते सौरभ्यात् पित्तनाशने ॥२८६॥ मालती (जाति), मल्लिका (जूही)—तिक्ररस, सुगन्धि से पित्त का नाश करती हैं। ॥२८६॥
सुगन्धि विशदं हृषं बाकुलं पाटलानि च। बाकुल (मौलसरी) और (पाटल फूल) के पुष्प—सुगन्धि, विशद, हृदय के लिये प्रिय होते हैं।
श्लेष्मपित्तविषघ्नं तु नागं तद्रुचं कुडकुमम् ॥२८७॥ नाग (नागकेसर), कफ पित्त-विषनाशक है, कुंकुम (केसर) में भी नागकेसर के समान गुण हैं। ॥२८७॥
चम्पकं कफपित्तघ्नं शीतोष्णं कफनाशनम्। चम्पक (चम्पा)—रक्त-पित्तनाशक, शीत-उष्ण (साधारण) कफनाशक है।
किंशुकं कफपित्तघ्नं तद्रुदेव कुरण्टकम् ॥२८८॥ किंशुक (डाक) और कुरण्टक के पुष्प-कफ पित्त नाशक हैं। यथावृक्षं विजानीयात् पुष्पं वृक्षोचितं तथा। उपसंहार—वृक्ष के अनुसार-पुष्प में भी गुण समझने चाहिये।
मधुशिम्यकरीराणि कटु श्लेष्महराणि च ॥२८९॥ मधुशिम्य (मीठे सहजन) के करीर (नाल) कटुरस और कफनाशक हैं। ॥२८९॥
क्षवककूलेचरवंशकरीरप्रभृतीनि कफकराणि सुधूम्रप्रपुषाणि च ॥२९०॥
क्षवक (छत्रक), कूलेचर (खुखुण्डक) और वंशकरीर (वंशांकुर)—आदि कफनाशक और मल मूत्र प्रवर्त्तक हैं।
क्षवकं क्रमिलं तेषु स्वादुपाकं सपिच्छलम्। विष्यन्दि वातलं नातिपित्तश्लेष्मकरं च तत् ॥२९१॥
अ० ४६ ]
पूर्वस्थानम्
१०५
क्ष्वक-कुमिकारक, मधुर-विपाक, पिच्छिल, विष्यन्दि (कफसावि), वायुकारक, पित्त-कफ को थोड़ा बढ़ाता है ॥
वेणोः करीराः कफला मधुरा रसपाकतः ।
विदाहिनो वातकराः सकषाया विरुक्षणः ॥२२॥
बाँस के अंकुर—कफकारक, मधुरविपाक, विदाही, वायुकारक, कषाय एवं रूक्ष हैं ॥२२॥
उद्भिदानि पलाक्षुकरीषवेणुक्षितिजानि । तत्र पलाक्षजानं मधुरं मधुरविपाकं रूक्षं दोषप्रशमनं च, इलुजं मधुरं कषायानुरसं कटुपाकं शीतलं च तद्धेवोष्णं कारीषं कषायं वातकोपनं च, वेणुजातं कषायं वातकोपनं च; भूमिजं गुरुं नातिवातलं भूमितश्चास्यानुरसः ॥२३॥
उद्भिदं शाक—( भूमि में से उत्पन्न होनेवाले और बिना बोये )—
पलाळ ( पुआल शस्यशून्य काण्ड ), इलु ( गन्ने ), करीष ( शुष्क गोमय ), वेणु ( बाँस ), क्षितिज ( भूमि में उत्पन्न ) उद्भिद ( छत्रकादि ) शाक हैं । इनमें पलाळ ( पुआल ) में उत्पन्न शाक—मधुररस, मधुरविपाक, रूक्ष, दोषनाशक हैं । गन्ने में उत्पन्न शाक—मधुररस, कषाय—अनुरस, कटु और शीतल हैं । करीष में उत्पन्न शाक—उष्ण, कषाय और वातप्रकोपक हैं । वेणु ( बाँस ) में उत्पन्न शाक—कषाय एवं वायुप्रकोपक हैं । भूमिजन्म शाक—गुरु, ईषत्—वायुकारक और भूमि के समान गुणवाले होते हैं ॥२६॥
पिण्याकतिलकत्कस्थूणिकागुष्कशाकानि सर्वदोषप्रकोपणानि ॥२८॥
पिण्याक ( अलसी-सरसों की खल ), तिलकल्क ( तिल खल ), स्थूणिका ( वटक-नालबड़ियाँ ) और ये शुष्क शाक-तीनों दोषों को कुपित करते हैं ॥२८॥
विष्टुभिन्नः स्मृताः सर्वे वटका घातकोपनाः ।
सिण्डाकी वातला साद्री रुचिष्यानलदीपनी ॥२९॥
वटक ( सब प्रकार की बड़ियाँ, मूँग, उड़द आदि से बनी ) विष्टुभिन्न और वायुप्रकोपक होती हैं । सिण्डाकी ( मूली आदि के शाक को थोड़ा-सा उबालकर, कूटकर, इसमें सुगन्धित एवं मिरच आदि द्रव्य मिलाकर बनी बड़ियाँ सिण्डाकी कहलाती है, यह आर्द्र और शुष्क भेद से दो प्रकार की हैं )—वायुकारक हैं, आर्द्रा-रोचक एवं अग्निदीपक हैं ॥२९॥
