भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ. २२ ]

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चिकित्सास्थानम्

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नष्ट करता है। दन्तमूलों के लिये चिकित्सा कह दी गई है वह करे। दन्त रोगों की चिकित्सा कहेंगे ॥

स्नेहानां कवलाः कोष्णाः सर्पिषस्त्रैवृत्तस्य वा ।

निर्युह्याश्चानिलघ्नानां दन्तहर्षप्रमर्दनाः ॥३४॥

स्नेहिकश्च हितो धूमो नस्यं स्निग्धं च भोजनम् ।

रसो रसयवाग्ग्वश्च क्षीरं सन्तानिका घृतम् ॥३५॥

शिरोवस्तिहितश्चापि क्रमो यश्चानिलापहः ।

अहिंसन् दन्तमूलाणि शर्करासुदुरेद्विषकृ ॥३६॥

लाक्षाचूर्णैर्मधुयुतैस्ततस्ताः प्रतिसारयेत् ।

दन्तहर्षक्रियां चापि कुर्यान्निरवशेषतः ॥३७॥

कपालिका कृच्छ्रतमा तत्राप्येषा क्रिया हिता ।

जयेद्विस्त्रावणैः स्निग्धमचलं कुमिदन्तकम् ॥३८॥

तथाऽवपीडैर्वातघ्नैः स्नेहगण्डुषधारणैः ।

भद्रदाबादिवर्षाभूलेपैः स्निग्धेयैश्च भोजनैः ॥३९॥

चलमुदधृत्य च स्थानं विदहेत् सुषिरस्य च ।

ततो विदारीयष्ट्याहृष्ट्वाऽटककसेरुः ॥४०॥

तैलं दशगुणे क्षीरे सिद्धं नस्ये हितं भवेत् ।

स्नेहों के या घी के अथवा वातव्याधि में कहे त्रैवृत्त स्नेह के सुहाते हुए गरम कवल, वातघ्न द्रव्यों के कपाय दन्तहर्ष को नष्ट करते हैं। स्नेहिकधूम, नस्य, स्निग्ध भोजन, मांसरस, यूप, यवाग, दूध, मलाई, घृत, शिरोवस्ति, वातनाशक जो चिकित्सा हो वह करे। मसूड़ों को हानि पहुँचाये बिना वैद्य शर्करा को उखाड़े। फिर मधु को लाक्षा चूर्ण में मिलाकर दांतों पर रगड़े। सम्पूर्णरूप में दन्तहर्ष की चिकित्सा करे। कपालिका रोग कष्टसाध्य है, उसमें भी यही चिकित्सा बरते। न हिलनेवाले कुमिदन्त में स्वेदन करके रक्त निकालकर अथवा लार टपकाकर शान्त करे। वातनाशक, अवपीड नस्य को धारण करे। भद्रदाबादिगण एवं पुनर्नवा का लेप करे। स्निग्ध भोजन देवे। हिलते हुये दांत को उखाड़कर खोखले स्थान को जला देवे। विदारी, सुलेहटी, सिंधाड़ा, कसेरु, इनके द्वारा तैल को दस गुने दूध में सिद्ध करके नस्य में बरते।

वि० मन्तव्य—ऊपर के दन्त अथवा जादू को निकालने के विकल्पों पर पाठक भली भाँति ध्यान देवें। दन्तमूल में यदि नाड़ी व्रण हो जाता है तो नाड़ी व्रण के समान ही कष्टसाध्य अवश्य होता है, परन्तु असाध्य नहीं होता, निरन्तर वर्षों तक उक्त अथवा उचित चिकित्सा करके देखना चाहिये। यदि लाभ ही न हो तो दन्त निकालने का उपक्रम करना चाहिये, किसी के कहने से घबरकाकर दन्त निकलवा देना उचित नहीं है। अत्यन्त आवश्यकता पड़ने पर, यदि कोई अन्य उपाय रह ही न जाय तब निकलवा देने पर कोई हानि भी नहीं है, इस क्रिया में जो काना आदि होने का उल्लेख किया गया है वह भी कावाचिक ही है, लाख में स्यात् किसीको ऐसा हो। कुमिदन्त रोग जादू में होता है और जादू का मध्य भाग

