सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 528, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें‰७र्
करके इसमे त्रिफला सुस्ता ओर रसौत को मिलाकर करे । प्रियंगु, मुस्ता ओर त्रिफला से प्रलेप करे। सुर्दटी; कमल, पद्याख, त्रिफला से सिद्ध किया ते नस्य मे बरते। नूतन दन्त पुप्पुटक मे रक्त मोक्षण करना चाहिये । पाचों नमक
यवक्षार ओर मधु इनसे प्रतिखारण करे । शिरोविरेचन;, नस्य
ओर स्निग्ध भोजन उत्तम हे ॥१०-१२॥ विखाविते दन्तवेष्ट ब्रणांस्तु प्रतिसारयत् ॥१४॥
रोधपत्तङ्गयष्टयाहराक्षाचुे मेधूत्तरेः ।
गण्ड्षे क्षीरिणो योऽयाः सक्षौदरधृतशकराः ॥१५।॥
काकोल्यादौ दशक्षीरसिद्ध सर्पिश्च नस्यतः।
सौ षिरे हतरक्ते तु रोध्रमुभ्तर सानः ॥१६॥।
सक्षौद्रः शस्यते रेपो गण्डूषे क्षीरिणो हिताः ।
सारिबोत्पखयष्टयाह्सावरागुरुचन्दनेः ॥१५॥
क्षीरे दशगुणे सिद्धं सर्पिनस्ये च पूजितम्।
क्रियां परिदरे कुयाच्छीतादोक्तां विचश्चणः ॥१८॥
दन्तव्रष्ट में रक्त निकाठकर व्रणं पर लोध, लाल्चन्दन, मुटेहठी, लाख, इनके चृणं को मधु मं मिलाक्रर प्रतिसारण कर ।
बरगद आदि क्षीरि वृरक्षोका कषाय, मधु, घी ओर करा मिलाकर गण्टरष में बरतन चाहिये | काकोल्यादिगण के कल्क
ओर दगुने गायके दुध मे घौ सिद्ध करके नस्यठे। शौषिर मे रक्तं निकालकर कोधः मुस्ता, रसोत इनको मधु मे मिलाकर
लेप करे । गण्डूष मे बरगद आदि क्षीरि ब्चों को वरते। खारिवा, उत्प (कमल), मुषेदटी, सावरखोध. अगरु, चन्दन इनके कल्क से ओर दखगुने गाय के दूध मे सिद्ध किया घृत नस्य में प्रशस्त हे । परिद्र रोग में बुद्धिमान् वेय शीताद में
कटी चिकित्सा को कर | १४-१८।
संओोध्योभयतः काये शिरश्चोपक्कुशे तथा । काकोटुम्बरिकागोजीपत्रेवैस्लावयद सक ॥१९६॥ छ्रयते च रवणः सब्योषैः प्रतिसारयेत् । पिप्पली: सषपा् उवेतान्नागरं नेङकटं फलम् ॥२०॥ सुखोदकेन संस्ञ्य कवलं चापि धारयेत. । घृत मधुरः सिद्धं हित कवलनस्ययोः ॥२॥ गखण दन्तवेदभं दन्तमूलानि शोधयेत् । ततः क्षारं प्रयुञ्जीत क्रिया सर्वश्चजीतलाः ॥२२॥ खदूश्त्यादिकदन्त तु ततोऽग्निमव चारयेत् । सापि विधिः कार्यो विजानता ॥२३॥ त उपशय रोग मे वम सेकाय सं क व 1 पत्तों से रगड़कर रक्त को पाचों नमक, स च, पीपल ` ग 1 पीली 1 ५ क गरम पा छाकर मुख मं रण कोल्यारि मधुर द्र्ग्यों से सिद्धं धुत कब रि
सुश्रतसंहिता ० स । भ० २९ बेदभ मे शस्त्र से दन्त मूर का शोधन. करे । अधिक को जड़ से निकालकर अग्नि रु जलम् देवे । ` जाननेवाडा दन्त
कृमिदन्त का भी उपचार इसमे कर ॥२३॥ । वेद्य
छित्तवाऽधिमांसं सक्षौद्र रेभिरचणैरुपाचरेत ।
वचतिजोवतोपाठास्वजिकायावशकजेः ॥२४। हषो द्रष्टितीयाः पिप्पल्यः कवख्धात्र कितः ।
पटोरत्रिफरानिम्बकषायश्चात्र धावने ॥
हितः शिरोषिरेकश्च धमो वेरेचनश यः ॥१५॥
अधिमांख को वच, तेजव्रङ, पाठा, सजं क्षार ओर
यवक्षार उनका चण सधु मे मिलाकर रगड़े । गरम पानी भे
मधु ओर गिप्यलो मिलाकर कव कर । धोने के लियि परवल त्रिफला ओर नीम का कषाय बरते । शिरोविरेचन ओर वैरेच. निक धूम प्रशस्त है ॥२५॥ सामान्यं कसं नाडीनां विशेषं चात्र मे.श्णु । .