विडुभेदि गुरु रूक्ष च प्रायो विष्टुभिन्नु दुर्जरम् ।
सकषायं च सर्वं हि स्वादु शाकमुदाहृतम् ॥२९॥
सब स्वादु ( मधुर ) शाक—विरेचक, गुरु, रूक्ष, प्रायः करके विष्टुभिन्नु ( गुड़गुड़ाहट कारक), दुर्जर, और कषायरस हैं ॥
पुष्पं पत्रं फलं बालं कन्दश्च गुरवः क्रमात् ॥
पुष्प, पत्र, फल, नाल और कन्द शाक ये उत्तरोत्तर गुरु
हैं, पुष्पशाक से पत्रशाक, पत्रशाक से फलशाक, उससे नाल-शाक, नालशाक से कन्दशाक गुरु हैं ॥२९॥
कर्कशं परिजीणं च क्रुमिजुष्टमद्देशजम् ।
वज्रयेत् पत्रशाकं तद्वाटकात्विरोहि च ॥२९॥
त्याज्य पत्रशाक—कर्कश ( खर-स्पर्श ), परिजीर्ण ( पुरा-तन पीला ), क्रुमिजुष्ट ( कीड़ों से खाया हुआ ), अदेशज ( अनुचित देश में उत्पन्न ), अकालविरोहि ( अकाल में उत्पन्न ) पत्रशाक त्याज्य है ॥२९॥
अथ कन्दवर्गः ।
कन्दान्त उर्ध्वं बन्दायसः—विदारीकन्दशतावरीविस-मृणालशृङ्गाटककशेरुकपिण्डालुकमध्वालुकहस्त्यालुकका - घ्वालुकशङ्खालुकरकालुकेन्द्रीवरोत्पलकन्दप्रभृतीनि ॥२९॥
विदारीकन्द ( विदारी ), शतावरी, विस ( कमलमूल ), मृणाल ( कमलनाल ), शृङ्गाटक ( सिंघाड़ा ), कशेरु, पिण्डालु, मध्वालु, हस्त्यालु, काष्ठालु, शंखालु, रक्तालु, इन्दीवर ( नील-कमल ), उत्पल ( श्वेत या लालकमल ) आदि कन्द ( भूमि में उत्पन्न ) हैं ।
वि० मन्तव्य—आज के पाश्चात्य शिक्षा शिक्षितों का विश्वास है कि आल्ड—आज से कुछ शताब्दी पूर्व अमेरिका से भारत में आया है, परन्तु यह भ्रूत है कि अन्त इसका विवेचन पाठक स्वयं करें और देखें कि इस सूत्र में एक नहीं अनेक आलुओं का नामोल्लेख है और—च० सू० अ० २७ में भी “तद्वत् पिण्डालुकां विद्यात् कन्दत्वात् च मुखप्रियम्” कह कर आल्ड का उल्लेख किया गया है । आज के समान उस समय भी यह मुखप्रिय था ॥२९॥
रक्तपित्तहराण्याहुः शीतानि मधुराणि च ।
गुरुणि बहुगुष्काणि स्तन्यबृद्धिकराणि च ॥३०॥
इनके सामान्य गुण—रक्तपित्तनाशक, शीतल, मधुर, गुरु, शुक्रवर्धक हैं और स्तन्यबृद्धि ( दूध को बढ़ाना ) करते हैं ॥
मधुरो वृंहणो वृष्यः शीतः स्वयोरर्जितमूत्रलः ।
विदारीकन्दो बल्यश्च पित्तवातहरश्च सः ॥३०॥
विदारीकन्द—मधुर, वृंहण ( देहवर्धक ), वृष्य ( शुक्रवर्धक ), शीतल, स्वर के लिये हितकारी, अतिमूत्रवर्धक, बलकारक, पित्त वायुनाशक है ॥३०॥
वातपित्तहरी वृष्या स्वादुतिकता शतावरी ।
महती चेव हृद्या च मेधाग्निबलवर्धिनी ॥३०॥
ग्रहण्यशोविकारघ्नी वृष्या शीता रसायनी ।
कफपित्तहरास्तिकतास्तस्या एवङ्गुराः स्मृताः ॥३०॥
शतावरी—वात-पित्तनाशक, वृष्य ( शुक्रवर्धक ), स्वादु-तिक्तरस है । महती ( बड़ी ) शतावर—हृदय के लिये प्रिय, मेधा अग्नि एवं बल की वर्धक है । ग्रहणी रोम-नाशक वृष्य,
२०६
( शुक्रल ), शीतल एवं रसायन है | शतावरी के अंकुर (परोद) कफ-पित्तनाशक, तिक्त होते देँ ॥ ३०१,२०२ ॥
अविद्ाहि विसं प्रोक्तं रक्तपित्तप्रसादनम् |
