सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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एकं सौ वषं जीता ३ ! एक सौ पल सेवन करने से एक सौ
वधे की आयु बदती है, दस तखा ( दला एक सो पल ` खाने
पर एक हजार वषं की आयु होती दै । भिवे के समान परः
हेज पाटे | प्रमेह, कुष्ठ, अपस्मार, उन्माद) श्टीपद, गरविष
ओष, शोफ, अशं, गुल्म, पाण्डु, विषमञ्वर इनको देर तक
सेवन करने पर शिलाजतु न करती हे । एेसा कोई रोग नी
जिसे शिलाजतु अच्छा न करे । चिरकाल से, उन्न १ शकरा
ओर अश्मरी को यह तोड़ देती है । हितकारी ओषधियों से
शिलाजल की भावना ओर घोठना चादि । चरक म॑--
("पयांसि तक्राशणि रसाः सयूषाः
तोयं समू्रा विविधाः कषायाः ।
आलोडनाथ गिरिजस्य शस्ताः
ते ते प्रयोज्याः प्रखमीदय कायम् ॥
पथ्य-शिखाजतुप्रयोगेष विदाहीनि गुरूणि च |
व्ययत्स्वकालं त॒ कुलत्थान् परिवजयेत् ॥
ते ह्यत्यन्तविरुद्धत्वात् अश्मनो मेदनाः परम् ।
लोके दष्टास्ततस्तेषां प्रयोगः प्रतिषिध्यते ॥
वि० मन्तव्य--शिलाजतु के सेवन मेँ ध्यान देने योग्य
बात यह है कि इसको १ तला मर अथवा इससे भी अधिक
(१०० पल, अथवा कई सौ पल) खाने का विधान दै, परन्तु
सतेगी १--२ तो° अथवा ५-७ तोला शिलाजीत खाकर ही कई
छाम न होने पर विरत हो जाते दै ओर कहने लगते हँ कि
इससे कोई लाभ नहीं इ ओर इसकी प्रतिदिन कौ मात्रा भी
भगवान् युनव॑सु ने- पलं अधेपलं कर्षो मात्रा तस्य त्रिधा
मता (च० चि० अ० १), ४ तो०, २ तो° अथवा १ तो° कदी
है । खानेवाठे १-२ रत्ती की माचा खाकर पूरा छाम चाहते है,
ओर उसके पथ्य आदि पर पूरा ध्यान नदीं दिया जाता । इन
खव बातों का विचार वेदय तथा रोगी को अवश्य करना चाहिये
11 १०--१६॥ एवं च माक्षिकं धातुं तापाजममृतोपमम् ॥१७॥
मधुरं काच्चनाभासमस्छं वा रजतप्रभम् ।
पिवन् हन्ति जराङुष्ठमेहपाण्डवामयक्षयान् ॥१८॥ `
तद्धावितः कपोतांरच कुरुत्थां श्च विवजयेत्।
इसी प्रकार तापी नदी मे उत्पन्न अमृततुल्य माक्चिक
सुश्रतखंहिता
सके 2 तब (अथवा तवमनादि पाचों काय कायं जहा जह व्यथं व्य दीखते (भ हो) श्रद्धालु एवं जीने को इच्छाव, कुष्ट रोगी की भी
वैद्य इस योग से चिकित्सा करे ॥१९॥ इदवमाय्
ुक्षस्तुवरका ये स्युः पर्चिमाणेवभूमिषु ॥२०॥
वीचीतरङ्गविक्षेपमारुतोदूधतपर्ख्वाः । तेषा फलानि गृह्णीयात् सुपक्वान्यभ्बुद्ागमे ।२९॥ मञ्जां तेभ्योऽपि संहत्य ओोषयिस्वा बिचण्यं च । तिख्वत् पोडयेदु द्रोण्यां खावयेद्धा कुसुम्भवत् ॥२९॥