नाडीव्रणहरं कमं दन्तनाडीषु कारयेत् ॥२६॥ यं दन्तमधिजायेत नाडी त' दन्तद्धरेत् ।
दिच्वा मांसानि अखण यदि नापरिजो भवेत् ॥२७॥
स्रोधयित्वा दहेच्चापि क्षारेण उवल्नेन वा।
भिनच्युपेक्चिते दन्ते हुकास्थि गतिष्ुवम् ॥य्ट्॥
समूढं दशनं तस्मादुद्धरेद्धग्नमस्थिरम् ।
उद्धृते तूत्तरे दन्ते समूरं स्थिरवन्धने ॥२९॥
रक्तातियोगात् पूर्वोक्ता रोगा घोरा भवन्ति हि ।
कृणः संजायते जन्तूरदित' चास्य जायते ॥३०॥
चरमप्युत्तरं दन्तमतो नापहरेद्धिषक् । धावने जातिमद्नस्वादुकण्टकखादिरम् ॥३१॥
कषायं जातिमदनकटुकस्वादुकण्टकेः ।
यष्ख््ाहयोधरमञ्जिष्ठाख रिरेश्वापि यत् कृतम् ॥१२॥
तैकं संगोधनं तद्धि हन्यादन्तगतां गतिम् । कीतिता दन्तमृछे तु क्रिया दन्तेषु वद्यते ॥२३॥
नाद्ी-दन्तनाद्ी कौ सामान्य चिकित्छा नाड़ी रण के समान् दै। इसमे विशेष सुनो । दन्त की नाद्वियों मे नाड़ीत्रण के
अनुखार चिकित्वा करो । जिस दान्त मे नाड़ी उन्न ५
जाये, उस दात को उखाड़ दे | इसके ल्यि मांस को शख
काटकर दांत को उखाडे। परन्तु ऊपर के. दति 1
उखाडे । शोधन करके इसको क्चार या अग्नि से जला दे
दन्त् कौ उपेश्ा करने पर नाड़ी हनुकास्थि कौ अवश्य न कर.देती है । इसल्यि दे एवं हिकते हुए दात कौ अ
साय ही उखाद़े | स्थिर बन्धन वाठ ( मजबूत ) स
दांत को जड़ समेत उखाडने पर र्त के अतिखाव स ९ भयानक रोग होते हँ । इसके सिवाय रोगी काना £ हे । इसव्यि बय हिर्ते हए भी ऊपर के दात कौ व
न उखाड़ । प्रक्षालन मे चमेली, मेनफट, कुटकी, ग
इनका कषाय वरते । सुलेदटी, लोध, जमीठ ओर | अवरशय -खिद्ध क्रिया तैक दन्तगति को संशोधन करके
हो जाता