विष्टम्भि दुरं रूक्षं विरसं मारुतावहम् ॥ ३०३ ॥ वरिस ( कमटमूल )-अविदाहि (जलन उन्न नदीं करती), रक्त-पिच्नाशक है । रसरहित त्रिख विष्टम्भि, दुजर, रुक्ष, वायु-
कारक हे ।|२०३॥ गुरू विष्टम्मिशीतो च श्चङ्गाटककरेरको ।
सिघाड़ा ओर कशेरू- गुर, विष्टम्भि ओर शीतल है ।
पिण्डाढुकं कफकरं गुरु वातप्रकोपणम् ॥ ३०४ ॥
पिण्डाल्ु-कफकारक गुरु ओर वायुप्रकोपक है ॥३०४॥ सुरेन्द्रकन्दः श्टेष्मघ्नो विपाके कडु पित्तञ्त् | सुरन्द्रकन्द ( वच्रकन्द ) कफनाशक, कटुविपाकं एवं पित्तकारक है |
वेणोः करीरा गुरवः क फमारुतकोपनाः ॥ ३०५॥ बां की मूल का अंदुर-गुख, कफ एवं वायुप्रकोपक है ॥ स्थुटसूरणमाणक्म्र्चतयः कन्दा ईषक्कषायाः कटुका रूक्षा शिष्टम्भिनो गुरवः कफव्रातखाः पित्तहराश्च ॥३०६॥ स्थूल्कन्द् ( ग्रामक्न्द् ), सूरणकन्द् ( जिपिकन्द ), माण- ककन्द् ( मानकन्द् ) आदि कन्द्-ईषत्कपाय रस, कटुविपाक, रूक्ष, 'वष्टम्भि, गुर, कफ-वायुकरारक ओर पित्तनाशक रै | २०६॥। मान् (ण) क स्वादु खतं च गुरु चापि प्रकीर्तितम् । स्थूख्कन्दस्तु नात्युष्णः सूरणो गद कीर्हा ॥ ३०७ ॥ : म।णककन्द्-स्वदु ( मधुर ), शीतल ओर गुर है । स्थूल- कन्द्-थोडा उष्ण ह, सूरणकन्द्-गुदकौल-(अशंरोग) नाशक दै । कुयुदोत्पट्पद्यानां कन्दा मारतकोपनाः । कषायाः पित्तशमना विपाके मधुरा हिमाः ॥ ३०८ ॥ कुमुद्, उत्पल ओर पद्म, इनके कन्द्-वायु-प्रकोपक, ˆ कषाय्रख, पित्तशामक, विपाक मे मधुर ओर शीतवीर्यं है २०८ वाराहकन्द्ः इरेऽमध्नः कटको रसपाकतः । मेद कु्ठकृमिहरो बरस्यो वृष्यो रसायनः ॥ ३०६ ॥ ` वाराहकन्द् ( युअरकन्द्-सुअर जैसे बार होते हे )-कफ- नाक्र, कटुरसः कडुविप।क, प्रमेह-कुष्ठ कृमिनाशक, वलकारक दृष्य ( शुक्रवधेक ) ओर रसायन दै ॥२०६।।
ताछनारिके& खजुरग्रशतीनां मस्तकमञ्जानः ॥३१०॥ स्वादुपाकरसानाहू रक्तपित्तदरांस्तथा । १ युक्रखाननिरध्नाश्च कफबद्धकरानपि ॥ २३१९ ॥ ताल ( ताङ् ) नारके ( नारि ) खर्जर ( खजुर ) आदि बृश्चों की मस्तकमज्जा ( अग्रमञ्जाभाग }-मधुररस, मुरविपाक, रक्तपित्तनाशक, शुक्रवधक, वायुनाशक, एवं कफ ` को बढ़ती हे।
|
सश्रतसंहिता [ अ० ४६ वि° मन्तव्य-ताङ़ आदि इक्षो के अग्रभाग-जहाँ पर हूर
पत्र लगे रहते ह-के मध्य मेँ कौमल गूदा रहता है | उसका
शाक बङ्गार तथा मद्रास मँ खाया जाता है ॥३१०.३१९॥ बालं ह्यनातेवं जीण व्याधितं कृमिभक्षितम् । कन्दं विवजयेत् सवं यो वा सम्यङ् न रोहति ॥३१६॥ त्याज्यकन्द्-बाल ( छोटे ), अनात्तव (अरृठकालजन्य।
जीणं ( पके-पुरातन ) व्याधित ( रोगयुक्त); कृमिमक्षित
( कोड से खाये ), अथवा जो कन्द मी प्रकार से उतपन्न नहीं हुआ-उखको छोड देना चाहिये ॥३१२॥ अथ खवणवगैः |
अथ लवणानि सेन्धवसासुद्रविडसौवच॑ररोमकेोद्धि- प्रभ्रतीनि यथोत्तरसुष्णानि वातकराणि कफपित्तकराणि कटुपाकीनि यथापूव रिनिग्धानि स्वादूनि सष्टमूत्रपुरीषागि ` चेति ३१२
इसके आगे क्वणो को कहते दै- |
सेन्धव ( सेन्धा छाहौरी ), सामुद्र ८ गुजरात मे समुद्र के
पानीसे तैयार); ब्रिड (मेड्गी नमक); सौवचंङ ( सुगन्धी
काला ल्वण ), रोमक ( खाम्भर ), ओद्भिद ( मूमि मे उदन्न ।
