सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ २२ |
अवमन्थ के पक जाने पर, पूटने पर, तैकं बरता जाता
ह | यहं तेक धव, अश्चकणे, टार चन्दन, सल्छ्की ओर
तिन्ुक से वनाना चादिए । पुष्करिका में सव्र शीतल क्रियाये
करनी चाहिये । जोक से रक्त को निकालते ओर घी से परिषिक
करे स्पशंहानि में रक्तमोक्षण करे ओर काकोल्यादि मधुर द्रव्यो
से लेप करे | दूध दख का रस, घी एवं अतिशीतल द्रव्यो से
परिक करे ॥१०-१२॥
पिडका्ुत्तमाख्यां च व डिरीनोद्धरेडिषक् ।
उदु धृत्य मधुसंयुक्तं कषायेरवचुणंयेत् ॥१३॥।
उत्तमा नामक पिडका को वेद्य बडिशसे निकाले | निकालकर मधुमिश्रित कषाय द्रव्यो के चूर्णं से, अवचूणंन करे ॥१२॥
रसक्रिया विधातव्या छिखिते अतपोनकै |
परथकपण्यादिसिद्ध' च देयं तेरमनन्तरम् १४
क्रियां छुयाद्धिषक् प्राज्ञस्स्वक्पाकस्य विसपेवत् |
रातपोनक मे ठेखन करके रोधन काठ मे शोधन द्रव्य कषायो से ओर रोपण काक में रोपण द्रव्य कार्यो से रस क्रिया
बनाकर बरतनी चादिये । पीछे से प्रथक् पण्यादि से (भिभकोक्त रोपण धृत मे के) सिद्ध क्रा तेल वरते । त्वक् पाक
म वेद्य विसपं की भाँति चिकित्छा करे ॥९४॥
रक्तविद्रधिवश्चापि क्रियाशोणितजेऽबु दे ।॥१५॥ कषायकस्कस्पीं षि तें चणे' रसक्रियाम् ।
सोधनं रोपणं चेव वीद्दय वीदयावचारयेत् ॥१६॥
हितं च सर्पिषः पानं पथ्यं चापि विरेचनम्।
हितः मोणितमोक्षश्च यच्चापि छु भोजनम् ॥१७॥
अवुदं मांसपाकं च विद्रधि तिख्कालकम् । प्रत्याख्याय प्रकर्बीत भिषक् सम्यक् प्रतिक्रियाम् ।१८।
रक्तजन्य अर्द में रक्त विद्रधि की माति उपचार करे।
्वि्णीय अध्याय मे कही हई अवस्थाओं को समय समय पर देखकर कषाय, कल्क, घी, तैर, चूणे, रसक्रिया, शोधन ओर
रोपण वरते । घी का पीना दितकारी है। विरेचन भी पथ्य
है | रक्तमोक्षण ओर लधु भोजन मी हितकारी. । अबद, मांसपाक, विद्रधि तिरकारुक, इनको असाध्य कहकर वेद्य
योग्य चिक्रित्सा करे | १५-१८॥ | ` इति सुश्रुतसंहितायां चिकित्सास्थाने शकरोगचिकित्सितं
नामैकर्विशोऽध्यायः ॥२९॥
दाविंशतितभोऽ्यायः अथातो सुखरोगचिकिस्सितं व्याख्यास्यामः ॥९॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
, अब इसके आगे सुखरोग की चिक्ित्छा का व्याख्यान ररगे-जेसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने कहा था ॥१,२॥
चिकित्सास्थानम् ७१
चतुर्विधेन स्नेहेन मधूच्छि्टयुतेन च ।
वातजेऽभ्यञ्जनं कुयोन्नाडोस्वेदं च ३ वि] तु साल्बणं श ५ मस्तिष्के चेव नस्ये च ते वातहरं हितम् 11४
श्रीवेष्टक' सजरसं सुरदारु सगुग्णुद । यष्टोमधुक्चणे ` तु विदध्यात् प्रतिसारणम् ॥५॥
पित्तरक्ताभिघातोस्थं जखौकोभिरुपाचरेत्।
पित्तविद्रधिवच्चापि क्रियां कुयौदरेषतः ॥६॥ शिरोविरेचनं धूमः स्वेदः कवर एव च ।
हृते रक्ते प्रयोक्तवयमोकोपे कफात्सके ७ यूषणं स्वजिकाक्षारो यवक्षारो विडं तथा ।
षौ प्रयुक्तं विधातन्यमेतच्च प्रतिसारणम् ॥८॥
मेदोजे स्वेदिते भिन्ने मोधिते खनो दितः । प्रियङ्कत्रिफङालोधं सक्षोद्रं प्रतिसारणम् ॥<॥
एतदोष्टप्रकोपानां साध्यानां कमे कौतितम् ।
बुद्धिमान् मनुष्य वातजन्य ओष्ठ प्रकोप मे मोम मिश्रित
घी, तैल, वसा ओर मञ्जा इन चार प्रकार के स्नेह से अभ्यंग
करे ओर नाड़ी सेस्ेददेवे। (स्नेहको वात दहर द्रव्योंके
क्वाथ मे सिद्ध करके मोम मिलाकर बरतना चाहिये) । उपनाह
मे साल्वण स्वेद् के द्रव्य वरते । शिरोवस्ति म ओर नस्य में
वातहर रैक हितकारी है । राङ्, श्रीवे्टक (धूप); , देव दास,
गुग्गुख, ओर सुेहटी इनका चूण मलना चाये । पित्तजन्य,
रक्तजन्य ओर अभिघातजन्य मे जोक लगानी चादिये । पित्तविद्रधि की माति सम्पूणं चिकित्सा करे । कफजन्य् ओष्ठ प्रकोप
मे र्त को निकालकर शिरोविरेचन धूम, स्वेद ओर कबूल
बरतने चाहिये । सोंठ, मरिचि, पिप, स्वजिक्षार यवक्षार ओर
विड़नमक् इनको मधु मे मिला कर् प्रतिसारण करना चाहिये ।
नेदजन्य ओष्ठ प्रकोपे स्तरेद देकर फट जानेप्र मेद् के
निकल जाने पर शुद्ध होने पर अग्नि से जलाना पथ्य हे ।
प्रियंगु, त्रिफला, लोध, इनको मधु मे मिलाकर प्रतिसारण करे,
साध्य ओष्ठ प्रकोपो की यह चिकिर्षा कह दी हे ।
वि० मन्तव्य-- धत आदि सब अथवा कोई एक स्नेह ८
त° से १ तोला मोम पिघलाकर रलो ओर ओठ पर बार
बार ठ्गाते रहो ॥२-६॥ ._ ` 4 दन्तमूखगतानां तु रोगाणां कम व्यते ॥१०॥
शीतादे हतरक्ते तु तोये नागरसषपान्। ^
निष्कवाथ्य चरिफलां सुस्त गण्डषः सारसाञ्नः ।९९।
प्रियज्गवश्च सुस्तं च निरुखा च अप्यम् ।
स्य॑ च त्रिफटासिद्धं मधुकोखर्पद्य के: ॥९२॥
दन्तुप्पुटके काये तरुणे रक्तमोक्षणम् ।
सपञ्चख्वणः क्षारः सश्शोद्रः प्रतिसारणम् ।१३॥
हितः शिरोविरेकश्च सस्यं स्निग्ध च भोजनम् ॥
दन्तभूक मे होनेबाछे रोगों को चिकिस्सा कगे । शीतादि
तेग मे रक्त को निकाककर सोठ ओर सरसों को जरम क्वाय ॥
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