भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ११]

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चिकित्सास्थानम्

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विशदं तित्त्कटुकं तदाऽऽरोग्यं प्रचक्षते ॥२०॥ प्रमेह रोगी का मूत्र जब पिच्छिलता रहित, गदलेपन से रहित (साफ), विशद (रूख), तित्त्क एवं कटु रसवाला हो जाता है, तब आरोग्य कहा जाता है ॥२०॥ इति श्रीसुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने प्रमेहपिडका- चिकित्सितं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥

त्रयोदशोऽध्यायः

अथातो मधुमेहचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥ अब इसके आगे मधुमेह चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे— जैवा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥ मधुमेहस्वमापन्नं भिषग्भिः परिवर्जितम् । योगेनानेन मतिमान् प्रमेहिणमुपाचरेत् ॥३॥ मांसे शुक्ले शुचौ चैव शैलाः सूर्याशुतापिताः । जतुप्रकाशं स्वरसं गिलाभ्यः प्रस्त्रवन्ति हि ॥४॥ शिलाजिविति विख्यातं सर्वव्याधिविनाशनम् । जिसे कि मधुमेह हो गया है, वैद्यों ने जिसे जवाब दे दिया है, उस प्रमेह रोगी की बुद्धिमान् वैद्य इस योग से चिकित्सा करें। ज्येष्ठ और आषाढ़ मास में सूर्य की किरणों से गरम हुये श्वेत लाख के समान स्वरस, शिलाओं से जुआते हैं, क्योंकि यह शिलाओं से लाख के समान बहता है, इसलिये शिलाजतु कहते हैं, यह सब रोगों को नष्ट करता है ॥ चरक में—

“न सोऽस्ति रोगो भुवि साध्यरूपः शिलाहृष्यं यन्न जयेत्प्रसन्न ।

तत्कालयोगैः विधिभिः प्रयुक्तं, सुस्वस्थचोजो विपुलां दधाति” ॥३,४॥

त्रप्वादीनां तु लोहानां षण्मासन्यतमान्वयम् ॥५॥ क्षेत्रं स्वग्नधतश्चापि षड्योनिप्रथितं क्षितो ।

शिलाजतु-त्रपु ( रांगा ), सीसा, तांबा, चाँदी, स्वर्ण और कृष्णलोह इन छेः में से किसी एक के साथ मिला रहता है। इसके छे कारण (उत्पत्तिस्थान) हैं। इनको इनकी अपनी गन्ध से जानना चाहिये। (चरक में स्वर्ण, चाँदी, ताम्र और लोहे के ही शिलाजतु के गुण कहे हैं)। त्रपु और सीसा का अति उपयोगी न होने से छोड़ दिये हैं ॥५॥

लोहाद् भवति तद्यस्माच्छिलजतु जतुप्रभम् ॥६॥ तस्य लोहस्य तद्वीर्यं रसं चापि विभर्ति तत् ।

इसमें जो शिलाजतु लोह में से उत्पन्न होता है, वह लाख के समान होता है, यह लोहे के रस, (वीर्य) और प्रभाववाला होता है। चरक में इसीको श्रेष्ठ कहा है, यथा—

“कटूर्बिपाके शीतश्च सर्वश्रेष्ठः स चायसः । गोमूत्रगन्धयः सर्वे सर्वकर्मसु योगिकाः ॥ रसायनप्रयोगेण पश्चिमस्तु विशिष्यते ॥” चरक ॥६॥ त्रपुसीसायसादीनि प्रधानान्युत्तरोत्तरम् ॥७॥ यथा तथा प्रयोगेऽपि श्रेष्ठे श्रेष्ठगुणाः स्मृताः । त्रपु, सीस, ताम्र, चाँदी, सोना और लोह के शिलाजतु में उत्तरोत्तर शिलाजतु श्रेष्ठ है। तो भी प्रयोग में श्रेष्ठ द्रव्य में श्रेष्ठ गुण होते हैं ॥७॥

तत्सर्वं तित्त्कटुकं कषायानुरसं सरम् ॥८॥ कटुपाक्युष्णवीर्यं च शोषणं छेदनं तथा । सब प्रकार के शिलाजतु—तित्त्क, कटुरस, कषाय अनुरस, सर (मुट्टुविरेंचक) विपाक में कटु उष्णवीर्य शोषक एवं छेदन करनेवाले हैं।

वक्तव्य—चरक में केवल ताम्र का शिलाजतु उष्ण कहा है, शेष को शीतवीर्य कहा है। वास्तव में शिलाजतु ‘नास्युष्णशीतं’ न बहुत उष्ण न बहुत शीत अर्थात् योगवाही है। जैसे कि रक्त को सुश्रुत में अनुष्णाशीत कहा है। यथा—“अनुष्णशीतं मधुरं स्निग्धं रक्तं च वर्णत । शोणितम्” ॥८॥

तेषु यत् कृष्णमलघु स्निग्धं निःशर्करं च यत् ॥९॥ गोमूत्रगन्धि यच्चपि तत् प्रधानं प्रचक्षते । इनमें जो शिलाजतु कृष्णवर्ण, भारी, स्निग्ध, रेती आदि से रहित, गोमूत्र की गन्धवाला हो, वह उत्तम कहा जाता है ॥९॥

तद्भाषितं सारगणैर्हृतदोषो दिनोदये ॥१०॥ पिवेत् सारोदकेनैव शुद्धगणैर्हृतं यथाबलम् । जाङ्गलेन रसेतान्नं तस्मिन्नीतुं तु भोजयेत् ॥११॥ उपयुज्य तुलामेवं गिरिजादमृतोपमात् । वपुर्वर्णबलोपेतो मधुमेहविबर्जितः ॥१२॥

जीवेष्ट्वर्षशतं पूर्णमजरोऽमरसन्निभः । शतं शतं तुलायां तु सहस्रं दशतौलिके ॥१३॥ भरत्तातकविधानेन परिहारविधिः स्मृतः । मेहं कुष्ठमपस्मारमुन्मादं रूक्षीपदं गरम् ॥१४॥ शोषं शोफार्शसीं गुल्मं पाण्डुतां विषमज्वरम् । अपोहृत्यचिरात्कालाच्छिलजतुः निषेवितम् ॥१५॥ न सोऽस्ति रोगो यं चापि निहन्त्यान्न शिलाजतु । शर्करां चिरसंभूतां भिनन्ति च तथाऽमरीम् ॥१६॥ भावनालोडने चास्य कर्तव्ये भेषजैर्हितैः । इस शिलाजतु को शालसारदि गण से भावना देकर, वमनादि से शरीर का शोधन करके, प्रातःकाल मेही, शालसारदि गण के क्वाथ से पीसकर (घोलकर) इसको बल के अनुसार पीये। इसके जौर्ण होने पर जांगल मांस रस से भोजन खाये। इस प्रकार अमृत के समान शिलाजतु के एक सौ पल खाकर, शरीर-वर्ण-बल से पुष्ट हो जाता है, मधुमेह जाता रहता है। बुढ़ापे से रहित बनकर, देवताओं के समान होकर