खार या खार युक्त पानी से तैयार हुभा ) आदि नमकदहै।
इनके सामान्य गुण-ये उत्तरोत्तर ८ सेन्धव से सामुद्र गुरु, ।
सामुद्र से व्रिड गुर....इषं प्रकार से) गुर दहै, वातनाशक, |
कफपित्तकारक हैँ । यथापूव ( सामृद्रसे सैन्धव, बरिडसे | सामुद्र....इस क्रम से) क्रम मे-रिनिगध, स्वादु ( मधुर); मल |
मूत्र के प्रवत्तंक है ॥२३१२॥ चक्षुष्यं सेन्धवं हयं रुच्यं रुष्वग्निदीपनम् । ` स्निग्धं सुमधुरं बृरष्यं शीतं दोषध्नयुत्तमम् ॥२१४॥ सेन्धव-आंखों के स्यि हितकारी, ह्य ( प्रिय ); खचि
कारक, रधु; अग्निदीपक, सिन्ध, मधुर, वृष्य ( शुक्रवधक ), ,
शीतल, दोषनाशक ओर नमकों मेँ शरेष्ठ है ॥२१५॥
सामुद्रं मधुरं पाके नाद्युष्णमविदाहि च ।
भेदनं सिनिग्धमीषच्च शृरहद्रोगनाशनम् ॥३१५॥ सामद्रनमक~विपाक मे. मधुर, ईषत् उष्ण, अविदाही,
मेदक ( विरेचक ), ईषत् स्निग्ध, शुख्नाशक, ईषत् पित्त
कारक ह |३१५॥ | य
सक्षारं मधुरं सुदमं शूरह्रोगनाशनम् । |
रोचनं तीच्णयुष्णं च विडं वातानुखोमनम् ॥३८६॥ विडनमक-क्ारथुक्त, अग्निदीपक, रूक्ष, शुल्ंदयरगण | नाशक, रोचक, तीण, उष्णवीयं ओर वायु का अनुरीरम"
करता है ॥३१६॥ 1 रघु सोवचंखं पाके वीर्योष्णं विद् कट् । ` गल्मशूरविरवन्धघ्नं हृं सुरमिं रोचनम् ॥३१॥
। |
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अ० ४६ ]
सूत्रस्थानम्
२०७
सौवर्चलनमक-मधु, उष्णवीर्य, विशद, कटुविपाक, गुल्म शूल एवं विषम्य (मल-मूत्रावरोध) नाशक, हृदय के लिये प्रिय, सुरभि (सुगन्धित) और रोचक है ॥३१७॥
रोमकं तीक्ष्णमत्युष्णं व्यवायि कटुपाकि च । वातघ्नं लघु विषयन्दि सूक्ष्मं विडुभेदि मूत्रळम् ॥३१८॥
रोमक (सामर)—तीक्ष्ण, उष्ण, व्यवायि (अपकावस्था में शरीर में व्याप्त हो जाता है), फिर शरीर में पचता है, विपाक में कटु, वातनाशक, लघु, विषयन्दि (कफसावक), सूक्ष्म, बल विरेचक और मूत्रल है ॥३१८॥
लघु तीक्ष्णोऽगुत्कलेदि सूक्ष्मं वातानुलोमनम् । सतिकं कटु सञ्चारं विद्यात्त्वणमोद्भिदम् ॥३१९॥
ओद्भिद लवण—लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, उत्कलेदि (वमन की अभिरुचि करनेवाला), सूक्ष्म, वायु का अनुलोमक, ईषत्तिक, कटुस्व, क्षारयुक्त होता है ॥३१९॥
कफवातकृमिघ्नं च लेखनं पित्तकोपनम् । दीपनं पाचनं भेदि लवणं गुटिकाहृयम् ॥३२०॥
गुटिका लवण (पकाने पर गुटिकाकार बना नमक)—कफ वायु कृमिनाशक, लेखन (कफ का), पित्तप्रकोप, अग्निदीपक, पाचक (त्रण को पकानेवाला), भेदि (विरेचक) है ॥३२०॥
ऊषसूतं बालुकैलं शैलमूलाकरोद्भवम् । लवणं कटुकं छेदि विहितं कटु चोत्थते ॥३२१॥
ऊषसूत (ऊषर भूमि में उत्पन्न), बालुकैल (रेतीलीभूमि में उत्पन्न, उदयपुर में इसे डिडुआना कहते हैं), शैलमूलाकरोद्भव (पर्वत की जड़ में उत्पन्न-खनिज)—नमक, कटुरस, छेदि और विगक में कटु होते हैं ॥३२१॥
यवक्षारस्वर्जिकाक्षारोपक्षारपाकिमटङ्कणक्षारप्रभृतयः ॥
यवक्षार (जौवार), स्वर्जिकाक्षार (सर्जजीवार) ऊषक्षार, पाकिम (पाक द्वारा बनाया, पानीय और प्रतिसारणीय अथवा-धूलि आदि से निकाला), टङ्कणक्षार (सुहागा) आदि क्षार हैं ॥ गुल्मागोम्रहणीदोषअर्कराशमरिनाशनः ।
