सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[अ० ३६]
सुगन्धिधूपितइलङ्गस्त्रतांशुकविभूषणाः ॥२७६॥
गाढमालिङ्गयेयुस्तं तर्हं वनलता इव ।
प्रह्लादं चास्य विज्ञाय ताः खीरपनयेत् पुनः ॥२८०॥
तासामङ्गपरिष्वङ्गनिवारितहिंसव्ररम् ।
भोजयेद्वित्तमन्नं च यथा सुखमवाप्नुयात् ॥२८१॥
कफ-वातजन्य ज्वरों में रोगी को शीत होनेपर भद्रदाव्यादि, सुरसादि या एलादि उष्णगण के कल्क से लेप करे एवं स्वेद देवे । गुनगुनाती कांजी, शुक्त, गोमूत्र, या मस्तु से सिंचन करे । सुरस (तुलसी), अर्जक, शिगु के पत्तों को पीसकर इनसे लेप करे । शुक्त मिश्रित खार तैल से अभ्यंग करना चाहिये । आरग्वधादि गण का क्वाथ पीने को देवे । एरण्डादि वातन्म द्रव्यों के सुहाते गरम क्वाथ पीने को देवे । एरण्डादि वातन्म द्रव्यों के सुहाते गरम क्वाथ में स्नान करना उत्तम है । इन उपायों से शीत को शान्त करके गुनगुनाते जल से स्नान कराके, ऊन, कपास, रेशम के बने वस्त्रों से ढाँपकर रोगी को सुला देवे । काले अगरू का अंगोपर लेप की हुई, पीनस्तनौवाली, रूप से फूटी फटती, चतुर, उठती जवानीवाली, स्त्रियाँ अंगों से लिपटा लें । ये स्त्रियाँ शीत एवं दीनता को नष्ट करने में श्रेष्ठ हैं । शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान निर्मल सुखवाली, नीले कमल की सी आँखोंवाली चंचलभू, अंगभंग, लछाट, स्तन को कम्पाती हुई, लटकते-हिलाते भारी नितम्बोंवाली, कुन्दुरु के समान ओठोंवाली, कुश उदरवाली, अतिविस्तृत जंघनों के उठाने से यकी, केशर एवं अगरू का अंगोपर लेप किये, भारी, उन्नत स्तनोवाली, सुगन्धित, धूप दिये चिकने नरम-कोमल-शिथिल वस्त्रों से विभूषित, स्त्रियाँ कुशशरीरवाले रोगी को कसकर आलिंगन करें । रोगी का आह्लाद हुआ जानकर स्त्रियों को अलग कर देवे । इन स्त्रियों के अंगों के आलिंगन से शीतज्वर नष्ट हो जानेपर हितकारी अन्न खिलाये । जिससे उसे सुख प्राप्त हो ।
वक्तव्य—ज्वर में वाह्य परिशीलन करे, अन्तः परिशीलन या सम्भोग निषिद्ध है ॥२७१-२८१॥
दाहभिभूते तु विधिं कुर्याद्वाहविनाशनम् ।
मधुफाणितयुक्तेन निम्बपत्राभ्मसाऽपि वा ॥२८२॥
दाहज्वरात् मतिमान् वामयेत् क्षिप्रमेव च ।
शतघौतघृताभ्युक्तं दिहाद्वा यवशक्तुभिः ॥२८३॥
कोलामलकसंयुक्तैः शुक्तधान्याम्लसंयुतैः ।
अम्लपिष्टैः सुशोतेश्च फेनिलापल्लवैस्तथा ॥२८४॥
अम्लपिष्टैः सुशोतेर्वा पलाशतर्जुर्वादेहेत् ।
बदरीपल्लवोत्थेन फेनेनारिष्टकस्य च ॥२८५॥
छिप्तेऽङ्गं दाहवृण्मूच्छाः प्रशाम्यन्ति च सर्वशः ।
