सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ अ० ५७ ]
ही क्षमक्षा जाय तो अनुचित नहीं है, देखिये सु० सू० अ० ४६ श्लो० ५०३ तथा श्लो० ४६६ । अरोचकरोग में रसनेन्द्रिय भी क्रियाहीन हो जाती है, जिससे रस का भलीभांति ग्रहण नहीं होता ॥१,२॥
दोषैः पृथक् सह च चित्राविपर्ययाच्छ भक्तायनेषु हृदि चावतते प्रगाढम् ।
नास्ते रुचिर्भवति तं भिषजो विकारं भक्तोपघातमिह पञ्चविधं वदन्ति ॥३॥
वातादि पृथक् दोषों से, तानों दोषों के मिलने से तथा चित्त के विपर्यय से-(काम, शोक, भय आदि से) अन्नवह स्तोमें और हृदय में दोषों के अतिशय ब्याप्त हो जाने पर अन्न में रुचि नहीं होती । वैद्य इस रोग को भक्तोपघात—(अरोचक) कहते हैं, यह पांच प्रकार का है ।
वक्तव्य—“मात्रयाऽप्यभ्यवहृतं पथ्यं चान्नं न जीर्यति । चिन्ताशोकभयक्रोधदुःखशय्याप्रजागरैः” च० वि० अ० २-११ ।
पृथगदोषैः समस्तेर्वा जिह्वाहृदयसंस्थितैः । जायतेऽरुचिराहारैः द्विद्वैरयैश्च मानवेः ॥
कषायतिक्रमधुरैः विद्यान्मुखरतैः क्रमात् । वाताद्यैरुचिं जातां मानसीं दोषदर्शनात् ॥
लक्षण—
प्राक्षप्तं तु मुखे चान्नं जन्तोर्न स्वदते मुहुः । अरोचकः स विज्ञेयो भक्तद्वेषमतः शृणु ॥
चिन्तयित्वा तु मनसा दृष्ट्वा श्रुत्वाऽपि भोजनम् । द्वेषमायाति यज्जन्युः भक्तद्वेषः स उच्यते ॥
यस्य चान्ने भवेच्छुद्धा सोऽभक्तच्छन्दु उच्यते ॥३॥
हृच्छूलपीडनयुतं विरसाननत्वं वातात्मके भवति लिङ्गमरोचके तु ।
वातजन्य अरोचक में हृदय में शूल, हृदय में पीड़ा, मुख में विरसता होती है ।
हृद्वाहचोषबहुता मुखतिक्रता च मूच्छां सगुह् भवति पित्तकृते तथैव ॥४॥
पित्तजन्य अरोचक में, हृदय में, दाह, चोष की अधिकता, मुख में तिक्रता, मूच्छां, प्यास होती है ॥४॥
कण्डुगुरुत्वकफसंघवसादतन्द्राः श्लेष्मात्मके मधुरमास्यमरोचके तु ।
कफजन्य अरोचक में—कण्डु, भारीपन, कफ का संखाव, शिथिलता, तन्द्रा और मुख में मधुरता रहती है ।
सर्वोत्तमके पवनपित्तकफा बहुनि रूपण्यथास्य हृदये समुदीरयन्ति ॥५॥
सन्निपातजन्य अरोचक में वायु, पित्त, कफ इसके हृदय बहुत से लक्षण उत्पन्न कर देते हैं ॥५॥
संरागशोकभयविप्लुतचेतसस्तु चिन्ताकृतो भवति सोऽशुचिदर्शनाच्छ ।
संराग (काम), शोक, भय से विकृत चित्त के कारण तथा बीभत्स वस्तु के दर्शन से चिन्ताजन्य अरोचक होता है ।
वाते वचाम्बुवमनं कृतवान् पिबेच्च स्नेहैः सुराभिरथवोष्णजलेन चूर्णम् ॥६॥
कृष्णाविडङ्ग्यवभस्महरेणुभागी- रास्तैलहिङ्गुलवणोश्वासनागरणाम् ।
वातजन्य अरोचक में वचा के क्वाथ से वमन करके मनुष्य पिप्ली, विडंग, यवक्षार, हरेणु, भागी, रास्ता, इलायची, हींग, सैन्धव, सौठ इनका चूर्ण स्नेह (घी), सुरा या गरम जल से पीये ॥६॥
पित्तो गुडाम्बुमधुरैर्भनं प्रज्ञस्तं स्नेहः ससैन्धवसितामधुसपिरिष्टः ॥७॥
पित्त में गुड के जल (शर्बत) से या काफोल्यादि गण से वमन करना प्रशस्त है । सैन्धव, शर्करा, मधु, घी का स्नेह उत्तम है ॥७॥
निम्बाम्बुवामितवतः कफजेऽनुपानं राजद्रुमाम्बु मधुना तु सदीभ्यकं स्यात् ।
कफजन्य, अरोचक में नीम के क्वाथ से वमन करके, अमलतास का क्वाथ, अजवाइन और मधु के साथ पीये ।
चूर्णं यदुक्तमथवाऽनिलजे तदेव सर्वैश्च सर्वकृतमेवमुपक्रमेत ॥८॥
वायु का अनुबन्ध होने पर कफजन्य अरोचक में वातजन्य अरोचक में कहा कृष्णा विडंग आदि चूर्ण पीये । सन्निपातजन्य अरोचक असाध्य कहकर वातादिज अरोचक नाशक चिकित्सा करे ॥८॥
द्राक्षापटोलविडवेत्रकरीरनिम्ब- मूर्वाभयाश्चबद्रामलकेन्द्रवृक्षैः ।
बीजेः करञ्जनपृथ्वभवेञ्च पिष्टे- लैहं पचेत् सुरभिमत्रयुतं यथावत् ॥९॥
मुस्तां वचां त्रिकुटुं रजताद्रव्यं च भागीं च कुष्ठमथ निर्दहनीं च पिष्टु ।
मूत्रेऽविजे द्विरदमत्रयुते पचेद्वा पाठां तुगामतिविषां रजनीं च मुख्याम् ॥
मण्डूकिमर्कममृतां च सलाङ्गलाख्यां मूत्रे पचेत् महिषस्य विधानविद्वा ।
एतान्न सन्ति चतुरो लिहतस्तु लेहान् गुरुमाहचिषसनकण्ठहृदामयाश्च ॥११॥
चार लेह—(१) द्राक्षा, पटोल, विडनमक, बेत, करीर, नीम, मूर्वा, हरड, बहेडा, बेर, आंवला, कुटज, करंज के बीज, अमलतास का गूदा इनसे गौमूत्र में विधि पूर्वक लेह बनाये (२) मुस्ता, बच, त्रिकुट