क्षारान्तु पाचनाः सर्वे रक्तपित्तकराः सराः ॥३२२॥
इनके सामान्य गुण—गुल्म अर्श ग्रहणीरोग प्रतिशयनाशक हैं । सब क्षार पाचक (त्रणों को पकानेवाले) रक्त-पित्त-कारक हैं ॥३२२॥
ज्ञेयौ वहिसमौ क्षारौ स्वर्जिकायावशुकजौ ।
शुक्ररत्नेष्वविबन्धागोगुल्मप्लीहविनागनौ ॥३२३॥
स्वर्जिकाक्षार और यवक्षार—अग्नि के समान उष्ण हैं, शुक्र, कफ-विषम्यन (मल-मूत्र अवरोध), अर्श-गुल्म एवं प्लीहा के नाशक हैं ॥३२३॥
१ 'शैलमूलाकरोद्भव' का अर्थ डल्हणाचार्य ने, प्रयासबुलुङ्ग की उत्पत्ति भूमि (तुर्क देश) किया है । इस देश में उत्पन्न यह शर्प किया है ।
लघुगोऽनिलघ्नः प्रकृतेदी चोषक्षारो वलापहः । मेदोघ्नः पाकिमः क्षारस्तेषां वस्तिविशोधनः ॥३२४॥ ऊषक्षार (ऊषर भूमि में तैयार)—उष्ण, वायुनाशक, क्लिन्नता उत्पन्न करता है, बल (शुक्र ओज) नाशक है । पाकिम (पाक द्वारा तैयार) क्षार—मेदनाशक और वस्ति (मूत्र) विशोधक (प्रवर्त्तक) है ॥३२४॥
विरुक्षणोऽनिलकरः इक्षुधमघ्नः पित्तदुष्णः । अग्निदीपिकरस्तीक्ष्णष्टङ्कणः क्षार उच्यते ॥३२५॥
टङ्कणक्षार—रुक्ष, वायुकारक, कफनाशक, पित्तप्रकोपक, अग्निदीपक और तीक्ष्ण है । लवणक्षार पार्थिव हैं, इसलिये अन्य स्वर्णादि धातुओं के भी पार्थिव होने से उनके गुण कहते हैं ॥३२५॥
सुवर्णं स्वादु हृद्यं च वृंहणीयं रसायनम् । दोषत्रयपहं शीतं चक्षुष्यं विषसूदनम् ॥३२६॥
स्वर्ण (भस्म)—मधुर, हृदय के लिये प्रिय, वृंहण (देहवर्धक) रसायन, तीनों दोषनाशक, शीतल, आँखों के लिये हितकारी और विषनाशक है ॥३२६॥
रूप्यमग्गलं सरं शीतं सस्तेहं पित्तवातनुत् ।
रूप्य (चाँदी)—अम्ल, सर (विरेचक), शीतल, स्नेहयुक्त, पित्त वायुनाशक है ॥
ताम्रं कषायं मधुरं लेखनं शीतलं सरम् ॥३२७॥
ताम्र—कषाय, मधुर, लेखन (कफ-मेद का), शीतल और सर (विरेचक) है ॥३२७॥
सतिकं लेखनं कांस्यं चक्षुष्यं कफवातजित् ।
कांस्य—(कांसी-धातु ताम्र एवं यशद से बनाई जाती है, खनिज नहीं)—तिक, लेखन, आँखों के लिये हितकारी, कफ-वायुनाशक है ॥
वातकृच्छीतलं लोहं तृष्णापित्तकफापहम् ॥३२८॥
लोह—वायुकारक, शीतल, तृष्णा पित्त और कफनाशक है । कटु कृमिघ्न लवण त्रपु सीसं च लेखनम् ।
त्रपु (रांगा) सीसा—कटु, कृमिनाशक, लवण और विलेखन (कफ मेद का), गुणकारी है ॥
मुक्ताविदुमवज्रेन्द्रवैदूर्यस्फटिकादयः ॥३२९॥
चक्षुष्या मणयः शीता लेखना विषसूदनाः । पवित्रा धारणीयाश्च पाप्माळदसीमलापहाः ॥३३०॥
इति लवणादिवर्गः । प्रसंगवश-मणियों के गुण—
मुक्ता (मोती) विदुम (प्रवाल), वज्रेन्द्र (हीरा), वैदूर्य,
१ यहाँ पर धातुओं को भस्म के गुण समझने चाहिये ।
२ लघु-शीतवीर्य लिखा है, परन्तु अन्य ग्रन्थों में ताम्र को उष्ण कहा है; देखिये रत्नेन्द्रसारसंग्रह । परन्तु अष्टांगसंग्रह में भी इसे शीत कहा है ।
२०२
मुश्रुतसंहिता
[ अ० ४६ ]