जीर्ण-शीर्ण हो जाता है, फलतः उसमें गड़वा पड़ जाता है। इस दशा में भी जादू उखाड़ना उचित नहीं है, उक्त विलावण आदि उपचार से वेदना शान्त हो जाती है, अथवा जादू के उस खोखले स्थान को तेजाब के फाहा से जलावे, अग्नि से नहीं। इस रोग में जादू का बाह्यभाग ही क्रिमियों द्वारा खादित होता है उसकी जड़ नहीं, अतः बाह्यभाग टूट जाने पर जड़ जीवन भर बनी रहती है, और चर्बण में सहायक भी रहती है।

हनुमोक्षे समुद्दिष्टा कुर्याच्छादितवत् क्रियाम् ॥४१॥

फलाभ्यम्लानि शीताम्बु रुक्षाश्च दन्तधावनम् ।

तथाऽतिकठिनान् भक्ष्यान् दन्तरोगी विवज्येत ॥४२॥

साध्यानां दन्तरोगाणां चिकित्सितमुदीरितम् ।

हनुमोक्ष में अर्दित के समान चिकित्सा करे। दन्तरोगी, खट्टे फल, शीतल पानी, रूख अन्न, दावुन करना तथा अतिकठिन भक्ष्यों को छोड़ देवे। साध्य दन्त रोगों की चिकित्सा कह दी है।

वि० मन्तव्य—दालन, मञ्जनक तथा श्यावदन्तक नामक दन्तरोग तो असाध्य होते हैं ॥४१-४२॥

जिह्वागतानां साध्यानां कर्म वक्ष्यामि सिद्धये ॥४३॥

ओष्ठप्रकोपेऽनिलजे यदुक्तं प्राक् चिकित्सितम् ।

कण्टकेष्वनिलोत्थेषु तत् कार्यं भिषजा भवेत् ॥४४॥

पित्तजेषु विघृष्टेषु निःसृते दुष्टशोणिते ।

प्रतिसारणगण्डुषं नस्यं च मधुरं हितम् ॥४५॥

कण्टकेषु कफोत्थेषु लिखितेष्वसृजः क्षये ।

पिप्पल्यादिर्मधुयुतः कार्यस्तु प्रतिसारणे ॥४६॥

गृहीयात् कवलाश्चापि गौरसर्षपसैन्धवैः ।

पटोलनिम्बवार्ताकुक्षारयूषैश्च भोजयेत् ॥४७॥

उपजिह्वा तु संलिख्य क्षारेण प्रतिसारयेत् ।

शिरोविरेकगण्डुषधूमैश्चैन्मसुपाचरेत् ॥४८॥

जिह्वागतानां कर्माकं-

जिह्वागत साध्य रोगों की चिकित्सा सफलता के लिये कहता हूँ। वातजन्य ओष्ठप्रकोप में जो चिकित्सा पहले कही है, वातजन्य जिह्वा कण्टकों में वही कार्य वैद्य करे। पित्तजन्य जिह्वा कण्टकों में गोजी-शेफालिका आदि के पत्तों से चर्बण करके दूषित रक्त को निकालकर मधुर प्रतिसारण और मधुर गण्डुष और मधुर नस्य बरते। कफजन्य कण्टकों में लेखन करके रक्त निकालकर, पिप्पल्यादि गण को मधु में मिलाकर प्रतिसारण करे। श्वेतघरलों और सैन्धव के कवल मुख में धारण करे। पटोल, नीम, कटेरी बड़ी, यवक्षार, और यूरों से भोजन करे। उपजिह्वा में लेखन कर क्षार से प्रतिसारण करे। शिरोविरेक, गण्डुष, धूम से चिकित्सा करे। जिह्वागत रोगों की चिकित्सा कह दी है ॥४३-४८॥

तालव्यानां प्रवृत्त्यते ।