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भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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पृष्ठ 734

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३१ ]

काश्यप संहिता में इसी को अन्य प्रकार से कहा है— “अरूपहेतुः बहिर्मागिर्गो वैकृतो निरुद्रवः । एकाश्रयः सुखोपायो लघुपाकः समो ज्वरः । विषमस्तद्विपर्यस्तः तीक्ष्णत्वात् संततो मतः । तद्वत् प्रेतग्रहोत्था ये चत्वारो विषमामागतः ॥ दुर्जयत्वाद् दुर्ग्रहत्वाद् उग्रग्रहप्रग्रहात् । वैषम्यं संततादीनां दारुणत्वादुदाहृतम् । तथा सततकादीनां चतुर्णां कालकारितम् । विषमत्वं प्रबन्ध्यामि ज्वराणां जायते तथा ॥ समस्तो द्रन्द्वयो वाडपि घमनी रसवाहिनीः । दोषाः प्रपन्नाः कुर्वन्ति विषमा विषमज्वरम् । ज्वरितो मुच्यमानो वा मुक्तमानश्च यो नरः । व्यायामगुर्णसाल्यानमतिमात्रमथो जलम् ॥ पायसं कृशरं पिष्टं पल्लवं दधिमन्दकम् । पिप्पाकमाषविकृतिग्राम्यान्पूर्वं यथाऽऽभिषम् ॥ ज्वरोऽभिषधंते तस्य विषमं वाऽऽशु जायते ॥


सद्यो वान्तो विरिक्तो वा स्नेहपीतोऽनुवासितः । शीतोपचारे गुर्वन्तं व्यवाये यश्च सेवते ॥ तस्यापि सहसा वायुरस्थिमज्जान्तरं गतः । कुपितः कोपयत्याशु रूढेष्माणं पिचमेव च ॥ ततोऽस्य चातुर्नैषम्बाद् विषमो जायते ज्वरः । सततोऽन्येद्युक्तो वाडपि तृतीयः स चतुर्थकः ॥ न च नोपशमं याति न च भूयो न कुप्यति । शमप्रकोपयोः कालं न चायमतिवर्त्तते ॥ ज्वरप्रवेगोपरमे देही मुक्त इवेद्यते । नात्यन्तलिप्साग्लानिभ्यां शिरसो गौरवेण च ॥ पुनः पुनर्यथा चैष जायते तन्निबोध मे ॥

काश्यपसंहिता खिल० । १ ॥ ५२ ॥

अहोरात्रादहोरात्रात् स्थानात् स्थानं प्रपद्यते । ततश्चामाशयं प्राप्य दोषः कुर्याद्ज्वरं नृणाम् ॥ ५३ ॥ एक एक दिन रात में दोष एक स्थान से दूसरे स्थान में पहुँचता है। फिर आमाशय में पहुँचकर दोष मनुष्यों में ज्वर को करते हैं।

वक्तव्य—उर में स्थित दोष अहोरात्र में आमाशय में पहुँचकर दूसरे दिन अन्येद्युक्तज्वर को करता है। कण्ठ में स्थित दोष दो अहोरात्र में आमाशय में पहुँचकर तीसरे दिन तृतीयक को करता है। शिर में स्थित दोष तीन अहोरात्र में आमाशय में पहुँचकर चौथे दिन चतुर्थक ज्वर को करता है।

सन्धि में स्थित दोष नित्य ही प्रलेपक को करता है, यह राजयद्मा के रोगियों को होता है ॥ ५३ ॥

तथा प्रलेपको ज्ञेयः शोषिणां प्राणनाशनः ।

दुष्प्रिकित्स्यतमो मन्दः सुकष्टो वायुगोषकृत ॥ ५४ ॥

प्रलेपकज्वर शोषरोगियों (क्षयरोगियों) के लिये प्राणनाशक है। यह ज्वर अतिशय कष्ट से विकृत्सा करने योग्य है, मन्द वेग (धीमा ज्वर), अतिकष्टदायक, धातुओं को सुखानेवाला है ॥ ५४ ॥

कफस्थानेषु वा दोषस्तिष्ठन् द्वित्रिचतुर्षु वा ।

विपर्ययाख्यानं कुरुते विषमान् कृच्छ्रसाधनान् ॥ ५५ ॥

अथवा—कफ स्थानों में स्थित दोष दो तीन अथ चार में—विपर्यय नामक विषमज्वरों को करते हैं ये अतिशय कष्टसाध्य हैं।

वक्तव्य—उर और आमाशय इन दो कफ स्थानों में स्थित दोष-अन्येद्युक्त के विपर्यय ज्वर को करता है, यथा—पूर्वाह्नि में एक समय छोड़कर सारे दिन रात में ज्वर रहता है। इसी प्रकार कण्ठ, उर और आमाशय में स्थित दोष तृतीयक विपर्यय को करता है, इसमें ज्वर तीसरे दिन उत्तरता है। शिर, कण्ठ, उर, आमाशय इन चार स्थानों में स्थित दोष चातुर्थिक विपर्यय को करता है, इसमें ज्वर चौथे दिन उत्तरता है। सतत का विपर्यय नहीं होता, क्योंकि दोष एक ही कफ-स्थान में रहता है, या व्याधि का स्वभाव ही ऐसा है ॥ ५५ ॥

परो हेतुः स्वभावो वा विषमे कैश्चिद्रीरितः ।

आगन्तुश्चातुवन्धो हि प्रायशो विषमज्वरे ॥ ५६ ॥

विषमज्वर का कारण कई तो भूतादि को मानते हैं, कई स्वभाव को ही कारण कहते हैं। क्योंकि प्रायः करके विषम-ज्वर में आगन्तुज (बाह्य) कारण का सम्बन्ध रहता ही है।

वक्तव्य—विषमज्वर में स्वभाव ही उत्कृष्ट कारण है, ऐसा अर्थ करके पर का अर्थ उत्कृष्ट मानते हैं। संतत आदि को कोई आचार्य विषमज्वर मानते हैं, यथा—“ज्वराः पञ्च मयोक्ता ये पूर्णसंततकादयः। चत्वारः संततं हित्वा ज्ञेयास्ते विषमज्वराः ॥ (२) सूक्ष्मसूक्ष्मतरास्थेषु दूरदूरतरेषु च। दोषी रक्तादिमागेषु शनैरल्पं चिरेण यत् ॥ याति देहं नवाऽशेषं भूषिष्टं प्रतिपद्यते। क्रमोऽयं तेन विच्छिन्नने सन्तापो लक्ष्यते ज्वरे ॥ चक्रपाणि की टीका।

भूतसम्बन्ध—“त्रिदोषसंबन्धत्वाच्च भूतसंस्पर्शनादपि। दुष्प्रिकित्स्यतमो दोष तस्माद्ध्येनमुपक्रमेत ॥ बलिभिः शान्ति-होमैश्च सिद्धैः मन्त्रपदेस्तथा। पापापहरणं चास्य कर्तव्यं सिद्धि-मिच्छता ॥ काश्यपसंहिता ॥”