स्फटिक आदि मणियां—भाँखों के लिये हितकारी, शीतल, लेखन, विषनुशाक, पवित्र, धारण करने योग्य, पाप्मा (पाप) अलक्ष्मी (दौर्भाग्य) और मल के नाशक हैं ॥३२६-३३०॥ धान्येषु मांसेषु फलेषु चैव शाकेषु चानुकृमिहाप्रमेयात् । आस्वादतो भूतगुणेश्च मत्वा तदादिशेद्द्रव्यमनल्पबुद्धिः॥ अनहगबुद्धि (अगाध बुद्धिशाली वैद्य)—इष शास्त्र में—अप्र- मेयात् (अनन्त होने से), धान्य, मांस, फल एवं शाक (कन्द) वगों में—न कहे हुए द्रव्यों को आस्वादतः (रस के आस्वाद से) तथा भूतगुणों से (द्रव्यारधक भूत गुणों से, वीर्य-विपाक आदि से) पद्भिचान के ॥३३१॥
षष्टिका यवगोधूमा लोहिता ये च शालयः ।
मुदाठकीमसुराश्च धान्येषु प्रवराः स्मृताः ॥३३२॥
कहे हुए द्रव्यों में श्रेष्ठ द्रव्यों का विचार—
धान्यों में श्रेष्ठ—षष्टिक, यव (जौ), गोधूम (गेहूँ), और लाल शालि, मूळ, अरहर और मसूर श्रेष्ठ हैं ॥३३२॥
ठावतिस्तिरिसारङ्गकुरुक्षेत्रकपिखलाः ।
मयूरवसिकुर्माश्च श्रेष्ठा मांसगणेष्विव ॥३३३॥
मांसवर्ग में श्रेष्ठ—ठाव (बटेर), तित्तिरि, सारङ्ग, कुरुङ्ग, ऐण, कपिखल, मोर, वर्मि, कुर्म (कछुवा) श्रेष्ठ हैं ॥३३३॥
दाडिमामलकं द्राक्षा खजूरं सपरूपकम् ।
राजादनं मातुलुङ्गं फलवर्गं प्रशस्यते ॥३३४॥
फलवर्ग में श्रेष्ठ—अनार, आँवला, द्राक्षा, खजूर, फालसा, राजादन, बिजौरा श्रेष्ठ हैं ॥३३४॥
सतीनो वास्तुकश्चुचूचिच्छिर्मूलकपोतिकाः ।
मण्डूकपर्णीं जीवन्तीं शाकवर्गं प्रशस्यते ॥३३५॥
शाकवर्ग में श्रेष्ठ—सतीन (मटर), बथुवा, चुन्चू, चिछी, मूलकपोतिका (वालमूली), मण्डूकपर्णी, जीवन्ती श्रेष्ठ हैं ॥३३५॥ गन्धं क्षीरं घृतं श्रेष्ठं सैन्धवं लवणेषु च ।
धात्रीदाडिममन्लेषु, पिप्पली नागरं कटौ ॥३३६॥
तिक्के पटोलवार्ताकं मधुरं घृतमुच्यते ।
क्षौद्रं, पूगफलं श्रेष्ठं कषायं सपरूपकम् ॥३३७॥
शर्करेश्वुविकारेषु, पाने मध्वासवौ तथा ।
दूध और घी में गाय का दूध घी उत्तम है, नमकों में सैन्धव नमक, खटाई-अम्लस में अनार और आँवला, कटुरस में पिप्पली और सोंठ, तिक्रस में पटोल और वैंगन, मधुरस में घी और शहद, कषायरस में पूगफल (खुपारी) और फालसा, गन्ने के विकारों में शर्करा, आसवों में (मर्चा में), मूढ़ीका और द्राक्षसव श्रेष्ठ हैं ॥३३७॥
परिसंवत्सरं धान्यं मांसं वयसि मध्यमे ॥३३८॥
अपर्युषितमन्नं तु संस्कृतं मात्रया शुभम् ।
फलं पर्यागतं, शाकमशुष्कं तरुणं नवम् ॥३३९॥
एक साल पुराने धान्य, मध्यम आयुवाले पशु का मांस, जिस पर रात नहीं बीती ऐसा एवं संस्कृती (मली प्रकार पका), मात्रा में (उचित अभिनबलानुसार) एवं शुभ (पवित्र), अन्न पर्यागत (पका पुष्ट) फल तथा अशुष्क (हरा), तरुण (मध्यम- वय) एवं नव (नया) शाक उत्तम हैं ॥३३८, ३३९॥
अथ कृतान्नवर्गः ।
अतः परं प्रबद्धाभि कृतान्नगुणविस्तरम् ।
लाजमण्डो विशुद्धातां पथ्यः पाचनदीपनः ॥३४०॥
वातानुलोमतो हृद्यः पिप्पलीनागरायुतः ।
इसके आगे "कृतान्न" वर्ग के गुणों को कहते हैं —
लाजमण्ड विशुद्ध (वमन-विरेचन द्वारा शुद्ध हुए) रोगियों के लिये हितकारी है, पाचन एवं अभिनदीपक है । पिप्पली एवं सोंठ से युक्त लाजमण्ड वायु का अनुलोमक एवं हृदय के लिये प्रिय है१ ।
