सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३१ ]
चन्दन, खस युक्त उत्प्लादिगण के कषायों में शर्करा मिलाकर मधुर बनाकर, शीतल करके निरुह देवे, ये पित्राज्वर नाशक हैं। न्यम्रोधादि गण में कहे आम्र से लेकर नन्दीवृक्ष पर्यन्त वृक्षों की त्वचा, शंख, लालचन्दन, मुलेहटी, कमल, गेरु, अंजन ( सुरमा ), मंजीठ, कमलनाल, पद्माख, इनको बारीक पीसकर, दूध में घोलकर, शर्करा-मधु मिलाकर, भली प्रकार छानकर ठण्डा करके जलन अनुभव करनेवाले रोगी को बस्ति देवे ॥३०६-३११॥
ज्वरदाहापहं तेषु सिद्धं चैवानुवासनम् ॥३१२॥ न्यम्रोधादि के छालों में सिद्ध किया अनुवासन ज्वर एवं दाह को नष्ट करता है ॥३१२॥
आरम्बधगणकवाथाः पिप्पल्यादिसमायुताः । सक्षौद्रमूत्रा देयाः स्युः कफज्वरविनाशनाः ॥३१३॥
आरम्बधादिगण के क्वाथ में पिप्पल्यादिगण का कल्क, मधु और गोमूत्र मिलाकर निरुह देवे, यह कफज्वरनाशक है। आरम्बधादि कफनाशक द्रव्यों से सिद्ध अनुवासन देवे ॥३१३॥
कफऽनैरेव संसिद्धा द्रव्यैश्चाप्यनुवासनाः । आरम्बधादि कफनाशक द्रव्यों से सिद्ध अनुवासन देवे । संसर्गं सन्निपाते च संसृष्टा वस्तयो हिताः ॥३१४॥ दोषों के संसर्ग और सन्निपात में दोषों के अनुसार वस्तियों को मिलाकर देवे ॥३१४॥
संसृष्टैरेव संसृष्टा द्रव्यैश्चाप्यनुवासनाः । दोषों के संसर्ग में द्रव्यों को मिलाकर अनुवासन देवे ॥ वातरोगापहाः सर्वे स्नेहा ये सम्यगीरिताः ॥३१५॥ विना तैलं त एवं स्युर्योज्या मास्तुते ज्वरे । वातरोग नाशक जो सब स्नेह ( घी, तैल, वसा, मजा )-भली प्रकार कहे हैं, वे सब स्नेह वातजन्यज्वर में तैल को छोड़कर बरतने चाहिये। अनुवासन में तैल नहीं देना चाहिये ॥
निखिलेनोपयोज्याश्च त एवाभ्यञ्जनादिषु ॥३१६॥ अभ्यंग आदि कार्यों में सम्पूर्ण रूप से ये सब स्नेह ( घी, तैल, वसा, मजा ) बरतने चाहिये ॥३१६॥
पैतिके मधुरैस्तिकैः सिद्धं सर्पिश्च पृथ्यते । पित्राज्वर में-मधुर एवं तिक द्रव्यों में सिद्ध घृत अभ्यंग आदि में उत्तम है ।
श्लैष्मिके कटुतिकैश्च संसृष्टानोतरेषु च ॥३१७॥ श्लैष्मज्वर में-कटु, तिक द्रव्यों से सिद्ध घृत ( या तैल अभ्यंग आदि में बरते। संसृष्ट एवं सन्निपात दोषों में वातादि-द्रव्यों से मिश्रित घी तैल आदि को परस्पर मिलाकर बरते ।
वक्तव्य—इलक्षण ने कफ में भी घृत का उपयोग अभ्यंग आदि में करने के लिये कहा है। इसमें संस्कार के कारण घृत
कफनाशक है। तुल्य गुण होने पर घृत कफ को नहीं बढ़ाता ॥३१७॥
हृतावशेषं पित्रं तु त्वकस्थं जनयति ज्वरम् । पिबेदिज्वरसं तत्र शीतं वा शर्करोदकम् ॥३१८॥ शालिषष्टिकयोरन्तमइनीयात् क्षीरसंप्नुतम् ।
निकालने से बचा पित्र त्वचा में स्थित होकर ज्वर उत्पन्न करता है, इसमें ईख का रस या शर्करा का शीतल शरबत पीये। दूध में भिगोये शाली चावल या सांठी के चावल खाये ॥३१८॥
कफवातोत्थयोरैव स्वेदः भयङ्गो प्रयोजयेत् ॥३१९॥ निकलने से बचे कफ और वायु के कारण यदि ज्वर हो तो स्वेदन एवं अभ्यंग करे ॥३१९॥
घृत्नं द्वादशरात्रात्तु देयं सर्वज्वरेषु च । तेनान्तरेणाशयं स्वं गता दोषा भवन्ति हि ॥३२०॥ सब प्रकार के ज्वरों में बारह दिन के पीछे घृत देना चाहिये। क्योंकि इतने समय में दोष अपने अपने स्थान पर पहुँच जाते हैं, उनका परिपाक हो जाता है ॥
ज्वरः कषायेः वमनैः लंघनैः लघुमोजनैः । रूक्षस्य ये न शम्यन्ति सर्पिस्तेषां भिषग्वितम् ॥ यः स्यादनुबलो धातुः स्नेहवश्यः सचानिलः ॥ कषायाः सर्ब एवैते सर्पिषा सह्योजिताः । प्रयोज्या ज्वरशान्त्यर्थमग्निसंधुक्षणः शुभाः ॥चरक ॥ धातून प्रक्षोभयन् दोषो मोक्षकाले बलीयते । तेन व्याकुलचिन्तास्तु श्रियमाण इवेहते ॥३२१॥
मोक्षसमय में धातुओं को चलायमान करते हुए दोष बलवान् की भाँति आचरण करते हैं। इस दोष के कारण रोगी व्याकुल होता है और मरते हुए मनुष्य के समान कराहना, गात्रविच्छेपण आदि चेष्टाओं को करता है ।
वक्तव्य—जिस प्रकार बुझता हुआ दीपक एक बार जोर से चमकता है। चरक—“ज्वरप्रमोचे पुरुषः कूजन् वमति चेद्वते । श्वसन्निवर्णः स्विन्नाङ्गो वेपते लीयते मुहुः ॥ प्रलपत्युष्णसर्वाङ्गः शीताङ्गश्च भवत्यपि । विसंशो ज्वरवेगातः सक्रोष इव वीक्ष्यते ॥ सदोषशब्दं च शकृद् एवं खवति वेगवद् । लिंगान्येतानि जानीयात् ज्वरमोचे विचक्षणः” ॥३२१॥
१ (१) ज्वर दो प्रकार से उत्तरता है—या तो एकदम से ताप परिमाण साधारण बिन्दु पर आता है, या धीरे धीरे आता है। इसी को कार्यासिस और लायासिस कहते हैं यथा— बहुदोषस्य बलवान् प्रायेणाभिनवो ज्वरः । सक्रियादोषपक्ष्या चेद् विमुञ्चति मुदाक्षणम् ॥