सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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चिकित्सास्थानम्
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रावधानी से, शुक्ल पक्ष में, उत्तम दिन में, चौथे समय के सार्यकाल के भोजन में (पन्द्रह दिन के पीछे अगले दिन प्रातः सार्य स्वाभाविक भोजन करे। दूसरे दिन प्रातः स्वाभाविक भोजन करे, और सार्यकाल के स्वाभाविक भोजन में) मंत्र से पवित्र किये हुए इस तैल की मात्रा को बल के अनुसार पीये। जिस मंत्र से यह तैल अभिमन्त्रित किया जाता है, उसे यहाँ पर कहता हूँ। 'हे मज्जसार! महावीर्य! सब धातुओं का शोधन कर। शंख, चक्र, गदा हाथ में लिये हुए भगवान् कृष्ण तुमको आज्ञा कर रहे हैं।' इस तैल से रोगी के दोष वमन और विरेचन के रूप में एक साथ प्रवृत्त होते हैं। सार्यकाल में नमक और स्नेह रहित, रीतिल यवाग्न इनको पीने के लिये देवे। इस विधि से मनुष्य पाँच दिन तैल पीये। फिर पन्द्रह दिन छोड़कर, मूंग यूप के साथ चावल खाये। इस प्रकार पाँच दिन में ही कुछ से मुक्त हो जाता है। इसी तैल को तीन गुणे खैर के क्वाथ में भली प्रकार सिद्ध करके, पूर्व की भाँति गोबर में रखकर पन्द्रह दिन के पीछे एक मास तक विना आलस्य के पीये। इसी तैल का शरीर पर अर्भग करे और कहा हुआ मूंग का यूप और चावल खाये। जिस का स्वर बैठ गया हो, आँखों में सुखी हो, मांस झड़ रहा हो, कोई पड़ गये हो, उस कुछ रोगी की भी इस प्रयोग से वैद्य चिकित्सा करे। इस तैल को घी और मधु के साथ मिला कर खैर के क्वाथ के साथ पीने से एवं पक्षियों के मांस रस का आहार करने पर दो सौ वर्ष की आयु होती है। पचास दिन तक इस तैल का नश्य लेने से मनुष्य उत्तम शरीरवाला और सुनते ही धारण करनेवाला, तीन सौ वर्ष की आयु का होता है। इस तुवरक फल की मज्जा मात्रा में पीने से मनुष्य का शोधन करती है। तुवरक अतिशक्तिशाली कुछ और प्रमेह के नाशन में श्रेष्ठ है।
वक्तव्य—तुवरक तैल की मात्रा—कूर्प प्रमाण, अनुपान, शीतलजल, फलों का रस।
वि० मन्तव्य—तुवरक-भावप्रकाश निघण्टु में जिस तुवरी तैल का उल्लेख है वह इससे भिन्न है। वह तुवरी-सरसों के से लुप्त होते हैं जो पञ्जाब में 'तोरिया' या तोड़िया नाम से प्रसिद्ध है। परन्तु निघण्टुतन्त्राकर (बिष्णु वासुदेव गोडबोलेकृत) में तुवरक की चर्चा इस प्रकार है—'तुवरः सागरीद्रव्यः कुष्ठ-हाड्सकापहः। तुवरस्तुवरश्चोष्यो रसे पाके च तित्तकः॥ कफाग्नकुमिमेहकुष्ठज्वरविनाशनः। आनाहमर्शः शोफं च च नाशयेद् इति ते जगुः॥' इस पाठ में "ते जगुः" पाठ से प्रतीत होता है कि यह पाशाल्य निघण्टुकारों की ओर संकेत है। गोडबोले तथा आपके सहायकों ने स्यात् सुश्रुत के तुवरक पर ध्यान नहीं दिया। जो कुछ हो, हमारे विचार में यह सुश्रुत का ही तुवरक है, क्योंकि इसके विवरण में गोड-
बोले महाशय ने लिखा है कि—इसके वृक्ष समुद्र एवं नदियों के तट पर होते हैं। शालिग्राम निघण्टु भूषण ॥२०-३४॥
सान्तर्यमस्तस्य मज्जा तु दग्धः क्षिप्तस्तैले सैन्धवं चाळजनं च।
पैल्यं हन्यादर्मन्तकान्ध्याकान् नलीरोगं तैमिरं चाळनेन ॥३५॥
तुवरक फल की मज्जा अन्तर्यम विधि से जलाकर तुवरक के तैल में डालकर इसमें सैन्धव नमक और सुरमा मिलाये। इसका अंजन करने से पिछ्लोग अर्भ, नक्तान्ध, कांच, नीली रोग और तिमिर नष्ट होते हैं। (डल्हण ने मज्जा, सैन्धव, अंजन तीनों को अन्तर्यम विधि से जलाना लिखा है) ॥३५॥
इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने मधुमेहचिकित्सितं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥३॥
चतुर्दशोऽध्यायः
अथात उदराणां चिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१॥
अत्र इसके आगे उदररोगों की चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे—जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था।
वि० मन्तव्य—यद्यपि अतिसार, ग्रहीरोग एवं शूल आदि अनेक रोग उदर में होते हैं, परन्तु वे उदर के एक देश में होते हैं और उदर रोग उदर के यकृत एवं अन्त्र तथा हृदय आदि मध्यकायिक समस्त अवयवों की विकृति से उत्पन्न होते हैं ॥१,२॥
अष्टावुदराणि पूर्वसुद्धिनि। तेष्वसाध्यं बद्धगुदं परिस्रावि च, अवशिष्टानि कृच्छ्रसाध्यानि, सर्वाण्येव प्रत्याख्यायोपक्रमेत। तेष्वद्यश्चतुर्वर्गो भेषजसाध्यः, उत्तरः शल्लसाध्यः, कालप्रकर्षात् सर्वाण्येव शल्लसाध्यानि वर्जयितव्यानि वा ॥३॥
आठ उदर पहले कह दिये हैं, इनमें बद्ध गुदोदर और परिस्रावी उदर असाध्य हैं। शेष उदर कष्टसाध्य हैं। सभी उदर रोगों को असाध्य कहकर चिकित्सा आरम्भ करे। इनमें पहले चार उदर (वात, पित्त, कफ, सन्निपातोदर) औषधसाध्य हैं, शेष पिछले चार (फ्लोहोदर, बद्धगुदोदर, छिद्रोदर, दकोदर) शल्लसाध्य हैं। अथवा समय की अधिकता के कारण सब ही उदर शल्लसाध्य होते हैं अथवा असाध्य हो जाते हैं।
वि० मन्तव्य—इसका विवरण नि० अ० ७ में किया गया है ॥३॥
उदरी तु गुर्वभिष्यन्दिरुक्षविदाहिस्तिर्धपशितपरि-षेकावगाहान् परिहरेत्, शालिषछिक्यवगोभूमनीवारात् नित्यमरनीयात् ॥४॥