वि- मन्तव्य—किया-बनाया-पकाया हुआ अन्न-भोजन- 'कृतान्न' कहलाता है । लाजमण्ड-भुने चावलों का मण्ड मण्ड पिच्छ । पेया—चावलों या जौ, गेहूँ का बनाया वह खाद्य जो पीने योग्य हो जैसे साबुदाना या बारली, इनमें चावल आदि घुले रहते हैं । बिलेयी—जो खाद्य पेया से कुछ गाढा हो, कड़- छुली में लिपता-सटता है, जैसे-फिरनी खिचड़ी आदि । यवगु बिलेयी से भी गाढा खाद्य जैसे—दलिया आदि । ओदन-भात पकाए गये चावल आदि धान्य । ओदन के दो प्रकार—१- अप्रस्तुत-जिसका मन्द पृथक् नहीं किया है—इसे "पिच्छमार भात" कहते हैं । २—प्रस्तुत भात जिसका मण्ड पृथक् कर दिया गया—जुआ दिया गया है । विधि भेद से ओठन के दो प्रकार—भूतन्दुल-जो चावलों को थोड़ा भूनकर भात बनाया जाता है । अमृधतन्दुल-जो चावलों को बिना भूने बनाया जाता है । यह सब शालि एवं षष्टिक धान्यों के खाद्य हैं जो प्रायः रोगियों के लिये उपयोगी हैं । इनके भात एवं रोटियां आदि स्वस्थों के लिये बनते हैं । क्षीरोपसाधित दूध से पकाए चावल आदि जैसे खीर आदि । सूप—दालों-द्विदलों के खाद्य जो तरल रहते हैं वे सूप यूप तथा नूस कहे जाते हैं । यह पतली दाल है । परन्तु मूली आदि के पके रसों को भी 'यूप' कहते हैं । कृशरा—शालि अथवा षष्टिक धान्य तथा द्विदल के योग से बना खाद्य-खिचड़ी आदि । शाक-पत्र पुष्प फल आदि वे पदार्थ जिनके शाक बनाए जाते हैं । स्विब- उबाला हुआ निष्पीडित-जिसका रस निचोड़ दिया गया है । स्नेह संस्कृत स्नेहघृत तैल आदि में छोँका हुआ ॥३४०॥
१ सोंठ और पिप्पली का योग—षडंग परिभाषा के अनुसार होना चाहिये । यथा—
‘यदस्मृ श्रुतशीतासु षडंगादि प्रयुज्यते ।
कषमात्रं ततो द्रव्यं साधयेत्प्रास्थिकेऽन्मसि ॥’
अ० ४६ ] २७
सूत्रस्थानम्
२०६
स्वेदाग्निजननी लब्ध्वी दीपनी वस्तिशोधनी ॥३४१॥
क्षुतृद्धशम्लानिहरी पेया बातानुलोमनी ।
पेया—स्वेद एवं अग्निजनक, लघु, अग्निदीपक, वस्तिशोधक (मूत्रल), क्षुतृ (भूख), प्यास, श्रम और ग्लानि नाशक, एवं वायु का अनुलोमन करती है ॥३४१॥
विलेपी तर्पणी हृद्या ग्राहिणी१ बलवर्धनी ॥३४२॥
पथ्या स्वादुरसा लब्ध्वी दीपनी क्षुर्त्तृषापहा ।
विलेपी—(पेया से सान्द्र-चाटने योग्य)—तर्पणी (वृत्तिकारक), हृद्या (हृदय के लिये प्रिय), संग्राही, बलवर्धक, पथ्या (हितकारी), मधुररस, लघु, अग्निदीपक, भूख-प्यासनाशक है ॥
हृद्या संतर्पणी वृष्या वृंहणी बलवर्धनी ॥३४३॥
शाकमांसफलैर्युक्ता यवाग्बोऽस्म्लारुच दुर्जराः ।
यवाग्—हृदय के लिये प्रिय, सन्तर्पण (वृत्तिकारक) वृष्य (शुक्ल), बलवर्धक है । शाकमांस या फल के साथ पकाने से यवाग् दुर्जर हो जाती है ॥३४३॥
सिक्थैरिंरहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता ॥३४४॥
विलेपी बहुसिक्था स्याद्यवाग्पूर्विरलद्रवा ।
यवाग् के भेद—
मण्ड—सिक्थ से रहित होता है, पेया—सिक्थ के साथ होती है । २विलेपी—बहुत सिक्थवाली है, ३यवाग्—विरल-द्रव होती है ॥३४४॥
विष्टम्भी पायसो बल्यो भेदःकफकरो गुरुः ॥३४५॥
पायस—खीर विष्टम्भी, बलकारक, भेद-कफ को बढ़ाती है, और गुरु है ॥३४५॥
कफपित्तकरी बलया क्रुशराऽनिलनाशनी ।
क्रुशरा—(तिल चावल और माष से बनाई) कफपित्तकारक, बलकारक और वायुनाशक है ।
