भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १२

रस, पित्त, कफ, रक्तवहा धमनियों के निर्वल होने से प्रमेहियों में दोष ऊपर की नहीं जाते (अपितु दोष नीचे भाग में ही अधिक रहते हैं, इसलिये विरेचन ही अधिक दे)। इससे मधुमेह रोगियों के शरीर के अधो भाग में पिडकायें होती हैं।।

अपकवानां तु पिडकानां शोफवत् प्रतीकारः पकवानां व्रणवदिति, तैलं तु व्रणरोपणमेवादौ कुर्वीत, आरग्वधादिकषायसुत्सादानार्थं, आलसारादिकषायं परिषेचने, पिप्पल्यादिकषायं पानभोजनेषु, पाठाचित्रकग्राङ्गैश्चाहुद्राबृहतीसारिवासोमवलकसप्रपणीरग्वधकुटजमूलचूर्णानि मधुमिश्राणि प्राशनीयात् ॥६॥

अपक्व पिडकाओं की चिकित्सा व्रण शोफ की भाँति और पक्व पिडकाओं की चिकित्सा व्रण की भाँति करे। व्रण रोपण में तैल को प्रारम्भ से ही बरते। उत्सादन में आरग्वधादि कषाय, परिषेचन में बालसारादि गण का कषाय, खानपान में पिप्पल्यादि कषाय देवे। पाठा, चित्रक, शाङ्गैश्चाहुद्रा, बड़ी कटरी, सारिवा, कटफल, सप्तपर्ण, अमलतास, कुटजमूल इनके चूर्ण मधु में मिलाकर खाने को देवे ॥६॥

आलसारादिवर्गकषायं चतुर्भोगावशिष्टमवतार्य परिस्त्रान्य पुनरुपनीय साधयेत्, सिध्यति चामलकरोऽधप्रिय-कुदन्तीकृष्णायस्ताम्रचूर्णाभ्यापयेत्, एतदनुपदगंधं लेहो भूतमवतार्यानुगुणं निदध्यात्, ततो यथायोगमुपयुज्जीत, एष लेहः सर्वमेहानां हन्ता ॥१०॥

बालसारादि गण का कषाय, जब चौथाई रह जाये, तब इसको उतारकर, छानकर, फिर आगपर पकाये। पकाते समय इसमें—आंवला, लोष, प्रियंगु, दन्ती, कालालोह और ताम्र मस्म मिला देवे। इस लेह को जलने से बचाकर, लेह बन जाने पर (कड़छी पर चिपकने लगे) उतारकर सुरक्षित स्थान रख देवे। फिर योग के अनुसार खाये। यह लेह सब प्रकार के प्रमेहों को नष्ट करता है।

वि० मन्तव्य—कृष्णायस्ताम्रचूर्णानि—कृष्णलोह अर्थात् लोह का और ताम्र का चूर्ण अर्थात् चूना—मस्म। मस्म बनाने की विधि सु० चि० अ० १० के सू० ११-१२ में लिखी है। अथवा रस शाल्व के अनुसार बनाई गई मस्मों का प्रयोग करे ॥१०॥

त्रिफलाचित्रकत्रिकटुकविडङ्गमुस्तानां नव भागास्तावन्त एव कृष्णायश्चूर्णस्य; तत्सर्वमेकध्वं कृत्वा यथायोगं मात्रां सपिर्मधुभ्यां संसज्योपयुज्जीत, एतन्नववासम; एतेन जाठयं न भवति, संन्तोऽनिराग्यायते, दुर्नामशोफ-पाण्डुकुडरोगाविपाककासश्वासप्रमेहाश्च न भवन्ति ॥११॥

त्रिफला, चित्रक, त्रिकटु, वायविडंग, मुस्ता, ये नौ भाग, काले लोहे की मस्म भी इतनी ही अर्थात् नौ भाग, इन सब

