सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३९ ] पित्तञ्वरोक्त' शमनं विरेकोऽन्द्धितं च यत् ।
पित्तञ्वरोक्त शमन चिकिस्खा) विरेचन तथा जो हितकारी
हो, वहू भी करे |
निरैरतिन्तमेवादौ दोषेषु समवायिषु ॥२९४॥
दर्मिवारतरं तद्वि वरातोनां विशेषतः।
संसर्गि दोषों म खसे प्रथम पित्त को निकले । क्योकि
-वररोगियों मे यह पित्त ही विशेष कठिनाई से शान्त दोता है ।
वक्तव्य -- उष्मा पित्ताहते नास्ति, ज्वरो नास्ति, उष्मणा
बिना ॥ इखी से कहा है समवाये ठ दोषाणां पूवः पित्तमुपा-
चरेत् । ज्वरे चेवातीखारे च सवत्रान्यत्र मारुतम् |” सन्निपातउवर मँ कफ का शमन प्रथम होता है, पित्त का निहरण प्रथम | होता दै। इसीसे “सन्निपातज्वरे पूवं ऊुयांदामविशोषणम् |
| पशवा् श्टेष्मणि संक्षीणे शमयेत् पित्तमारुतौ ॥' अष्टांगसंग्रह मे इसका उत्तमता से विचार किया दहै। विज्ञपाठक उसे बही
| देख सकते ह ।|२६४॥ छर्दिमूच्छो पिपासादीनवि रोधाञ्वरस्य च ॥॥२९५॥ उपद्रवाज्ञयेच्चापि प्रत्यनोकेन हेतुना । ज्वर के वमन, मृच्छा, प्यास आदि उपद्रवं को ज्वर के | अविरोधि, करण से विपरीत अपनो चिकित्खा से शान्त करे । | उपद्रव- ं
व्यापेखूपरि यो व्याधिः भवल्युत्तरकाठजः । उपक्रमाविरोधी च स उपद्रव उच्यते || २६५॥ विशचेषमपरं चात्र -णपद्रवना्नम् ।२९६॥ मधुक रजनी मुस्तं दाडिमं साम्ख्वेतसम् । अन्जनं तिन्तिडीकं च नख्दं पत्रमुत्पखम् ॥२९७॥ तवचं ्याघ्रनखं चेव मातुटुङ्गरसो मधु । दिद्यादेभिज्वेरातेस्य मधुडुक्तयुतैः शिरः ॥२९८॥ भिरोभितापसंमोदवमिदिकाप्रवेपधून्
प्रदेहो नाञ्चयत्येष उव रितानामुपद्रवान् ॥ २९६॥ उपद्रवनाशक विशेष चिकित्सा को सुनो । सुेहटी, हल्दी, ह अनारदाना, अग्ख्वेतस, अंजन (सुरमा), इमली, खस, | ट का पत्ता, दाल्चीनी, व्याधनख, बिजोरे का रस, घु ५ मु शुक्त मे मिलाकर ज्वररोगी के सिर प९ ल्प करे। शिरकी पीड़ा, संमोह, वमन, हिचकी, कमन न्ट होते वर के उपद्रवो को यह प्रदेह न्ट करता दै ॥२६६-२९९॥ कमथ ह्ोवेरयुत्पल्यानि मधूलिकाम् ॥३००॥ ~ द्वा चूणानि मधुना सपिषा च जयेद्टमिष। प्मप्रसेकासूक्पित्तहिकाश्वासाश्च दारुणान् ॥३०९॥ मुभा. बालक, कमल, जख्यष्टी इनका चूण मघ ओर चारने प्र वमन नष्ट होती दै। कफप्रसेक, रक्तपित्त,
प रवास, कास नष्ट होते है ॥२००,२०२१॥ ; दय् व्वरातेखिफलां पिष्पीं च समाक्षिकाम्। `
₹त्तरतन्त्रम् ६९प् कासे श्वासे च मधुना सर्षिषा च सुली भवेत् ॥२०२॥ उवरपीड़ितरोगी त्रिफला, पिप्यली ; मदु को पीसकर-मधु ओर धृत में मिलाकर कास शवा म चाटे, इससे सुख होता हे । (मधु के साय पसे, फिर मधु से घोल्कर चे ) ॥३०२॥ विदारी दाडिमं टोध' दधित्थं वोजपूरकम् । एभिः प्रदिह्यान्मूधनं वृड्दाहातंस्य देहिनः ॥३०६॥ ` वरषा एवं दह से पीड़ित रोगी के सिर पर विदारी अनारदाना, रोध, केथ, व्रिजोरे से ठेथ करे ॥२०३॥ द्ाडिमस्य सितायाश्च द्राक्चामख्कयोस्तथा । वरस्ये धारयत् कल्कं गण्डूषं च यथाहितम् ॥३०४॥ कषीरेज्वरसमाक्षोकसर्पिस्तेडोष्णवारिमिः। | सुख को विरखता मे अनारदाना, शकंरा, द्राक्षा ओर आबले का कल्क सुख में धारण करे । दुध, ईख का रख, मधु, पृत, तेल, गरम पानी का कवल मुख मे ध।रण् करे ॥३०४॥ शून्ये मूध्नि हितं नस्यं जौवनायस््तं घृतम् ॥३०५॥ शिरके शूल्य (खाली) होने पर जीवनीय गण की दस
` ओषधियों से सिद्ध धृत का नस्य देवे ॥२०५॥ चूर्णितेखिषाश्यामात्रिवृषिष्पटिसंयुतेः ।
सक्षौद्रः शकरायुक्तो विरेकस्तु प्रशस्यते ॥३०६॥
` पक्वे पित्तञवरे रक्ते चोध्वगे वेपथौ तथा ।
पि्लव्वरं क पक जने पर ( निरामावस्था मे ), ऊध्वंगामो
रक्तपित्त मे, कम्पन में- त्रिफला, निशोथ, काली निशोयः
पिप्पली इनका चूणं मधु ओर करा के साथ मिलाकर विरेचन
के लिये देवे ॥२३०६॥
कृफबातोत्थयोरेवं स्नेहा भ्यगेर्विंओोधयेत् ॥३०७॥
कफा-वातजन्य उ्वररोगी का स्नेहन ओर अभ्यंग से शोधन
कृरे ॥|२०७॥
हृतदोषो भमावेस्तु शिदयात् शोद्रसिताभयाः।
दोष के निकल जाने पर मी यदि चक्कर अति हीं तो
मधु, शकरा, हरड़ को चट ~>.
वातष्नमधुरेरयोऽ्या निरूहा वातजे उरे ॥२०८॥
अवेच्य दोषं प्राणं च यथास्वं चादुवासनाः ।
वातजन्यज्वर में भंद्रदाव्यांदि वात्न एवं काकोल्यादि
मधर द्रव्यो से निरूह देवे । दोष एवं बल का विचार करके,
दोषहर ( वात दोष हर ) द्रव्यो से साधित स्तेह का अनुवासन
बरते ॥३०८॥ _ ॑ |
उत्पङादिकषायाया (व्या) श्चन्दनोशीरसंयुताः ।३०९
शक॑रामघुराः शीताः पित्तञ्वरहरा मताः ।
आम्रादीनां स्वचं शङ्खं चन्दनं सथुकोतपरे ॥२१०॥
गौरिकाञ्जनमक्ि्ठायणालान्यथ पद्मकम्। `
इलच्णपिष्ठं तु पयसा शकरामघुसयुतम् ॥३११॥
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