तत्तेटं संहतं भूयः पचेदातोयसंक्षयात् ।
अवताये करीषे च पक्षमात्रं निधापयेत् ॥२२॥ स्निग्धः सििन्नो हतमछः पश्चादृष्वं प्रयरनवान्। चतुथेभक्तान्तरितः शुक्छादौ दिवसे मे ॥२४। मन्तरपूतस्य तेढस्य पिबेन्मात्रां यथावखम् । तडा मन्तं प्रवद्यामि येनेदमभमिमन्यते ॥२५॥
'मञजसार महावीयं सवौन् धातून् विशोधय | गह्धचक्रगद्ापाणिस्स्वासाज्ञापयतेऽच्युतः ॥२६॥ तेनास्योध्वेमधङ्चापि दोषायान्त्यसश्त्ततः | अस्नेहख्वणां सायं यवागू" जओीतखां पिबेत् ॥२७॥
पठचाहं प्रपिवेत्तेरख्मनेन विधिना नरः।
पक्षं परिहरेच्चापि अुद्गयूषोद नाशनः ।॥२८॥ पञ्चभिर्दिवसेरेवं सवंकष्टर्विुच्यते ।
` तदेव खदिरक्वाथे त्रिगुणे साधु साधितम् ॥२६॥
निहितं पूववत् पश्छात् पिबेन्मासमतन्द्रितः ।
तेनाभ्यक्तशरीरश्च कुर्वी ताहारमीरितम् ॥२०॥
भिन्नस्वरं रक्ते विश्ीण कृमिभक्षितम्। अनेनाञ्चु प्रयोगेण साधयेत् कष्ठिनं नरम् ॥२५॥
सर्पिमधुयुतं पीत' तदेव खदिराम्बुना ।
पक्षिमांसरसाहारं करोति दहिशतायुषम् ॥२२॥
तदेव नस्ये पञ्चाशहिवसानुपयोजितम् । वपुष्मन्तं श्रुतिधरं करोति #िशतायुषम् ॥२२॥
शोधयन्ति नर पीता मञजानस्तस्य मात्या । महावीयस्तुवरकः कुष्ठमहापहः परः ॥३४॥
पश्चिम समुद्र के (कोंकण एवं मल्याङ के सुद्र क किनपि
धातु स्वणमाक्चिक या रजतमाक्षिक, को पीने से जरा, ष्ट, मेह, | किनारे ठवरक नामक इृक्ष दै, इनके पत्ते समुद्र की
पाण्डुरोग, श्य नष्ट होते दँ । स्वणमाक्चिक मधुररस एवं रजत- | थपेड़ों से कम्पित इई वायु से दिते रहते द । वधां आने १
माक्षिक अम्छरस होता हे | रिखाजतु ओर माक्षिक का सेवन करनेवाला मनुष्य कपोत (कृतर) ओर कुढत्थ को सदा के ण्यि छोड़ देवे ॥१७.१८॥ ` | पञ्चकमेगुणातीतं श्द्धावन्तं जिजीविपुप् ॥१९॥ योगेनानेन मतिमान् साधयेदपि कष्ठिनम् । ¶चमधाठ॒ (मेद मे स्थित) मे कुष्ठ के पर्हैचने पर जव संशो- षन; संशमन; अभ्य॑गःगुग्ुखादि किसी सेमी लाम न हो
पकाकर सव पानी नष्ट कर देवै | फिर इख तट
इखके भली प्रकार पके हुए फरो को एकत्रित कर 2 । € ध.
मे से मञ्जा को निकालकर, सुखाकरं चूण कर
दोणी (कोल) मे तिरो की माति पीडन करे, या कम †ि तल निका स॒ तख भाति हार्थो से दबाकर तेख निका ठे। ईइ > को ठक
गोबर के ढेर मे पन्द्रह दिन रख देवे । स्नेहन,
दोषो को निकाक्कर (वमनादि से) पन्द्रह दिन