रोगी को दाह होने पर दाहनाशक विधि बरते । इसके लिये नीम के पत्तों को पानी में मथकर इसमें मधु और राव मिलाकर इससे लेप करे । दाह ज्वर से पीड़ित रोगी को तुरन्त वमन कराये । अथवा जो के सत्तू को शतघौत घृत में मिलाकर लेप करे । बेर, आँवला, इनको शुक्त और कांजी में मिलाकर इनसे, या शीतल, फेनिल (रीठा या उपोदिका या चांगेरी) के पत्तों को कांजी में पीसकर लेप करे । ढाक के कोमल शीतल पत्तों को कांजी में पीसकर लेप करे । बेर के पत्तों की या रीठे के (या नीम के) पत्तों की क्षाग शरीर पर लेप करे । इनसे अंगोपर लेप करने से दाह, प्यास, मूच्छा, सम्पूर्ण रूप में नष्ट होती है ॥ २८२-२८५ ॥
यवार्धकुड्वं पिष्ट्वा मल्लिघार्धपलं तथा ॥२८६॥
अम्लप्रस्थशतोनिमश्रं तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
एतत् प्रह्लादनं तैलं ज्वरदाहविनाशनम् ॥२८७॥
जो का कल्क आधा कुड्व, मंजीठ आधापल, कांजी एक सौ प्रस्थ, तैल एक प्रस्थ मिलाकर तैल सिद्ध करे । यह प्रह्लादन तैल ज्वर दाह को नष्ट करता है ॥ २८६, २८७ ॥
न्यम्रोधादिर्गणो यस्तु काकोल्यादिश्च यो गणः ।
उत्पलादिर्गणो यस्तु पिष्टैर्वा तैः प्रलेपयेत् ॥२८८॥
तत्कषायाम्लसंसिद्धाः स्नेहाश्चास्पृज्जने हिताः ।
तेषां शीतकषाये वा दाहात्तमवगाहयेत् ॥२८९॥
दाहवेगे स्वतिक्रान्ते तस्मादुदुधृत्य मानवम् ।
परिचिन्ध्याम्वुभिः शीतैः प्रलिम्पेरुचन्दनादिभिः ॥२९०॥
ग्लानं वा दीनमनसमालिष्येयुर्वराङ्गनाः ।
पेलेवक्षौमसंवीताश्चन्दनाद्रूपयोधराः ॥२९१॥
विभ्रत्योऽज्जस्त्रजश्चित्रा मणिरत्नविभूषिताः ।
भजेयुस्ताः स्तनैः शीतैः स्पृशन्त्योऽन्मुखैः सुखैः ॥
प्रह्लादं चास्य विज्ञाय ताः खीरपनयेत् पुनः ।
हिन्तं च भोजयेद्दन्तं तथाऽऽप्नोति सुखं महत् ॥२९२॥
न्यम्रोधादिर्गण, काकोल्यादिर्गण, उत्पलादिर्गण, इनमें से
किसी एक के द्रव्यों को पीसकर लेप करे । इन गणों के क्वाथ में तथा कांजी में सिद्ध किये तैल अभ्यंग में हितकारी हैं । अथवा इसके शीत कषाय में दाह से पीड़ित रोगी को गोता लगाये (बैठाये) । दाहवेग के शान्त हो जाने पर रोगी को उसमें से निकालकर शीतल जल से स्नान कराके चन्दन आदि का लेप कर देवे । ग्लान (उदास) या दीनमनवाले रोगी को, कोमल रेशमी वस्त्रों से ढँपी, स्तनों पर चन्दन का गीला लेप की हुई, कमल की माला पहने, नाना प्रकार के मणिरत्नों से भूषित स्त्रियाँ स्तनों से इसको आलिंगन देवे । खिलते हुए सुखदायक कमलों को धारण करती हुई स्त्रियाँ आलिंगन करें । रोगी को आनन्द हुआ जानकर स्त्रियों को दूर हटा देवे । फिर हितकारी अन्न खिलाये, इससे बहुत सुख होता है ॥ २८८-२९२ ॥