धौतस्तु विमलः शुद्धो मनोज्ञः सुरभिः ससः ॥३४६॥
१ कविराज हाराणचन्द्र जी—'हृद्या ग्राहिणी' आदि पाठ नहीं पढ़ते । इसके स्थान पर—'वस्तिसंशोधनी वृष्या ज्वरातिसार्योहिता' यह पढ़कर विलेपी के गुण मानते हैं ।
२ 'विलेपी बहुसिक्था स्यात्' के स्थान पर 'यवाग् बहुसिक्था स्यात्' यह पाठ करते हैं । यह चरक के अनुसार है । परिभाषा—'अन्नं पञ्चगुणे साध्यं विलेपी च चतुर्गुणे ।
मण्डरचतुर्दशगुणे यवाग् षड्गुणेऽस्मसि ॥'
इन्तुणाचार्य ने—'मण्डं पञ्चगुणे तोये, यवाग् षड्गुणे पन्नेत् । चतुर्दशगुणे पेया विलेपी तु चतुर्गुणे ॥' यह पाठ दिया है ।
३ चतुर्विधं भवेद् भक्तं जलदातप्रमाणतः । तत्र भक्तं विलेपी च यवाग् पेयया सह ॥
स्विन्नः सुप्रस्नृतस्तृणो विशद्वस्त्वोदनो लघुः ।
धौत (घुले हुए), निर्मल, शुद्ध, मनोहर, सुगन्धित और अच्छी तरह पके हुए और मांड निकाले हुए उष्ण चावल विशद और लघु होते हैं ॥३४६॥
अधौतोऽप्रस्नृतोऽस्विन्नः शीतश्चाप्योदनो गुरुः ॥३४७॥
अधौत (न घोये), अप्रस्नृत (बिना मण्ड निकाले)—अस्विन्न (अधपके) शीतल-ओदन (भात) गुरु होता है ॥३४७॥
लघुः सुगन्धिः कफहा विज्ञेयो भृष्टतण्डुलः ।
भृष्ट तण्डुल (भूने चावल) का भात—लघु, सुगन्धि, कफ-नाशक है ।
स्नेहैर्मांसैः फलैः कन्दैर्विदलाम्लैश्च संयुताः ॥३४८॥
गुरवो वृंहणा बलया ये च क्षीरोपसाधिताः ।
स्नेह (घृत आदि), मांस, फल, कन्द, वैदल (शामी धान्य-दालें आदि) और क्षीर (दूध) में बनाये आहार गुरु, वृंहण (देहवर्धक) और बलकारक हैं ॥३४८॥
सुस्विन्नो निस्तुपो भृष्ट ईषत् सूपो लघुहितः ॥३४९॥
सुस्विन्न (भली प्रकार से उबाला), निस्तुप (बिना उप के घुले), थोड़े भूने द्रिदलों का सूप (दालें), लघु तथा हितकारी है ।
स्विन्नं निष्पीडितं शार्कं हितं स्यात् स्नेहसंस्कृतम् ।
अस्विन्नं स्नेहहितमपीडितमतोऽन्यथा ॥३५०॥
स्विन्न (जोश दिया), निष्पीडित (निचोड़ा) और धी आदि स्नेह द्वारा संस्कृत शाक हितकारी है । अस्विन्न, स्नेहहित, एवं बिना निचोड़ा (जिसमें पानी रह गया) शाक अहितकारी है ।
मांसं स्वभावतो वृष्यं स्नेहनं बलवर्धनम् ।
स्नेहगोरसधान्याम्लफलाम्लकटुकैः सह ॥३५१॥
सिद्धं मांसं हितं बल्यं रोचनं वृंहणं गुरु ।
मांस—स्वभाव से ही वृष्य (शुक्ल), स्नेहन, बलवर्धक है । यही मांस स्नेह (घृत आदि), गोरस (दही आदि), धान्याम्ल (काझी आदि), फलाम्ल (अनार आदि), कटुक (मरिच आदि) के साथ सिद्ध करने पर, हितकारी, बलकारक, रोचक, वृंहण (देहवर्धक) और गुरु है ।
वि० मन्तभ्य—स्वभावतः कृत्वा मांस, सिद्धमांस—घृत, दही डालकर बनाया मांस—रसेदार मांस ॥३५१॥
तदेव गोरसादानं सुरभिद्रव्यसंस्कृतम् ॥३५२॥
विद्यापित्तकफोद्रेकी बलमांसानिर्बध्ननम् ।
यही मांस—पाक काल में सुगन्धित (स्वग-इलायची आदि) द्रव्यों के साथ मिलाकर, तथा उपयोग काल में गोरस१ (दही या छाछ) के साथ मिलाकर उपयोग करने पर, कफ-पित्त को बढ़ाता है, बल, मांस और अग्नि का वर्धक है ॥३५२॥
१ गोरस शब्द से—दही और तक्र का ही ग्रहण है, दूध का नहीं, क्योंकि दूध मांसरस के साथ नहीं मिलता । यथा—