को मिलाकर योग के अनुसार मात्रा में मधु और घी के साथ मिलाकर खाये, इसका नाम नवायस है। इससे उदर रोग (या स्थूलता) नहीं होती, मन्द अग्नि प्रदीप्त होती है; अर्ग, शोफ, पाण्डु, कुड, अविपाक, कास, श्वास, प्रमेह नहीं होते ॥

आलसारादिनिर्युहं चतुर्थाग्नावशेषिते। परिस्मृते ततः शीते मधु माक्षिकमात्रपेत ॥१२॥ फाणिनीभावमापन्नं गुडं ओधितमेव च। श्लक्ष्णपिष्टानि चूर्णानि पिप्पल्यादिगणस्य च ॥१३॥ ऐकध्वमात्रपेतं कुम्भे संस्कृते घृतभाविते। पिप्पलीचूर्णमधुभिः प्रलितेऽन्तःशुचौ द्रढे ॥१४॥ श्लक्ष्णान् तीक्ष्णलोहस्य तत्र पत्राणि बुद्धिमान्। खदिराङ्कारतप्तानि बहुशः सन्निपातयेत् ॥१५॥ सुपिधानं तु तं कृत्वा यवपल्ले निधापयेत्। मासांश्चिद्युतुरो वाऽपि यावदालोहसक्षयात् ॥१६॥ ततो जातरसं तं तु प्रातः प्रातयथाबलम्। निषेवेत यथायोगमाहारं चास्य कल्पयेत् ॥१७॥ कार्यकृद्गुलिनामेष सन्तस्याग्नेः प्रसाधकः।

शोफगुद गुल्महृत् कुष्ठमेहपाण्डुवासयापहः ॥१८॥ प्लीहोदरहरः शीघ्रं विषमञ्जरनाशनः। अभिध्वन्दपाहरणो लोहारिष्टो महागुणः ॥१९॥

लोहारिष्ट—शालसारादिगण का क्वाथ चौथाई बचाकर छान ले। ठण्डा हो जाने पर इसमें (मधुमद्य) शहद मिलाये। जब यह राब जैसा हो जाये, तब इसमें साफ किया गुड और पिप्पल्यादिगण की औषधियों को बारीक पीसकर मिला देवे। फिर घी से चिकने किये, धूप आदि देकर संस्कृत किये घड़े में पिप्पली चूर्ण और मधु का लेप करके इस घड़े में उपयुक्त औषध को डाल देवे। फिर तीक्ष्ण लोह के चिकने-पतले पत्रों को लैर के अंगारों पर गरम करके बहुत बार इसमें डालता जाये। इसको ढांप कर जो के ढेर में तीन या चार महीने तक अथवा जब तक लोहा घुले, इसको रहने दे। फिर तैयार हो जाने पर प्रतिदिन इसको अग्नि बल के अनुसार पीये। मोटे पुरुषों को यह पतला करता है, मन्द अग्नि को प्रदीप्त करता है। शोफ, गुल्म, कुष्ठ, प्रमेह, पाण्डु रोग को नष्ट करता है। प्लीहोदर को नष्ट करता है, विषमञ्जर को शीघ्र नष्ट करता है। अभिध्वन्द को नष्ट करता है, यह लोहारिष्ट महा शक्तिशाली है। (अभिध्वन्द शब्द से-मूत्र निःस्पन्द लेना चाहिये)।

वि० मन्तव्य—लोहारिष्ट की निर्माणविधि—शालसारादि-गण चतुर्थांशावशिष्ट क्वाथ १ द्रोण, मधु आधी तुला (५० पूल), गुड १ तुला (१०० पूल), पिप्पल्यादि गण का चूर्ण १० पूल डालना चाहिये। लोह पत्र १—२ सेर डाल देना चाहिये। वे उसमें जितने मान में घुल जायें उतना ही उत्तम हैं ॥१२-१६॥ प्रमेहिनो तदा मूत्रमपिच्छिन्नमनाविलम्।